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शिक्षक दिवस विशेष: संविधान सभा में डॉ. राधाकृष्णन के विचार

शिक्षक दिवस विशेष: संविधान सभा में डॉ. राधाकृष्णन के विचार


यह आलेख संविधान सभा की आधिकारिक बहसों और डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के दार्शनिक विचारों पर आधारित एक रचनात्मक एवं विश्लेषणात्मक प्रस्तुति है; विचारों और संवादों को कथात्मक प्रवाह के लिए संयोजित एवं पुनर्गठित किया गया है।


नई दिल्ली की उस रात में इतिहास की एक बेचैनी थी। भारत खुद को एक संविधान देने की तैयारी कर रहा था और हर शब्द मायने रखता था। लाल किले पर आज़ादी का तिरंगा फहरे अभी कुछ ही महीने बीते थे, लेकिन स्वतंत्रता मिल चुकी थी, उसके अर्थ को संस्थाओं और संविधान में आकार दिया जाना अभी बाकी था। देश केवल सत्ता हस्तांतरण के दौर से नहीं गुजर रहा था। संविधान सभा के कक्षों में एक ऐसे गणराज्य की रूपरेखा तय हो रही थी जो यह निर्धारित करने वाला था कि आज़ाद भारत अपने प्रत्येक नागरिक के साथ कैसा व्यवहार करेगा।

उस दिन मौलिक अधिकारों के अंतर्गत धर्म की स्वतंत्रता और शिक्षा में उसकी सीमा पर बहस तीखी हो रही थी। प्रश्न सीधा था। क्या राज्य द्वारा संचालित अथवा सहायता प्राप्त विद्यालयों में धार्मिक शिक्षा दी जा सकती है? यदि दी जाए तो क्या किसी विद्यार्थी को उसमें भाग लेने के लिए विवश किया जा सकता है? धर्म और राज्य एक-दूसरे से कितनी दूरी पर रहें?

संविधान निर्माण में जुटी संविधान सभा
संविधान निर्माण में जुटी संविधान सभा

बहस में एक दृष्टि यह थी कि राज्य को धर्म के हर रूप से पूरी तरह अलग रहना चाहिए। तभी सदन में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की प्रशांत आवाज़ उठी। धवल वस्त्र और सिर पर बंधी पगड़ी के साथ वे केवल सदस्य के रूप में नहीं, बल्कि एक शिक्षक और विचारक के रूप में बोल रहे थे।

उन्होंने किसी धर्म की श्रेष्ठता का दावा नहीं किया। पहले एक साफ अंतर रखा। राज्य के पूर्ण नियंत्रण वाले संस्थानों में किसी एक संप्रदाय की धार्मिक शिक्षा देना निष्पक्षता के सिद्धांत के विरुद्ध होगा। सहायता प्राप्त संस्थानों में धार्मिक शिक्षा और व्यक्ति की अंतरात्मा की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाना होगा, जहाँ किसी भी विद्यार्थी को उसकी इच्छा के विरुद्ध बाध्य न किया जाए। बहस में यह चिंता भी सामने थी कि यदि राज्य धर्म के किसी भी रूप के पास खड़ा दिखाई देगा तो दूसरे नागरिकों को भरोसा कैसे होगा।

राधाकृष्णन कुछ क्षण चुप रहे। फिर धीरे से पूछा, “आप धर्म से दूरी चाहते हैं या किसी एक धार्मिक सत्ता से?”

यह अंतर छोटा नहीं था।

“बहुत बड़ा,” उनका आशय था। यूरोप में धर्म और राज्य का अपना इतिहास रहा था। वहाँ चर्च और सत्ता के लंबे संघर्षों ने कई राजनीतिक विचारों को जन्म दिया। लेकिन किसी विचार की उत्पत्ति को समझे बिना उसे दूसरी सभ्यता में ज्यों का त्यों रख देना हमेशा ठीक नहीं होता।

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन

भारत को अपना रास्ता समझना चाहिए। अलग होना लक्ष्य नहीं, समझना लक्ष्य है।

धर्म के नाम पर संघर्ष से कैसे बचेंगे?

पहले यह तय करना होगा कि हम धर्म से क्या समझते हैं। आस्था और पूजा उसके हिस्से हो सकते हैं। लेकिन यहाँ धर्म का अर्थ केवल पूजा नहीं रहा। वह कर्तव्य भी है, आचरण भी और न्यायपूर्ण जीवन की जिम्मेदारी भी। राज्य को किसी एक मत को समझने की जरूरत नहीं। उसे नागरिकों की स्वतंत्रता और न्याय सुनिश्चित करना है।

उन्होंने यह भी याद दिलाया कि भारत की ऐतिहासिक परिस्थिति यूरोप से अलग रही है। यह एक बहुधार्मिक समाज था, जो विभाजन के गहरे ज़ख्मों से भी जूझ रहा था। राज्य का कर्तव्य किसी एक धर्म का पक्ष लेना नहीं, बल्कि अलग-अलग धर्मों के प्रति निष्पक्ष व्यवहार करना था। उनकी दृष्टि में सत्य की खोज के मार्ग अनेक हो सकते थे। किसी एक मार्ग को पूरे सत्य का एकमात्र अधिकारी मान लेना उचित नहीं था।

