आस्था के अनूठे स्वरूप में कोटा के खड़े गणेश जी
September 14, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | भाद्रपद कृष्ण द्वादशी | बुद्धवार
नक्षत्र: मघा | योग: शुभ | करण: तैतिल
पर्व विशेष : | तदनुसार 07 अक्टूबर 2026

प्राचीन समय में डोल ग्यारस उत्सव का रंग कोटा के पाटनपोल में अपने चरम पर होता था। बूूंदी राज्य से पृथक होकर अपना अस्तित्व निर्मित करने वाले कोटा राज्य ने वैष्णव धर्म की परम्पराओं को राजघराने में सम्मिलित किया। मध्यकाल में मथुरा के श्रीमद्वल्लभाचार्य ने अद्वैत मत का प्रसार किया। गोकुल में यमुना तट पर फाल्गुन कृष्ण एकादशी के दिन उन्हें मथुराधीश जी ने दर्शन कर सेवा करने का आदेश दिया। तब मथुराधीश जी ने महाप्रभु के आग्रह पर मात्र 27 अंगुल का विग्रह रूप धारण किया। बाद में महाप्रभु ने इस विग्रह को अपने पुत्र गोस्वामी विठ्ठलनाथ जी को और अपने सात पुत्रों को सात विग्रहों को निजी पूजन के लिए प्रदान कर दिया था।
विठ्ठलनाथ जी ने 1571 ई. में गोकुल में सभी स्वरूपों को स्थापित कर दिया। यही नौ विग्रह वल्लभ सम्प्रदाय में नवनिधि के नाम से प्रचलित हुए। बाद में यह विग्रह गिरधर जी को पधराया गया। 9 अप्रैल 1669 ई. को औरंगजेब द्वारा हिन्दू मंदिरों को नष्ट करने के आदेश दिए जाने के बाद, इन विग्रहों को सुरक्षित रखने के प्रयास में सन् 1671 में श्रीनाथ जी की प्रतिमा को नाथद्वारा में स्थापित किया गया जबकि मथुरेश जी को बूंदी में रखा गया।
संवत् 1801(1738 ई.) में बूंदी विजय करने के उपरान्त महाराव दुर्जनशाल द्वारा श्री मथुराधीश जी के मूल विग्रह को कोटा के परकोटे में लाने का निर्णय किया गया। यह मथुरा के करनावल ग्राम में स्थापित था जहां से इसे बूूंदी लाया गया और फिर राजकीय सम्मान के साथ राजा के रूप में मथुरेश जी को कोटा में स्थापित किया गया। मथुरेश जी के विग्रह के लिए महाराव रामसिंह के मंत्री कोटा के दीवान राय द्वारिकादास भटनागर ने अपनी हवेली भेंट कर दी। वर्तमान में यहीं मुख्य मंदिर स्थित है। वहीं कोटा रियासत के राजा रामसिंह द्वारा हवेलीनुमा स्थापत्य में मंदिर का निर्माण करवाया गया। पाटनपोल के इसी क्षेत्र में महाराव रामसिंह द्वितीय के काल में उनकी महारानी फूलकुंवर के द्वारा समीप में हवेली मंदिर का निर्माण किया गया जो बाद में फूलबिहारी मंदिर के नाम से जाना जाने लगा। यहां फूलबिहारी जी की श्यामवर्णी प्रतिमा विराजित है।

पाटनपोल का श्री मथुराधीश मंदिर
मथुराधीश मंदिर के आसपास श्री महाप्रभुजी, ब्रजनाथजी, फूलबिहारीजी तथा छोटे मथुराधीशजी जैसे प्राचीन धार्मिक स्थल स्थित हैं। इस प्रकार पाटनपोल और उसके आसपास का क्षेत्र कोटा की पुरानी वैष्णव धार्मिक-सांस्कृतिक संरचना को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। महाराव भीमसिंह द्वारा कोटा गढ़ में मंदिर निर्माण करवाकर प्रतिमा स्थापित हुई जो ब्रजनाथ जी के नाम से जानी जाती है। इस प्रतिमा को महाराव भीमसिंह प्रथम हमेशा अपने साथ रखते थे। यहां तक कि युद्ध में ही यह उनके साथ ही विराजित होती थी। वर्तमान में इसकी पूजा-अर्चना रियासतकालीन परम्परा अनुसार होती है।
