आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी | सोमवार

नक्षत्र: पुनर्वसु | योग: वज्र | करण: गर

पर्व विशेष : | तदनुसार 10 अगस्त 2026

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संवत् 2083 विक्रमी | आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी | सोमवार

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पर्व विशेष : | तदनुसार 10 अगस्त 2026

छत्तीसगढ़ी फाग गीत

छत्तीसगढ़ी फाग गीत

भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहाँ की जलवायु कृषि के अत्यधिक अनुकूल है। यहाँ की भूमि अत्यंत उर्वरा है। कृषि के लिए यहाँ वर्षा ऋतु एवं शरद ऋतु में अनुकूल वर्षा होती है। ग्रीष्म ऋतु में यहाँ चार माह तीव्र गर्मी पड़ती है जिसके परिणामस्वरूप मौसमी (मानसूनी) वायु द्वारा तीन-चार माह तक अच्छी वर्षा होती है। चार माह वर्षा ऋतु के होते हैं और चार माह शरद ऋतु के।

यूँ ऋतु चक्र को भारत में छह भागों में विभक्त किया हुआ है। शरद और ग्रीष्म के बीच में वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा ऋतु के मध्य में हेमन्त और वर्षा ऋतु और शरद ऋतु के मध्य में शिशिर ऋतु, इस प्रकार बना हुआ है हमारा फसल चक्र। भारत भूमि के विशाल भू-भाग पर वर्षा निर्मित जंगल हैं। बड़ी-बड़ी और ऊँची-ऊँची पर्वत श्रेणियाँ है और विशाल नदियाँ हैं। इन नदियों ने वनों एवं पर्वतों से उपजाऊ मिट्टी लाकर सपाट मैदानी भागों में फैलाई है। नदियों द्वारा लाई गई मिट्टी से निर्मित ये मैदानी भाग अत्यन्त उर्वर है।

भारतीयों ने इन मैदानी क्षेत्रों को प्राचीनकाल से ही पहचान लिया था और इसीलिए हिमालय से निकलकर अरब समुद्र में गिरने वाली नदियों सतलज, व्यास, रावी, चिनाब और झेलम के मैदानी क्षेत्र का नामकरण पंजाब के रूप में किया था और हिमालय पर्वत से ही निकलने वाली नदियों गंगा और यमुना के मैदानी क्षेत्र को दो आबा नाम दिया था। प्राचीनकाल से ये दोनों क्षेत्र अत्यन्त उपजाऊ थे और यहाँ घास के हरे-भरे चरोत्तर थे।

इन घास के चरोत्तरों के आकर्षण में ही मध्य एशिया के अनेक पशुपालक कबीलों का भारत में आगमन हुआ। भारत में इन कबीलों के आने का क्रम लगभग दो-ढाई हजार वर्षों तक निरन्तर चलता रहा। बाहर से आने वाले ऐसे सभी कबीले यहीं बस गये। भारत का हिन्दुस्तान नामकरण भी यहाँ की प्रमुख नदी सिंधु के नाम पर ही पड़ा है। 'स' को अरवी उच्चारण में 'ह' बोला जाता है। सिन्धु का ही अपभ्रंश हिन्दू है और सिन्धु नदी का स्थान अर्थात् हिन्दुस्तान या हिन्दोस्तान।

भारत के त्यौहारों के महत्व को समझने के लिए यहाँ के ऋतु चक्र व फसल चक्र को समझने की आवश्यकता है। भारत के त्यौहारों का ऋतु एवं फसल चक्रों से गहरा और प्रत्यक्ष सम्बन्ध है। कार्तिक अमावस्या को पड़ने वाला दीपावली का त्यौहार खरीफ की फसल का पर्व है और फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को पड़ने वाला होली पर्व रबी की फसल का। दोनों त्यौहारों को मनाने का आरंभ मूल रूप से फसलों से जुड़ा हुआ है परन्तु कालान्तर में उनके साथ में कुछ मिथकीय घटनाएँ भी जुड़ती चलीं गई।

होली पर्व के साथ होलिका दहन का मिथक जुड़ गया और उसने एक धार्मिक स्वरूप ग्रहण कर लिया। प्राचीन समय में होली को वसन्तोत्सव के रूप में मनाने का वर्णन प्राचीन भारतीय साहित्य में मिलता है। फाल्गुन मास में गेहूं, चना तथा अन्य दलहनी फसलें, सरसों तथा अन्य तिलहनी फसलें तैयार होकर किसानों के खलियानों में पहुँच जाती हैं। प्रकृति भी अत्यन्त मनोरम होती है।

वृक्षों में पतझर के पश्चात् नये पत्ते आ जाते है और वे फूलों से लद जाते हैं। वसन्त का मौसम भी खूब ही सुहावना होता है, न अधिक सर्दी और न अधिक गर्मी। प्रकृति की इस सम्पन्नता से कामदेव भी प्रसन्न रहते हैं। होली का पर्व वास्तव में वसन्त तथा रबी फसलों के उल्लास के समारोहण का पर्व है।

वसन्त का होली त्यौहार वसन्त पंचमी से आरंभ होता है और होलिका दहन तथा उसके दूसरे दिन रंग पर्व अथवा धुलेंडी के दिन पूर्ण होता है। वसन्त पंचमी के दिन अंडी के वृक्ष की एक शाख को होलिका दहन के स्थान पर स्थापित किया जाता है जहाँ लोग अपने घर के कूड़े करकट, कण्डे और लकड़ी आदि को होलिका दहन तक लाकर जलाने हेतु एकत्र करते जाते हैं। वसन्त पंचमी के दिन से ही होली के नगाड़े बजने लगते हैं और लोगों पर वसन्त का नशा चढ़ने लगता है।

रात्रि में लोग गाँव की चौपालों में, कस्बों के चबूतरों पर या किसी रसिक के प्रांगण में एकत्र होकर वसन्त का उल्लासपूर्वक स्वागत करते हुए गीत गाते है। वसन्त के अवसर पर गाये जाने वाले गीतों को फाग गीत कहा जाता है। अबीर गुलाल लगाकर लोग नगाड़ों की थाप पर इन गीतों को गाते हैं। गायकों के दो दल बन जाते हैं-एक दल गीत का आरंभ करता है और दूसरा दल उसे दुहराता है और फिर दोनों ही दल उसे समवेत स्वर में पुनः गाते हैं। इन गीतों के साथ नगाड़े, ढोलक, टिमकी, ढप्प और मंजीरों का वाह्य के रूप में प्रयोग होता है। कभी-कभी मात्र नगाड़े का या नगाड़े और मंजीरे का ही प्रयोग होता है।

गायकों में फाग गाने के अवसर पर मस्ती छा जाती है और उनमें से एक-दो गायक उठकर नृत्य करने लगते हैं। गुलाल के रंग और भंग की तरंग में फाग गायन ज्यों-ज्यों रात्रि का समय बढ़ने लगता है त्यों-त्यों परवान चढ़ने लगता है। वसन्त के मौसम की सुहावनी रातों में फाग की स्वर लहरी और नगाड़ों की ध्वनि से आकर्षित होकर गायन स्थल की ओर लोग पहुँचने लगते हैं। देर रात्रि तक फाग गायन का कार्यक्रम चलता रहता है।

