ज्ञान और भक्ति का पावन संगम : तिरुवोट्टियूर का ऐतिहासिक त्यागराजस्वामी मन्दिर
June 14, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | आषाढ़ शुक्ल पंचमी | शनिवार
नक्षत्र: पूर्वा फाल्गुनी | योग: वरीयान | करण: बव
पर्व विशेष : | तदनुसार 18 जुलाई 2026

दक्षिणापथ शृंखला की यात्रा में कांचीपुरम के कैलाशनाथर मन्दिर और चेन्नई के निकट स्थित तिरुवोट्टियूर मन्दिर की चर्चा के बाद अब विल्लुपुरम जिले के एन्नायिरम मन्दिर की यात्रा पर चलते है।

तमिल भाषा में एन्नायिरम का अर्थ आठ हजार होता है। एन्नायिरम गाँव में स्थित यह मन्दिर भगवान अझगिया सिंग पेरुमल यानी “नृसिंह” को समर्पित है। यह मन्दिर तात्कालिक शिक्षा प्रणाली, वेतन वितरण और आय-व्यय के विवरण की पर्याप्त जानकारी देता है।
मन्दिर की दीवारों पर उपस्थित शिलालेखों से तात्कालिक शिक्षा के व्यवस्था की जानकारी मिलती है। ये मन्दिर अपने समय में विश्वविद्यालय के रूप में काम करते थे। इस मंदिर ने चोल और पल्लव काल में ज्ञान के संरक्षण, विकास और प्रसार के प्रमुख माध्यम के रूप में कार्य किया। राजाओं, स्थानीय सभाओं और दानदाताओं के शिलालेखों के अध्ययन करके प्राचीन शिक्षा प्रणाली को समझा जा सकता है। यहाँ की शिक्षा व्यवस्था हेतु दान की अच्छी व्यवस्था थी।

विल्लुपुरम जिले में स्थित एन्नायिरम गाँव प्राचीन शिक्षा व्यवस्था को समझने का सबसे अच्छा माध्यम है। तमिलनाडु में इसे राजराजा चतुर्वेदीमंगलम कहा जाता था। अब इसका नाम बदलकर एन्नायिरम हो गया है। राजा के आदेश से इस गाँव को शिक्षा का मुख्य केन्द्र घोषित किया गया था। चतुर्वेदीमंगलम शब्द यह दर्शाता है कि यह भूमि 4 वेदों की शिक्षा के लिए दान की गई थी।
राजेन्द्र चोल प्रथम का शासनकाल 1012 से 1044 ईस्वी तक था। उनके संरक्षण में अझगिया नरसिम्हा पेरुमल मन्दिर उच्च शिक्षा के आवासीय संस्थान के रूप में विकसित हुआ। इसे गुरुकुलम् कहा जाता था। यह सैकड़ों विद्वानों के रहने और सीखने का बड़ा केन्द्र था।
यहाँ मिले शिलालेखों से संस्थान को दिए गए दान की सटीक जानकारी मिलती है। इन शिलालेखों से 300 एकड़ उपजाऊ भूमि के दान का उल्लेख मिलता हैं। स्थानीय ग्राम सभा इस भूमि की उपज का प्रबन्ध करती थी। इससे गुरुकुल के लिए एक स्थायी कोष बनाया गया था। भूमि से मिलने वाले इस धन के कारण शिक्षा व्यवस्था पर राजनीतिक/प्रशासनिक बदलावों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता था। इस व्यवस्था से ऐसा वातावरण बना जहाँ अध्ययन लम्बे समय तक चलता रहा।
एन्नायिरम के इतिहास से कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ मिलती हैं। यहाँ पल्लव शासक नृपतुंगवर्मन के काल 850 से 882 ईस्वी तक से लेकर परान्तक चोल प्रथम के शासनकाल 907 से 953 ईस्वी तक के अभिलेख मिलते हैं। यह संस्थान राजेन्द्र चोल प्रथम के काल में सबसे बड़ा केन्द्र बना। मन्दिर की दीवारों पर लिखे शिलालेख 'राजाज्ञा/आदेश' के रूप में हैं। ये इस शिक्षा केन्द्र के नियमों को बताते हैं। इन शिलालेखों में 340 छात्रों और 14 विद्वान शिक्षकों के लिए भोजन और अन्य आवश्यक सामग्री के वितरण का स्पष्ट विवरण है।
