अठारह शक्ति पीठों में एक: बस्तर की माई दंतेश्वरी
January 15, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | चैत्र कृष्ण द्वादशी | मंगलवार
नक्षत्र: शतभिषा | योग: शुक्ल | करण: कौलव
पर्व विशेष : | तदनुसार 14 अप्रैल 2026

देवी के किसी शक्तिपीठ की स्थापना कैसे हुई होगी है? यह सोचना ही आंखों में एक चमक उत्पन्न कर देता है। ऐसा देव दुर्लभ कार्य आज की पीढ़ी में किसी ने देखा या सोचा हो या पढ़ा हो यह एकदम असंभव सा प्रतीत होता है। देवी के शक्तिपीठ की स्थापना का दृश्य तो देवता भी देखने के लिए लालायित रहते हैं। जगत जननी भगवती महिषासुर मर्दिनी की स्थापना, शक्तिपीठ स्थल पर होना एक अत्यंत ही दुर्लभ परंपरा है। सनातन धर्म में देवी शक्तिपीठ की स्थापना सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक कृत्य है। इस अवसर पर देवता स्वयं आदिशक्ति की स्थापना में सम्मिलित होते हैं। भारत में शक्तिपीठों के स्थापना की गाथा बेहद ही रोचक है।
प्रचलित कथा है कि भगवान शिव की अर्धांगिनी देवी सती ने अपने परमेश्वर भगवान शिव के अपमान से आहत हो गई और यज्ञ कुंड में कूद कर आत्मदाह कर लिया। तब भगवान शिव देवी सती के देह को लेकर तीनों लोक में विलाप करने लगे। इस स्थिति में, भगवान श्री विष्णु ने अपने चक्र से देवी सती के देह को कई टुकड़ों से विखंडित कर दिया। धरती पर जहां जहां देवी सती के अंग गिरे, वहां वहां पर देवी के शक्तिपीठ स्थापित हुए हैं। विभिन्न पुराणों में देवी सती की यह कथा का स्वरूप भिन्न भिन्न है। इसी तरह से देवी सती के अंगों पर स्थापित हुए शक्तिपीठों की संख्या भी अलग अलग पुराणों, ग्रंथों और स्तुति में भिन्न भिन्न प्राप्त होती है। विभिन्न पुराणों ग्रंथों और स्तुति में,शक्तिपीठ चार, अठारह, छब्बीस, इक्यावन, बावन चौंसठ चौहत्तर और एक सौ आठ तक की सूची में प्राप्त होते हैं। भारत के अनेक स्थानों की तरह ही, भगवती का एक शक्तिपीठ बस्तर क्षेत्र में भी स्थापित हुआ था। शंकराचार्य रचित अष्टादश पीठ स्तोत्रम में एक शक्तिपीठ माणिक्या चक्रकोटिली अर्थात चक्रकोट की माणिक्य देवी का शक्तिपीठ भी है।

