नागपंचमी: आस्था और भारतीय परंपरा
August 16, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | भाद्रपद कृष्ण द्वादशी | बुद्धवार
नक्षत्र: मघा | योग: शुभ | करण: तैतिल
पर्व विशेष : | तदनुसार 07 अक्टूबर 2026

शैव और शक्ति साधना का प्राचीनतम मंदिर है देवरानी जेठानी, जहां शैव तंत्र और शाक्त साधना का रहस्यमय स्वरूप एकाकार दिखता है। शिव की दस महाविद्या देवियों में से तारा देवी और धूमावती देवी इन मंदिरों में प्रतिष्ठापित रही हैं। मंदिर अपने आप में अदभुत, अनूठी मूर्तियों के साथ रहस्यमय अनुष्ठान को संजोए हुए हैं, जिस के बारे में पौराणिक ग्रंथों में कोई तथ्य नहीं मिलते। यहीं एक विशाल अदभुत मूर्ति मिली है, जिसके अंग प्रत्यंग अनेक जीव जंतुओं से उकेरे गये हैं। देवरानी जेठानी का मंदिर चार दशक पूर्व उत्खनन के बाद प्रकाश में आया है। मंदिर के गर्भगृह में देवी तारा की मूर्ति नहीं मिली। शैव, शाक्तो की देवी तारा जैन और बौद्धों में भी पूजनीय है।
दस महाविद्या देवियों का मंदिर-
देवरानी जेठानी का मंदिर वाममार्गियों की गुप्त साधना स्थली रहा है। भगवान शिव की दस महाविद्या देवी में से तारा देवी व धूमावती के मंदिर अब ध्वस्त अवस्था में हैं। तारा देवी देवरानी और धूमावती देवी जेठानी कही गई हैं। गांव का नाम देवी तारा से ताला पड़ गया, शायद इस स्थान को आमजन से गुप्त रखने के कारण यह नाम दिए गए हैं। तंत्र साधना की प्राचीन देवी तारा पर केंद्रित मंदिर अलग है मंदिर का गर्भगृह मूर्ति विहीन मिला है। समीपस्थ सारागांव में धूमनाथ, (शिव) मंदिर का गर्भगृह मूर्ति विहीन हैं। अलबत्ता तारा देवी के द्वारपाल के रूप में एक अदभुत मूर्ति मिली है इसे अब तक ठीक ठीक पहचाना नहीं जा सका है।

भग्नावशेष ताला
देवरानी जेठानी मंदिर की मूर्तियां अदभुत और अतिरंजना पूर्ण हैं जो अपने आप में सबसे अलग है। पंचतत्व, पंच मकार से अभिभूत प्रतिमाएं गूढ़ तंत्र साधना की पर्याय लगती हैं ।धर्म ग्रंथों, तंत्र -मंत्र के ग्रंथों में मूर्तियों के ऐसे स्वरूप और उसकी व्याख्या नहीं मिलती जो देवरानी जेठानी के मंदिर में मिली हैं।
देवी तारा मंदिर-
तारा देवी का मंदिर जेठानी मंदिर से 15 मीटर की दूरी पर विशाल ऊंचे जगमोहन पर ध्वंस अवस्था में मिला है। मंदिर के तल विन्यास में आरंभिक चंद्रशिला और सीढ़ियों के बाद अर्धमंडप, अंतराल और गर्भगृह तीन प्रमुख भाग हैं, गर्भगृह मूर्ति विहीन है।
