छत्तीसगढ़ का पारम्परिक लोकनाट्य: रहस
July 22, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | अश्विना शुक्ल अष्टमी | रविवार
नक्षत्र: उत्तराषाढ़ा | योग: सुकर्मा | करण: विष्टि
पर्व विशेष : | तदनुसार 18 अक्टूबर 2026

वर्तमान समय आपाधापी का समय है। मनुष्य इस आपाधापी के कारण मानसिक शांति से कोसों दूर हैं। सुख-सुविधा की चाहत में मनुष्य इतना उलझ गया है कि भौतिक संपदाओं की उपलब्धि के बावजूद भी न तो उसकी आंखों में नींद है, और न ही मन में चैन। ऐसी स्थिति में उसके शारीरिक कष्टों और उसके मन की अशांति को कोई शांत कर सकती है, तो वह है प्रकृति।
आवश्यकता इस बात की है कि मनुष्य प्रकृति के साथ पूर्ण तादात्म्य बनाकर चले। प्रकृति तो प्रदायिनी है आनंद की, ज्ञान की और लौकिक-अलौकिक सुख-समृद्धि की। जो प्रकृति से जुड़ा है, वही सुखी है, वही समुन्नत और समृद्धिशाली है। प्रकृति के नैसर्गिक सौन्दर्य से परिपूर्ण ऐसा ही एक मनोरम स्थल है-डांगेश्वर महादेव।
डोंगेश्वर महादेव राजनांदगाँव जिला मुख्यालय से लगभग 75 कि.मी. दूर गण्डई (नर्मदा)-बालाघाट मार्ग के आठवें कि.मी. पर स्थित है। यहाँ प्रकृति अपनी सम्पूर्ण मनोरमता के साथ बिखरी हुई है। मैदानी क्षेत्र की समाप्ति के पश्चात मानपुर गाँव से प्रारंभ होता है प्रकृति का सौन्दर्य दर्शन, जो आंखों को बरबस ही असीम शांति देता है। सलिहा, मोंदे, भिरहा, कर्रा, कोरई, पलास आदि वृक्षों से शोभित यह जंगल, जहाँ रंग-बिरंगे पक्षी शांति गीत गाते और राहगीरों को अपनी ओर बुलाते हैं। इस शांति गान में शामिल होने के लिए।

गरगरा घाटी की चढ़ाई यहीं से प्रारंभ होती है। लगभग डेढ़ कि.मी. लम्बी गरगरा घाटी अपनी सुन्दरता से सबको सम्मोहित करती है। ऊँची पहाड़ियाँ, सागौन के ऊँचे-ऊँचे, हरे-भरे पेड़ यहाँ की वन सम्पदा के स्वमेव साक्षी हैं। प्राकृतिक रूप से उगे और वन विभाग द्वारा रोपित सागौन वृक्षों का यह क्षेत्र ‘‘सैगोना रवार‘‘ के नाम से जाना जाता है। गरगरा घाटी में गरगरा की छोटी मढ़िया व विशाल दुर्गा मंदिर दर्शनीय है। इसी मंदिर स्थल से मुख्य मार्ग को छोड़कर दक्षिण दिशा की ओर जाना पड़ता है, डोंगेश्वर महादेव के लिए।
यहाँ पर छोटा सा गाँव है-जंगलपुर, झाड़ियों के बीच दुबके हुए खरगोश की तरह प्रतीत होता है। यह गाँव पहाड़ियों से घिरा हुआ है। दायें-बायें पहाड़ियों के बीच हरे-भरे खेतों से उठती है यहाँ माटी और लोक जीवन की सौंधी-सौंधी गंध। खेतों से लगी चट्टानी धरती के नीचे है डोंगेश्वर महादेव का मंदिर। इसी मंदिर के नीचे है एक और गाँव बगदूर की काली उपजाऊ मिट्टी केवल फसलें ही नहीं उगाती। बल्कि यहाँ उगती और पनपती हैं धर्म, आस्था, प्रेम, सद्भाव और पारस्परिक सहयोग की मंगल भावनाएँ। लोक की यही मंगल भावना डोंगेश्वर महादेव मंदिर के निर्माण की प्रेरिका है।