बस्तर में दंतेवाड़ा देव भूमि पर देवी सती माता के दान्त गिरने की मान्यता पुरातन समय से प्रचलित रही है इसलिए इस नगर का नाम दंतेवाड़ा है, दंतेवाड़ा में भैरव मंदिर के 1061 ईस्वी के शिलालेख में इस नगर का नाम दत्तवाड़ा उल्लेखित है जो कि इस मान्यता का एक महत्वपूर्ण प्रमाण है। बस्तर रियासत काल में बस्तर ग्राम में राजधानी के कारण बस्तर क्षेत्र कहलाया। इसके पूर्व यह चक्रकोट राज्य कहलाता था। आठवीं सदी से लेकर चौदहवीं सदी तक के दर्जनों शिलालेखों में इस स्थल का नाम चक्रकोट उल्लेखित मिलता है।
अष्टादश पीठों में एक पीठ चक्रकोट की माणिक्य देवी पीठ इसी बस्तर क्षेत्र में है। दंतेवाड़ा का दन्तेश्वरी मंदिर मूलतः चक्रकोट की माणिक्य देवी का शक्तिपीठ है। इस देवालय में 1061 ईस्वी के भैरव मंदिर अभिलेख और 1224 ईस्वी में छिंदक राजवंश के जगदेक भूषण तृतीय नरसिंह देव द्वारा देवी को भूमि अर्पित करने का अभिलेख स्थापित है जिससे यह देवालय ग्यारहवीं सदी से अपने मूल अस्तित्व में स्थापित है। छिंदक राजवंश के जगदेक भूषण प्रथम 1063 ईस्वी, बारसूर बत्तीसा मंदिर 1210 ईस्वी, काकतीय राजवंश के अन्नमराज (1324 ईस्वी),महारानी मेघावती (1410 ईस्वी), राजपाल देव (1709 ईस्वी), भैरमदेव(1853 ईस्वी से 1891 ईस्वी) आदि के शिलालेख, ताम्रपत्र, स्तुति, वंशावली जैसे अभिलेखों में देवी का नाम माणिक्य देवी ज्ञात होता है।
चौदहवीं सदी में महाराज अन्नम देव के काल में माणिक्य देवी को (देवी सती के) शुभ दन्त के स्थान पर स्थापित देवी कहा गया है। यह दूसरा महत्वपूर्ण प्रमाण है कि मध्यकाल में दंतेवाड़ा में देवी सती के दान्त गिरने की मान्यता प्रचलित रही है। इसी मान्यता के तहत अठारहवीं सदी में माणिक्य देवी को लोक प्रचलित नाम दन्तावला देवी कह कर संबोधित किया जाने लगा था। इसी तरह उन्नीसवीं और बीसवीं सदी में माणिक्य देवी, लोक प्रचलित नाम दन्तेश्वरी देवी के नाम से विख्यात है। देवी का मूल नाम माणिक्य देवी सिर्फ अभिलेखों में सीमित रह गया है।
अष्टादश पीठों में एक चक्रकोट की माणिक्य देवी अर्थात देवी दन्तेश्वरी माई के प्रतिमा और उनकी स्थापना का पर्व ही वर्तमान फागुन मंडई है। दंतेवाड़ा क्षेत्र में मंदिर के पुजारी, बारह लंकवार, सेवादार, नगर वासी आदि ने पीढ़ियों से शक्तिपीठ की स्थापना के इस पर्व को फागुन मंडई को जीवंत रखा है।
फागुन मंडई अर्थात फागुन में मंडाना। मंडाना लोक का शब्द है अर्थात स्थापना करना। फागुन में देवी को मंडाना अर्थात देवी को फागुन महीने में स्थापना करना, यही फागुन मंडई है। इस फागुन मंडई के समस्त रीति रिवाज और परंपराएं शक्तिपीठ स्थापना की परंपरा है। इन रस्मों और परंपराओं को देखना अर्थात शक्तिपीठ की स्थापना कैसी होती है? उन समस्त रस्मों की कुछ स्मृतियां आज इन परम्पराओं में सुरक्षित है। पुजारी, बारह लंकवार और सेवादार की पीढ़ियों की यह साधना को प्रणाम है जिन्होंने शक्तिपीठ के स्थापना को सदियों से प्रत्येक वर्ष पुनः स्मरण किया और उनका निर्वहन किया।

