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भक्त शिरोमणि माता कर्मा: भक्ति, चारित्रिक अवदान और प्रेम की पराकाष्ठा

भक्त शिरोमणि माता कर्मा: भक्ति, चारित्रिक अवदान और प्रेम की पराकाष्ठा

भारतीय सनातन परंपरा केवल ग्रंथों और सिद्धांतों में नहीं बसती, बल्कि यह उन संतों और भक्तों के जीवन से भी परिलक्षित होती है जिन्होंने प्रेम और भक्ति के माध्यम से परमात्मा को भी अपना ऋणी बना लिया। जब हम उत्तर भारत के विशाल मैदानों से लेकर मध्यभारत के मुख्य क्षेत्रों मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ और उड़ीसा के जगन्नाथ पुरी के तटों तक की सांस्कृतिक यात्रा करते हैं, तो एक नाम विशेष रूप से उभरकर सामने आता है  “भक्त शिरोमणि माता कर्मा”।

माता कर्मा का व्यक्तित्व किसी एक जाति, वर्ग या राज्य की सीमा में बंधा नहीं है। वे उस अद्वैत चेतना का प्रतीक हैं जो उत्तर प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों को एक ही सूत्र में पिरोती है जिसका मूल भाव है निष्काम भक्ति ।

माता कर्मा के जन्म और बाल्यकाल की बात करें तो उनका  प्राकट्य उत्तर प्रदेश के झांसी नगर में चैत्र कृष्ण एकादशी को प्रसिद्ध तेल व्यापारी श्री राम साहू जी के घर हुआ था। झांसी, जो कालांतर में वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई की शौर्यगाथा का केंद्र बना, प्राचीन काल से ही धर्म और व्यापार का प्रमुख केंद्र रहा है। माता कर्मा के बचपन से ही उनके भीतर वैराग्य और भक्ति के बीज प्रस्फुटित होने लगे थे।

सनातन परंपरा में नारी को ‘शक्ति’ माना गया है और माता कर्मा ने इसे अपने जीवन से चरितार्थ किया। उनके पिता के भक्तिभाव का उन पर गहरा प्रभाव पड़ा। वे बाल्यकाल से ही मीराबाई की भाँति कृष्ण भक्ति के पद अपने मधुर कंठ से गाया करती थीं। उन्हें ‘मारवाड़ की मीरा’ के रूप में भी सम्मान प्राप्त है। यह तथ्य दर्शाता है कि उत्तर प्रदेश की एक बेटी अपनी भक्ति की सुगंध से धीरे-धीरे अन्य क्षेत्रों को भी सुगन्धित कर रही थी।

माता कर्मा का विवाह मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के नरवरगढ़ निवासी पद्मा जी साहू के साथ हुआ। नरवर उस समय एक स्वतंत्र और समृद्ध रियासत थी। उनकी बहन धर्माबाई का विवाह राजस्थान के नागौर राज्य के श्री रामसिंह राठौर से हुआ। इस प्रकार यह पारिवारिक विस्तार केवल सगे-संबंधों तक सीमित नहीं था, बल्कि साहू और राठौर वंशों के बीच सामाजिक एकता का आधार भी बना, जो आज भारत के विभिन्न प्रांतों आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और गुजरात तक फैला हुआ है।

सनातन संस्कृति में नारी केवल घर तक सीमित नहीं थी, बल्कि वह सामाजिक और आर्थिक निर्माण की भी सूत्रधार रही है। माता कर्मा और उनके पति ने लोक-कल्याण के लिए कई पुलों और सरायों का निर्माण कराया। आज भी नरवर-शिवपुरी मार्ग पर स्थित ‘माता कर्मा के पुल’ और ‘सरायें’ उस काल की इंजीनियरिंग और जनसेवा के प्रमाण माने जाते हैं।

माता कर्मा के जीवन का एक महत्वपूर्ण प्रसंग तब सामने आया जब राजा नल के पुत्र ढोला ने ईर्ष्यावश उनके परिवार को संकट में डाल दिया। राजा ने आदेश दिया कि सात दिन के भीतर राज्य के पक्के तालाब को कड़वे तेल से भर दिया जाए, अन्यथा देश निकाला दे दिया जाएगा। हजारों टन तेल की व्यवस्था करना सामान्य परिस्थितियों में असंभव प्रतीत होता था।

कथा के अनुसार, जब माता कर्मा ने अपनी अंतरात्मा से बाल गोपाल का स्मरण किया, तो उनकी कृपा से वह कुण्ड तेल से भर गया । वह तालाब आज भी ‘धर्मा तलैया’ के नाम से जाना जाता है। इस प्रसंग को भक्त परंपरा में भक्ति और विश्वास की शक्ति के रूप में स्मरण किया जाता है।

माता कर्मा के प्रति छत्तीसगढ़ में गहरी श्रद्धा देखी जाती है। यहाँ अनेक लोग उन्हें अपनी आराध्य मानते हैं और उनके नाम से विभिन्न धार्मिक परंपराएँ भी प्रचलित हैं । उनके जीवन से जुड़ी एक लोकप्रिय कथा जगन्नाथ पुरी से संबंधित है। कथा के अनुसार माता कर्मा रोज़ बड़े सवेरे उठकर भगवान के लिए खिचड़ी पकातीं और ज्यों ही उन्हें आर्त भाव से पुकारती प्रभु प्रकट जाते और उनकी गोद में बैठकर खाते ।

