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पर्व विशेष : | तदनुसार 18 जुलाई 2026

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जहाँ भक्ति बनी प्रेम की भाषा

जहाँ भक्ति बनी प्रेम की भाषा


भगवान श्रीराम का जीवन केवल धर्म-मर्यादा की ही गाथा नहीं है, अपितु यह प्रेम के विविध और उदात्त स्वरूपों का भी एक अनुपम महाकाव्य है। श्री प्रशांत श्रीधर जी का यह लेख रामायण के उसी अनदेखे ‘प्रेम पक्ष’ को उजागर करता है, जहाँ प्रेम केवल आकर्षण नहीं, बल्कि त्याग, सेवा और समर्पण का पर्याय बन जाता है। श्रीराम और सीता का आत्मीय प्रेम, भरत का भ्रातृ-प्रेम, उर्मिला का मौन समर्पण और हनुमान जी की निष्काम भक्ति, ये सभी प्रसंग यह सिद्ध करते हैं कि रामायण में भक्ति ही प्रेम की सर्वोच्च भाषा है। यह लेख हमें रामायण को एक नवीन और भावपूर्ण दृष्टि से पढ़ने की प्रेरणा देता है।


भारतीय वाङ्मय में द्वापर युग में अवतरित भगवान श्रीकृष्ण को जहाँ प्रेम का साक्षात् अवतार माना जाता है, वहीं त्रेता युग के भगवान श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। श्रीराम ने प्रेम को मर्यादा के पवित्र बन्धन में बांधा, जबकि श्रीकृष्ण ने उसे अनन्त विस्तार प्रदान किया। यदि हम सम्पूर्ण रामायण का गम्भीरता से अध्ययन करें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि रामायण केवल संयम, त्याग, तपस्या और धर्मपरायणता की ही गाथा नहीं है, बल्कि यह निस्वार्थ और एकात्म प्रेम का एक महाकाव्य भी है।

रामायण को केवल एक आदर्शवादी या धार्मिक ग्रन्थ मान लेने से इसका विशाल प्रभाव सीमित हो जाता है। इसमें प्रेम की अनेक यात्राएं हैं। यह एक ऐसा प्रेम है जो शारीरिक आकर्षण से परे है, जो निस्वार्थ त्याग से उत्पन्न होता है और जो परिस्थितियों के अनुसार करुणा, हठ और कभी-कभी सात्त्विक क्रोध का कारण भी बनता है।

इस पवित्र प्रेम की शुरुआत बालकाण्ड से ही दृष्टिगोचर होने लगती है। जब राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न शिक्षा प्राप्त करने के लिए महर्षि वशिष्ठ के आश्रम जाते हैं, तो उन्हें आश्रम के कठोर नियमों के अनुसार साधारण शिष्यों की भांति जीवन व्यतीत करना पड़ता है। उस कठिन परिस्थिति में भगवान श्रीराम दिन में एक पिता की भांति अपने अनुजों को शिक्षा, आचरण और अनुशासन का पाठ पढ़ाते हैं और रात्रि के समय एक वात्सल्यमयी माता की भांति अपने छोटे भाइयों का ध्यान रखते हैं। यहाँ श्रीराम का प्रेम एक अद्भुत वात्सल्य भाव के रूप में प्रकट होता है।


गुरुकुल में अपने वात्सल्य भाव दिखाते श्रीराम

रामायण के प्रेम पक्ष को गहराई से समझने के लिए श्रीराम और माता सीता के विवाह-पूर्व प्रेम का प्रसंग सबसे दिव्य और पवित्र उदाहरण है। यह प्रेम किसी सांसारिक या भौतिक आकर्षण पर आधारित नहीं था, बल्कि यह आत्मा की गहन अनुभूति और मर्यादा पर आधारित था। जनकपुर में जब श्रीराम अपने गुरु विश्वामित्र के साथ शिवधनुष देखने पहुँचे, वहीं राम और सीता का प्रथम दर्शन हुआ था।

