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पर्व विशेष : | तदनुसार 17 अक्टूबर 2026

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दीपावली/ नवसस्येष्टि: प्रकाश, पुनर्जागरण और भारतीय जीवन-दर्शन का उत्सव

दीपावली/ नवसस्येष्टि: प्रकाश, पुनर्जागरण और भारतीय जीवन-दर्शन का उत्सव

भारत में शारदीय नवसस्येष्टि/लक्ष्मी पूजन (दीपावली) प्रमुख पर्व है। भारतीय संस्कृति का वह महाउत्सव है, जो हजारो वर्षो से कार्तिक मास की अमावस्या को हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता रहा है। दीपावली भारतीय जीवन-दर्शन के चार प्रमुख पर्वों नववर्ष प्रतिपदा, बासन्तीय नवसस्येष्टि/होली, ऋषि तर्पण/रक्षा बंधन और शारदीय नवसस्येष्टि में से एक है, जो एक ऋतु से दुसरे ऋतु में प्रवेश के अवसर पर मनाए जाते हैं।

शारदीय नवसस्येष्टि/दीपावली के अवसर पर माँ लक्ष्मी की पूजा प्राचीन काल से होती आ रही है। यह कृषि से सम्बंधित पर्व है, यह शरद काल में नई फसल के घर आने की ख़ुशी में मनाये जाने वाला पर्व है। इसे लक्ष्मी पूजा भी कहा जाता है। हमारी संस्कृति में नई फसल आने पर पर देवी देवताओं को भोग लगाने के बाद ही उपयोग करने की परम्परा है, अत: नई फसल आने पर किये जाने वाला यज्ञ शास्त्रों में नवसस्येष्टि कहलाता है। बहुत से लोग दीपवाली में नवाखाई करते है, नई फसल देवी देवताओं को समर्पित करने वाला पर्व लोकभाषा में नवाखाई कहलाता है। 


शास्त्रों में नवसस्येष्टि यज्ञ

यह पर्व वर्षा ऋतु की समाप्ति और हेमंत ऋतु के आगमन के संगम काल में आता है। किसान नई फसल, जैसे धान, मूंग, दाल, बाजरा, ज्वार, तील आदि घर आने पर परमात्मा का धन्यवाद ज्ञापन करने के लिए नवसस्येष्टि यज्ञ करते थे। इसलिए आपने देखा होगा, नवा खाई (नई फसल) देवी देवताओं को अर्पित कर फिर खाना आरम्भ करते है। कई घरों में नया चावला से बने खीर को दीपावली में लक्ष्मी माता को भोग लगाकर ही खाने की परम्परा आज भी विद्यमान है। पांच दिनों की दीपावली के आलावा भी देव दीपावली, देवउठनी एकादशी, शरद पूर्णिमा, गंगा दशहरा,मकर संक्रांति,छठ पूजा आदि पर्व के दिन भी दीपों की माला/पंक्ति लगे जाती है, अत: इस पर्व का मूल नाम दीपावली ना होकर शारदीय नवसस्येष्टि / लक्ष्मी पूजन कहना न्यायोचित होगा। 


माँ लक्ष्मी को नए अन्न से बनी खीर का भोग

हालांकि लोगों के बीच एक लोकप्रिय विश्वास यह है कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम ने लंका पर विजय प्राप्त करने के बाद अयोध्या लौटते समय उनकी खुशी व्यक्त करने के लिए घी के दीपक जलाए गए थे, और तब से ही यह परंपरा जारी है। यह एक प्रचलित लोक मान्यता है। किंतु, महर्षि वाल्मीकि रचित रामायण के गहन अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि भगवान राम ने रावण का वध फाल्गुन मास में किया था, और उनका १४ वर्ष का वनवास चैत्र माह में पूरा हुआ था। इसलिए, यह कथा सत्य प्रतीत नहीं होती कि राम कार्तिक मास की अमावस्या को अयोध्या आए थे, क्योंकि शारदीय नवसस्येष्टि यज्ञ (दीपावली) का पर्व भगवान राम के वनवास गमन से पूर्व भी मनाए जाने के प्रमाण शास्त्रों में मौजूद हैं।

