आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी | सोमवार

नक्षत्र: पुनर्वसु | योग: वज्र | करण: गर

पर्व विशेष : | तदनुसार 10 अगस्त 2026

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देवशयनी एकादशी हरि विष्णु चतुर्मास

देवशयनी एकादशी हरि विष्णु चतुर्मास

भगवान विष्णु से सम्बन्धित देवशयनी एकादशी को 'आषाढ़ी एकादशी', 'पद्मा एकादशी' तथा 'श्री नारायण हरि शयनी एकादशी' भी कहते हैं। विष्णु भक्त इस दिन भगवान की पूजा करते हैं। यह आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को आती है। हिन्दू धर्म में यह भगवान विष्णु के योग निद्रा में जाने का समय है। प्राचीन परम्पराओं और शास्त्रों में इसका उल्लेख है।

भगवान विष्णु क्षीरसागर में 1000 सिर वाले शेषनाग की शय्या पर योग निद्रा में जाते हैं। उनकी यह योग निद्रा 4 माह तक रहती है। वे कार्तिक मास की प्रबोधिनी एकादशी या देवउठनी एकादशी पर जागते हैं।

राजा मान्धाता की कथा

प्राचीन काल में सूर्यवंश में राजा मान्धाता का शासन था। वे अपनी बुद्धिमत्ता और दयालुता के लिए प्रसिद्ध थे। वे धर्म के मार्ग पर चलते थे। वे प्रजा को अपनी सन्तान मानते थे। राजा मान्धाता अहंकार या स्वार्थ से शासन नहीं करते थे। उनका हर निर्णय प्रजा के कल्याण के लिए होता था। उनके राज्य में खेत उपजाऊ थे। नदियाँ पानी से भरी थीं। गाँव और शहर समृद्ध तथा शान्त थे।

व्यापारी सफल व्यापार करते थे। किसान भरपूर फसल उपजाते थे। विद्वान पवित्र शास्त्रों का अध्ययन करते थे। राजा के न्यायपूर्ण शासन में सभी लोग खुशहाल थे। लोग राजा की प्रशंसा करते थे। उनका मानना था कि राजा पिता के समान उनकी रक्षा करते हैं। राजा की धर्मपरायणता से राज्य में न्याय स्थापित था। कई वर्षों तक राज्य में शान्ति और समृद्धि बनी रही।

अकाल की स्थिति

कुछ समय बाद परिस्थितियाँ बदल गईं। 1 वर्ष बारिश नहीं हुई। लोगों को अगले मौसम में वर्षा की आशा थी। अगला वर्ष भी सूखा रहा। इस प्रकार 3 वर्ष बीत गए। लगातार 3 वर्षों तक राज्य में पर्याप्त वर्षा नहीं हुई।

नदियाँ सूख कर पतली धाराओं में बदल गईं। कुएँ खाली हो गए। तेज धूप से झीलें सूख गईं। उपजाऊ खेत बंजर हो गए। फसलें पकने से पहले मुरझा गईं। चारों ओर दुःख का वातावरण था। किसान बेबस होकर अपनी फसल को नष्ट होते देखते रहे। पशु पानी की तलाश में भटकते रहे। उन्हें पानी नहीं मिला। पक्षी आसमान से गायब हो गए। पेड़ों के पत्ते झड़ गए और वे निर्जीव दिखने लगे।

घरों में अन्न का अभाव हो गया। बच्चे भोजन के लिए रोने लगे। वृद्ध लोग कमजोर हो गए। कई परिवारों को पीने का पानी भी नहीं मिल रहा था। समृद्ध राज्य दुःख में डूब गया।

राजा मान्धाता की चिन्ता

राजा मान्धाता प्रजा की पीड़ा देखकर दुःखी थे। वे लोगों की समस्या समझने के लिए प्रतिदिन विभिन्न गाँवों का दौरा करते थे। उन्होंने शाही भण्डारों का शेष अनाज गरीबों में बाँटने का निर्देश दिया। वे जानते थे कि ये उपाय अस्थायी हैं। इनसे मुख्य समस्या का समाधान नहीं होगा।

रात के समय राजा महल की छत से अँधेरे आकाश को देख रहे थे। उन्होंने भगवान से प्रार्थना की। उन्होंने कहा कि यदि उनसे कोई भूल हुई है तो दण्ड उन्हें मिलना चाहिए। निर्दोष प्रजा को कष्ट नहीं होना चाहिए। उन्होंने राज्य को बचाने का मार्ग माँगा। कोई मार्ग न मिलने पर राजा ने महर्षि से मार्गदर्शन लेने का निर्णय लिया।