छत्तीसगढ़ी फाग गीतों में राधा कृष्ण के मध्य होली खेले जाने का लालित्यपूर्ण वर्णन प्रचुरता के साथ मिलता है। कुछ एक गीत राम के द्वारा अवध में होली खेले जाने से सम्बन्धित भी मिलते हैं परन्तु कृष्ण से सम्बन्धित गीतों जैसा भाव उन गीतों में कहाँ? दरअसल कृष्ण की गोपियों के साथ की गई बाल लीलाएँ भारतीय जनमानस में गहरे रूप में बैठी हुई है। राम का चरित जनमानस में मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में स्थापित है।

भारतीय ललित के केन्द्र में तो कृष्ण का चरित्र ही प्रतिष्ठित है इसीलिए कृष्ण के चरित्र ने ही भारत के सर्वाधिक कलारूपों के उद्भव को प्रेरित किया है। छत्तीसगढ़ी फाग गीतों में भी कृष्ण, राधा, गोपियाँ, ब्रव्रज का भक्तिमय वातावरण पूर्ण रूप से रच-बस गये हैं। कुछ फाग गीतों में आल्हा का भी उल्लेख मिलता है और कुछ एक फाग गीत आल्हा की तर्ज पर भी गाये जाते हैं। वास्तव में संपूर्ण उत्तर भारत के ग्रामीण अंचलों में आल्हा गायन बेहद प्रचलित है।

आल्हा गायन की धुन लोकमानस में रच-बस गई है, इसलिए उसका प्रभाव अन्य गायन विधाओं पर भी पड़ा है। बुंदेलखंड में फाग गीतों में मात्र श्रृंगार रस के गीत नहीं गाये जाते, वरन् उनमें वीर रस के गीतों की भी भरमार है। वहाँ आपसी बैर-भाव के कारण 'खून की होली' खेलने का भी वर्णन वीर रस प्रधान फाग गीतों में खूब मिलता है। फाग गायन का आरंभ- उद्घोषणा के साथ होता है-

बजे नगाड़ा दसौं जोड़ी हाँ, राधा किशन खेलें होरी दुनों हाथ धरै पिचकारी धरै पिचकारी धरै पिचकारी ॥

रंग गुलाल सबै बोरी, हाँ राधा किशन खेलय होरी॥

होली खेलने की इस उ‌द्घोषणा के साथ ही नगाड़े पर जोर-जोर से थाप पड़ने लगती है और फिर देव सुमरनी के पद गाये जाते हैं –

(1)

चला हाँ रे पहिले, सुमिरों गणपति को ना
जिनकी पारवती हैं माय, रे पहिले सुमिरों गणपति हो
चला हाँ रे गजानन, सब देवन में अगुवा है
सो पूजवें ध्यान लगाय, रे पहिले सुमिरॅव गणपति

गणपति वंदना के उपरान्त गुरू और सरस्वती की वंदना भी आवश्यक है। गुरू भूले अक्षर याद दिलाते है वहीं सरस्वती कंठ में विराजमान होती हैं। उनकी सहायता के बिना गायन कैसे संभव हो सकता है। अतः वंदना का पद इनकी स्तुति में गाया जाता है-

(2)

पहिली सुमिरौं गनपति गौरा दूसर मा महादेव!
फिर लेवंव गुरू के नाम कंठ बिराजे
सरसती माता भूले अच्छर देय बताय
जो अच्छर सुधि बिसरै हो लेहाँ गुरू के नाँव ॥

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छत्तीसगढ़ी फाग गीतों में 'चला हाँ रे' के साथ गीतों का आरंभ होता है और फिर टेक में भी 'चला हाँ रे' का प्रयोग करते हुए गाये जाने वाले पद को दुहराया जाता है।

(3)

चला हाँ रे बजै नगाड़ा दसौं जोड़ी हाँ राधा किशन खेलें होरी
दूनौं हाथ धेरै पिचकारी रंग गुलाल सबै बोरी॥
चला हाँ रे हाँ राधा किशन खेलें होरी ॥
दुधवा दहिया ला बैच न पाइस ओहू मा रंग दिहिन घोरी॥
चला हाँ रे राधा किशन खेलें होरी ॥
सब सखियन मिल पकड़ किशनलाल वही रंग मारे रे बोरी॥
चला हाँ रे राधा किशन खेलय होरी ॥
तब राधा मुसकाय कहिन हाँ अऊ खेलिहौ-तू होरी ॥
चला हाँ रे राधा किशन खेलै होरी ॥

Radha and Krishna Play Holi with Companions | Exotic India Art

भावार्थ- बजे नगाड़ा दसौं जोड़ी (दसो दिशाओं में) हाँ राधा कृष्ण खेलें होली दोनों हाथों में पिचकारी थामे हुए रंग और गुलाल में सराबोर राधा कृष्ण खेलें होली। दूध दही को बेच नहीं पाई (होली के वातावरण में) इसलिए उन्हीं में रंग घोल दिया है। राधा कृष्ण होली खेल रहे हैं। सब सखियों ने कृष्ण को पकड़कर उसी रंग में डुबो दिया है। राधा और कृष्ण होली खेल रहे हैं। राधा ने मुस्कुराकर कहा और खेलोगे तुम हमारे साथ होली। राधा कृष्ण खेलें होली।

(4)

होली खेलय बिरिज मा कन्हैया होली खेलय बिरिज मा...
काकर हाथ मा रंग कटोरा काकर हाथ पिचकारी ॥
राधा के हाथ मा रंग कटोरा।
कृष्ण के हाथ मा पिचकारी ॥

भावार्थ- ब्रज में कन्हैया होली खेल रहे हैं होली खेल रहे हैं ब्रज में... किसके हाथ में रंग का कटोरा है किसके हाथ में पिचकारी है राधा के हाथ में रंग का कटोरा है (और) कृष्ण के हाथ में पिचकारी है।

गीत क्रमांक (3) में राधा गोपियों के साथ मिलकर कृष्ण के साथ होली खेल रही है। दूध, दही में ही रंग घोलकर उसमें कृष्ण को डुबो दिया है और विनोदपूर्वक पूछ रही है और खेलोगे होली ? गीत क्रमांक (4) में राधा के हाथ में रंग का कटोरा है और कृष्ण के हाथ में पिचकारी है। वे कटोरे से पिचकारी में रंग भर-भरकर राधा और गोपियों के साथ होली खेल रहे हैं।

(5)

चल हाँ रे राधिका तोरे दुलारी के कारन मोर हो गयै कन्हैया चोर।
चल हाँ रे राधिका, कहिन के दुलारी बनी और कहिन लागे डोर ॥
चल हाँ रे राधिका... चल हाँ रे मइया सोन के मोर दुलरी बनी अऊ रेशम लागे डोर ॥
चल हाँ रे राधिका...

