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धरती आबा बिरसा मुंडा: जनजातीय अस्मिता और स्वाधीनता के अमर पुरोधा

धरती आबा बिरसा मुंडा: जनजातीय अस्मिता और स्वाधीनता के अमर पुरोधा


भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में बिरसा मुंडा एक ऐसे महानायक हैं, जिन्होंने न केवल विदेशी हुकूमत की चूलें हिला दीं, बल्कि अपने समाज को आत्मिक और सांस्कृतिक रूप से भी पुनर्जीवित किया। यह लेख मात्र एक जीवनी नहीं है, अपितु उस 'उलगुलान' की गाथा है जिसने जनजातीय अस्मिता और अधिकारों को नई परिभाषा दी। 19वीं सदी के उत्तरार्ध में जब औपनिवेशिक सत्ता और सामन्ती व्यवस्था वनवासियों का शोषण कर रही थी, तब बिरसा मुंडा ने 'धरती आबा' के रूप में उभरकर अपनी मातृभूमि की रक्षा का शंखनाद किया। प्रस्तुत आलेख उनके संघर्ष, दर्शन और अमिट विरासत का सघन विश्लेषण करता है।


भारतीय वाङ्मय के पुराणों में राजा पृथु की लोककल्याणकारी भूमिका का स्मरण कराते हुए कहा गया है:

"प्रजानां वृत्तिकामोऽसौ पृथुर्वैन्यः प्रतापवान्।
दुग्धां पृथ्वीं चकाराशु सर्वलोकहिताय वै॥"

इसका अर्थ है कि जब पृथ्वी पर संकट के बादल मँडराने लगे, तब प्रतापी राजा पृथु ने प्रजा के कल्याण के लिए पृथ्वी का संरक्षण किया तथा उसके पोषण और संवर्द्धन की व्यवस्था सुनिश्चित की। भारतीय परम्परा में पृथ्वी का एक नाम 'पृथ्वी' भी राजा पृथु के कारण ही माना जाता है।

यही तेजस्वी छवि 19वीं सदी के जननायक बिरसा मुंडा में परिलक्षित होती है। जब औपनिवेशिक शासन, शोषणकारी जमीन्दारी व्यवस्था तथा बलात् धर्मान्तरण की गतिविधियों के कारण वनवासी समुदाय का पारम्परिक सांस्कृतिक जीवन संकट में पड़ गया था, तब बिरसा मुंडा ने उसके संरक्षण का दायित्व अपने सबल कन्धों पर लिया।

जिस प्रकार माता और पिता अपनी सन्तानों के पालन, पोषण और भविष्य की चिन्ता करते हैं, उसी प्रकार बिरसा मुंडा ने अपनी मातृभूमि और सांस्कृतिक अस्तित्व की रक्षा के लिए स्वयं को पूर्णतः समर्पित कर दिया। इसी कारण उन्हें सम्मानपूर्वक 'धरती आबा' अर्थात 'धरती के पिता' के रूप में स्वीकारा गया।

जन्म, परिवेश और वैचारिक आधार: बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवम्बर 1875 को राँची जिले के उलिहातु गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम सुगना मुंडा तथा माता का नाम कर्मी मुंडा था। मुंडा परम्परा के अनुसार गुरुवार को जन्म लेने के कारण उनका नाम बिरसा रखा गया।

भारतवासियों के श्रद्धेय- 'धरती आबा' बिरसा मुंडा
भारतवासियों के श्रद्धेय- 'धरती आबा' बिरसा मुंडा

उनका शैशव और प्रारम्भिक जीवन घोर निर्धनता और शोषण की चुनौतियों के मध्य व्यतीत हुआ। यही कड़वे अनुभव आगे चलकर उनके व्यक्तित्व और प्रखर नेतृत्व का ठोस आधार बने। उनके चिन्तन में सामाजिक सुधार और अन्याय के विरोध की ज्वाला स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

बिरसा बचपन से ही विलक्षण बुद्धि के स्वामी थे। उनकी कुशाग्र प्रतिभा को देखकर लोगों ने उन्हें मिशन स्कूल में शिक्षा ग्रहण करने का परामर्श दिया। किन्तु उस समय की व्यवस्था के अनुसार वहाँ प्रवेश के लिए ईसाई धर्म को स्वीकारना अनिवार्य था, इसलिए उनका नाम बदलकर 'बिरसा डेविड' कर दिया गया।