छात्र और शिक्षक का यह अनुपात महत्वपूर्ण है। इससे पता चलता है कि शिक्षा प्रत्येक छात्र पर केन्द्रित थी तथा गुरु और शिष्य के बीच सीधा संवाद होता था। यहाँ का पाठ्यक्रम वृहद था। इसमें 4 वेद यानी ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद शामिल थे। सामवेद की वाजसनेय, सन्दोक और तलवाकार जैसी विशिष्ट शाखाएँ भी पढ़ाई जाती थीं। इसके साथ ही व्याकरण, मीमांसा और तर्कशास्त्र का अध्ययन होता था।
मन्दिर में प्रतिदिन शास्त्रार्थ चर्चाएँ होती थीं। छात्र भविष्य के उपयोग के लिए ताड़ के पत्तों पर ग्रंथों की प्रतिलिपि बनाते थे। इस कार्य के लिए उन्हें निश्चित मात्रा में अनाज दिया जाता था। कोई भी छात्र तभी उत्तीर्ण हो सकता था जब वह वेदों, खगोल विज्ञान और तमिल तथा संस्कृत के व्याकरण में निपुण हो जाता था। गुरुकुल का वातावरण बहुत सकारात्मक और अच्छा था।
एन्नायिरम के शिलालेखों में बौद्ध सूत्र जैसे कृष्य सूत्र, कल्प सूत्र और ज्ञान सूत्र के अध्ययन का विवरण भी मिलता है। इससे स्पष्ट होता है कि इन शिक्षण केन्द्रों में समावेशी दृष्टिकोण थी। यहाँ विद्वान विविध दार्शनिक परम्पराओं का अध्ययन और विश्लेषण करते थे। यह उस समय विचारों के आदान-प्रदान को दर्शाता है। विभिन्न परम्पराओं के विद्वान एक दूसरे के विचारों को समझते थे। इससे ज्ञान और चर्चा की स्वस्थ परम्परा को बढ़ावा मिला।
एन्नायिरम संस्थान में रहने वाले लोगों के लिए दैनिक भत्ते तय थे। कनिष्ठ छात्रों यानी ब्रह्मचारियों को प्रतिदिन 6 नाली (लगभग 5.5 किलोग्राम) अनाज दिया जाता था। वरिष्ठ विद्वानों को प्रतिदिन 10 नाली (लगभग 9.5 किलोग्राम) अनाज मिलता था। शिक्षकों यानी भट्टों को अच्छा वेतन मिलता था। उन्हें प्रतिदिन 16 व्यक्तियों के भोजन का खर्च और सालाना 0.5 कलिंगु (लगभग 6 ग्राम) सोने का विशेष भत्ता दिया जाता था।
इस व्यवस्था से पता चलता है कि चोल राज्य में शिक्षकों का बहुत सम्मान था। राज्य यह मानता था कि ज्ञान की रक्षा के लिए ऐसे शिक्षकों की आवश्यकता है जो पूरी तरह अध्यापन के प्रति समर्पित हों। राज्य धन आदि से यह सुनिश्चित करता था कि यह कार्य सम्मानजनक बना रहे।
शिक्षा की इस व्यवस्था को बनाए रखने के लिए मन्दिर ने आवश्यक सुविधाएं दीं। मन्दिर से मिलने वाले दान से शाम की पढ़ाई और पांडुलिपियों की प्रतिलिपि बनाने के लिए प्रकाश की अच्छी व्यवस्था की जाती थी।
छात्रावास होने के कारण विभिन्न क्षेत्रों के छात्र एक साथ रहते थे। इससे उनके बीच सहयोग की भावना बढ़ती थी। यह मन्दिर गाँव की आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था का मुख्य केन्द्र था। मन्दिर की श्रीवैष्णव समितियां इस दान की देखरेख के लिए ग्राम सभा के साथ मिलकर काम करती थीं।