भावार्थ-इस गीत में यशोदा मैया राधा से शिकायत कर रही हैं-

राधिका तुम्हारे दुलार के कारण मेरा कन्हैया चोर हो गया है राधिका तुम कैसी उसकी दुलारी बनी हो और कैसा तुम्हारा बंधन है। मैया सोने की मेरी डोर बनी है और रेशम का मेरा बन्धन है। राधिका तुम्हारे दुलार के कारण मेरा कन्हैया चोर बन गया है।

(6)

नाचे नंद के कन्हैया फन पर नाचे नंद के कन्हैया!
हाँ रे हाँ... पीताम्बर उड़ि उड़ि जात
फन पर नाचे नन्द के कन्हैया।
हाँ रे हाँ नाचे नंद के कन्हैया फन पर।

भावार्थ-नाच रहे हैं नन्द के कन्हैया नाग के फन पर नाच रहे है नन्द के कन्हैया ! उनका पीताम्बर उड़ रहा है और वे नाग के फन पर नाच रहे हैं।

(7)

कैसे मिल गए गंगा मा जमुना भागीरथे पाये नाम
जमुना तै कैसे मिल गये गंगा कैसे मिल गये...॥

भावार्थ- हाँ रे हाँ गंगा में जमुना कैसे मिल गई उन्हें भागीरथी नाम प्राप्त हुआ यमुना से कैसे मिल गई गंगा हाँ रे हाँ कैसे मिल गई गंगा में यमुना।

(8)

हाँ रे हाँ चला सखी री सांकुर खोल दे गोकुल के
अरे राधा पनियान जायस सांकुर खोल दे
गोकुल के हाँ रे हाँ चला सखी री...॥

भावार्थ-सखी गोकुल के द्वार की साँकल खोल दो अरे राधा पानी भरने जा रही है साँकल खोल दो गोकुल की चलो सखी साँकल खोल दो।

(9)

हाँ हाँ रे वृन्दावन श्याम दही लूटे...
काहे तोरे हार काहे नकबेसर
कौन गलियन मा लरटूटे
वृंदावन मा श्याम दधि लूटे ॥
लपट झपट मा हरवा टूटगै
सिरके मटकी घलो फूटगै
बिन्दराबन मा श्याम दधि लूटे ॥
बिन्दराबन हार गोकुल नकबेसर बीच गली मा लर टूटे
हाँ हाँ रे बिन्दराबन श्याम दधि लूटे ॥

भावार्थ- वृन्दावन में श्याम दही लूट रहे हैं... कहाँ गया तुम्हारा हार कहाँ गयी तुम्हारी नकबेसर किस गली में तुम्हारे मोतियों की लड़ टूटी है वृन्दावन में श्याम दही लूट रहे हैं। लपट झपटकर (मैंने) बचने का प्रयास किया तो हार टूट सिर की मटकी भी फूट गई वृन्दावन में श्याम दही लूट रहे हैं। वृन्दावन में हार टूटा और गोकुल में नकबेसर टूटा और गली के बीचों बीच मोतियों की लड़ टूटी वृन्दावन में श्याम दही लूटे।

(10)

हाँ रे हाँ सखी री जल भरने को अरे ठाड़े प्रभु घनश्याम सखी री चली जावें
सखी जल भरने को हाँ रे हाँ सखी री जल भरने को ॥

भावार्थ- सखी जब मैं जल भरने गई हे सखी! तब वहाँ प्रभु घनश्याम खड़े थे चलो चलें सखी जल भरने को सखी जल भरने को।

(11)

जमुना तट आज मची होरी।
हलधर गिरधर मदन मनोहर खेलत है जोरी जोरी।
जमुना तट आज मची होरी। अबीर गुलाल कुमकुमाकेसर की कीच मचे खोरी खोरी जमुना तट आज मची होरी...
मोर मुकुट मकराकृत कुण्डल सोहत है सुन्दर जोरी जमुना तट आज मची होरी...
फेट गुलाल हाथ पिचकारी अबीर गुलाल भरे जोरी जमुना तट आज मची होरी...
हिलमिल फाग परस्पर खेलत फेंकत है झोरी झोरी जमुना तट आज मची होरी...
उड़त गुलाल लाल भये बादर कर मुरली रंग में होरी।
जमुना तट आज मची होरी।
सूरदास प्रभु रसिक शिरोमणि चितवन श्याम मोम ओरी जमुना तट आज मची होरी...॥

भावार्थ-यमुना के तट पर आज होली मची है वहाँ बलराम और कृष्ण मदन मस्त होकर होली खेल रहे हैं। वे जबरदस्ती होली खेल रहे हैं। आज यमुना के तट पर होली मची है। गली गली में अबीर गुलाल कुमकुम केसर की कीचड़ मची हुई है। मोरपंखों का मुकुट और मकर की आकृति के कुंडल धारण किये हुए इन दोनों भाइयों की जोड़ी बहुत सुन्दर लग रही है। यमुना के तट पर आज बलराम और कृष्ण दोनों ने होली मचा रखी है।

गुलाल अबीर आदि को घोल रखा है और हाथों में पिचकारी है यमुना तट पर आज होली मची है। झोली भर भरकर गुलाल अबीर डाल रहे हैं और सबजन हिलमिल कर होली खेल रहे हैं। गुलाल उड़ रही है जिससे बादलों का रंग भी लाल हो गया है और (कृष्ण की) मुरली भी उसी रंग में रंग गई है। यमुना तट आज मची होली सूरदास कहते हैं कि प्रभु रसिकों के शिरोमणि हैं जो श्याम वर्ण की मोम मूर्ति बन गये हैं। यमुना तट आज मची होली ॥

इस गीत के अन्त में कवि सूरदास का नाम आया है। संभवतः यह पद उनका ही हो और किंचित मात्र परिवर्तन के साथ उसे छत्तीसगढ़ी गायकों ने उसके लालित्य के कारण उसे अपना लिया हो। यह भी संभव है कि सूरदास की शैली में ही गीत की रचना की गई हो और उन्हें ही समर्पित करने की भावना से गीत के अंत में उनका नाम जोड़ दिया गया हो। वैसे भी छत्तीसगढ़ी फाग गीतों पर ब्रज भाषा का काफी प्रभाव दिखाई पड़ता है। भक्ति आंदोलन के प्रभाव स्वरूप संपूर्ण उत्तर भारत में कृष्ण भक्ति से सम्बन्धित साहित्य पर ब्रज भाषा का गहरा प्रभाव पड़ा है।

(12)

चित्रकूट में क्यों बसे रामजी आनन्द है कोल किरात रामजी चित्रकूट में क्यों बसे॥
आवत हैं बन मा भरतजी संग में है माता साथ ॥
भरतजी मिलने को अब आवत हैं रामजी चित्रकूट में क्यों बसे ॥

भावार्थ- हे रामजी! आप चित्रकूट में आकर क्यों बस गये आपके यहाँ आने से कोल किरात जन आनन्दित है। भरतजी वन में (आपसे भेंट करने) आ रहे हैं उनके साथ में माताजी भी है। भरतजी मिलने को आ रहे हैं रामजी आप चित्रकूट में क्यों बसे।

(13)

अरे धूनी रमा के रम रै हौं रस रैहीं रमा रै हौं रम रैहौं तरिया पार बाबा धूनी के रम रै हौ।
तालाब के पार रमें रहो बाबा की धूनी (अग्निकुंड) के पास रमे रहो॥
भावार्थ- अरे धूनी रमा के रमें रहो रसिक बने रहो रमें रहो

 

(14)

अरे जल्दी उतारो पार केवट होवत है अब देर केवट जल्दी पार उतारो ना॥

भावार्थ-अरे केवट, जल्दी पार उतारो अब देर हो रही है जल्दी पार उतारो।

यहाँ केवट अर्थात् प्रभु से भवसागर से पार उतारने का संकेत है।

(15)

मारो बाण तुम रावणला ओ रामजी
सीताजी व्याकुल होय रामजी
मारो बाण तुम रावणला ओ रामजी ॥

भावार्थ- हे रामजी! आप रावण को बाण मारो सीताजी बहुत व्याकुल हो रही है आप रावण को बाण मारो हे रामजी !

