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ढोकरा शिल्पकला – कठोर धातु से जीवन के सौम्य भावों को उकेरता जनजातीय समाज

ढोकरा शिल्पकला – कठोर धातु से जीवन के सौम्य भावों को उकेरता जनजातीय समाज

हममें में से ऐसा शायद ही कोई व्यक्ति होगा जिसने “सिन्धु घाटी सभ्यता” का नाम नहीं सुना होगा ! इतिहास को जानने का सबसे विश्वसनीय माध्यम है पुरातात्विक स्त्रोत और मोहनजोदड़ो से प्राप्त  एक बहुचर्चित पुरातात्विक साक्ष्य है “कांस्य की नर्तकी-प्रतिमा”। परन्तु शायद आपको यह लग रहा होगा के शीर्षक तो किसी शिल्पकला की ओर इंगित कर रहा है लेकिन लिखा इतिहास के बारे में जा रहा है, ऐसा क्यों? वो इसलिए की आज जिस शिल्पकला की चर्चा हम करने जा रहे है वह उसकी तकनीक ठीक वैसी ही है जैसे प्राचीन काल में सिन्धुघाटी सभ्यता में पाई जाती थी।


सिन्धु घाटी सभ्यता से प्राप्त कांस्य प्रतिमा 

हम बात कर रहे है “ढोकरा आर्ट” की ! जिसने छत्तीसगढ़ राज्य के दक्षिण में स्थित बस्तर को देश-विदेश में ख्याति दिलवायी। जब आप इन्टरनेट पर  बस्तर की कलाकृतियों को ढूँढने के लिए जायेंगे तब सबसे ऊपर इसी ढोकरा आर्ट का नाम आता है। हालाँकि ऐसा नहीं है कि इस कलाकृति का निर्माण केवल बस्तर में किया जाता है ओडिशा, झारखंड और पश्चिम बंगाल के क्षेत्रों में भी इसका निर्माण होता है।

लेकिन इसे ख्यातिलब्ध बनाने में बस्तर की विशेष भूमिका है । संभवतः इसीलिए छत्तीसगढ़ राज्य को वर्ष 2008 में इस हेतु जी.आई. (GI) टैग भी प्राप्त हुआ और जिसे छत्तीसगढ़ राज्य को पहला जी.आई. टैग दिलवाने का भी श्रेय जाता है।ढोकरा हस्तशिल्प एक ऐसी शिल्पकला है जो बहुत कठिन परिश्रम  और एक विशेष तकनीक से तैयार किया जाता है जिसे मोम की ढलाई (lost wax Method) तकनीक का उपयोग करके बनाया जाता है।


विश्व प्रसिद्ध- ढोकरा शिल्प

लगभग 4500 पुरानी इस कला को आज भी जनजातीय समाज में जीवित रखा गया है जिससे हमारी ज्ञान परंपरा के प्रति इस समाज की संवेदनशीलता कितनी उच्चस्तरीय है इसका पता चलता है । इस कलाकृति को बनाने की प्रक्रिया बहुत जटिल है इसके बावजूद भी जिस तरह इसे आज पर्यंत जस का तस बनाये रखने में जनजातीय समाज का योगदान न केवल विशेष सम्मान का पात्र है अपितु अनुकरणीय भी है और कहीं न कहीं हमारी ज्ञान परंपरा की मजबूत नींव का भी संकेतक है।

इसे बनाने हेतु प्रतिदिन चांवल की भूसी  और काली मिट्टी के मिश्रण से  विशेष मिट्टी का निर्माण किया जाता है कुछ कलाकार इस हेतु जलोढ़ मिट्टी और दीमक की बाम्बी के मिश्रण का प्रयोग करते है जिसे वांछित आकृति देकर 2-3 दिनों तक कड़ी धुप में सुखाया जाता है अतः आप समझ सकते है कि इस शिल्प कला के निर्माण के लिए मौसम की अनुकूलता का  भी बहुत महत्त्व होता है।

इसमें मोम का भी प्रयोग किया जाता है क्योंकि वह मज़बूत होने के साथ साथ जटिल रूपांकानों को सफाई के साथ उकेरने में भी बहुत मददगार होता है । इस हेतु मधुमक्खी के मोम का उपयोग किया जाता है मोम से बनायीं गयी आकृति को पिघलाकर प्रेस (दबाव) मशीन में डाला जाता है जिससे पिघला हुआ मोम महीन धागों के रूप में निकल आता है मोम से बनी डिजाईन को गीली मिटटी पर मुद्रित किया जाता है फिर तैयार हुई संरचना  पर पुनः गीली मिट्टी की परत चढ़ाई जाती है और एक-दो स्थानों पर छेद कर दिया जाता है ताकि बाद में मोम को आसानी से पिघलाया जा सके और पिघली हुए धातु को डालने के लिए जगह बन सके।