उस एक ही क्षण में दोनों के हृदयों में एक अत्यन्त शान्त, पवित्र और गूढ़ प्रेम का उदय हो गया था। यह एक ऐसा प्रेम था जो बिना किसी प्रत्यक्ष संवाद के, केवल दृष्टि के माध्यम से ही व्यक्त हो गया था। गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस अलौकिक मिलन का वर्णन करते हुए लिखा है, "एक बार बिनु बोले हियँ हेरि, मनहुँ जानि परिनय मन बिच्छेरि।" अर्थात् दोनों ने बिना कुछ बोले ही हृदय से एक-दूसरे को अपने जीवनसाथी के रूप में स्वीकार कर लिया था।


राम-सिया का प्रथम मिलन

माता सीता जब स्वयंवर से पूर्व माता गौरी के मन्दिर में गईं, तो उन्होंने श्रीराम को मन-ही-मन स्मरण करते हुए यह मनोकामना की थी, "हे माता! यदि मैं अपने पूर्व जन्मों में किसी भी पुण्य की पात्र हूँ, तो मुझे यहीं भगवान राम पति रूप में प्राप्त हों।" यह प्रार्थना उनके निस्वार्थ, निष्कलंक और आत्मिक प्रेम की चरम अभिव्यक्ति थी। जब श्रीराम ने शिवधनुष उठाया, तो उस दैवीय संकेत ने यह सिद्ध कर दिया कि यह दो दिव्य आत्माओं का मानवीय मिलन है।

यही कारण है कि राम और सीता का प्रेम भारतीय संस्कृति में आदर्श दाम्पत्य का सर्वोच्च प्रतीक माना गया है। वनवास के समय सीता जी का बिना किसी संकोच के राम के साथ वनों में चलने का निर्णय लेना, प्रेम में साझेदारी और त्याग का सबसे बड़ा नियम स्थापित करता है। उनका वियोग, अग्निपरीक्षा और अन्ततः माता सीता का धरती में समा जाना, यह सिद्ध करता है कि सीता जी शरीर छोड़कर भी राम के हृदय में सदैव के लिए अमर हो गईं।

श्रीराम और लक्ष्मण के मध्य का प्रेम केवल दो भाइयों का नाता नहीं है, अपितु यह एक ऐसा भावनात्मक और आध्यात्मिक सम्बन्ध है जो अद्वितीय है। लक्ष्मण जी ने श्रीराम के लिए अपने सारे राजसी सुख और सुविधाएं त्याग कर वनवास का कठोर मार्ग चुना। क्रोधी स्वभाव के होने के बावजूद भी, श्रीराम के मात्र एक आदेश पर लक्ष्मण जी चन्द्रमा की शीतलता के समान शान्त हो जाते थे।

युद्ध के दौरान जब मेघनाद के शक्तिबाण से लक्ष्मण जी मूर्च्छित हो गए, तब श्रीराम का विलाप उनके मानवीय प्रेम को उजागर करता है। उन्होंने अश्रुपूरित नेत्रों से विलाप करते हुए कहा कि यदि लक्ष्मण को कुछ हो गया तो वह अयोध्या लौटकर माता को क्या मुख दिखाएंगे। यह विलाप ईश्वरीय प्रेम का मानवीकरण रूप था।

रामायण की सबसे शान्त परन्तु सबसे गहरी प्रेम कथा लक्ष्मण और उर्मिला की है। जब लक्ष्मण श्रीराम के साथ वन चले गए, तब उर्मिला ने पूरे चौदह वर्षों तक न तो कोई शिकायत की और न ही अपने अश्रु दिखाए। उनका यह प्रेम किसी संवाद या वचनों में नहीं बंधा था, बल्कि यह उनके निस्वार्थ कर्तव्य और लम्बी प्रतीक्षा में गढ़ा गया था।

उर्मिला का यह असीम धैर्य हमें बताता है कि प्रेम का एक रूप पूर्ण मौन भी होता है, जिसे बिना शब्दों के पूरी सच्चाई के साथ जिया जाता है। उनके इस महान् प्रेम ने यह सिखाया कि सच्चा प्रेम केवल प्रिय के साथ रहने में ही नहीं है, बल्कि उसके कर्तव्य और धर्म के निर्वहन में उसकी सबसे बड़ी शक्ति बनने में है।अयोध्याकाण्ड में श्रीराम और निषादराज गुह व केवट का प्रसंग केवल भक्ति का प्रसंग नहीं है, अपितु यह निर्मल प्रेम और सामाजिक समानता का सबसे बड़ा प्रतीक है। श्रीराम ने केवट को एक भाई के समान सम्मान दिया और उसे केवल एक सच्चा प्रेमी तथा भक्त माना।


