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खेले मसान में होरी दिगम्बर....

खेले मसान में होरी दिगम्बर....

मणिकर्णिका! एक महाश्मशान... चिताएं यहां अहर्निश दहकती रहती हैं। एक चिता ठंडी हुई नहीं कि दूसरी सजी हुई चिता सुलग उठती है। यह घाट हमें जीवन की अस्थिरता का, उसकी नश्वरता का बोध दिन-रात ही कराता रहता है। यहां मृत्यु की लौ चिता से अग्निशिखा बनकर ऐसे उठती है जैसे वह अंतिम बार विश्वेश्वर को देख लेना चाहती हो, उनमें समाहित हो जाना चाहती हो। कभी जाकर देखिएगा.... सचमुच अद्भुत घाट है मणिकर्णिका।


मणिकर्णिका घाट

लेकिन क्या? मणिकर्णिका की महत्ता बस यूँ ही स्थापित हो गई? नहीं भाई! इसी मणिकर्णिका में भगवान शिव ने देवी सती को दाह किया था और उनकी राख से यहां खेली थी एक होली जिसे यह लोक शिव की 'मसान होली' कहता है। तब से लेकर आज तक काशी भी अपने देव के साथ उसी मणिकर्णिका में चिता के भस्म से ही रंगभरी एकादशी के अगले दिन "खेले मसान में होरी दिगम्बर...." गाते हुए होली खेल रही है।


मसान होली, मणिकर्णिका घाट

मसान होली उल्लास और विरक्ति का एक अनूठा उत्सव है। रंगों की सांसारिक आनंद से अलग मसान होली वह होली है जिसमें शिवभक्त उनका गण बनकर आकाश में भस्म उड़ाते हुए मृत्यु का उत्सव मनाते हैं। वे जीवन का उल्लास और मृत्यु की शांति को एक पासंग में लाकर खड़े कर देते हैं। चढ़ते हुए जीवन की तरह उनका फेंका गया भस्म भी ऊपर की ओर उठता है और ढलती हुई आयु की तरह वही भस्म नीचे आकर धरती पर बैठने लगता है। बैठा हुआ भस्म मिट्टी के देह को मिट्टी में मिल जाने की बात करता है। मसान होली जीवन के प्रति मोह और मृत्यु के प्रति भय को त्यागते हुए जीवन में शिवत्व उतारने की बात करता है।


मणिकर्णिका घाट का दृश्य

शिवत्व? - हाँ जी शिवत्व! शिव कोई देह का नाम तो नहीं.... यह तो चेतना की वह अवस्था जहां वैराग्य अपने चरम पर होता है। जैसे असंतुष्टि के चरम पर ही तृप्ति का भाव फूटता है वैसे ही मोह की पराकाष्ठा पर वैराग्य पनपता है जहां न तो मृत्यु का भय रहता है और न ही जीवन से कोई आसक्ति रहती है। वैराग्य का यही भाव तो शिवत्व है और मसान होली जीवन में उसी शिवत्व को उतारने का प्रेरणा पर्व है।

अच्छा, कभी आपने यह विचार है कि 'मसान होली' काशी को छोड़कर किसी दूसरे शिवधाम में क्यों नहीं खेली जाती? हो सकता है कि इस प्रश्न का कोई शास्त्रोक्त उत्तर भी हो लेकिन जो मुझे लगता है, वह काशी की उसकी अपनी वीतरागी प्रकृति का होना है। कहते हैं कि शंकर का हृदय कैलाश के बाद सबसे अधिक काशी पर ही मुस्कुराता है इसलिए काशी की उसकी अपनी वैरागी ठसक है। काशी अवघड़ है, काशी फक्कड़ है इसलिए उसे रंगों की होली से अधिक मसान की होली प्रिय है। वैसे भी इस काशी ने शैव-वैष्णव, द्वैत-अद्वैत, निर्गुण-सगुण सबको सुना है और सभी को स्वीकारा है और जो आचरण से अवघड़ या फक्कड़ न हो, वह सभी मतों को न तो सुन सकता है और न स्वीकार सकता है। मसान होली और काशी दोनों ही एक दूसरे की महिमा को सराहते हैं। 

काशी की होली
काशी की होली

वैसे एक सच्चाई यह भी है काशी के साथ-साथ जगत का हर एक प्राणी भी शिव के साथ महाश्मशान की होली खेल ही रहा है। यह संसार श्मशान नहीं तो और क्या है... एक दिन खेलते-खेलते उसकी जीवन ज्योति भी शिव में ही समहित हो जाएगी।


लेख -
करुणा सागर पण्डा 
रायपुर (छत्तीसगढ़)

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