मन्दिर में आने वाले अनाज और धन का उपयोग शिक्षा एवं देव उत्सवों के लिए होता था। विभिन्न क्षेत्रों से आने वाले छात्र गुरुकुल में पढ़ते थे। वे सभी एक ही छात्रावास में रहते थे जिससे उनके बीच विचारों और भाषा का आदान और प्रदान होता था।
इन स्थानों के इतिहास का अध्ययन करने पर कई पुरानी बातें सामने आती हैं। मन्दिर के पास एन्नायिरम मलई में शिलालेख मिलते हैं जो जैन धर्म से सम्बन्धित हैं। इससे पता चलता है कि तमिलनाडु में विभिन्न धार्मिक विचारों का पुराना इतिहास रहा है। इन विशाल मन्दिरों के बनने से पहले यहाँ जैन सन्यासी रहते थे। बाद में यह स्थान जैन केन्द्र से वैदिक अध्ययन के वैष्णव केन्द्र के रूप में बदला।मन्दिर ऐसा माध्यम बना जिसने ज्ञान की प्राचीन परम्पराओं को समय के अनुसार आगे बढ़ाया। इससे स्पष्ट होता है कि इस क्षेत्र का इतिहास समृद्ध रहा है।
ये संस्थान शिक्षा को स्वास्थ्य, प्रशासन या आध्यात्मिक जीवन से अलग नहीं मानते थे। तिरुमुक्कुडल का शिलालेख इस विषय में अतिरिक्त जानकारी देता है। इससे पता चलता है कि मन्दिर में विद्वानों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए भी व्यवस्था की गई थी। लोग मानते थे कि ज्ञान के प्रसार के लिए विद्वानों का स्वस्थ रहना आवश्यक है।
मन्दिर का इतिहास तमिलनाडु में शिक्षा की निरन्तरता को समझने में सहायता करता है। इन गुरुकुलों की ज्ञान परम्परा आगे चलकर तंजावुर के सरस्वती महल जैसे पुस्तकालयों तक पहुँची। इस प्रकार मध्यकाल के मन्दिरों की शिक्षा व्यवस्था आगे बढ़ती रही।
एन्नायिरम में शिक्षक केवल ग्रंथ नहीं पढ़ाते थे। वे उन पर टीकाएं भी लिखते थे और गम्भीर चर्चा करते थे। इस कारण ये मन्दिर विचार, विमर्श, संस्कृति के मुख्य केन्द्र बन गए। यहाँ संस्कृत और तमिल भाषा की साहित्यिक परम्पराओं का मेल होता था।
यहाँ दार्शनिक विषयों पर वाद और विवाद होते थे तथा नए प्रशासकों, पुजारियों और विद्वानों को प्रशिक्षित किया जाता था। मन्दिर समाज का मुख्य अंग था और गुरुकुल उसका वैचारिक केन्द्र।
मध्यकालीन तमिलनाडु के लोगों ने ज्ञान को किसी महल या मठ तक सीमित रखने के स्थान पर गाँव के जीवन का मुख्य हिस्सा बनाया। इसके लिए भूमि का दान दिया जाता था, भोजन की व्यवस्था होती थी और विद्वानों को समाज में सम्मान मिलता था। यह सब समाज को साक्षर बनाने के प्रयासों का हिस्सा था।
एन्नायिरम और तिरुमुक्कुडल के पत्थरों पर लिखी यह विरासत संस्कृति और ज्ञान के क्षेत्र में चोल राजवंश का बड़ा योगदान है। इससे पता चलता है कि तात्कालिक समाज ने अपने संसाधनों का उपयोग सुन्दर मन्दिर बनाने के साथ ज्ञान को बढ़ावा देने के लिए भी किया। विद्वानों के न रहने पर भी उनका ज्ञान सुरक्षित रहा। इस इतिहास का अध्ययन करना आवश्यक है ताकि प्राचीन अतीत हमारी संस्कृति का हिस्सा बना रहे। ये शिलालेख हमें उस समय की कक्षाओं, चर्चाओं और ज्ञान की खोज की याद दिलाते हैं और यह बतलाते है, भारत में शिक्षा की व्यवस्था कितनी समृद्ध थी।
एन्नायिरम मन्दिर: चोल कालीन शिक्षा प्रणाली का प्रमुख केंद्र
June 28, 2026