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पर्व विशेष : | तदनुसार 11 मार्च 2026

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चेतना के व्यक्त प्रतीकः मन्दिर

चेतना के व्यक्त प्रतीकः मन्दिर

"दक्षिण कोसल टुडे" द्वारा सम्पादकीय प्रस्तावना

पहाड़, वन, नदियों के तट, विस्तीर्ण धरा आदि प्रकृति के रमणीय दृश्य मात्र नहीं हैं, अपितु ये देवताओं के स्वाभाविक निवासस्थान हैं। वे इन एकांत और पवित्र स्थलों पर नित्य निवास करते हैं। हमारी यह अथर्ववेदोक्त मान्यता आदिकाल से से ही चली आ रही है। वस्तुतः यह उस शाश्वत सत्य की ही घोषणा करती है कि प्रकृति साक्षात् ईश्वर की भौतिक अभिव्यक्ति है। और यही मान्यता मन्दिरों की महान संकल्पना में भी अनुदित हुई है, जो वास्तव में सर्वव्यापी परमात्मा को एक निश्चित और सुघड़ वास्तु-रूप देह के रूप में देखने के लिए की गई थी।

भोरमदेव मंदिर, छत्तीसगढ़
भोरमदेव मंदिर, छत्तीसगढ़ 

छत्तीसगढ़, जिसे प्राचीन काल में 'दक्षिण कोसल' के रूप में जाना गया, इसी अरण्य-संस्कृति और मंदिर स्थापत्य की एक श्रेष्ठ धरोहर को संजोए हुए है। महानदी के पावन तटों से लेकर दंडकारण्य के सघन वनों तक, तो सिरपुर आदि के प्राचीन शिल्प से लेकर भोरमदेव के शिल्पसौन्दर्य तक, यहाँ का कण-कण उस 'विराट् पुरुष' की अभिव्यक्ति है, जिसकी चर्चा श्रुति समेत हमारे शास्त्र अनादि काल से करते आए हैं। 'दक्षिण कोसल टुडे' के इस डिजिटल पटल पर, कला और संस्कृति के अभिलेखीकरण के अपने संकल्प की दिशा में, हम भारतीय विद्या भवन की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘भारती’ के 4 अक्टूबर 1964 के अंक से एक अत्यंत शोधपरक और विचारोत्तेजक लेख पुनः प्रकाशित कर रहे हैं।

लक्ष्मण मंदिर, सिरपुर
लक्ष्मण मंदिर, सिरपुर

देवदत्तजी (देवदत्त पटनायक नहीं) द्वारा आज से लगभग 60साल पहले लिखा यह लेख मात्र मन्दिर शिल्प का विवरण नही है, प्रत्युत यह मंदिर को 'चेतना के व्यक्त प्रतीक' के रूप में देखने की एक गहरी दार्शनिक अंतर्दृष्टि भी हमें प्रदान करता है। लेख इस सत्य को रेखांकित करता है कि मंदिर परमसत्ता की देह होने के साथ-साथ लोकजीवन को दिशा देने वाले मार्गदर्शक और समाज को संस्कारित करने वाली महान् प्रेरणा भी हैं। आज के आधुनिक युग में, जब हमने मंदिरों को मात्र व्यक्तिगत श्रद्धा तक सीमित रख दिया है, तब यह आलेख हमें मन्दिरों की उस व्यापक सामाजिक भूमिका का स्मरण कराता है, जहाँ वे अर्थ, कला, विद्या और लोककल्याण के जीवंत केंद्र थे। 

तो आइए, लगभग छह दशकों पूर्व लिखे गए इस दर्शनप्रधान लेख के माध्यम से हम अपने देवालयों के शास्त्रीय प्राण-तत्त्वों को अनुभूत करें!!!

चेतना के व्यक्त प्रतीकः मन्दिर

लेखक - देवदत्त 

मंदिर एक ओर तो परमात्मा की देह और कभी-कभी स्वयं परमात्मा के रूप में पूजे जाते हैं; दूसरी ओर वे लौकिक जीवन को एक मार्गदर्शन देने की क्षमता रखते हैं, कला को एक धारा और समाज को संस्कार देने के यंत्र बन सकते हैं।