पौराणिक मान्सयताओं के अनुसार सतयुग में दीपावली की सबसे प्रमुख कथा समुद्र मंथन (समुद्रमंथन) से जुड़ी है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार,भगवान विष्णु की सलाह पर देवताओं और असुरों ने मिलकर क्षीरसागर का मंथन किया। इस मंथन से चौदह रत्न प्रकट हुए, जिनमें से एक थी, माँ लक्ष्मी। कार्तिक मास की अमावस्या के दिन ही माता लक्ष्मी कमल पुष्प पर विराजमान होकर समुद्र से प्रकट हुईं।  इसी कारण से दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजन की परंपरा है, जो सत्य युग से जुड़ी हुई है।


क्षीरसागर का मंथन

दीपावली की महारात्रि को संपत्ति और समृद्धि की विशेष वृद्धि के लिए श्रीमहालक्ष्मी और श्री गणेश जी के साथ पूजन किया जाता है। शास्त्रों में लक्ष्मी को चंचला कहा गया है जो आती और जाती रहती हैं। जबकि जगत पिता महादेव की शक्ति को श्रीमहालक्ष्मी कहा गया है। महालक्ष्मी का स्थाई वास तभी होता है जब मनुष्य ईमानदारी और पुरुषार्थ से ‘पुण्य लक्ष्मी’ अर्जित करे, न कि बेईमानी या शोषण से अर्जित ‘पाप लक्ष्मी’।

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श्रीमहालक्ष्मी

कार्तिक अमावस्या को घना अन्धकार होता है। दीपावली केवल बाहरी प्रकाश नहीं, बल्कि आंतरिक जागरण का पर्व है। यह ‘दीपों की आवली’ (पंक्ति) है, जिसका अर्थ है अंधकार को मिटा देना, भय से बाहर निकलना, और भ्रम को दूर करना। बृहदारण्यकोपनिषद् का श्लोक “असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मामृतं गमय।” वास्तविक साधना और आध्यात्म का संदेश देता है। अंधकार यानी बुराई और बुरी आदतों को त्यागकर, प्रकाश यानी सत्य के पथ पर उन्मुख होना ही इसका वास्तविक संदेश है।

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असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय।

प्रकाश का आह्वान दीपावली, अपने सार्वभौमिक संदेश “अंधकार से प्रकाश की ओर” के साथ, हमें प्रेरित करती है कि हम भौतिक और आत्मिक, दोनों स्तरों पर अंधकार (अज्ञान, दरिद्रता, रोग, असत्य) को त्यागकर प्रकाश (ज्ञान, समृद्धि, स्वास्थ्य, सत्य) की ओर चलें। यह पर्व अग्नि तत्व की बढ़ोत्तरी के लिए मनाया जाता है, क्योंकि इस माह सूर्य नीच राशि तुला में रहते हैं। दीपों को जलाना वास्तव में अग्नि, प्रकाश, और ऊर्जा की प्राप्ति के लिए है।

यह विश्व कल्याण की भावना से विशेष यज्ञ का अनुष्ठान करने, और सभी मनुष्यों के लिए सुख, शान्ति, सामर्थ्य, संयमशीलता और स्वस्थ जीवन की कामना करने का पर्व है। अंततः यह पर्व सृष्टि के आरम्भ से ही समस्त मनुष्यों का पर्व रहा है, यह अनादि सत्य सनातन धर्म की महानता है। यह प्रकाश पर्व हर व्यक्ति के चेहरे पर खुशी और उत्साह का प्रकाश करता रहे, यही इसका सर्वोच्च दार्शनिक सार है।

लेख
वेद प्रकाश सिंह ठाकुर
संपादक, दक्षिण कोसल टुडे

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