उन्होंने याद दिलाया कि भारत में जिसे धर्म कहा गया, वह कोई बंद पंथ नहीं था। वह जीवन की एक समग्र दृष्टि थी। भारत की एकता किसी एकरूपता पर नहीं टिकी। वह संगीत की तरह है जिसमें अलग-अलग स्वर मिलकर एक रचना बनाते हैं। विविधता मिटाकर एकता बनाना आसान है। विविधता के साथ एकता बनाए रखना कठिन है। यही असली परीक्षा है।

भारत की विविधता में एकता 
भारत की विविधता में एकता 

उनकी व्यापक दार्शनिक दृष्टि में जाति का प्रश्न भी इससे अलग नहीं था। परंपरा का अंध समर्थन नहीं किया जा सकता। एक शिक्षक और विचारक का काम है कि वह सोने और उस पर जमी धूल के बीच अंतर करे।

वर्ण की मूल कल्पना को जन्म आधारित ऊँच-नीच से अलग समझने की कोशिश की गई थी। लेकिन जब सामाजिक व्यवस्था जन्म पर टिक गई, तो उससे अन्याय भी पैदा हुआ। जो व्यवस्था भेदभाव करे, उसे केवल पुरानी होने के नाम पर नहीं बचाया जा सकता। अपनी परंपरा से प्रेम करने का अर्थ उसकी हर गलती का बचाव करना नहीं है। फिर उन्होंने अद्वैत की गहराई की ओर इशारा किया।

सर्वं खल्विदं ब्रह्म।

यह केवल एक दार्शनिक घोषणा नहीं थी। इसका अर्थ था कि इस पूरे जगत में एक ही मूल चेतना व्याप्त है। यदि अस्तित्व के आधार में एकता है, तो दूसरे मनुष्य को केवल ‘दूसरा’ मानकर उससे घृणा या अहंकार कैसे संभव है? यदि हर व्यक्ति में वही सत्य बसता है, तो जन्म, जाति या संप्रदाय के आधार पर किसी को ऊँचा या नीचा ठहराना स्वयं उस सत्य का खंडन है।

धार्मिक श्रेष्ठता का दावा या सामाजिक ऊँच-नीच, दोनों ही उस दृष्टि के विरुद्ध जाते हैं। संविधान जब समता का अधिकार लिख रहा था, तो वह केवल किसी बाहरी विचार की नकल नहीं कर रहा था। वह अपनी सभ्यता के कुछ उदार मूल्यों को आधुनिक कानूनी भाषा में ढालने का प्रयास भी कर रहा था।

समता और बंधुत्व का संवैधानिक संकल्प
समता और बंधुत्व का संवैधानिक संकल्प

यही दृष्टि स्वाभाविक रूप से शिक्षा तक पहुँची। यदि हर मनुष्य में वही चेतना है, तो शिक्षा का काम किसी एक मत को थोपना नहीं हो सकता। शिक्षा का उद्देश्य जानकारी का ढेर लगाना या विद्यार्थी को किसी विचार का अंध अनुयायी बनाना नहीं, सोचने की क्षमता देना है। विद्यार्थी को असहमत होने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।

बहस में एक और प्रश्न उभरता है। शिक्षक का काम तो ऐसा है जिसका फल जल्दी नहीं दिखता। कभी सालों बाद दिखता है, कभी नहीं भी दिखता। तब प्रयास का अर्थ क्या रह जाता है?

राधाकृष्णन ने सिर हिलाया।

“परिणाम की चिंता में अटक जाना कर्म को कमजोर करता है।”

फिर उन्होंने कर्म और परिणाम के संबंध की ओर संकेत किया। गीता ने भी इसी कठिनाई पर विचार किया है। परिणाम हमारे हाथ में न हो, फिर भी कर्म से पीछे हटना हमारे हाथ में नहीं। जो लंबे समय तक कक्षा में खड़े रहे हैं, वे इसे अपनी हड्डियों में महसूस करते हैं। शिक्षक का काम अपने विचारों की प्रतियाँ तैयार करना नहीं। सामने वाले को अपने प्रश्नों का स्वामी बनाना है। उस विचार में शिक्षा की पूरी गरिमा छिपी थी। एक विद्यार्थी अपने शिक्षक से असहमत हो सकता है। एक नागरिक अपने राज्य से असहमत हो सकता है। और एक समाज अपनी परंपरा के किसी हिस्से पर प्रश्न उठा सकता है।

प्रश्न करना परंपरा को नष्ट करना नहीं है। कभी-कभी प्रश्न ही यह तय करता है कि परंपरा में क्या बचाया जाना चाहिए और क्या बदला जाना चाहिए। उस बहस ने केवल एक संवैधानिक प्रावधान का निर्धारण नहीं किया। उसने यह भी याद दिलाया कि संविधान केवल कानूनों की किताब नहीं। वह परस्पर सम्मान, आत्म-संयम और निरंतर सीखने की एक जीवंत प्रतिज्ञा है। अलग होते हुए भी एक साथ कैसे रहा जाए, यही उसका मूल प्रश्न है।

पाँच सितंबर को जन्मे डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन आगे चलकर राष्ट्रपति बने। लेकिन उनका जन्मदिन आज भी शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। शायद इसलिए कि एक शिक्षक की सबसे बड़ी विरासत अंतिम उत्तर देना नहीं होती। वह आने वाली पीढ़ियों को अपने प्रश्नों के साथ स्वतंत्र और विवेकपूर्ण ढंग से खड़े होने की क्षमता देता है।

- श्रीनिवासा चारी
   हैदराबाद

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