इलियात तंगुड़ी !
मद्रास और मदुराई के बीच एक छोटा सा गाँव ! पर करीब दो वर्ष पहले उसी गाँव में देश की समस्त सांस्कृतिक प्रतिभाओं का सम्मिलन हुआ था। उत्तर से डॉ. रघुवीर थे, फ़्रान्स के डॉ. फिलियोजा थे, कम्बोडिया तथा अन्य देशों से विभिन्न लोग थे। यहाँ विश्वविद्यालयी समारोहों की ज्ञानवर्षा से भरी अहंकारिता नहीं थी, अपना मत प्रतिपादन करने की तीव्रता भी नहीं थी। काञ्ची कामकोटि पीठाधिपति श्री चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती के आवाहन पर लोग देश, धर्म तथा काल की समस्याओं पर विचार करने के लिए एकत्र हुए थे। यहीं पर एक विभाग था मन्दिर निर्माण का। इस विभाग ने आगमशास्त्रानुसार मन्दिर निर्माण तथा अर्चना सम्बन्धी विभिन्न प्रणालिओं पर अपना मत प्रदर्शित किया और निर्देश भी दिए थे।

पर आज प्रश्न है मन्दिर क्यों ? हम ज्ञानवृद्ध परम्परा के वाहक हैं। ‘अधमेषु प्रतिमा’ की पूजा परम्परा पर विश्वास करते हैं। अतः यह स्वाभाविक है कि अमेरिकावासी के सामने चर्च एक प्रश्न बनकर न खड़ा हो; पर मन्दिर हमारे सामने खड़े हो गये हैं! हिन्दू परम्परा में मन्दिर सामूहिक पूजा के लिए नहीं तो व्यक्तिगत उत्थान के लिए बनते हैं।

हमारी मान्यता है :
वनोपान्त नदी शैलं निर्झरोपान्त भूमिषु।
रमन्ते देवता नित्यं पुरेषुधान बत्सु च॥

अर्थात्, पहाड़, वन, नदी, के तीर आदि स्थान देवताओं के निवासस्थान हैं। इसी कारण हम अथर्ववेद के युग से इसे पूजित मानते आ रहे हैं। इस पौराणिक कल्पना के अतिरिक्त मन्दिरों का एक अलग व्यक्तित्व होता है। इसी व्यक्तित्व के आधार पर न देखने से हमें दक्षिण के मन्दिर एक समान लगते हैं और गहरी समझ के बिना आगत यहाँ भी देवपूजा के अतिरिक्त और कोई प्रेरणा नहीं प्राप्त कर पाता।

मन्दिरों की कल्पना भारत की केवल अपनी सम्पत्ति नहीं है। मानव चेतना ने क्रमशः स्थूलतर पदार्थों में भगवद्दर्शन करना प्रारंभ कर दिया तो धीरे-धीरे हम मात्र अग्निहोत्र की परम्परा से उतर कर यज्ञों की परम्परा पर आये, देवगण यज्ञों में भाग लेने आने लगे। धीरे-धीरे उनकी स्थायी प्रतिष्ठा के लिए विभिन्न यंत्र तथा वेदिकाएँ बनीं और वे केवल आहूत ही नहीं प्रतिष्ठित भी किये जाने लगे। शास्त्रों ने उनमें संपूर्ण ब्रह्माण्ड को समाहित माना और इसके प्रतीक स्वरूप मन्दिरों की उत्पत्ति हुई।

यह उत्पत्ति केवल भारत में नहीं, यूनान और ग्रीस में भी हुई थी। अन्तर यही रहा कि भारत में मंदिर जीवन के केन्द्र बन गये थे, पर ग्रीस उन्हें उस रूप में अपना नहीं सका। उनके स्नानागार पुष्करिणी-सी पवित्रता नहीं अपना सके; फलतः वे अत्यंत स्वच्छ होकर भी मन की मलिनता से दूषित हो उठे; जबकि काई जमी भारतीय पुष्करिणी आज भी सर्व पापहारी है। पर प्रारंभ में हमने एक ही विधान पाया था, प्रारंभिक भेद भी केवल स्थानीय विधानों के थे। सामग्रियों का भी भेद रहा।

उदाहरणस्वरूप वेदी को लें। मंदिर के प्रारंभ में पृथ्वी की प्रतीक वेदिका बनती है। ग्रीस के मंदिरों की वेदिकाओं का अनुपात भी ऐसा ही है। पर भारतीय मंदिरों की वेदिका वास्तुपुरुष मण्डल के अनुसार विभिन्न वर्गों में विभाजित की जाती है । देवताओं का स्थान निश्चित होता है। गर्भगृह के अनुसार संपूर्ण कलाओं का विभाजन होता है और तब जाकर वेदिका देवप्रतिष्ठा के उपयुक्त होती है ।