इन्होंने स्वयं का नाम भी परिवर्तित करके कृष्णदास रख लिया था और कोटा को नंदग्राम तथा शेरगढ़ को बरसाना कहा जाने लगा था। किशोरपुरा दरवाजे से लेकर पाटनपोल तक का क्षेत्र नंदगांव के रूप में जाना जाता है। कोटा में जन्माष्टमी के अगले दिन नंदमहोत्सव पर अवकाश रखने की परंपरा का संबंध कोटा के महाराव भीमसिंह प्रथम के शासनकाल से ही माना जाता है। उनके समय से भगवान श्रीकृष्ण को कोटा राज्य का वास्तविक अधिपति मानने तथा राजदरबार में उनके लिए सिंहासन रखने की परंपरा प्रचलित हुई।
पाटनपोल में मथुराधीश जी की स्थापना -दुर्जनशाल जी ने संवत् 1798 (1741 ई.) में नाथद्वारा में एक लाख रूपए खर्च कर भव्य महोत्सव का आयोजन किया इसमें वल्लभ सम्प्रदाय के सातों स्वरूपों- श्री विठ्ठलनाथ जी, नवनीत प्रिया जी, द्वारकानाथ जी, गोकुलचन्द्र जी, मथुरानाथ जी, गोकुलनाथ जी एवं मदन मोहन जी को एक साथ प्रतिष्ठित किया गया। यही नहीं इस महोत्सव में जयपुर से सवाई जयसिंह, करौली के गोपालसिंह , उदयपुर महाराणा जगतसिंह द्वितीय तथा अन्य राजपरिवारों के गणमान्य व्यक्तियों ने दर्शन लाभ प्राप्त किया। (उल्लेखनीय है कि पुष्टिमार्गी वल्लभ संप्रदाय की सात पीठ हैं, जिसमें मथुराधीश जी कोटा, विठ्ठल नाथ जी नाथद्वारा, द्वारिकाधीश जी कांकरोली, गोकुल नाथजी गोकुल, गोकुल चंद्रमा जी कामां, कल्याण राय जी बड़ौदा और मदनमोहन जी का कामां में मंदिर है।) दुर्जनशाल जी की भक्ति से प्रेरित होकर कोटा वल्लभमत का प्रमुख तीर्थ बन गया।

मथुराधीश मंदिर की मूर्ति
तत्कालीन समय से कोटा में भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को जलझूलनी या परिवर्तिनी एकादशी के रूप में मनाने की परम्परा चली आ रही है। इसे डोल ग्यारस के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि इस उत्सव में पाटनपोल के मंदिरों सहित शहर के सभी मंदिरों की प्रतिमाओं को विशेष रूप से सजाए गए देव विमानों (डोल) में विराजमान कर नगर भ्रमण कराया जाता है। डोल ग्यारस के दिन व्रत रखने की परंपरा के कारण पाटन पोल के हलवाईयों द्वार विशेष रूप से सिंघाड़े के आटे की पूरियाँ, हलवा और मावे की फलाहारी मिठाइयाँ बनाई जाती थीं। यह परम्परा वर्तमान में भी जीवित है।
प्राचीन काल से कोटा रियासत में चली आ रही इस परम्परा में कोटा गढ़ स्थित राजप्रासाद से तोपों की सलामी के साथ देव विमानों का प्रस्थान होता था। कोटा महाराव स्वयं हाथ में सोने-चांदी की छड़ी लेकर इस शाही सवारी की अगुवाई किया करते थे। इस सवारी में महाराज कुमार भी सम्मिलित होते थे। इस लवाजमें में कोटा की पलटनें , कई कलाकार ,पुरोहित ,जागीरदार सभी होते थे। तत्कालीन सवारी में गढ़ से तीन विमान प्रथम भगवान लक्ष्मी नारायण जी, गोरधन धारी जी, अन्नदाता जी गढ़ से घाट तक लवाजमे के साथ लाए जाते थे। घाट पर निर्मित चबूतरे पर विमानों को रखने के लिए सुंदर कालीन बिछाया जाता था।