कुछ समय तक अध्ययन करने के उपरान्त उन्होंने उस मिशन स्कूल का त्याग कर दिया। शिक्षा के दौरान उन्होंने सूक्ष्मता से अनुभव किया कि साहूकारों, जमीन्दारों और ब्रिटिश शासन के त्रिकोणीय अत्याचारों ने जनजातीय  समाज के जीवन को नारकीय बना दिया है। यही बोध उनके मन में विद्रोह की भावना का अंकुर बना।

सांस्कृतिक पुनर्जागरण और सुधारवादी आन्दोलन: मिशन स्कूल छोड़ने के उपरान्त बिरसा ने बलात् धर्म परिवर्तन का पुरजोर विरोध किया। उन्होंने जनजातीय समाज को अपनी गौरवशाली परम्पराओं, रीति और रिवाजों तथा मूल धार्मिक मान्यताओं के प्रति जागरूक करना आरम्भ किया। उन्होंने जनमानस से अपनी मौलिक पहचान को अक्षुण्ण बनाए रखने का आह्वान किया।

धीरे धीरे उनके विचारों का प्रभाव व्यापक होने लगा और बड़ी संख्या में लोग उनसे जुड़ने लगे। उन्होंने 'बिरसाईत' नामक एक नवीन पन्थ की स्थापना की। वे समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर करना चाहते थे।

उन्होंने लोगों को अन्धविश्वासों से दूर रहने, मद्यपान का त्याग करने और अपने समाज के उत्थान के लिए कार्य करने की प्रेरणा दी। उनके प्रभाव के कारण अनेक लोग पुनः अपने पारम्परिक धर्म और संस्कृति की ओर लौटने लगे।

महान उलगुलान: शोषण के विरुद्ध महासंग्राम

1 अक्टूबर 1894 को बिरसा ने एक प्रखर युवा नेता के रूप में जन अधिकारों की रक्षा के लिए हुंकार भरी। उन्होंने अवैध जमीन्दारी के विरोध में लगान माफी आन्दोलन का सूत्रपात किया। अंग्रेजी सरकार ने इसे अपने शासन के विरुद्ध खुली चुनौती माना और 1895 में उन्हें बन्दी बना लिया।

उन्हें हजारीबाग केन्द्रीय कारागार में 2 वर्ष के कारावास की दण्ड दिया गया। रिहाई के बाद उन्होंने शान्त बैठने के स्थान पर छोटानागपुर क्षेत्र में अकाल और महामारी से पीड़ित जनमानस की सेवा की। उनकी इस सेवा भावना ने उन्हें जन जन का प्रिय बना दिया और लोग उन्हें 'धरती आबा' कहकर पुकारने लगे।

उनका संघर्ष अब केवल आर्थिक नहीं, बल्कि जनजातीय स्वाभिमान और संस्कृति की रक्षा का महासंग्राम बन गया था। उन्होंने "अबुआ दिशुम, अबुआ राज" अर्थात "हमारा देश, हमारा राज" का अमर उद्घोष किया। इस नारे ने सोए हुए समाज में नई चेतना का संचार किया।

अपने शब्दों से किया जनमानस में ऊर्जा का संचार
अपने शब्दों से किया जनमानस में ऊर्जा का संचार

1897 से 1900 के मध्य उन्होंने ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष आरम्भ किया। इसके लिए उन्होंने गुरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनाई। उनके बढ़ते प्रभाव से अंग्रेज अधिकारी और शोषक वर्ग भयभीत हो उठा। 24 दिसम्बर 1899 को यह आन्दोलन अत्यन्त उग्र हो गया। पुलिस थानों पर तीरों से प्रहार किए गए।

इस संघर्ष के दौरान अंग्रेजी सेना ने 'डोम्बारी बुरु पहाड़ी' पर निहत्थे जनजातीयों पर बर्बरतापूर्वक गोलीबारी की। जनजातीयों ने अदम्य साहस का परिचय दिया, किन्तु उनके तीर और कमान अंग्रेजों के आधुनिक हथियारों और गोलियों के सम्मुख अधिक समय तक टिक नहीं सके।