मंदिर की सीढ़ियों में शिव के यक्षगण और गंधर्व की आकृतियां उत्कीर्ण हैं। निचले हिस्से में शिव पार्वती चौपड़ खेलते हुए हैं, वहीं पार्वती नंदी की पूंछ खींचते हुए दिखाई पड़ती हैं। देखने से प्रतीत होता है कि शिव चौपड़ खेल में नंदी को दांव में लगा हार गए हैं। मंदिर के दाहिनी ओर प्रणालिका बनी है जो मनियारी नदी की ओर है। यह बलि देने का स्थान रहा होगा। प्रवेश द्वार के उत्तरी पार्श्व में दोनों किनारों में 6×6 फीट के गज विशाल गज बैठी मुद्रा में है। दक्षिण की ओर मुख्य प्रवेश द्वार है इसके साथ पूर्व व पश्चिम में भी द्वार हैं। मुख्य प्रवेश द्वार के चौखट में दोनों ओर भयावह कीर्तिमुख का अंकन वनस्पतियों के साथ कमनियता लिए हुए हैं।

भग्नावशेष ताला
शिव परिवार की मूर्तियां उत्खनन के दौरान मिली हैं। अति विशिष्ट मूर्तियों में चतुर्भुजी कार्तिकेय की मयूरासन प्रतिमा है जो निर्लिप्त भाव लिए हुए हैं। दिमुखी गणेश प्रतिमा जो अपने हाथ में दांत को लिए हुए चंद्रमा में प्रक्षेपण के लिए उद्धत मुद्रा में है। अर्धनारीश्वर, उमा महेश, नाग पुरुष, यक्ष मूर्तियां अपने पौराणिक आख्यानों के सदृश लगती हैं। शालभंजिका की भग्न मूर्ति में शरीर सौष्ठवता व कलात्मक सौंदर्य उसकी कमनियता को सुन्दरता देते हुए है। एक विशाल चतुर्भुजी प्रतिमा जो खंडित अवस्था में है जिसकी भाव भंगिमा से महिषासुर मर्दिनी की मूर्ति का बोध होता है। यहीं पर तारा देवी के मुख्य गण की अदभुत विशाल प्रतिमा मिली है जो सहज आकर्षित करती है।
रूद्र शिव या काल पुरुष?-
देवरानी मंदिर के उत्खनन से एक अद्वितीय प्रतिमा प्राप्त हुई है। 9 फीट लंबी 4 फुट चौड़े बलुवा शिलाखंड से निर्मित मूर्ति लगभग डेढ़ टन की है। मूर्ति की ज्ञानेंद्रियां एवम् जानेंद्रियां जलचर, थलचर जीवों से बनाई गई हैं। प्रतिमा की भाव भंगिमा, स्वरूप और लक्षणों को देखकर विद्वानों ने अनेक नामकरण किए हैं। रूद्रशिव,परशुराम,लकुलीश और काल पुरुष आदि नाम दिये गए हैं। तारा देवी के द्वार पर स्थापित इस मूर्ति का रहस्य क्या है! इस पर विद्वान एकमत नहीं है।

रुद्र शिव ताला
काल पुरुष की अदभुत मूर्ति शिल्प कला की दृष्टि से अद्वितीय है। इस प्रतिमा के स्वरूप का वर्णन किसी शास्त्र में नहीं मिलता, ना ही इस तरह की कोई दूसरी मूर्ति कहीं मिली है। प्रतिमा के सिर से पांव अनेक जलचर- थलचर जीव बने हुए हैं। प्रतिमा का सिर पर नाग से निर्मित कुंडलीकार पगड़ी है जो चार चक्रकार में गुंठित है। सिर के पीछे प्रभामंडल खंडित है। आंखें अर्ध निर्लिप्त योगी जैसी, जिस पर भौंह गृहगोधा (छिपकली) के पिछले पैरों जैसी है। गाल घंटाकार पंख पसारे मयूर से निर्मित हैं। नासिका बिच्छू स्वरूप, होंठ मदिरापान से मदमस्त प्रतीत होते हैं। मूंछें मछली से अलंकृत हैं, ठुड्डी पर केकड़े की आकृति है। कंधा मकर मुख से शोभायमान हैं। हाथों की उंगलियां सर्प की मुखाकृति लिए हुए हैं।