इस कालीन के चारों कोनों पर सोने की छड़ि़यां लगाई जाती थीं। चारों ओर आकर्षक शामियाना लगाया जाता था। सांयकाल में चंबल का पूजन कर भगवान के विमानों को दाधीच ब्राह्मण द्वारा अपने कंधों पर उठाकर भट्ट जी के घाट तक लाया जाता था। चंबल नदी कोटा की गंगा के नाम से संज्ञापित की जाती रही है। मंदिर के मुख्य पुजारी भगवान की आरती उतारते थे तथा चंबल का गंगा के रूप में पूजन किया जाता था। घाट पर आरती के समय नदी में ककड़ि़यां फेंकी जाती थी जिन्हें प्राप्त करने में होड़ लगा करती थी। आरती उतारने के पश्चात दरबार गढ़ को लौट जाते थे। आज के दिन घाट पर मेला लगा रहता था। यहां ठाकुर जी नाव में सवार होकर जलविहार किया करते थे। धार्मिक मान्यता है कि कृष्ण जन्म के बाद माता यशोदा ने इसी दिन उनका जलवा पूजन (कुआं पूजन) किया था अतः कोटा रियासत में ठाकुर जी को जलाशयों के किनारे ले जाकर स्नान कराने और नए वस्त्र धारण करावने की यह अनूठी परंपरा सदियों से चली आ रही है। चंबल के दाहिने तट पर स्थित भट्ट जी घाट का रियासत काल में अत्यधिक महत्व था।
देव विमानों की डोल यात्रा
बाद में यह घाट कोटा बैराज बनने के पश्चात पानी के तेज बहाव के कारण नष्ट हो गया। इस घाट का नामकरण कोटा महाराव के विशिष्ट पुरोहित भट् जी महाराज के नाम पर किया गया था। बाद में भट्ट जी महाराज का परिवार पाटन पोल स्थित अपनी हवेली को बेचकर गुजरात जाकर बस गया। चंबल के दूसरी तरफ से भूरिया डोल की परंपरा भी निभाई जाती थी। चंबल नदी के दूसरे छोर से भूरिया डोल नामक प्रसिद्ध विमान भी भट्ट जी घाट पर आता था। यहां दोनों विमानों को आपस में गले मिलाया जाता था जो दोनों किनारों की संस्कृतियों के मिलन का प्रतीक माना जाता था। यहां से लौटते समय यह भव्य विमान पाटनपोल चैकी की तरफ रूका करते थे। वर्तमान में राजघराने और पाटनपोल मंदिरों की सवारियां निकालना बंद होकर मात्र हवेली महोत्सव तथा राजघराने के मंदिरों में ही सीमित रह गई हैं।
वर्तमान में मथुराधीश जी मंदिर में दान एकादशी मनाई जाती है। मथुरेश जी को विशेष पंचामृत द्वारा स्नान करवाकर दान-बिहारी जी के रूप में सुसज्जित किया जाता है। महाराव उम्मेद सिंह जी द्वितीय (सन् 1889 से 1940 तक) के शासनकाल में ‘डोल उत्सव’ को अत्यधिक हर्षोल्लास के साथ मनाया जाना आरंभ हुआ। कालान्तर में यह परंपरा जन-उत्सव के रूप में परिणित हो गई। इसमें अखाड़े, परम्परागत अस्त्रों-शस्त्रों का प्रदर्शन, भजन मंडलियां आदि भी सम्मिलित हो गए। शहर के विभिन्न मार्गों से इसमें अन्य विमान जुड़ते जाते हैं और यह भव्य रूप धारण कर लेती है। इस परम्परा में अब यह सवारी चंबल नदी की जगह किशोर सागर तालाब तक लाई जाती है। यहां मुख्य पुजारियों द्वारा उसी परम्परा को निभाते हुए स्नान-पूजा आदि करवाए जाते हैं फिर देर रात्रि तक यह वापस लौट जाते हैं। इस अवसर पर किशोर सागर तालाब पर मेला आयोजित किया जाता है जो तेजादशमी से लेकर अनन्तचतुर्दशी तक चलता है। यहां तेजादशमी के दिन तेजाजी की डसी काटी जाती है क्योंकि यहां तेजाजी का थानक स्थित है।
डोल ग्यारस और मथुराधीश जी की हवेली संगीत परंपरा