उर्मिला का धैर्य व हनुमंत की भक्ति- प्रेम की पराकाष्ठा

यह प्रसंग यह दिखाता है कि प्रेम में कोई ऊँच-नीच नहीं होती। इसी प्रकार, श्रीराम और भरत का प्रेम रामायण का सबसे पवित्र, आत्मिक और भावनात्मक प्रसंग है। चित्रकूट में जब भरत जी राम को मनाने गए, तब गुरु वशिष्ठ ने अपना निर्णय देते हुए कहा था, "धर्म का पलड़ा राम के पक्ष में है, परन्तु प्रेम का पलड़ा भरत के पक्ष में भारी है।"

यह प्रेम की सबसे श्रेष्ठ विजय थी। भरत ने श्रीराम की चरण पादुकाओं को अयोध्या के सिंहासन पर रखकर यह साबित कर दिया कि उनका प्रेम रक्त का नहीं बल्कि आत्मा का सम्बन्ध था। परम श्रेष्ठ भक्त हनुमान जी की भगवान श्रीराम के प्रति अगाध भक्ति रामायण में प्रेम का आत्मविसर्जन पक्ष है। जब हनुमान जी पहली बार ऋष्यमूक पर्वत पर श्रीराम से मिलते हैं, तो वे केवल अपना परिचय नहीं देते, अपितु स्वयं को पूर्णरूपेण अपने आराध्य के प्रति समर्पित कर देते हैं।


श्रीराम की चरण पादुका रहीं भारत की मार्गदर्शक

लंका विजय के पश्चात जब राज्याभिषेक के समय सभी को वरदान मिल रहे थे, तब हनुमान जी ने हाथ जोड़कर कहा, "मुझे कुछ नहीं चाहिए प्रभु, बस इतना दीजिए कि आपका नाम लेते हुए ही मेरा जीवन कटे।" यह भक्ति की वह सर्वोच्च अवस्था है जहाँ प्रेम कुछ मांगता नहीं, केवल समर्पित होता है। इस महाकाव्य में रावण और मन्दोदरी का सम्बन्ध सबसे कम चर्चित परन्तु अत्यन्त मानवीय प्रेम का पक्ष है।

मन्दोदरी ने रावण को सीता हरण से रोकने का हर सम्भव प्रयास किया और उसे संयम का पाठ पढ़ाया। रावण की महत्वाकांक्षा के कारण मन्दोदरी ने अपना सब कुछ खो दिया, परन्तु अपने पति के प्रति उनका प्रेम कभी समाप्त नहीं हुआ। मेघनाद और सुलोचना का प्रेम भी अपने कर्तव्यों और बलिदानों के कारण रामायण के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। मेघनाद जानता था कि राम से युद्ध का परिणाम क्या होगा, फिर भी पिता की प्रतिष्ठा के लिए उसका सर्वस्व समर्पण यह दर्शाता है कि प्रेम केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि कठोर कर्तव्यनिष्ठ भी होता है।

इन सबके अतिरिक्त, महाराज दशरथ का श्रीराम के प्रति अगाध पुत्र-प्रेम, माता शबरी की वह लम्बी और प्रेममयी प्रतीक्षा, विभीषण की श्रीराम के प्रति अनन्य भक्ति और लव-कुश के प्रति श्रीराम का वह अदृश्य और अविच्छेदनीय प्रेम रामायण की उन अनन्त प्रेम यात्राओं का हिस्सा हैं जिन्हें समेट पाना सम्भव नहीं है। समेकित रूप में रामायण केवल धर्म और नीति की गाथा नहीं है, बल्कि यह प्रेम के विविध और पवित्र रूपों का एक विराट महाकाव्य है। रामायण हमें यही सिखाती है कि प्रेम केवल एक भाव नहीं है, बल्कि वह धर्म का वह हृदय स्थल है जहाँ करुणा, मर्यादा और त्याग एक साथ मिलकर मानवता का सबसे बड़ा आदर्श रचते हैं।

-प्रशान्त श्रीधर
(लेखक पिंडरई (मण्डला) में शिक्षक हैं, जो शिक्षा और लोक-संस्कृति के माध्यम से समाज में निरंतर वैचारिक चेतना का संचार करते हैं।)

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