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पर्व विशेष : | तदनुसार 14 जून 2026

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कोटा चित्र शैली में श्री राम का चित्रण

कोटा चित्र शैली में श्री राम का चित्रण


भगवान श्रीराम का चरित्र केवल ग्रन्थों का विषय नहीं है, अपितु यह भारत की कला, और संस्कृति के कण कण में समाहित है। डॉ मुक्ति पाराशर जी द्वारा रचित यह आलेख राजस्थान की प्रसिद्ध कोटा चित्र शैली में श्रीराम के विविध प्रसंगों का अत्यन्त सुन्दर, और कलात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। अहिल्या उद्धार से लेकर राम दरबार की भव्यता तक, यह लेख स्पष्ट करता है कि तत्कालीन चित्रकारों ने अपनी तूलिका से केवल रंग नहीं भरे, अपितु एकात्मता, समरसता और भक्ति की उस अमर भावना को उकेरा जो आज भी सम्पूर्ण जनमानस को एक सूत में बांधे हुए है।


आदौ रामतपोवनादि गमनं हत्वा मृगं काञ्चनम्। 
वैदेही हरणं जटायु मरणं सुग्रीवसम्भाषणम्।।
बालीनिर्दलनं समुद्रतरणं लंका पुरीदाहनम्।
पश्चाद्रावण कुम्भकर्णहननम् एतद्धि रामायणम्।।

भगवान राम एक ऐसे चरित्र हैं, जो जीवन की विषम परिस्थितियों में भी नीति सम्मत रहे। उन्होंने वेदों, और मर्यादा का पालन करते हुए सुखी राज्य की स्थापना की। स्वयं की भावनाओं, और सुखों को त्याग कर सत्य, और न्याय का साथ दिया। उनसे हमें अनेक गुण सीखने को मिलते हैं। जैसे सभी से हंसते मुस्कुराते मिलना, दूसरों की बातों को ध्यान, और धैर्य से सुनना, लोगों के प्रति सच्ची निष्ठा रखना, दूसरे व्यक्तियों को सम्मान देना, दूसरे के विचारों, और भावनाओं के प्रति सच्ची सहानुभूति रखना, तथा अपनी त्रुटि को शीघ्र स्वीकार करना। ऐसे अनेक गुण हैं जो हमें श्रीराम के भीतर ही मिलते हैं।

कोटा चित्रशैली में उकेरे गए रामायण के प्रसंग
कोटा चित्रशैली में उकेरे गए रामायण के प्रसंग

कोटा चित्र शैली में भगवान श्रीकृष्ण से सम्बन्धित चित्र तो मिलते ही हैं, इनके अतिरिक्त इस चित्र शैली में श्रीराम के जीवन पर भी विपुल चित्रण हुआ है। कोटा के कला प्रेमी शासक राव रामसिंह के समय का एक प्रमुख चित्र है जो कोटा कलम के विकास को दर्शाता है। इसमें अत्याचारी शासक रावण, और उसकी दानवी सेना का संहार करते श्रीराम लक्ष्मण, एवं वानरों तथा भालुओं की सेना को दर्शाया गया है।


नृत्य करते श्रीकृष्ण और गोपियाँ 

इस चित्र को कोटा कलम में दक्ष चितेरे ने कागज पर उकेरा है। इसमें नारंगी, सफेद, और पीले रंग की प्रधानता है। रथों को पीले रंग से बनाया गया है। चित्र संयोजन की दृष्टि से अत्यन्त उत्कृष्ट है, और इसमें लय तथा गति का अद्भुत सामंजस्य दिखाई देता है।कोटा गढ़ पैलेस की भित्तियों के आलों में श्रीराम के जीवन की घटनाओं को भी चित्रित किया गया है।

इन भित्ति चित्रों में श्रीराम, लक्ष्मण, भरत, और शत्रुघ्न का अंकन है। इस चित्र में चारों भाइयों को सफेद धोती, और पीले रंग का ऊपरी वस्त्र पहने हुए दर्शाया गया है, एवं चारों के हाथों में धनुष है। पृष्ठभूमि को दो भागों में विभक्त किया गया है। ऊपरी भाग में हल्का नीला आकाश है, और निचले भाग में हरे रंग का घास का मैदान है। चारों के केश कटे हुए हैं। यद्यपि समय के साथ इन चित्रों के रंग कुछ हल्के हो गए हैं, परन्तु इनकी आभा आज भी पूर्णतः जीवन्त है।

एक अन्य चित्र में श्रीराम, लक्ष्मण, महर्षि विश्वामित्र, और अहिल्या को दर्शाया गया है। पृष्ठभूमि में हरे भरे पेड़ पौधे, पहाड़, और नदी बनाई गई है। यह घटना उस समय से सम्बन्धित है जब श्रीराम, और लक्ष्मण महर्षि विश्वामित्र के साथ मिथिलापुरी के वन उपवन देखने के लिए निकले थे। वहां उन्होंने महर्षि गौतम का एक निर्जन आश्रम देखा।