मथुरेश जी मंदिर में राग का निर्धारण केवल अवसर से नहीं, बल्कि समय, ऋतु और सेवा-भाव से भी संबंधित होता है। कोटा के मंदिर हवेली संगीत में ध्रुपद और धमार गायन की परंपरा रही है तथा कोटा की गायकी नाथद्वारा की सामूहिक गायकी से अलग ही एकल गायन आलापचारी के बिना भगवान को रिझाने की विशिष्टता रखती है। मथुराधीश जी मंदिर पुष्टिमार्ग की प्राचीन वैष्णव परंपरा से जुड़ा प्रमुख धार्मिक केन्द्र रहा है और यहां भगवान श्रीकृष्ण के बालस्वरूप-प्रधान सेवा की जाती है इसलिए उत्सव केवल सार्वजनिक शोभायात्रा नहीं, बल्कि मंदिर की दैनिक सेवा-परंपरा का भी महत्वपूर्ण अंग है। मथुराधीश जी की सेवा-पद्धति में हवेली संगीत का विशेष स्थान है। पुष्टिमार्ग में संगीत को केवल मनोरंजन नहीं माना जाता, बल्कि वह ठाकुरजी की सेवा का माध्यम है। दिन के अलग-अलग समय और विभिन्न उत्सवों के अनुरूप पदों का गायन किया जाता है।

शोभायात्रा
डोल ग्यारस पर वातावरण में विशेष रूप से उत्सवप्रधान वैष्णव पदों का गायन होता है। इनमें श्रीकृष्ण के जलविहार, वर्षा ऋतु, मिलन, आनंद और उत्सव की भावनाओं को अभिव्यक्ति मिलती है। मंदिर की परंपरा में कीर्तनकार-गायक, पखावज, मंजीरा, झांझ तथा अन्य पारंपरिक वाद्यों के माध्यम से कीर्तन की प्रस्तुति का स्वरूप मिलता है। हवेली संगीत की विशेषता यह है कि इसमें राग, समय और भाव का संबंध अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। इसलिए डोल ग्यारस के अवसर पर गाए जाने वाले पद सामान्य भजन की तरह नहीं, बल्कि श्रीनाथजी की सेवा के विशिष्ट भाव के अनुरूप प्रस्तुत किए जाते हैं। जब श्रृंगार-दर्शन के साथ कीर्तन होता है तो भक्तों के लिए यह केवल दृश्य अनुभव नहीं रहता, बल्कि श्रवण, दर्शन और भक्ति तीनों का संयुक्त अनुभव बन जाता है।
ग्रीष्म ऋतु की सेवा में आसावरी, देवगंधार और बिलावल जैसे शीतल प्रभाव वाले रागों में कीर्तन का उल्लेख मिलता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि मथुराधीश जी में ऋतु के अनुसार राग-सेवा बदलने की परंपरा जीवित है। यह सेवा जन्माष्टमी से आरंभ होती है ‘‘ब्रज भयो महीप के पूत जब यह बात सुनी’ फिर यह बारह महीनों तक ़ऋतुअनुसार राग, भोग और श्रृंगार की पद्धतियांे में बदलाव आता है। पिछवाईयां, अखंडपाठ, चित्रकला’मथुराधीश जी की हवेली-संगीत परंपरा में अष्टछाप कवियों के पद गाए जाते हैं। उपलब्ध मंदिर-संबंधी स्रोत भी पारंपरिक कीर्तन तथा अष्टछाप कवियों द्वारा रचित पदों के गायन का उल्लेख करते हैं। ब्रजमण्डल में श्रीकृष्ण की लीला 14 वर्ष 7 माह 7 दिन की थी इस लीला के अवगाहन से ही पुष्टिमार्ग की सेवा मानी जाती है, जो इन पदों में रचित है।
यह पद अष्टछाप कवियों मुख्यतः- सूरदास, कुंभनदास, परमानंददास, कृष्णदास, गोविंदस्वामी, नंददास, छीतस्वामी, चतुर्भुजदास की पद-परंपरा आती है। रागबद्ध पद-गायन, पारंपरिक वाद्यों की संगति और ठाकुरजी के प्रति सेवाभाव इस आयोजन को सामान्य लोक-उत्सव से अलग एक विशिष्ट वैष्णव सांस्कृतिक अनुभव बनाते हैं। इस प्रकार मथुराधीश जी मंदिर की डोल ग्यारस परंपरा को कोटा की जीवित धार्मिक विरासत, हवेली संगीत और नगर की सामुदायिक सांस्कृतिक स्मृति के अंतर्संबंध के रूप में देखा जा सकता है।
लेख-
डाॅ. नेहा प्रधान
कोटा राजस्थान
डोल ग्यारस का पर्व : ठाकुर जी की पालकी यात्रा
September 22, 2026