महर्षि अंगिरा से भेंट

राजा मान्धाता ने योग्य मन्त्रियों को राज्य का शासन सौंपा। वे सन्त की खोज में वन की ओर गए। कई दिनों की यात्रा के बाद वे पहाड़ों और नदियों को पार करके महर्षि अंगिरा के शान्त आश्रम में पहुँचे। महर्षि के शिष्य वेदों का अध्ययन कर रहे थे। आश्रम में पक्षियों का मधुर स्वर गूँज रहा था। वहाँ का वातावरण शान्तिपूर्ण था।

राजा मान्धाता ने महर्षि अंगिरा को प्रणाम किया। महर्षि ने उनका स्वागत किया। उन्होंने राजा से उनकी चिन्ता का कारण पूछा। राजा ने हाथ जोड़कर अपनी समस्या बताई। उन्होंने कहा कि उन्होंने हमेशा धर्म के अनुसार शासन किया है। उन्होंने कभी जानबूझकर किसी को हानि नहीं पहुँचाई है। इसके बाद भी उनके राज्य में 3 वर्षों से सूखा है। फसलें नष्ट हो गई हैं। लोग भूख से मर रहे हैं। पशुओं की भी मृत्यु हो रही है। राजा ने महर्षि से इस संकट का कारण और उपाय पूछा।

महर्षि का मार्गदर्शन

महर्षि अंगिरा ने आँखें बन्द कीं और ध्यान मग्न हो गए। कुछ समय बाद उन्होंने अपनी आँखें खोलीं। उन्होंने शान्त स्वर में कहा कि वर्तमान समय धर्म का है। धर्म के कमजोर होने पर प्रकृति असन्तुलित हो जाती है। संसार की हर घटना के पीछे सूक्ष्म कारण होते हैं।

महर्षि ने सन्तुलन स्थापित करने का उपाय बताया। उन्होंने कहा कि देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। राजा को स्वयं श्रद्धापूर्वक एकादशी व्रत करना चाहिए। उन्हें राज्य के सभी नागरिकों को भी यह व्रत करने का निर्देश देना चाहिए। सबको प्रार्थना और दान करना चाहिए। भगवान विष्णु के नामों का जप करना चाहिए। इस पूजा का पुण्य समस्त जीवों के कल्याण के लिए समर्पित करना चाहिए। भगवान विष्णु कृपालु हैं। वे राज्य पर अवश्य कृपा करेंगे।

राजा ने महर्षि की बात ध्यान से सुनी। उन्हें आशा मिली। उन्होंने महर्षि को प्रणाम किया। राजा ने कहा कि महर्षि के शब्दों से उनका भय दूर हो गया है। वे उनके निर्देशों का पूरी तरह पालन करेंगे।

राज्य में एकादशी व्रत का पालन

राजा मान्धाता राजधानी लौटे। उन्होंने अपने सभी मन्त्रियों, पुरोहितों और नागरिकों को एकत्रित किया। राजा ने आगामी देवशयनी एकादशी पर उपवास रखने की घोषणा की। उन्होंने सक्षम लोगों से भगवान विष्णु की पूजा करने को कहा। उन्होंने स्वयं के साथ-साथ पूरे राज्य के कल्याण के लिए प्रार्थना करने का निर्देश दिया।

प्रजा ने राजा के निर्देश को सहर्ष स्वीकार किया। देवशयनी एकादशी के दिन पूरे राज्य में भक्ति का वातावरण था। लोग सूर्योदय से पूर्व उठे। उन्होंने नदियों और तालाबों में स्नान किया। भक्तों ने मन्दिरों को फूलों और दीपों से सजाया। पुरोहितों ने वेदों के पवित्र मन्त्रों का उच्चारण किया। पुरुष, महिलाएँ, बच्चे और वृद्ध भगवान विष्णु की पूजा के लिए एकत्र हुए। कई लोगों ने सम्पूर्ण उपवास रखा। अन्य लोगों ने फलाहार के साथ व्रत किया।

देवशयनी एकादशी का महत्व

देवशयनी एकादशी उपवास के साथ-साथ भक्ति, विनम्रता, धर्मपरायणता और करुणा का पर्व है। ये गुण व्यक्ति और समाज दोनों में सकारात्मक बदलाव लाते हैं। राजा मान्धाता की कथा से स्पष्ट है कि कठिन समय में भगवान विष्णु पर विश्वास और सामूहिक प्रार्थना से आशा मिलती है। इससे ईश्वरीय कृपा प्राप्त होती है।

प्रतिवर्ष लाखों भक्त प्रार्थना, उपवास, भजन और दान के साथ इस एकादशी का व्रत करते हैं। वे अपने परिवार और संसार के कल्याण की कामना करते हैं। यह पर्व लोगों को धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। इससे भक्ति सुदृढ़ होती है। इसी दिन से चातुर्मास के पवित्र माह की शुरुआत होती है।

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। जय श्री हरि! 

- शुभम गोंडिकर 

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