एक दिन एक ज्ञानी महात्मा जो बड़े नियम से चलते थे उनकी भेंट स्नान को जा रही कर्मा माता हुई, उन्होंने पूछा तुम तो भगवान की बड़ी भक्त बनती हो प्रातः के ७ बज गए तुमने अब तक प्रभु की पूजा- अर्चना नहीं की तब माता कर्मा ने बताया के वे प्रतिदिन भोर ३ बजे उठकर पहले भगवान के लिए खिचड़ी तैयार करती हैं तब भोग लगाकर कोई अन्य कार्य करती हैं । इतना कहना हुआ कि महात्मा जी ने कहा- बिना स्नान के भगवान को भोग ! यह तो घोर अपराध है । अगले दिन अपराध के डर से माता ने महात्मा जी के कहे अनुसार खिचड़ी तैयार की जिससे ठाकुर जी को भोग पाने में विलम्ब हो गया जैसे ही पहले कौर खाया मंदिर के पट खुल गए और ठाकुर जी अंतर्ध्यान हो गए।

शीघ्रता के कारण जय-जय के मुख पर भोग का एक दाना शेष रह गया जिसे देखकर मंदिर के पुजारी विस्मय में पड़ गए और प्रश्न किया कि जय-जय अभी तो भोग लगा नहीं फिर यह खिचड़ी कैसे! तब प्रभु ने सब वृतांत सुनाया और यह सन्देश भी दिया कि किसी भी नियम से ऊपर मेरे भक्त का प्रेम और भाव है अतः माता से कहो कि वे पूर्ववत ही मेरी सेवा करें और मान्यतानुसार तभी से जगन्नाथ पुरी में छप्पन भोग से पहले ‘माता कर्मा की खिचड़ी’ का भोग लगाया जाता है। इस कथा का संदेश यही माना जाता है कि परमात्मा बाहरी वैभव से अधिक भक्त के भाव को महत्व देते हैं और भक्ति सच्ची हो तो जिनके अधीन सारा विश्व है वे स्वयं भक्त के अधीन हो जाते हैं ।

माता कर्मा केवल एक भक्त शिरोमणि ही नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक एकता का भी प्रतीक मानी जाती हैं। उत्तर प्रदेश उन्हें अपनी जन्मभूमि की पुत्री के रूप में स्मरण करता है, मध्य प्रदेश उनके जीवन के वैवाहिक अध्याय से जुड़ा है, राजस्थान उन्हें ‘मारवाड़ की मीरा’ कहकर सम्मानित करता है, और छत्तीसगढ़ में उन्हें आराध्य कुलदेवी के रूप में श्रद्धा से याद किया जाता है।  मान्यतानुसार रायपुर  में उनकी आराधना से जुड़ी सार्वजनिक परंपराओं का प्रारंभ सन् 1974 बताया जाता है। पंजाब सहित अन्य राज्यों में भी उनके नाम से सेवा और एकता के कार्यक्रम आयोजित होते रहे हैं।

माता कर्मा का जीवन संघर्ष, सेवा और समर्पण का प्रेरक उदाहरण है। उन्होंने यह दिखाया कि गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी उच्च आध्यात्मिक आदर्शों का अनुसरण किया जा सकता है। उनकी स्मृति में मनाई जाने वाली जयंती और अन्य परंपराएँ इस बात की ओर संकेत करती हैं कि भारतीय समाज में व्यक्ति के चरित्र, सेवा और भक्ति को महत्व दिया जाता है जहाँ मीराबाई राजपरिवार की होकर भी संत जीवन की ओर अग्रसर हुईं, अत्यंत संघर्षमय जीवन व्यतीत  किया और संत रैदास को अपना गुरु बनाया, गोस्वामी तुलसीदास ने भी कष्टों भरा जीवन व्यतीत किया लेकिन राम नाम की तरह घर-घर में बस गए वैसे ही माता कर्मा ने अपनी खिचड़ी से जग में महमोहन के नाम से जाने गए कृष्ण को मोहित कर लिया । सार यह की यदि हम अपने इतिहास को टटोलें तो ऐसी अनगिनत गाथाएं मिलेंगी जिसमें अद्भुत् घटनाओं का वर्णन है जो अलग-अलग काल में घटीं लेकिन भाव एक त्याग, समर्पण व निस्वार्थता और भारतीय दर्शन में लोक जीवन को सफल और सार्थक बनाने के मूलमंत्र भी यहीं हैं ।

माता कर्मा की  लगभग एक हजार वर्ष पुरानी गाथा साहू-तेली समाज सहित अनेक लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी और आज तक प्रासंगिक है । आइए, हम माता कर्मा के जीवन से अटूट विश्वास और निस्वार्थ सेवा की प्रेरणा ग्रहण करें ।

“माँ कर्मा आराध्य हमारी, भक्त शिरोमणि मंगलकारी।
सेवा, त्याग, भक्ति उर धारें, जन-जन में माँ अवतारे।”

जय माँ कर्मा 

लेख-
सोनल बाजपेयी
शोधार्थी- भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा

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