(16)

अरे पनिया भरन नहीं देय हो
मोहनजी पनिया भरन नहिं देवें लाल ॥
पनघट पर खड़े कन्हैया घघरी पलोरन भिजोये चुनरी ॥
अरे पनिया भरन नहीं देय हो कहाँ छिपाये प्यारी राधा राधा बिन होरी न होय ॥
अरे पनिया भरन नहीं देय हो मोहनजी पनिया भरन नहि देवे लाल ॥

भावार्थ-अरे! पानी भरने नहीं दे रहे हैं मोहनजी पानी भरने नहीं दे रहे हैं लाल पनघट पर खड़े हैं कन्हैया गगरी ढुबाने पर चुनरी भिगो रहे हैं अरे पानी भरने नहीं दे रहे हैं मोहनजी प्यारी राधा कहाँ छिपी हुई हैं राधा के बिना होली कैसे खेलें अरे पानी भरने नहीं दे रहे हैं मोहनजी पानी भरने नहीं दे रहे हैं।

(17)

डारो राम गले जयमाला सीता के जयमाला हरी का होय
सीता डारो राम गले जयमाला
राम निकाल बन का पैहौ दिये
डारो भरत को राज कैकेयी ॥
राम निकाल बन का पैहो।

भावार्थ-राम ने सीता के गले में जयमाला डाल दी जयमाला डालने से सीता हार की हो गई। राम ने जयमाला गले में डाली राम को वन में निकाल दिया। कैकेयी ने भरत को राज दिला दिया राम को वन में निकाल दिया।

(18)

गहिल बहे जलधारा नंदिया आपन तरे औरों को तारे
तारे सब परिवारा नंदिया गहरी बहे जल धारा
पुरइन पत्र रहे जल भीतर नदिया की गहरी बहे जलधारा।
जल मा करे पसारा नंदिया गहिल बहे जलधारा॥

भावार्थ- गहरी बहे जलधारा नदिया की। स्वयं तरे और औरों को भी तारे। तारे संपूर्ण परिवार को। नदिया की गहरी बहे जलधारा। पुरइन पत्र (कलमपत्र) जल के भीतर रहते हैं। जल में ही वे अपना प्रसार (फैलाव) करते हैं।

 

(19)

अरे हाँ रे हाँ तनी राजा जनक द्वारे चाँदनी
जहाँ सीता स्वयंवर होय चाँदनी
तनी रहे राजा जनक द्वारे ॥
अरे हाँ रे हाँ तनी राजा जनक द्वारे चाँदनी ॥

भावार्थ-राजा जनक के द्वार पर चाँदनी तनी है। वहाँ सीता का स्वयंवर हो रहा है प्रकाशमय वातावरण में। तनी रहे राजा जनक के द्वार पर चाँदनी। अरे हाँ रे हाँ तनी राजा जनक के द्वार पर चाँदनी। यहाँ पूर्व में चाँदनी प्रांगण को ढँकने वाले मोटे वस्त्र के लिए प्रयुक्त हुआ है वहीं दूसरी लाइन में इस शब्द का प्रयोग प्रकाश के लिए हुआ है, जो उल्लासमय वातावरण को प्रकट कर रहा है।

(20)

हाँ हाँ रे हाँ रावण छोड़ दे आशा लंका के गढ़ लंका चढ़े राजा राम
हाँ हाँ रे हाँ रावण छोड़ दे आशा लंका के ॥
हाँ हाँ रे रावण पहिले द्वार अंगद ठाड़े
जेन सभा मा रोपे पाँव रावण।
छोड़ दे आशा लंका के॥
हाँ हाँ रे हाँ रावण छोड़ दे आशा लंका के ॥
दूसर द्वार नील नल ठाड़े जिन सागर बाँधे सेत रावण।
हाँ हाँ रे हाँ रावण छोड़ दे आशा लंका के॥
तीसर द्वार जामवन्त ठाड़े जिन सभा मा हुकुम चलाये रावण।
छोड़ दे आशा लंका के हाँ हाँ रे हाँ रावण छोड़ दे आशा लंका के॥
चौथे द्वार में हनुमान ठाड़े जिन लंका जलाय दिये ।
रावण छोड़ दे आशा लंका के।
हाँ हाँ रे हाँ रावण छोड़ दे आशा लंका के ॥

भावार्थ-रावण लंका की आशा (बचने की) छोड़ दो। गढ़ लंका पर राजा राम ने आक्रमण कर दिया है रावण तुम लंका के बचने की आशा छोड़ दो। पहले द्वार पर अंगद खड़े है जहाँ तुमने पैर जमाया था (अंगद प्रसंग)। रावण तुम लंका के बचने की आशा त्याग दो। दूसरे द्वार पर नील और नल खड़े हैं। जिन्होंने समुद्र पर सेतु बांधा था। रावण तुम लंका की आशा छोड़ दो। तीसरे द्वार पर जामवन्त खड़े हैं। उसी दरबार के द्वार पर जहाँ तुमने शासन किया है। छोड़ दो लंका के बचने की आशा। रावण छोड़ दो आशा लंका की। चौथे द्वार पर हनुमान खड़े हैं। जिन्होंने लंका को जलाया था। छोड़ दो आशा लंका की। रावण छोड़ दो आशा लंका की।

(21)

अरे हाँ रे हाँ जसोदा धीरे झुलाय पालना तोरे कान्हा उचक न जाय।
जसोदा धीरे झुलाय पालना।
हाँ रे हाँ जसोदा... अरे हाँ रे हाँ जसोदा काहे के बने पालना॥
हाँ रे हाँ जसोदा अस काहेन लगी डोर जसोदा धीरे से झुलाय पालना॥
हाँ रे हाँ जसोदा... अरे हॉ रे हाँ जसोदा चंदन काठ बने पालना अस रेशम लागे डोर।
जसोदा धीरे झुलाये पालना तोरे कान्हा उचक न जाय। अरे हाँ रे हाँ जसोदा...॥

भावार्थ- जसोदा, पालना धीरे झुलाओ। कहीं तुम्हारा कान्हा उछल न जाये। तुम्हारा पालना काहे का बना है। और उसकी डोर काहे की बनी है। अरे हाँ रे हाँ जसोदा...। जसोदा चंदन काष्ठ का पालना बना है। और उसमें रेशम की बनी हुई डोर बँधी है। जसोदा धीरे झुलाओ पालना।। तुम्हारा कान्हा कहीं उछल न जाये।

(22)

हाँ हाँ रे हाँ कबूतर आइ गिरे दरवाजे पर
तोला रसिया बान मारे रे कबूतर आई गिरे दरवाजे पर।
हाँ हाँ रे हाँ कबूतर तोला रसिया बान मारे॥

भावार्थ- कबूतर आ गिरे दरवाजे पर। तुम्हें रसिया ने बाण मारा रे कबूतर। आकर गिरे दरवाजे पर। कबूतर तुम्हें रसिया ने बाण मारा।