ऐतिहासिक सन्दर्भ और विद्रोह के कारण: विभिन्न इतिहासकारों ने मुंडा विद्रोह के कारणों की गम्भीर विवेचना की है। स्टीवन फूक्स (1955) के अनुसार, जनजातीय समुदाय के असन्तोष का मुख्य कारण आर्थिक था, क्योंकि अंग्रेजों ने उनकी मूल समस्याओं की निरन्तर अनदेखी की थी।

एस. के. सिंह (1985) के अनुसार, मुंडा विद्रोह का प्रमुख कारण उनके भू-अधिकारों एवं स्वतन्त्रता पर बाहरी हस्तक्षेप था। ए. के. दान ने अपनी पुस्तक में विद्रोह का कारण सांस्कृतिक हस्तक्षेप और भूमि अधिकारों का हनन माना है।

वास्तव में, ब्रिटिश भू-राजस्व नीति, मिशनरियों द्वारा धर्म परिवर्तन का दबाव, 'खुटकट्टी प्रणाली' का विनाश और 'दिकू' अर्थात बाहरी शोषकों का अनैतिक हस्तक्षेप ही इस विद्रोह के मूल में था। मुंडा जनजातियों का एक और नारा अत्यन्त प्रसिद्ध हुआ: "अबुआ राज एतेर जना, महारानी राज तुदु जना" जिसका अर्थ था कि अब हमारा राज स्थापित हो और ब्रिटिश महारानी का राज समाप्त हो।

बलिदान और युगान्तरी प्रभाव: 9 जून 1900 को मात्र 25 वर्ष की अल्पायु में राँची जेल में बिरसा मुंडा का निधन हो गया। यद्यपि ब्रिटिश सरकार ने मृत्यु का कारण हैजा बताया, किन्तु जनमानस और कई इतिहासकारों ने इसे सन्दिग्ध माना है। कुछ विवरणों में उन्हें विष दिए जाने की आशंका भी व्यक्त की गई है।


जहाँ निधन हुआ वहां है अब संग्रहालय

उनकी मृत्यु के बाद भी उनका संघर्ष निष्फल नहीं गया। 1908 में ब्रिटिश सरकार को 'छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट' (CNTA) लागू करना पड़ा, जिसने जनजातीय भूमि के अन्य समुदायों  को हस्तान्तरण पर रोक लगा दी। साथ ही 'वेथ बिगारी' जैसी शोषणकारी प्रथाओं का अन्त हुआ।

उनके विद्रोह ने सिद्ध कर दिया कि वनवासी समुदाय भी संगठित होकर औपनिवेशिक सत्ता की जड़ें हिला सकता है। उनके इस आन्दोलन ने बाद के कई जनजातीय संघर्षों जैसे टूरिया जंगल सत्याग्रह, नागा आन्दोलन और रम्पा विद्रोह को महती प्रेरणा प्रदान की।

अक्षुण्ण विरासत और वर्तमान प्रासंगिकता: बिरसा मुंडा की विरासत आज भी भारतीय राष्ट्र चेतना में जीवन्त है। उनके जन्म दिवस को अब सम्पूर्ण भारत में 'जनजातीय गौरव दिवस' के रूप में मनाया जाता है। महाश्वेता देवी का उपन्यास 'अरण्येर अधिकार' उनके संघर्ष की जीवन्त गाथा है।

वर्तमान में मध्यप्रदेश सरकार सहित विभिन्न राज्य और केन्द्र सरकारें उनके सम्मान में अनेक कल्याणकारी योजनाएँ संचालित कर रही हैं। 'भगवान बिरसा मुंडा स्वरोजगार योजना' और 'धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान' जैसे कार्यक्रम उनके सपनों के भारत को साकार करने की दिशा में प्रभावी कदम हैं।

9 जून को राष्ट्र उनके बलिदान दिवस पर उन्हें विनम्र श्रद्धाञ्जलि अर्पित करता है। यह दिन केवल एक प्रतीक नहीं, बल्कि साहस, प्रतिरोध और स्वाधीनता की उस भावना का स्मरण है जो सदैव भारतीय जनमानस का मार्ग प्रशस्त करती रहेगी।

-प्रद्युम्न अवधिया 

 

 

 

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