पहले इस स्थान का नाम चोड़रापाट था, जो अब चोड़राधाम हो गया है। इस स्थान के प्राकृतिक सौन्दर्य से प्रभावित होकर गण्डई के भूतपूर्व जमीदार लाल डोगेन्द्रशाह खुशरों ने यहाँ लोगों को मंदिर निर्माण की प्रेरणा दी और उसी के फलस्वरूप 1974 में यहाँ शिव मंदिर का निर्माण किया गया। यहाँ की प्राकृतिक शोभा बड़ी ही निराली है। बड़े-बड़े चट्टान, चट्टानों के बीच झरता जल का प्राकृतिक अविरल स्त्रोत हृदय के तारों को झँकृत कर शीतलता प्रदान करता था। इसी अविरल स्त्रोत को 1974 में संगमरमर से निर्मित गो-मुख से निकालकर शिवलिंग पर प्रवाहित किया गया। जिसे लोग गुप्त गंगा कहते हैं। गुप्त गंगा का स्त्रोत स्थल गुप्त है।

लोक जीवन में जल को गंगा की संज्ञा दी जाती है। चूंकि गंगा का स्त्रोत गुप्त है। अतः इसका गुप्त गंगा नामकरण सार्थक जान पड़ता है। कितनी ही गर्मी क्यों न हो गुप्त गंगा कभी नहीं छीजती। यह पतली किन्तु अविरल रूप में सतत् प्रवाहित हो रही है। इस प्रयास से इस स्थान की महत्ता और बढ़ी। लोग आकर्षित हुए और आज डोंगेश्वर महादेव एक पवित्र पर्यटन स्थल के रूप में प्रतिष्ठित हो चुका है। यहाँ आकर मन को अगाध शांति मिलती है। मंदिर से लगे दो कुण्डों का निर्माण किया गया है। बड़े कुण्ड से लोग जल निकालकर स्नान करते हैं। और गो-मुख से प्रवाहित गुप्त गंगा व शिवलिंग के दर्शन कर धन्य होते हैं। एक गंगा है जो शंकर की जटा से निकलकर लोगों को पवित्र कर रही है और एक ये गंगा है जो शिवलिंग पर स्वयं प्रवाहित होकर लोकजीवन को धन्य कर रही है।
अंचल के लोगों की धार्मिक आस्था और विश्वास के कारण यहाँ गुप्त गंगा के जल को भी गंगा जल की तरह मान्यता प्राप्त है। ऐसी मान्यता है कि यहाँ के जल को वर्षों तक रखने पर भी उसकी पवित्रता कायम रहती है। इस जल के उपयोग से अनेक रोगों का उपचार होता है। फसलों में लगने वाले रोगों के लिए कृषक इसी जल का उपयोग करते हैं। यह सब आस्था और विश्वास की बात होती है। ‘‘माने तो देवता नहीं तो पथरा।‘‘ लोक की अपनी मान्यता होती है।
प्रकृति जितनी सहज है, उतनी ही विचित्र भी। डोंगेश्वर महादेव में भी ऐसी ही विचित्रता है। दो चट्टानों के बीच एक संकरा मार्ग है, जो ऊपर की ओर खुलता है। इसे ‘‘मुड़बुलका‘‘ कहते हैं। मुड़बुलका का अर्थ है-सिर को निकालने की क्रिया। मुड़बुलका में सिर को ऊपर की ओर उठाकर तथा दोनों हाथों से टेककर ही ऊपर निकलना पड़ता है। यहाँ ऐसी लोक मान्यता है कि इस मार्ग से केवल पुण्यात्मा ही पार हो सकता है। बहुत सारे लोग अपराध बोध या भयग्रस्थ होने के कारण इस मार्ग से नहीं निकलते। इस मार्ग से सच्चे लोग ही निकलें, ऐसा कुछ नहीं है। बुरे लोग भी निकल जाते हैं। सच्चे-बुरे की परख के लिए कहीं कोई कसौटी है? पर हाँ इतना जरूर है मुड़बुलका से निकलना आनंद का एहसास कराता है। यहाँ पर एक प्राकृतिक गुफा है। जिसके भीतर प्रवेश करना आदिमानव के प्राकृतिक आवास का सहज स्मरण कराता है।