फाग में इस प्रकार के छोटे-छोटे श्रृंगारिक पदों को बार-बार धीमी गति से और फिर मध्यम और द्रुत गति से अनेक बार गाया जाता है। गाते वक्त गायक मंडली में से एक या दो गायक खड़े होकर पद को दुहराते हुए नृत्य करने लगते हैं। इस प्रकार से एक ही पद को अनेक बार लम्बे समय तक गाने की परंपरा है।

(23)

हाँ हाँ रे देवरा बाजत घुँघरू लेदेवे देवरा
महलों में झमाड़ाम होय देवरा।
बाजत घुँघरू ले देबे हाँ रे हाँ देवरा बाजत घुँघरू लेदेवे ॥

भावार्थ-देवर बजने वाले घुँघरू ले देना। फिर महलों में खूब झमाझम नाचेंगे। बजने वाले घुँघरू ले देना। देवर बजने वाले घुँघरू ले देना।

इस पद में देवर-भाभी के मधुर सम्बन्धों का वर्णन किया गया है। देवर-भाभी के मध्य होली खेलने का रिवाज संपूर्ण उत्तर भारत में प्रचलित है।

(24)

हाँ हाँ रे हाँ रावण मोर कहे ते मानजा झान करबे कुल के नास
मोर कहे ते मानजा रावण हाँ हाँ रे हाँ रावण झन करबे कुल के नास ॥

भावार्थ - रावण

मेरा कहना तू मान जा अपने कुल का नाश मत कर मेरा कहना तू मान जा रावण रावण मत कर अपने कुल का नाश।

राम से सम्बन्धित फाग गीतों में रामकथा के अधिकाँश पद राम-रावण युद्ध, लंका दहन आदि प्रसंगों को लेकर रचित हैं। इन पदों में वैसा काव्यमय लालित्य नहीं है जैसा कृष्ण से सम्बन्धित फाग गीतों में मिलता है या अन्य श्रृंगारिक गीतों में। होली पर होलिका दहन का प्रतीक मनोवैज्ञानिक रूप से लंका दहन के साथ समानार्थी रूप से जुड़ जाता है, इसलिए इस प्रसंग का उल्लेख फाग गीतों में मिलता है।

(25)

मनमोहन नंदलाल नहीं आये बरसाने में।
बिन सहेली के बाजा दुलहिन
बिना बरात बिन पुरूष के तिरिया रोवे आधी रात।
हाँ रे हाँ मनमोहन नहीं आये बरसाने में॥
बिन पीपर के खैरवा, बिन ठाकुर के गाँव
वहाँ तनिक न बैठिये जे रुख में नहीं छाँव।
हाँ रे हाँ मन मोहन नहीं आये बरसाने में।
बिन दीया के मंदिर बिन खंबा के ताल
बिन पिया के नारि पड़े रहे बेहाल ॥
हाँ रे हाँ मनमोहन नहीं आये बरसाने में।

भावार्थ- मनमोहन नंदलाल बरसाने नहीं आये। बिना सहेली के बाजा बिना दुल्हिन के बारात। बिना पति (पुरूष) के तिरिया रोवे सारी रात। मनमोहन नहीं आये बरसाने में। बिना पीपल को खैर और बिना स्वामी का गाँव। ऐसी जगह पर न बैठे जहाँ वृक्ष की छाया तक न हो। मनमोहन नहीं आये बरसाने में। बिना दीपक का मन्दिर और बिना खंब का तालाब। वे बिना प्रियतम की नारी के समान है। जो बदहाल पड़ी रहती हैं। मनमोहन नहीं आये बरसाने में।

बिना सहेली के बाजा का अर्थ है बिना अन्य साजिंदों के या संगत के एक ही वाद्य को बजाने में कोई रस नहीं है। बिना दुल्हन के बारात भी निरर्थक है क्योंकि दुल्हन ही नहीं है तो बारात क्या खाक करेगी! पुरूष के वियोग में स्त्री आधी रात के समय रोयेगी नहीं तो क्या करेगी! बिना पीपल के मात्र खैर से कार्य नहीं सध सकता और बिना ठाकुर (स्वामी) के गाँव की रक्षा कौन करेगा। यहाँ ठाकुर मालगुजार या जागीरदार के लिए प्रयुक्त हुआ है। ऐसे वृक्ष के नीचे बैठना व्यर्थ है जिसकी छाया ही न मिले।

बिना दीपक का मंदिर तो वीरान होता है और बिन खम्बे वाले तालाब में पानी नहीं ठहरता ऐसी मान्यता है। छत्तीसगढ़ में तालाब बनाने के उपरांत उसका विवाह आकाश से करवाने की प्रथा है। विवाह हेतु स्तंभ लग्न मण्डप के अभिप्राय के रूप में स्थापित किया जाता है। बिना स्तंभके तालाब का विवाह सम्पन्न नहीं होता और बिना विवाह हुए या तो आकाश वर्षा ही नहीं करेगा और वर्षा हुई भी तो उस तालाब में पानी नहीं ठहरेगा। वास्तव में यह वर्षा सम्मोहक या जादू (Rain charm) है।

(26)

हाँ रे हाँ कैकेई सोच विचार के वर माँग प्राण लेवत हस निकार कैकेई सोच विचार के वर माँग ॥ हाँ रे हाँ कैकेई...

भावार्थ- कैकेई सोच विचार के वरदान माँगो। (वरदान माँगकर) तुम प्राण (दशरथ के) ले रही हो। सोच विचार के वरदान माँगो। कैकेई....

(27)

सागर मा केवड़ा फूलि रहे अरे फूलि रहे दुइचार केवड़ा फूलि रहे सागर मा॥ अरे हाँ सागर मा केवड़ा फुलि रहे ॥

भावार्थ- सागर में केवड़ा फूल रहा है। अरे फूल रहे हैं दो चार केवड़े। फूल रहे हैं सागर में। अरे हाँ सागर में केवड़े फूल रहे है।

(28)

हाँ हाँ रे सखी गौरी पूजेन जाबो न माताजी दिये है पठाय सखी री गौरी पूजेन जाबो ना हाँ हाँ रे सखी गौरी पूजेन जाबो ॥

भावार्थ- सखी, गौरी पूजने जायेंगे माताजी ने भेज दिया है सखी री गौरी पूजने जायेंगे। सखी, गौरी पूजने जायेंगे।

(29)

हाँ हाँ रे सखी री तोला बिहावन शिव आये वर पाये भोलानाथ गौरी तोला बिहावन शिव आये॥

भावार्थ- सखी, तुम्हे व्याहने शिव आये। तुम्हें भोलानाथ वर मिले हैं गौरी। तुम्हें ब्याहने शिव आये।

(30)

गिरजा संग शंकर खेलै होरी अबीर गुलाल मलत मुख ऊपर रंग छोड़त है चहुँ ओरी॥
हाँ रे हाँ गिरजा संग शंकर खेलें होरी ॥
नर सिर माला गरेबिच सोहत भांग की लटकन वा झोरी।
हाँ रे हाँ गिरजा संग शंकर खेलें होरी ॥
भूत प्रेत नित नाचत गावत मुख पर मले छये के रोरी ॥
हाँ रे हाँ गिरजा संग शंकर खेलें होरी॥ भक्तजन सदा सिर नांवत बिनती करत कर जोरी॥ हाँ रे हाँ गिरजा संग शंकर खेलें होरी ॥

