वारुणी पर्व : प्राणदायी “जल” के सम्मान का उत्सव
March 17, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | श्रवण शुक्ल चतुर्थी | रविवार
नक्षत्र: हस्त | योग: साध्य | करण: विष्टि
पर्व विशेष : | तदनुसार 16 अगस्त 2026

भारत को जब “विविधताओं का देश” कहा जाता है, तो अधिकतर लोग भाषा, पहनावे, भोजन और रीति-रिवाजों की भिन्नता की ओर संकेत करते हैं। परंतु गहराई से देखने पर अनुभव होता है कि इन विविधताओं के भीतर कुछ ऐसे मूल तत्त्व भी निहित हैं जो पूरे भारत को एक अदृश्य सूत्र में बाँधते हैं। यह सूत्र है-लोकमान्यताओं में समाई श्रद्धा, परंपरा और प्रकृति-केंद्रित दर्शन।महाराष्ट्र के सह्याद्री पर्वतमाला में बसने वाले जनजातीय समाज की डोंगरदेव परंपरा, झारखंड के संथाल–मुंडा–हो समाज का मारंग बुरु, और बस्तर अंचल के डोंगर देव/डूंगरी- सब यह प्रमाणित करते हैं कि नाम, भाषा और स्थानीय भिन्नताओं के पार एक ही भाव दीप्त होता है- कृति ही देव है, पर्वत ही देवालय है, और लोकजीवन की समृद्धि उसी के वरदान पर टिकी है।

झारखण्ड में मारंग बुरु का निवास मानी जाने वाली पहाड़ी
सह्याद्री की कठोर, कणखर और फिर भी ममतामयी पर्वतमाला की गोद में बसने वाले जनजातीय समाज के दैनिक जीवन में परिलक्षित अनेक परंपराएँ और मान्यताएँ अत्यंत पवित्र मानी जाती हैं। उनके लिए कुलदेवता केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन का आधार हैं। इसी कुलदेवता का एक रूप है डोंगरदेव,जिसे आदिवासी डांगी बोली में “भाया” कहा जाता है।
“डोंगरदेव” शब्द मराठी के निकट है, जबकि “भाया” डांगी (गुजरात) की बोली का शब्द है। दो भाषाएँ, दो संबोधन, पर संकेत एक ही- पहाड़ों में वास करने वाला वह देवत्व जो पूरे गाँव की रक्षा करता है, सुख-दुःख, अन्न-जल, रोग–स्वास्थ्य सबका नियंता माना जाता है। महाराष्ट्र के नाशिक, पालघर, नंदुरबार, जलगाँव तथा गुजरात के आदिवासी क्षेत्रों में यह परंपरा पीढ़ियों से जीवित है। पहले यह पूजा आठ दिन चलती थी अब कई स्थानों पर दो से चार दिन में सम्पन्न होती है। समय बदला है, जीवनशैली बदली है, पर डोंगरदेव के प्रति आस्था आज भी उतनी ही गहरी है। बस्तर में भी समय-समय पर डोंगरी पर होने वाली पूजा, वहाँ के मेले और जात्रा प्रकृति के प्रति इस श्रद्धा और देवत्व की भावना को स्पष्ट दिखाते हैं। जनजातीय समाज में प्रकृति-पूजा केवल वार्षिकोत्सव नहीं, संकट, असंतुलन और अनिश्चितता के समय पूरे समुदाय को एकजुट करने का माध्यम भी है।
इसी कारण डोंगरदेव की पूजा दो प्रकार से की जाती है- सामूहिक रूप से, जब पूरे गाँव पर कोई विपत्ति हो और व्यक्तिगत/परिवारिक रूप से, जब किसी एक परिवार पर लगातार प्रतिकूल घटनाएँ घट रही हों। यदि गाँव में बार-बार बीमारी, फसल की हानि, अकाल या किसी अपशकुन का अनुभव होता है, तो माना जाता है कि कुलदेवता नाराज़ हैं या कोई अपेक्षा अधूरी रह गई है। इसके बाद भगत, पुजारी, सिरहा, बैगा या स्थानीय परंपरागत जानकार के मार्गदर्शन में पूजा की तैयारी प्रारंभ होती है। यहाँ ज्योतिष की अपेक्षा विश्वास को महत्त्व दिया जाता है। देवता को मनाने की यह सामूहिक प्रक्रिया मानसिक संबल और सामाजिक-सांस्कृतिक एकता दोनों को सुदृढ़ करती है।

डोंगर देव का मेला
पूजा-स्थल को गाय के पहले बछड़े के गोमूत्र से शुद्ध किया जाता है। यह केवल पवित्रीकरण का धार्मिक कर्म नहीं, बल्कि सूक्ष्म पर्यावरण-दर्शन का प्रतीक है गोमाता, भूमि और देवता तीनों को एक पवित्र श्रृंखला में जोड़ना। जनजातीय समुदाय में मुर्गे और बकरे “मान” रूप में चढ़ाए जाते हैं। बलि-प्रथा के पीछे हिंसा नहीं, बल्कि यह भाव निहित है कि अन्न, पशु और भूमि - सब देव का है मनुष्य की भूमिका केवल संरक्षक की है। चिंतन करने पर स्पष्ट होता है कि सह्याद्री, झारखंड और बस्तर- तीनों स्थानों में दर्शन एक ही है, भले ही नाम भिन्न हों। भारत में प्रकृति-पूजा की परंपराओं को देखिए तो पता चलता है कि पहाड़ मात्र भू-आकृति नहीं, बल्कि देवत्व के जीवित प्रतीक हैं। झारखंड और आसपास के क्षेत्रों में संथाल, मुंडा और हो जनजातियाँ “मारंग बुरु” महान पर्वत की पूजा करती हैं। वहीं बस्तर अंचल में “डोंगरदेव” या “डूंगरी” अत्यंत श्रद्धेय देव हैं ।

प्रकृति के प्रति कृतज्ञता प्रकट करता जनजातीय समाज
इन जनजातीय समाजों की मान्यता है कि प्रत्येक पहाड़ी किसी देवी-देवता द्वारा निर्देशित और संरक्षित होती है। वर्षा, फसल और गाँव की समृद्धि इन्हीं पर निर्भर है। इसलिए पहाड़ केवल पत्थर नहीं, बल्कि संरक्षक देवता हैं। सह्याद्री के डोंगरदेव, झारखंड के मारंग बुरु और बस्तर के डोंगरदेव/डूंगरी को समान धरातल पर रखकर देखें, तो यह सत्य स्पष्ट होता है कि भाषा, नाम और कथा-रूप भिन्न होने पर भी मूल दर्शन एक है- प्रकृति में निहित देवत्व की अनुभूति, पर्वत को देवालय मानने की चेतना और मनुष्य-समाज का अपना अस्तित्व इन पहाड़ों की कृपा पर निर्भर समझने की विनम्रता।
भारतीय सभ्यता को यदि केवल ग्रंथों से नहीं, बल्कि लोकविश्वासों से समझा जाए, तो डोंगरदेव, मारंग बुरु और ऐसे अनगिनत पर्वत-देव बताते हैं कि भारत की “एकता” किसी राजनीतिक या कानूनी संधि से नहीं बनी, बल्कि पर्वतों,नदियों, जंगलों और खेतों में बसे इन साझा देवताओं ने इसे एक भावात्मक राष्ट्र बनाया है।इन्हीं परंपराओं के माध्यम से भारत आज भी “भूमि का टुकड़ा” नहीं, बल्कि जीवित देश के रूप में साँस लेता है।
लेख-
श्रीमती सोनल बाजपेयी
शोधार्थी- भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा
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