डोंगेश्वर महादेव से प्रकृति के विहंगम दृश्यों का अवलोकन करना आनंद को द्विगुणित करता है। आँखों के सामने हरियाली ही हरियाली। हरितिमा से परिपूर्ण पहाड़ी और पहाड़ी के नीचे दूर तक फैले हरे-भरे खेत तन और मन की क्लान्ति मिटाकर शांति देते हैं। वर्षाकाल में डोंगेश्वर महादेव का प्राकृतिक सौन्दर्य और भी अप्रतिम होता है। ऊपर पहाड़ी से खेतों का पानी एक वृहद् झरने के रूप में झरता है। झर-झर झरने का शोर, पेड़-पौधें का हहराना और चिड़ियों का कलरव अलौकिक संगीत संगीत का सृजन करते हैं।
डोंगेश्वर महादेव के आसपास औषध वनस्पत्तियों की भरमार है। दूर-दूर से जानकार लोग यहाँ आकर औषधियों का संचयन कर ले जाते हैं। आस-पास दुर्लभ धाँस नामक वृक्ष बड़ी संख्या में है। धाँस की छाल श्वांस, दमा के रोगियों के लिए उपयोग में लायी जाती है। डोंगेश्वर महादेव के विकास कि लिए एक पंजीकृत ‘‘जय डोंगेश्वर महादेव चोड़राधाम समिति‘‘ सतत् प्रयासरत है। डोंगेश्वर महादेव में वर्ष में तीन बार मेला भरता है। प्रथम कार्तिक पूर्णिमा को, द्वितीय महाशिवरात्री व तृतीय चैत्र कृष्ण पक्ष में तेरस को।
यहाँ मेला का स्वरूप अभी विस्तार नहीं पाया है, लेकिन शीघ्र ही यहाँ वृहद् रूप से मेला आयोजन की संभावना दिखलाई पड़ती है। डोंगेश्वर महादेव में चैत्र-नवरात्रि पर्व व क्वांर-नवरात्रि में जंवारा-जोत भी जलाया जाता है। मनोकामना पूर्ति के लिए दूर-दूर से लोग यहाँ आकर मनौती मनाते हैं। गण्डई (नर्मदा)-बालाघाट मार्ग में होने के कारण यहाँ लोगों का आना-जाना हमेशा लगा रहता है। दूर-दूर से आने वाले लोग यहाँ आकर प्राकृतिक सौन्दर्य का आनंद लेकर ही गन्तव्य की ओर आगे बढ़ते हैं।
डोंगेश्वर महादेव के आसपास और भी कई दर्शनीय स्थल हैं जैसे-पैलीमेटा की रासडोंगरी, पैलीमेटा का सुरही जलाशय और मगरकुण्ड का बावहनपाट। ये सभी स्थान यहाँ से 5-6 कि.मी. के इर्दगिर्द हैं। प्रकृति के रहस्य और रोमांच से भरी प्राकृतिक गुफा मंडीप खोल की दूरी यहाँ से लगभग 15 कि.मी. है। यहाँ आकर इसकी भी आनंदानुभूति की जा सकती है। वैसे यह अंचल अपनी प्राकृतिक सुषमा के लिए प्रसिद्ध है। डोंगेश्वर महादेव की खुशनुमा वादियों से प्रभावित होकर अनेक फिल्म निर्माताओं ने यहाँ आकर सीडी एलबमों की शूटिंग की है। अक्सर यहाँ शुटिंग का कार्य चलते रहता है।
पैलीमेटा बांध की अपार जलराशि की हिलोरें आँखों को संतृप्त करती है। ऊँचे-ऊँचे पहाड़ और प्रकृति की शोभा को देखकर मन आनंदित होता है। कुल मिलाकर डोंगेश्वर महादेव की यात्रा क्लान्त, अशान्त तन-मन को प्रकृति के रंग में रंग देती है। और जीवन में नए उत्साह का संचार करती है। हो न भी क्यों? प्रकृति का कार्य ही है हृदय को प्रमुदित करना। शर्त यही है कि मनुष्य प्रकृति से जुड़कर रहे और पर्यावरण को सुरक्षित और संरक्षित रखे।
आलेख
डॉ. पीसी लाल यादव
‘साहित्य कुटीर’ गंडई पंड़रिया जिला राजनांदगांव(छ.ग.) मो. नं. 9424113122
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