मूर्ति के मुख्य सिर के अलावा सात और सिर शरीर के दूसरे भाग में बने हैं। वक्षस्थल में दाएं और बाएं दो सिर है, पेट में उदराकार एक सिर, दो सिर जंघा में और दो सिर घुटने में बने हैं। सभी की मुखाकृति भाव भंगिमा अलग-अलग है। उर्ध्वाकार लिंग कच्छप मुख का और अंडकोष घंटाकृति लिए हुए हैं। शरीर में आभूषण सर्प कुंडलियों से अलंकृत हैं जो गले में है। मूर्ति का बायां हाथ व पैर के पंजे भग्न हो चुके हैं।'
अनेक राजवंशों के पुरावशेष -
जेठानी मंदिर ध्वस्त अवस्था में मिला है जिसके चारों दिशाओं में सोपान हैं । मंदिर की सफाई के दौरान शरभपुरीय शासक का प्रसन्नमात्र की उभारदार रजत मुद्रा मिली जिस पर ब्राह्मी लिपि में शासक का नाम अंकित है। रतनपुर के कलचुरी शासक रत्नदेव व प्रताप मल्ल की रजत मुद्रा मिली है। कलचुरी कालीन तांबे का एक सिक्का भी मिला है। मंदिर निर्माण में जो डोलोमेटिक लाइमस्टोन का उपयोग किया गया है। मंदिर निर्माण के काफ़ी समय बाद मुख्य मंदिर को सहारा देने के लिए पक्की ईंटों का इस्तेमाल किया गया है। उत्खनन के दौरान मंदिर के 12 फीट नीचे ईसा पूर्व द्वितीय व तृतीय शताब्दी नवपाषाण कालीन कठोर प्रस्तर फलक भी मिले हैं। मंदिर के गर्भगृह में नवपाषाण युगीन में दैनिक उपयोग आने वाली वस्तुएं मिली हैं। पूजा में प्रयुक्त होने वाले धूपदान, दीपक, दीवट, कलसी, सुराही, गृह उपयोगी वस्तुओं में उथले मिट्टी के बर्तन, मटका, ढक्कन पत्थर का सिलबट्टा, धार तेज करने वाले पत्थर, मिट्टी के मनके, चौसर की गोटियां, बालियां और ताबीज मिला है। धातु की वस्तुओं में हंसिया, पहलसूल सामरिक अस्त्रों में भाला शीर्ष, जिरहबख्तर पहनने के बाद शरीर खुजलाने का उपकरण भी मिला है।
देवी धूमावती-
जेठानी मंदिर से भग्नावशेष धूमावती देवी की अदभुत प्रतिमा मिली है। देवी की आंखें बड़ी बड़ी हैं, उसके सुंदर केश आभूषणों से अलंकृत हैं। कानों में कुंडल एवं गले में हार सुशोभित है। देवी अपने कंधों को झुकाए दोनों हाथों की हथेली को जमीन से स्पर्श कर रही है। प्रतिमा के सिर पर पद शिल्प शिव जी का पैर है, जिसके ऊपर का भाग खंडित है। मूर्ति की आंखें पैरों के दबाव से वेदना से भरी हुई लगती हैं।
आख्यानों में देवी धूमावती-
शिव की दस महाविद्या देवियों में से एक हैं, माता धूमावती, जो स्वयं नियंत्रिका हैं, पार्वती स्वरूपा है। माता धूमावती जब भूख से व्याकुल हुई तब उन्होंने स्वयं शिव को निगल लिया था।( पौराणिक आख्यान के अनुसार माता पार्वती भगवान शिव के साथ कैलाश पर्वत पर बैठी थीं, माता ने शिव से अपनी क्षुधा निवारण का अनुरोध किया, बार-बार अनुरोध करने पर शिव ने ध्यान नहीं दिया तब देवी ने रुष्ट होकर महादेव को ही निगल लिया।) शिव को निगलने के कारण समूचे ब्रह्मांड में हाहाकार मच गया। देवताओं ने माता से अनुनय विनय की, कि वे शिव को मुक्त करें, इस पर माता ने अपने शीर्ष (सर) से शिव को मुक्त किया। शिव को मुक्त करने के लिए देवी ने धरती को हथेलियों से थाम लिया और शिव देवी के सिर से निकल गए। जेठानी मंदिर में धूमावती देवी के ऐसे स्वरूप वाली मूर्ति मिली है।