भारतीय मंदिरों की वेदिका
भारतीय मंदिरों की वेदिका

मंदिर विराट् पुरुष का वास्तुरूप होने के नाते यजमान और आचार्य के अतिरिक्त स्थपति की भी वास्तुशास्त्र में प्रधानता है। स्थपति ही शास्त्रानुसार और मन्दिर की प्राचीन परम्परा तथा पुराणकथा के अनुसार मन्दिर के मानचित्र की रचना तथा उसके वास्तुरूप को पूर्ण करता है। इसीलिए पौराणिक वास्तु शान्ति प्रयोग में वास्तु पुरुष की वन्दना की जाती है- ॐ नमो भगवते वास्तुपुरुषाय, महाबल पराक्रमाय... शक्रवरदाय वास्तोष्पते नमः…

वास्तुपुरुष को केन्द्र करके अवस्थानुरूप मण्डूक या परमशायिन आदि प्रकारों के वास्तुपुरुष मण्डल की रचना की जाती है। जिस तरह से संगीत के सप्त स्वरों का हजारों प्रकार से प्रयोग किया जाता है, उसी तरह वास्तुशास्त्र विधान का प्रयोग करने में स्थपति स्वतंत्र है। पर अशुद्धि का कोई स्थान नहीं। मयमत के अनुसार तो मानं धामृस्तु संपूर्ण जगत्सम्पूर्णता भवेत्-२२-६२

मन्दिर के सामान्य तौर पर कुछ भिजाजन हैं-विमान या शिखर, प्रासाद और गर्भगृह, चिदम्बरम्, मदुरा आदि स्थानों पर सहस्त्र मण्डपम् अन्य स्थानों पर शत- मण्डपम् तथा सामान्य मन्दिरों में पूर्ण या अर्ध मण्डपम् की व्यवस्था है।

इनमें भी कुछ मुख्य तत्त्व होते हैं, जैसे मान, स्थापत्य और उपादान। शास्त्रों में उपादान का उल्लेख तो अवश्य है, पर इस पर ज़ोर कम दिया गया है। मान और स्थापत्य ये दो तत्त्व प्रतीकात्मक अधिक हैं।

मन्दिर का सबसे प्रमुख अंश होता है विमान या शिखर। मत्स्यपुराण में तो इसके निर्माण का अत्यंत विस्तार से विवरण है। उत्तर भारत में जहाँ गोपुरमों की प्रधानता नहीं है, यही विमान शिखरों का रूप धारण कर लेता है और शिखर पर के चक्र या त्रिशूल से मन्दिर पहचाने जाते हैं "शिखरस्य तु भेदेन सर्वेषां भेद मुद्दिशेत" शिखरों का सामान्य रूप तो खजुराहो तथा अन्य मन्दिरों की कैलाश प्रणाली में उपलब्ध है, पर विमान विभिन्न प्रकार के बनते हैं। विसवत्यूर का अर्ध चन्द्र विमान आज भी उसी परम्परा का प्रमाण है।


अर्धचन्द्र विमान

विमान की रचना गर्भगृह के चतुर्भुज की चौड़ाई के बराबर होती है, गर्भगृह के अन्दर की चौड़ाई बाहर की चौड़ाई की आधी होती है और विमान का आकार गर्भगृह की बाहरी दीवार की चौड़ाई से दूना होता है।

मन्दिरों के गर्भगृह अंधेरे होते हैं। मुख्य द्वार के अतिरिक्त और कोई द्वार नहीं-हवा नहीं-पर वास्तव में गर्भगृह सृष्टि के उस अंध गर्भ के प्रतीक हैं, जिसमें हिरण्यगर्भ निवास करते हैं। इसी गर्भ- गृह में प्रतिष्ठापक यंत्र की प्रतिष्ठा हुई रहती है। काञ्ची के कामाक्षी मन्दिर में तो इसी यंत्र की पूजा होती है; पर सामान्यतया मन्दिरों में सृष्टि के तत्त्व स्वरूप धातुओं से बनी या प्रस्तर निर्मित मूल मूर्ति प्रतिष्ठित रहती है और उत्सव शृंगार आदि चलित मूर्तियाँ उसके पास ही प्रस्थापित कर दी जाती हैं।

गर्भगृह की दीवार को भी प्रासाद ही कहते हैं और इसी प्रासाद के छोर यानी स्कंध पर वास्तुपुरुष का शीर्ष भाग अवस्थित होता है। विश्वपुरुष की देह को मन्दिर में समाहित करने के लिए गर्भ के अनुरूप शीर्ष से पादपर्यंत शरीर का विन्यास किया जाता है।