फिर पिघली हुई धातु को संरचना में डालकर उसके सूखने की प्रतीक्षा की जाती है । इस संपूर्ण प्रक्रिया में अधिकतम कार्य हाथ से और बहुत बहुत धीरे- धीरे किया जाता है जो किसी साधना से कम नहीं ! यह शिल्पकला बहुत अधिक धैर्य मांगती है और संभवतः इसीलिए यह आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में ही फल-फूल रही है क्यूंकि सीधे-साधे जनजातीय समाज के पास जिस स्तर का धैर्य होता है विकास के नाम पर प्रकृति से खिलवाड़ करने वाले शहरी क्षेत्रों में उसकी झलक मिल पाना भी असंभव सा लगता है ।

इसी कला के माध्यम से जनजातीय समाज का एक और सकारात्मक पक्ष उजागर होता है और वह लैंगिक भेदभाव की अनुपस्थिति । कोंडागांव क्षेत्र के ढोकरा कलाकार भगनु दादा ने यह कला अपनी बेटियों को भी सिखाई है और उम्रदराज हो जाने  के कारण भगनु दादा द्वारा इस कला को बचाए रखने में उनका बराबरी से साथ दे रहीं हैं।

इससे स्पष्ट होता है जहाँ साक्षर समाज में आज भी लड़कियों पर अत्याचार के केस दर्ज होते है वहाँ दुनिया की नजर में असभ्य और अनपढ़ों की श्रेणी में गिना जाने वाला यह समाज कितनी उन्नत विचारधारा रखता है। पारंपरिक कलाएं न केवल जीवनयापन में सहायक होती हैं अपितु समाज में सम्मान दिलाने भी अहम् भूमिका निभाती है । उदाहरण के लिए रायगढ़ क्षेत्र में एक ऐसा परिवार निवास करता है जिसके सभी सदस्यों – पिता गोविन्द राम -1987, धनीराम झोरका-1997, पत्नी धनमति झोरका- 2003 को इस हेतु राष्ट्रीय पुरुस्कार और पुत्र विजय झोरका को वर्ष 2011-12 में छत्तीसगढ़ शसन से पुरुस्कार प्राप्त हो चुका है।

इस कलाकृति की सुन्दरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी ने वर्ष 2022 में  डेनमार्क का दौरा किया था तब वहां के क्राउनिंग प्रिंस को ढोकरा शैली में बनी नाव की कलाकृति भेंट की थी।वैसे तो यह देश के अन्य राज्यों जैसे- ओडिशा, पश्चिम बंगाल, झारखण्ड प्रदेशों में भी बनाया जाता है लेकिन छत्तीसगढ़ के कोंडागांव जिले का भेलवापारा और रायगढ़ का एकताल गाँव ऐसा क्षेत्र है जहाँ के हर घर में ढोकरा कलाकृति से जुड़े कलाकार रहते हैं।


2022 में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा डेनमार्क के प्रिंस को भेंट की गई ढोकरा कलाकृति 

इसके सुन्दर रूपांकनो में न केवल इसकी बारीकी और सफाई से की गई कारीगरी देखने योग्य है बल्कि ध्यान से देखने पर जनजातीय समाज के जीवन की झलक भी स्पष्ट नज़र आती है। देवी-देवताओं,पशु-पक्षी, कछुआ, नाव इत्यादि इसके प्रमुख केंद्र रहें है लेकिन वैश्विक ख्याति प्राप्त करने के बाद दायरा बढ़ा है और ग्राहकों की मांग के अनुसार नई-नई डिजाईन भी बनने लगी हैं। विदेशों में तो इसकी बहुत मांग है, आवश्यकता है कुछ ऐसे माध्यमों की जिससे घरेलु बाजार में भी इसे उचित स्थान और दाम प्राप्त तो ताकि नए युवाओं को भी इस पारंपरिक कला का समोचित प्रतिसाद मिले।
 

लेख-
श्रीमती सोनल बाजपेयी
शोधार्थी- भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा

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