आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी | रविवार

नक्षत्र: रोहिणी | योग: धृति | करण: शकुनि

पर्व विशेष : | तदनुसार 14 जून 2026

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ईशावास्योपनिषद के श्लोक को चरितार्थ करता त्यौहार- दियारी

ईशावास्योपनिषद के श्लोक को चरितार्थ करता त्यौहार- दियारी

ईशावास्यमिदँ सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।” ईशावास्योपनिषद का यह श्लोक कहता है कि इस ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी है, वह सब ईश्वर से व्याप्त है । यह सोच के विस्मय होता है है कि जहाँ विश्व में कई ऐसी संस्कृतियाँ है जो काल के गर्भ में समा गईं और इतिहास का भाग बनकर रह गईं वहीँ भारतीय संस्कृति बहुत ही अद्भुत है जिसमें आज भी लाखों-हजारों वर्ष पुराने दर्शन और सिद्धांत आम जनजीवन के मध्य परम्पराओं, उत्सवों और त्योहारों के रूप में प्रत्यक्ष परिलक्षित होते हैं।


खिचड़ी बनने के उपरांत दियारी की तैयारी

यदि यह पढ़कर आप सोच में पड़ गए है तो चलिए आज एक ऐसे त्यौहार की जानकारी आपसे साझा करते हैं जिसके बाद उपरोक्त कही गयी बातें स्वतः ही प्रमाणित हो जाएँगी । देश के मध्य में स्थित छत्तीसगढ़ राज्य के दक्षिण क्षेत्र में एक बहुत प्रसिद्ध त्यौहार है जिसे दियारी के नाम से मनाया जाता है उस त्यौहार की रीत-परम्पराओं में उपर्युक्त वर्णित मन्त्र का भाव व्यवाहरिक जीवन में स्पष्ट रूप से झलकता है।

दियारी का त्यौहार बस्तर क्षेत्र में मकर संक्रांति के पहले पौष माह में मनाया जाता है जिसकी कोई तिथि या दिनांक सुनिश्चित नहीं होता जिसका कारण यह बताया जाता है कि यदि किसी विशेष तिथि या दिनांक को किसी त्यौहार या उत्सव के लिए नियत कर दिया जायेगा तो इससे भारत की मूल परंपरा जिसमें सामुदायिक सहयोग और सहभागिता बहुत महत्त्व रखती है समय के साथ उसका ह्रास हो जायेगा । किसी एक गाँव के उत्सव में आस-पास के रहवासी भी सहजता से भागीदार बन सकें इसलिए ऐसी व्यवस्था बनायीं गयी है जिसका आज पर्यंत पालन किया जा रहा है ।

चलिए अब जानते हैं कि दियारी आखिर है क्या और कैसे मनाया जाता है ? क्योंकि कृषि पुरातन काल से मनुष्य के जीवन और भारत की अर्थव्यवस्था दोनों ही दृष्टिकोण से बहुत महत्व रखती है इसलिए नए फसल के उत्पादन की सभी गतिविधियों से निवृत होकर पशुधन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने करने के उद्देश्य से यह त्यौहार मनाया जाता है क्योंकि फसलोत्पाद के प्रत्येक चरण में पशुधन का विशेष योगदान होता है। यह, सनातन परंपरा में प्रकृति के प्रति जो, एकात्म का भाव व्याप्त है उसे दर्शाता है ।


पशुधन को समर्पित है दियारी

इस दिन भोर से ही आयोजन की तैयारियां प्रारंभ हो जाती हैं । नए धान को डंठल सहित लाकर आपस में गूँथ कर एक सुन्दर डिजाईन तैयार की जाती है और उसे घर के मुख्यद्वार पर लटकाया जाता है । इसे सैला कहा जाता है । इसे घर के मुख्यद्वार पर ही इसलिए लगाया जाता है की नयी फसल को पक्षियों के साथ साझा किया जा सके कितना सुन्दर भाव है यह, है न!


धान की बालियों से बना पारंपरिक सैला

आधुनिक दौर में जब लोग दूसरों के कार्य का श्रेय खुद लेकर वाहवाही बटोरना चाहते हैं तब हमारा ही एक हिस्सा ऐसा भी है जो अपनी कड़ी मेहनत का मीठा फल खुलकर दूसरों से बाँटते हैं । घर की महिलाएं सूर्योदय से पहले ही उठकर घर की साफ़-सफाई करती हैं, आँगन लीपती हैं वहीँ पुरुष पशुओं को नहलाना-धुलाना और उनके स्थान को सुव्यस्थित करने की जिम्मेदारी लेते हैं ।

उड़द दाल का बड़ा और नए चांवल की खिचड़ी इस दिन का विशेष व्यंजन होता है । जिसके लिए मिट्टी के नए बर्तन लाये जाते हैं उसका उपयोग करने से पहले  नए चांवल के घोल से (अयपन) उसमें हाथ की छाप बनायीं जाती है और तब उसे चूल्हे पर चढ़ाया जाता है । जिस ओर से पशुओं का प्रवेश होना है वहां गेरुए रंग से आँगन को लीपकर अयपन से माँ लक्ष्मी के पदचिन्ह और पशुधन के खुर प्रतीकात्मक स्वरुप में बनाये जाते हैं ।


पशुधन के लिए तैयार खिचड़ी
 

दियारी उत्सव न केवल कृषि एवं पशुपालन के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति में व्याप्त एकात्मता, सामुदायिक बंधन और ईशावास्य के दर्शन का जीता-जागता उदाहरण रूप में प्रस्तुत करता है। इस प्रकार, छत्तीसगढ़ के इस त्यौहार ने आधुनिक समय में भी अपनी प्रामाणिकता और सांस्कृतिक मूल्य को बरकरार रखा है।

लेख-
सोनल बाजपेयी
शोधार्थी- भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा

 

                                      

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