बसंत पंचमी का यह पावन दिवस शक्तिपीठ स्थापना के पर्व का प्रथम दिवस है। इस दिन सबसे महत्वपूर्ण रस्म का निर्वहन होता है जिसमें शक्तिपीठ पर स्थापित होने वाली देवी महिष मर्दिनी दुर्गा के अस्त्र त्रिशूल की स्थापना। आराध्य देवता के अस्त्र की स्थापना का मूल कारण यही है कि, प्राण प्रतिष्ठा का कार्य निर्विघ्न सम्पन्न हो। इस शक्तिपीठ की आराध्य देवी महिष मर्दिनी दुर्गा है जिनका अस्त्र त्रिशूल है। इसलिए बसंत पंचमी को देवालय के सम्मुख देवी के प्रिय आयुध त्रिशूल की स्थापना की जाती है। यह शक्तिपीठ स्थापना की पहली महत्वपूर्ण रस्म है।
इसके बाद समस्त देवी देवताओं को आमंत्रित करने की रस्म होती है। गांव —गांव के, दूर दराज के, समस्त प्रमुख देवी देवताओं को स्थापना पर्व में आमंत्रित किया जाता है। उन्हें न्यौता भेजा जाता है। और फिर गांव गांव के देवी देवताओं के प्रतीक ध्वज, छत्र, सिंहासन, आदि को लेकर उनके पुजारी इस अत्यंत पावन पर्व में सम्मिलित होते हैं।

इसके बाद, इसी क्रम में, फाल्गुन शुक्ल षष्ठी इस शक्तिपीठ की स्थापना का सबसे महत्वपूर्ण दिवस है। इस दिवस को ही,सदियों पूर्व ही, देवी सती के दान्त गिरने के स्थल पर, देवी महिष मर्दिनी दुर्गा की प्रतिमा स्थापना की गई थी। स्मरण रहे हैं कि देवी सती के दान्त गिरने के स्थल पर देवी का स्वरूप उनके प्रतीक छत्र के रूप में सदियों से स्थापित रहा है। प्रतिमा स्थापना की परम्परा में आठवीं सदी पूर्व ही नल राजवंश के शासकों द्वारा माणिक्य देवी वर्तमान दन्तेश्वरी माई के प्रतिमा की स्थापना की गई थी। फाल्गुन शुक्ल षष्ठी के अत्यंत ही पावन दिवस को, देवी प्रतिमा, शक्तिपीठ स्थल पर स्थापित की गई थी, इसलिए प्रत्येक वर्ष ,इसी फाल्गुन शुक्ल षष्ठी को देव पड़ाव में , देवी के मूल शक्तिपीठ स्थल पर, उनके प्रतीक छत्र को ले जाकर स्थापित किया जाता है। समस्त रस्मों के साथ, देवालय से देवी के छत्र को देव पड़ाव स्थल पर, स्थापित कर देवी की आराधना की जाती है।

इसके बाद प्रत्येक दिवस, देवी की पालकी का भ्रमण होता है। देवी अपने पालकी में बैठकर, नगर भ्रमण को निकलती है। प्रत्येक संध्या को नौ दिनों तक निरंतर, देवी की पालकी का भ्रमण, देवी के सरोवर तक होता है। इस दिन पुजारी, उपवास कर अपने पारंपरिक वस्त्रों एवं फूलों के मुकुट को पहनकर देवी के पालकी के उपासक बनकर साथ चलते हैं और पालकी के साथ, समस्त देवी देवताओं के छत्र और ध्वजाएं भी भ्रमण में सम्मिलित होती है। नृत्य, गान, वाद्य, यंत्र, देवी देवताओं का लोक संसार देवी के साथ भ्रमण में होता है, यह देव दुर्लभ दृश्य है, जो प्रतिदिन सायं पालकी भ्रमण में दिखाई देता है। पालकी की गंगा आरती की जाती है। रात्रि को प्रत्येक दिवस खोर खुंदनी , नाच मांडनी जैसे रस्म होती है जो लोक समुदायों द्वारा देवी के प्रति नृत्य गान करके उनके प्रति कृतज्ञता की रस्में है।