भावार्थ- गिरजा के साथ शंकर होली खेल रहे हैं। अबीर गुलाल गिरजा के मुख पर मल रहे है और चारों ओर रंग डाल रहे हैं। गले में नर मुंडों की माला शोभायमान है और भाँग की थैली लटका रखी है। भूत प्रेत नित्य नाचते गाते हैं। मुख पर रोली मल रखी है। भक्त जन सदा सिर नंवाते हैं और हाथ जोड़कर विनती करते हैं। शंकर गिरजा के संग होली खेल रहे हैं।

(31)

अरे हाँ रे हाँ काहे को इतराय कन्हैया काहे को इतराय लाल।
जब से हरि जनम लियो है बहुत ही दूध मचायो कन्हैया ॥
अरे हाँ रे हाँ काहे को इतराय कन्हैया फटी पुरानी कदरी के ओढ़इया बन बन गाय चरइया।
अरे हाँ रे हाँ काहे को इतराय कन्हैया ॥
घर घर जा तुम दही माखन लूटे माखन चोरी करैया।
अरे हाँ रे हाँ काहे को इतराय कन्हैया॥
सखियन संग रास रचे तुम सब के प्यास बुझैया।
अरे हॉ रे हाँ काहे को इतराय कन्हैया ॥

भावार्थ- काहे को इतरा रहे हो कन्हैया। काहे को इतरा रहे हो लाल। जब से हरि तुमने जन्म लिया है तुमने बहुत ही उत्पात मचाया है कन्हैया। तुम फटी पुरानी कथरी के ओढ़ने वाले हो। वन-वन में गाय चराने फिरने वाले तुम क्यों इतना इतरा रहे हो। तुमने घर-घर जाकर दही और मक्खन लूटा है। माखन चोर कहलाते हो। तुम इतना क्यों इतरा रहे हो कन्हैया। तुमने सखियों के संग रास रचाया है। तुम सब की प्यास बुझाने वाले हो। तुम क्यों इतना इतरा रहे हो कन्हैया।

(32)

होरी खेलय गिरजा संग शिव भोला अबीर गुलाल लाल भई देहिया देखके सुफल भये मोर चोला।
हाँ रे हाँ होली खेलय गिरजा संग शिव भोला।
बूढ़े बैल पे सवार होके अबीर उड़ावत भर झोला।
हाँ रे हाँ होली खेलय गिरजा संग शिव भोला ॥
भक्तराम कहै आज गाके शिवदानी की जैजै बोला ।।
अरे हाँ होली खेलय गिरजा संग शिव भोला।

भावार्थ- होली खेल रहे हैं गिरजा के संग शिव भोला। अबीर गुलाल से देह लाल हो गई है। उन्हें होली खेलते देखकर मेरा जीवन सफल हो गया। होली खेल रहे हैं गिरजा संग शिव भोला। बूढ़े बैल (नंदी) पर सवार होकर झोला भर-भर कर अबीर उड़ा रहे हैं। होली खेल रहे हैं गिरजा संग शिव भोला। भक्त राम आज गाकर कह रहे हैं शिवदानी की जयजयकार कर रहे है। होली खेल रहे हैं गिरजा के संग शिव भोला।

(33)

काहे मानेना मोरा श्याम सखी बिन्दराबन की कुंज गलिन में रहिया छेके घनश्याम सखी ॥
अरे हाँ रे हाँ काहे मानेना मोरा श्याम सखी ॥
ग्वाल बाल ले संगमा अपन बिरिज मा घूमें श्याम सखी ॥
अरे हाँ रे हाँ काहे मानेना मोरा श्याम सखी ॥
नार पराइ तनिक ना चीन्हें मोर बहियाँ पकड़ लिए थाम सखी ॥
अरे हाँ रे हाँ काहे मानेना मोरा श्याम सरख्खी ॥
बिरिज की गोपी कहें मनमोहन से हार गई की तमाम सखी ॥
अरे हाँ रे हाँ काहे मानेना मोरा श्याम सखी ॥

भावार्थ- क्यों नहीं मानता मेरा श्याम हे सखी। वृन्दावन की कुंज गलियों में राह चलते रोकते हैं घनश्याम हे सखी। क्यों नहीं मानता मेरा श्याम हे सखी। ग्वाल बालों को अपने साथ में लेकर ब्रज में श्याम घूमते हैं हे सखी। क्यों नहीं मानता मेरा श्याम हे सखी। पराई नारी को जरा भी नहीं पहचानते बाँह पकड़ मुझे थाम लिया हे सखी। क्यों नहीं मानता मेरा श्याम हे सखी। ब्रज की गोपी मनमोहन से कहती है वे सबकी सब उनसे हार गई हैं हे सखी। काहे मानेना मोरा श्याम सखी।

(34)

केदली बन मा भौरा रे बोलय हाँ रे हाँ केदली बन मा।
कहाँ जनम लिये सिया जनुकिया कहाँ जनम लिये राम।
केदली बन मा भौरा रे बोलय हाँ रे हाँ केदली बन मा।
राजा जनक घर सिया जनम लिये अवधपुरी में राम।
केदली बन मा भौरा रे बोलय हाँ रे हाँ केदली बन मा॥

भावार्थ-कदली वन में भौरा (भँवरा) रे बोले कदली वन में। कहाँ जन्म लिया सिया हे जनक सुता कहाँ जन्म लिया है राम। कदली वन में भौरा रे बोले कदली वन में। राजा जनक के घर सिया ने जन्म लिया अवधपुरी में राम ने। कदली वन में भौरा रे बोले कदली वन में।

(35)

होरी खेलै रघुबीरा सरजू नदी के तीरा हाँ रे हाँ होली खेलै रघुबीरा लाल॥
काकर हाथे कनक पिचकारी काकर हाथे अबीरा हाँ रे हाँ होली खेलै रघुबीरा
लाल राम के हाथे कनक पिचकारी सिया के हाथ अबीरा।
हाँ रे हाँ होली खेलय रघुबीरा लाल ॥

भावार्थ- होली खेल रहे हैं रघुवीर सरयू नदी के तट पर। होली खेल रहे रघुवीर लाल। किसके हाथ में सोने की पिचकारी है। किसके हाथ में अबीर। होली खेले रघुवीर लाल। राम के हाथों में सोने की पिचकारी सिया के हाथ में अबीर। होली खेलय रघुवीरा लाल।

(36)

मोरे अंग पे गुलाल न डालो लला वारी उमर मोरी लड़कइया मन में लो अपन विचार लला।
अरे हाँ रे हाँ मोरे अंग पे गुलाल न डालो लला॥
मैं दही बेचन घर से चली हूँ सारी न मोरी बिगारो लला।
जो सुन पइहैं सास ननदिया घर से न हमको निकालो लला।
हाँ रे हाँ मोरे अंग पे गुलाल न डालो लला॥
बार-बार तोरे पड़याँ परूँ मैं घूंघट पर मत टारो लला।
 हाँ रे हाँ मोरे अंग पे गुलाल न डालो लला॥
बिरिज ललना तोसे गाके कहै कि चोली के बन्द मत फारो लला।
हाँ रे हाँ मोरे अंग पे गुलाल न डालो लला ॥