धूमावती ताला
धूमावती देवी का कोई स्वामी नहीं है इस कारण इन्हें विधवा भी कहा गया है। तंत्र ग्रंथों व शिव पुराण में धूमावती देवी को उग्रतारा देवी कहा गया है। धुएं से आवृत्त होने के कारण ध्रूमा एवं धूमावती कहलाई। खुले केशों वाली यह चंडिका, उग्र रूप धारण करने वाली हैं, विधवा भी हैं। कागध्वज वाले रथ पर आरूढ़ हो, हाथ में सूप धारण किए हुए, भूख से व्याकुल, निर्मम आंखों वाली उग्रतारा हैं।
मंदिर का काल निर्धारण-
देवरानी जेठानी मंदिर से मिली सामग्री पुराविदों के लिए कौतूहल का विषय बनी, यहां ईसा पूर्व पांचवी शताब्दी की वस्तुएं प्राप्त हुई हैं। पुरातत्व अधिकारी जी. एस. रायकवार ने मंदिर को 475 ईसवी से 625 ईसवी के मध्य निर्मित माना है। एक मत के अनुसार शरभपुरीय अमरार्य कुल के समय इसे निर्मित माना गया है लेकिन यहां गुप्तकालीन विष्णु फलक चतुर्भुजी मूर्ति होने के कारण परस्पर मतभेद हैं।
ईसा पूर्व पांचवी सदी से दसवीं शताब्दी के लंबे समय तक मंदिर का वैभव काल रहा होगा। 1873 -74 में तत्कालीन कमिश्नर फिशर ने इसकी सूचना भारतीय पुरातत्व महानिदेशक एलेग्जेंडर के सहयोगी जे. डी. बेलगर को दी। बेलगर ने स्थल निरीक्षण कर ग्रामीणों के अनुसार इसका नामकरण देवरानी जेठानी मंदिर किया। एक विदेशी पुरातत्व जोलियम विलियम्स ने इसका निरीक्षण कर इसे चंद्रगुप्त काल का मंदिर बताया था। 1985- 86 के दौरान देवरानी जेठानी मंदिर के टीले की सफाई की गई। उत्खनन में शरभपुरीय, कलचुरी कालीन, गुप्तकालीन के अलावा नवपाषाण युग वस्तुएं प्राप्त हुई हैं।

भग्नावशेष ताला
देवरानी जेठानी का मंदिर मनियारी नदी तट पर स्थित है। मंदिर रायपुर बिलासपुर राष्ट्रीय राजमार्ग रायपुर से 80 किलोमीटर दूरी पर भोजपुर गांव से 7 किलोमीटर पर अमेरी कांपा गांव के समीप स्थित है। रायपुर बिलासपुर रेलवे लाइन में दगोरी रेलवे स्टेशन से यह डेढ़ किलोमीटर दूरी पर स्थित है।
देवरानी जेठानी ऐतिहासिक धरोहरों को समेटे हुए है। यहां पुरातत्व महत्व की अनेक मूर्तियां मिली हैं जिन्हें वहीं एक छोटे संग्रहालय में संजोया गया है। प्राकृतिक सौंदर्य भी यहां पर अनोखा है। यहां ठहरने की सुविधा नहीं है लेकिन अपने साधन से यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है। शैव और शाक्त साधना का एककार स्वरूप लिए देवरानी जेठानी मंदिर के रहस्य को जानना अभी शेष है! प्राचीन दक्षिण कोसल में शैव और शाक्त साधना का रहस्य क्या है!सबसे हटकर ऐसा मंदिर किस उद्देश्य से बनाया गया था?
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