इसके बाद, लोक में मनोरंजन हेतु लोक नाटकों की रस्मों का निर्वहन रात्रि को किया जाता है। इन लोक नाटकों में आखेट की परम्पराओं का, नाट्य रूपांतरण प्रस्तुत किया जाता है। जिनमें विभिन्न लोगों द्वारा नाट्य भूमिका निर्वहन की जाती है। इसमें हास्य भूमिका भी रहती है। इन आखेट नाट्यों में लम्हा मार, कोडरी मार, चीतर मार, गौर मार, छेरी लंगड़ी जैसे नाटक लोक मनोरंजन हेतु किए जाते हैं। आंवलामार की रस्म भी लोक मनोरंजन और निरोगी जीवन के कामना की रस्म है। फागुन मंडई में एक रस्म सती की परंपरा का स्मरण पर्व भी है। ताड़ फलंगा रस्म में ताड़ पत्तों को धोना और उन ताड़ पत्रों के दहन से सती परंपरा को स्मरण किया जाता है। फाल्गुन मंडई की होलिका दहन रस्म मूलतः सती परंपरा के प्रति स्मरण और उनके मान का पर्व है। ताड़ पत्रों के दहन की राख को, माथे पर लगाना और उस स्थल की परिक्रमा करना, यह प्रमाणित करता है कि, राजकुल में किसी राजमहिषी ने, अपने दिवंगत पति के स्मृति में अग्नि दाह को चुन लिया था। उसी के सती स्मारक के सामने, प्रत्येक वर्ष यह रस्म निभाई जाती है। होली में भैरव का रूप धारण कर, भ्रमण करना, भैरव की उपासना करना, देवी को प्राकृतिक रंग लगाना, जैसे महत्वपूर्ण रस्म इस फागुन मंडई का अंग है।

इस शक्तिपीठ की स्थापना का सबसे अंतिम दिवस महत्वपूर्ण है, जब देवी के छत्र को लेकर, साथ में हजारों देवी देवताओं के प्रतीक छत्र ध्वज और वाद्य मंडली, नृत्य मंडली और समस्त लोक का नगर भ्रमण होता है। यह बुधवार का दिवस है। इस दिन बस्तर के समस्त देवी देवता, दंतेवाड़ा की इस पवित्र देव भूमि पर, देवी के साथ नगर भ्रमण और परिक्रमा के लिए प्रस्थान करते हैं। देवी के ध्वज की स्थापना की जाती है। लाई और सिक्के फेंककर, सबकी समृद्धि की कामना की जाती है। जिया पुजारी , देवी के छत्र को लेकर नगर भ्रमण कराते हैं। देवी के शक्तिपीठ पर, प्रतिमा स्थापना के बाद, उनके ध्वज स्थापना और नगर परिक्रमा की महत्वपूर्ण,परंपरा ही फागुन मंडई का सबसे मुख्य दिवस है। इसके बाद समस्त देवी देवताओं को भेंट अर्पित कर विदा किया जाता है।

शक्तिपीठ पर देवी प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा पर्व की,यह फागुन मंडई लोक में, लोक के द्वारा जीवंत है। धन्य है वे राजा गण, पुजारी, बारह लंकवार, सेवादार, नगर वासी, ग्राम वासी, समस्त बस्तर का देव लोक, जिन्होंने प्रत्येक वर्ष इस पर्व को आयोजित कर रखा है। देवी सती के दान्त गिरने के इस शक्तिपीठ स्थल पर, देवी दुर्गा महिष मर्दिनी की प्रतिमा की स्थापना का यह पर्व, कई सदियों पहले हुआ आयोजित किया गया था, और आज भी कुछ रस्मों के साथ, निर्वहन किया जा रहा है। यह देव दुर्लभ पर्व है। यह सनातन धर्म की स्थापना का पर्व है। ऐसा देव दुर्लभ पर्व आज दंतेवाड़ा की फागुन मंडई है, जो कि सनातन की स्थापना का महत्वपूर्ण धार्मिक पर्व है।
(लेखक इतिहास विषय के सहायक प्राध्यापक और “चक्रकोट की माणिक्य देवी —बस्तर में एक शक्तिपीठ” जैसे शोध पूर्ण पुस्तक के लेखक है)
फागुन मंडई- देवी के शक्तिपीठ स्थापना का देव दुर्लभ पर्व
March 10, 2026