भावार्थ-मेरे अंगों पर गुलाल न डालो है लाल मेरी उम्र अभी लड़कपन की है। अपने मन इस बात का विचार कर लो लाल। मेरे अंगों पर गुलाल न डालो। मैं दही बेचने घर से निकली हूँ। मेरी साड़ी (रंग से) ना बिगाड़ो है लाल। यदि मेरी सास या ननद ने सुन लिया ऐसे में मुझे घर से न निकलवाओ। मेरे अंग पर गुलाल न डालो लाल। बार-बार तुम्हारे पाँव पड़ती हूँ मेरे घूंघट के पट मत खुलवाओ हे लाल। मेरे अंग पर गुलाल न डालो लाल। ब्रज की ललना तुमसे गाकर कह रही है मेरी चोली के बंद मत फाड़ो हे लाल। मोरे अंग पे गुलाल न डालो लाल।

(37)

हाँ रे हाँ अवध मा राम खेलें होरी भरत सत्रुधन मिल फगुवा गावैं लखन रहे रंग घोरी॥
हाँ रे हाँ अवध मा राम खेलें होरी ॥
अबीर गुलाल से रंग गई देहइया निरखे जनक किशोरी।
हाँ रे हाँ अवध मा राम खेलें होरी ॥
पुरवासी सब खुशी मनावंय श्यामल गौर लख जोरी।
हाँ रे हाँ अवध मा राम खेलें होरी॥

भावार्थ-अवध में राम खेलें होली। भरत शत्रुघ्न मिलकर फाग गा रहे हैं। लक्ष्मण रंग घोल रहे हैं। हाँ रे हाँ अवध में राम खेल रहे हैं होली अबीर गुलाल से देह रंग गई है। जिन्हें जनक की किशोरी सीता देख रही हैं। अवध में राम खेल रहे हैं होली। अयोध्यावासी सब खुशी मना रहे हैं राम का श्यामल रूप और सीता का गौरवर्णीय रूप देखकर। अवध में राम होली खेल रहे हैं।

(38)

रहिया में करें तकरार कन्हैया हाँ रे हाँ बिन्दाबन की कुंज गलिन में दही माखन लिये है उतार कन्हैया।
रहिया में करै तकरार कन्हैया हाँ रे हाँ। कुछ खाये कुछ भुंड्या गिराये पाके बिरिज की नार कन्हैया।
रहिया में करै तकरार कन्हैया हाँ रे हाँ। लाज सरम तनिको न लाग घूंघट के पट दिये फार कन्हैया।
रहिया में करे तकरार कन्हैया हाँ रे हाँ।

भावार्थ राह में करे तकरार कन्हैया। वृन्दावन की कुंज गलियों में हमारे कन्हैया ने दही और मक्खन उतार लिया है। राह में करे तकरार कन्हैया। कुछ खाते हैं कुछ भूमि पर गिरा रहे हैं। ब्रज की नारी को पाकर कन्हैया ऐसा कर रहे है। राह में करे तकरार कन्हैया। उनको लाज शर्म भी नहीं आती कन्हैया ने (हमारे) घूंघट के पट भी फाड़ डाले। राह में करे तकरार कन्हैया।

(39)

चला हाँ रे आल्हा खेलें फाग गढ़े समर मा ब्रह्मा के रचे हे बिहाव आल्हा खेलें फाग गढ़ समर मा चला हाँ रे हाँ।
कवन महीना मँगनी आल्हा कवन मा रचे बिहाव आल्हा खेलें फाग गढ़ समर मा
माघ महीना मँगनी आइस फागुन मा रचै बिहाव आल्हा खेलय होली गढ़ समरमा॥

भावार्थ-आल्हा खेल रहे हैं फाग गढ़ समर में। ब्रह्मा ने उनके भाग्य में विवाह लिखा है और आल्हा खेल रहे हैं फाग गढ़ समर में। किस महीने में उनकी मँगनी होगी। किस महीने में आल्हा का विवाह होगा। आल्हा खेल रहे हैं फाग गढ़ समर में। माघ महीने में मँगनी (सगाई) आई। फागुन में विवाह रचाया गया। आल्हा खेलें फाग गढ़ समर में।

इस गीत में आल्हा के शौर्य का बखान किया गया है। वे विवाह एवं घर गृहस्थी बसाने की अपेक्षा रणभूमि में दुश्मनों के साथ खूनी होली खेल रहे है।

(40)

होरी खेलन राम लखन आये हाँ रे हाँ होरी खेलन राम लखन आये
लागे बसन्त मौरि गये आमा चम्पा के सब रंग छाये हाँ रे हाँ होरी खेलन राम लखन आये
राम लखन भरत सतरूघन संग सखा हनुमान आये हाँ रे हाँ होरी खेलन राम लखन आये
फैट गुलाल हाथ पिचकारी केशर कलश भर लाये हाँ रे हाँ होरी खेलन राम लखन आये
तुलसीदास छवि देखि मगन भये चरण कमल चितलाये हाँ रे हाँ होरी खेलन राम लखन आये।

भावार्थ- होली खेलने के लिये राम लखन आये। होली खेलने राम लखन आये। बसन्त लगते ही आमों में बौर लग गया। सर्वत्र चम्पई रंग की आभा फैल गई। होली खेलने राम लखन आये। राम लक्ष्मण भरत शत्रुघ्न के साथ उनके सखा हनुमान भी आये। होली खेलने राम लखन आये। गुलाल फेंट कर हाथ में पिचकारी और केशर का कलश भर लाये राम लखन होली खेलने आये। तुलसीदास इन सबको होली खेलता देखकर मगन हो गये और उनके चरण कमलों में अपना चित्त लगा लिया। राम लखन होली खेलने आये।

(41)

आयी फागुन के कैसन बहार सखी अरे हाँ रे हाँ अगर अबीर लगा मुख ऊपर प्रेम के रंग दिये डार सखी।
आयी फागुन के कैसन बहार सखी अरे हाँ रे हाँ॥
ग्वाल बाल मिल सब फगुवा गावैय बिन्दाबन के मझार सखी।
आयी फागुन के कैसन बहार सखी अरे हाँ रे हाँ॥
आम के डारा मा बोलय कोइलिया आकर के भिनसार सखी।
आयी फागुन के कैसन बहार सखी अरे हाँ रे हाँ।
सुन्दरलाल सुहावन मौसम खिले बाग मा अनार सखी।
आयी फागुन के कैसन बहार सखी अरे हाँ रे हाँ।

भावार्थ- आयी फागुन की कैसी बहार सखी। अगर अबीर मुख पर लगा प्रेम का रंग डाल दिया। आयी फागुन की कैसी बहार सखी। ग्वाल बाल सब मिलकर फाग गा रहे हैं। वृन्दावन के बीच होली खेल रहे हैं। आयी फागुन की कैसी बहार सखी। प्रातःकाल होते ही हे सखी। आम की डाल पर कोयलिया बोल रही है। आयी फागुन की ऐसी बहार सखी। लालिमा लिये हुए सुन्दर सुहावना मौसम है। बाग में अनार के फूल खिले हैं। आयी फागुन की कैसी बहार सखी अरे हाँ रे हाँ।

(42)