गोपुरम् वास्तुपुरुष की देह के अतिरिक्त विभिन्न लोकों के भी प्रतिक होते हैं। शिखर के अन्दर कलश, महापद्म और आमलक नामक करणों के विन्यास के बाद गोपुरम् की भूमियाँ प्रारम्भ होती हैं। दक्षिण भारत में विजयनगर साम्राज्य के द्वारा बतलाये गये गोपुरमों की भूमियाँ इस दृष्टि से शास्त्र का व्यावहारिक प्रमाण मानी जाने लगी हैं। इन भूमियों पर मन्दिर के अधिष्ठाता देवता से विभिन्न लोकों में पुराणकथाओं द्वारा सम्बन्धित देवी देवता, गंधर्व, किन्नर, यक्ष और अप्सराओं के तदनुरूप चित्र बनाये जाते हैं। स्थपति को अत्यंत कुशलता के साथ कथाओं का चुनाव, देवों के रूपों के “शुद्ध बिम्ब,” उनके उचित स्थान तथा संपूर्ण मन्दिर की लक्षण कला में समग्र संयोजन का निर्णय लेना होता है। विदेशी कलाविज्ञों की आलोचनाओं के बावजूद मदुरा मीनाक्षी मन्दिर के कुम्भाभिषेकम् के समय भारत भर से एकत्र स्थपतियों ने इस तथ्य को प्रमाणित कर दिया है कि प्राचीन कलाकारों की बिरुदावली गाकर ही शास्त्र-प्रेम का परिचय नहीं दिया जा सकता और नयों में भी शास्त्रानुसार बहुत कुछ करने की क्षमता बाकी है।


मीनाक्षी मंदिर

केवल दाक्षिणात्य मन्दिरों के शीर्ष भाग पर एक दानवाकृति दिखायी देती है। सर, बड़े दाँत, लपलपाती जीभ, इसका नाम है - कीर्त्तिमुख, शिव ने राक्षसों के विनाश के लिए इसे निर्मित किया था-पर अपनी प्रबल बुभुक्षा में समस्त राक्षसों को खाकर कीर्त्तिमुख ने शिवसे पूछा- "अब क्या खाऊँ ?” शिवने कहा - "तू अब अपने को खा" और कीर्त्तिमुख ने अपने को खाना आरम्भ कर दिया-जब केवल सर ही बच गया, तो आज्ञा पालन से प्रसन्न होकर शिव ने उसे अमर होने का वर दिया और मन्दिर के शिखर पर प्रतिष्ठित कर दिया ।

तब से आज तक यह भगवान के प्रतिनयन की याद दिलाता है। यूनानी मन्दिरों में चित्रित गार्गों की भयंकरता के साथ इसका अद्भुत मेल है। पर मंदिरों के स्थापत्य का प्रतीकात्मक रूप आज धूमिल पड़ गया है। कला की गैलरियों में प्रतिष्ठित किये जाने के पूर्व गोपुरमों पर अंकित प्रतिमाएँ हमें अर्थहीन लगती हैं। शास्त्रानुसार मानव, पशु, पक्षी तथा विभिन्न प्रकार की लोकश्रुतियों का प्रतिफलन भी मन्दिरों की कला में हुआ है।

इसी तरह मन्दिरों में निर्मित पुष्करिणी की अपनी योजना है और सहस्रमण्डपम् के लिए भी इन्द्र, चन्द्र, सूर्य आदि के नामों पर भिन्न-भिन्न प्रणालियाँ स्थापित की गयी हैं। प्राचीन काल के मन्दिर केवल भगवदाराधन के केन्द्र मात्र न होकर लोक संस्कृति, पर्व, शास्त्रीय नृत्य, विद्या, आदि अनेक प्रवृत्तियों के केन्द्र थे और आज का सामाजिक जीवन मन्दिरों से मुड़ कर कारखानों की ओर जाते हुए भी वह शान्ति नहीं पा रहा है, जो कि उसका लक्ष्य माना जाता है।

इस तरह मन्दिर एक ओर तो परमात्मा की देह और कभी-कभी स्वयं परमात्मा के रूप में पूजे जाते रहे हैं, दूसरी ओर वे लौकिक जीवन को एक मार्गदर्शन देने की क्षमता रखते हैं। कला को एक धारा और समाज को संस्कार देने के यंत्र बन सकते हैं। आज हम इस केन्द्र से च्युत अवश्य हो गये हैं; पर मन्दिर निर्माण की कला की प्रेरणा शाश्वत है और अगर हम उससे कुछ भी ग्रहण न कर सकें, तो यह हमारा दुर्भाग्य ही होगा। 

(यह लेख भारतीय विद्या भवन की प्रसिद्ध पत्रिका “भारती” के 4 अक्टूबर 1964 के अंक से साभार लिया गया है।)

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