होरी खेलत हैं घनश्याम सखी हाँ रे हाँ होरी खेलत है घनश्याम सखी ॥ टेक ॥
ग्वाल बाल के रांग अपन पूगें ब्रज में श्याग राखी।
हाँ रे हाँ होरी खेलत हैं घनश्याम सखी ॥
अबीर गुलाल लिये हाथन मा मलते मुख थाम सखी।
हाँ रे हाँ होरी खेलत हैं घनश्याम सखी
नार परायी तनिक न चीन्हय पाके अकेली नन्द ग्राम सखी।
हाँ रे हाँ होरी खेलत हैं घनश्याम सखी ॥
केतनो मना करूं बात न मानय मसके चोली सुबह शाम सखी हाँ रे हाँ होरी खेलत हैं घनश्याम सखी ॥
भक्तजन कहै बिरिज वनिता नाहक किये बदनाम सखी ॥

भावार्थ- होली खेल रहे हैं घनश्याम सखी। होली खेल रहे हैं घनश्याम सखी। ग्वाल बाल के संग स्वयं घूम रहे हैं श्याम सखी। होली खेल रहे हैं घनश्याम सखी। हाथों में अबीर गुलाल लिये हुए हैं। सबको पकड़-पकड़ उनके मुख पर लगा रहे हैं हे सखी। होली खेल रहे हैं घनश्याम हे सखी। वे पायी नारी को भी नहीं पहचानते (छोड़ते) नन्दगाँव में उन्हें अकेली पाकर उनके मुख पर गुलाल मल देते हैं। होली खेल रहे है नन्दलाल सखी। कितना भी मना करूँ बात नहीं मानते सुबह शाम चोली मसकते हैं है सखी ॥ होली खेल रहे हैं घनश्याम हे सखी। भक्तजन कह रहे हैं कि ब्रज की स्त्रियाँ नन्दलाल को नाहक ही बदनाम कर रही हैं।

(43)

मृगनयनी नारि नवरतन रसिया अतल सजा को लहका सहे लाल पलंग पचरंग तकिया मृगनयनी नारि नवरतन रसिया॥
पियंरी गौरी गियरी सारी झमका सा मखमल रसिया मृगनयनी नारि नवल रसिया॥
बाँह बड़ा बाजूबन्द सोहै झलके आरसी अद्भुतिया मृगनयनी नारि नवल रसिया ॥
छोटी रे अंगुरी मा मुंदरी सोहै लिए हमेल दिये छतिया मृगनयनी नारि नवल रसिया॥
सूरदास हरि रूप निहारे चरण कमल पर चित बसिया। मृगनयनी नारि नवल रसिया॥

भावार्थ - मृगनयनों वाली नवरत्न सी रसिक है उसका अत्यन्त श्रृंगार दमक रहा है। उसका लाल रंग का पलंग और पंचरंगी तकिया शोभायमान है। स्वर्णवर्णी गौरी और उसकी पीतवर्ण की साड़ी और उसके मखमली वस्त्र चमक दमक रहे हैं। मृगनयनी नारी है कृष्ण (नवल) रसिया है। बाँह पर भारी बाजूबन्द शोभायमान है और दर्पण में उनका प्रतिविम्ब अद्भुत सुंदर लग रहा है। मृगनयनी नारी और कृष्ण रसिया हैं। छोटी अँगुली में मुद्रिका शोभित है। छातियों पर हमेल (सिक्कों की बनी माला) धारण किये है सुन्दर मृगनयनी नारी और रसिक हैं कृष्ण। सूरदास हरि का रूप निहार रहे हैं। उनका चित्र चरण कमलों पर बसा है। मृगनयनी सुन्दर नारी है और नवल (कृष्ण) रसिया है।

(44)

अरे हाँ रे हाँ बागे बगीचा के अवसर रंगागेहे रंगागेहे अँगना के दुआर
गाँव-गाँव जागे हे होली के आगी मोर तन उठे हे अंगार ॥
अरे हाँ रे हाँ बागे बगीचा के अवसर रंगागेहे रंगागेहे अंगना के दुआर ॥

भावार्थ-बाग बगीचों की रंगीनी का मौसम आ गया है वसन्त में बाग बगीचों में बहार आ गई है। आँगन का द्वार भी रंग गया है अर्थात् गाँव-गाँव में होलिका दहन हो रहा है। मेरे तन में भी अंगारे धधक रहे हैं (कामोत्तेजना) वसन्त में बाग-बगीचों में बहार आ गई है। और आँगन का द्वार भी रंगीन हो उठा है।

(45)

मन हरलियो रे मन हरलियो रे छोटे से नंद के लाला।
छोटे से रुखवा कदम के भुइयाँ लहसै डार ऊपर में बइठे कन्हैया मुखले मुरली बजाय।
छोटे से नन्द के लाला सांकुर खींच गोकुल के राधा पनिया भरन को जाय बीच में वादे नन्द के लाला अंग लिये लटकाय ॥
छोटे से नन्द के लाला मन हर लियो रे हाँ रे हाँ मन हर लियो रे छोटे से नन्द के लाला ॥

 

 

भावार्थ-मन जीत लिया रे मन जीत लिया छोटे से नन्द के लाला ने। कदम के छोटे से वृक्ष की शाखा भूमि पर झुकी जा रही है उस कदम वृक्ष पर कन्हैया बैठे है और मुख से मुरली बजा रहे हैं। द्वार की साँकल बन्दकर गोकुल की राधा पानी भरने को जा रही है बीच मार्ग में खड़े नन्दलाल ने उन्हें अपने अंग से लिपटा लिया। छोटे से नन्द के लाला ने मन जीत लिया रे मन हर लियो रे छोटे से नन्द के लाला ने। रंग पंचमी तक फागुन त्यौहार चलता है। होली अथवा वसन्तोत्सव के पर्व के समापन एवं उसकी विदाई का अवसाद जनमानस के मन पर छा जाता है। लोग भारी मन से उसे विदाई देते है परन्तु उससे आश्वासन भी लेना नहीं भूलते कि उसकी पुनः वापसी कब होगी। फागुन का विदा गीत यहाँ उद्धृत है-

(46)

फागुन महाराज फागुन महाराज अब के गये कब आबे
अरे कऊन महीना हरेली अऊ कऊन महीना तीजा तिहार
अरे कऊन महीना के नवमी दसहरा अरे कऊन महीना रे दियना जलाये
कऊन महीना रे फागुन अब के गयेले कब आबे
सावन महीना मा हरेली भादो तीजा के तिहार कुँवार महीना नवमी
दसहरा कातिक मा दियना जलाय फागुन महीना फागुन आये महाराज अब के गयेले कब आबे ॥

भावार्थ - फागुन महाराज फागुन महाराज अब के गये कब आओगे। अरे किस महीने में हरेली (अमावस्या) और किस माह में तीज का पर्व आता है। अरे किस माह में नवमी और दशहरा आते हैं। अरे किस माह में दीपक जलाये जाते हैं। किस महीने में फागुन अब के गये कब आओगे। सावन मास में हरेली और भादों में तीज का त्यौहार। क्वाँर मास में नवमी व दशहरा और कार्तिक में दीपक जलाये जाते हैं। फागुन महीने में आप फागुन त्यौहार (होली) आये महाराज अब के गये फिर कब आयेंगे।

लेख-
निरंजन महावर

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