इन्द्र के छल के कारण महर्षि गौतम ने अपनी पत्नी अहिल्या को पाषाण बन जाने का शाप दिया था। कालान्तर में श्रीराम के चरण स्पर्श से वे पुनः स्त्री रूप में प्रकट हुईं। इसी पावन प्रसंग को इस चित्र में दर्शाया गया है, जिसमें अहिल्या श्रीराम को झुककर प्रणाम कर रही हैं। चित्र का संयोजन अत्यन्त सुन्दर है।

एक भित्ति चित्र में सीता हरण के उपरान्त श्रीराम, और हनुमान जी के प्रथम मिलन को अत्यन्त सुन्दर रूप में उकेरा गया है। इसमें हनुमान जी श्रीराम के चरणों में हाथ जोड़े हुए दर्शाए गए हैं। एक अन्य चित्र में हनुमान जी, और सम्पाती (जटायु के भाई) का अंकन है। जब जाम्बवन्त, अंगद, और हनुमान जी माता सीता की खोज कर रहे थे, तब उनकी भेंट पंखहीन विशालकाय पक्षी सम्पाती से हुई।

जाम्बवन्त से श्रीराम की व्यथा सुनकर वह अत्यन्त दुखी हुआ। सम्पाती के पुत्र सुपार्श्व ने माता सीता को ले जाते हुए देखा था, और रावण को रोकने का प्रयास भी किया था। मुनि के आशीर्वाद से वानरों के दर्शन पाकर सम्पाती को पुनः पंख प्राप्त हुए, और उसने दूर दृष्टि से लंकापुरी का मार्ग बताया। इस कथा को चित्र में अत्यन्त जीवन्त रूप में प्रस्तुत किया गया है।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस में लिखा है-

"राजत राम सहित भामिनी। मेरु शृंग जनु घन दामिनी।।
रुचिर बिमानु चलेउ अति आतुर। कीन्ही सुमन वृष्टि हरषे सुर।।"

अर्थात् पत्नी सहित श्रीराम ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो सुमेरु पर्वत के शिखर पर बिजली सहित श्याम मेघ हों। सुन्दर विमान बड़ी शीघ्रता से चला, देवता हर्षित हुए, और उन्होंने फूलों की वर्षा की। इसी से सम्बन्धित एक अत्यन्त सुन्दर चित्र है, जिसमें पीली, और हरी पृष्ठभूमि पर चार सफेद हंसों द्वारा खींचे जाते हुए पुष्पक विमान को दर्शाया गया है। इस पर श्रीराम, और माता सीता विराजमान हैं। सीता जी के पीछे हनुमान जी, और श्रीराम के पीछे लक्ष्मण जी खड़े हैं।

रामदरबार- कोटा चित्रशैली
रामदरबार- कोटा चित्रशैली 

झालावाड़ में एक भित्ति चित्र अत्यन्त मनमोहक है, जिसमें लव कुश को अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा पकड़ते, और सैनिकों से युद्ध करते हुए दर्शाया गया है। चित्र में प्राकृतिक छटा अत्यन्त सुन्दर चित्रित है। पृष्ठभूमि में माता सीता को झोपड़ी में बैठे हुए चित्रित किया गया है, और अग्रभूमि में जल के भीतर श्वेत कमल खिले हैं। माता सीता का मुखमण्डल पूर्णतः कोटा शैली में शिल्पित है।

कोटा गढ़ पैलेस की भित्ति पर एक 'राम दरबार' का चित्र भी है। इसमें श्रीराम, और माता सीता राजसी वेशभूषा, तथा आभूषण पहने हुए सिंहासन पर आसीन हैं। उनके चरणों में हनुमान जी विराजमान हैं। सिंहासन के समीप भगवान शिव, ब्रह्मा जी, गणेश जी, और देवर्षि नारद खड़े हैं। दोनों ओर भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न के साथ गुरु वशिष्ठ भी उपस्थित हैं। यह चित्र संयोजन अत्यन्त भव्य प्रतीत होता है।

अतः कोटा गढ़ पैलेस के इन भित्ति चित्रों में लोकोत्सव, और परम्परागत स्वरूप का अद्भुत चित्रण है। इन परम्पराओं की नींव केवल ऐतिहासिक न होकर हमारे लोक संस्कारों में गहराई से निहित है, जिन्हें तीज, गणगौर, दशहरा, और दीपावली जैसे पर्वों ने निरन्तर सहेजा है।

-डॉ० मुक्ति पाराशर
(लेखिका प्रतिष्ठित शिक्षाविद्, चित्रकला विभागाध्यक्ष एवं कला मर्मज्ञ हैं, जो अपने शोधपरक अनुभवों से भारतीय कला, संस्कृति और शैक्षणिक विमर्शों के क्षेत्र में निरंतर योगदान कर रही हैं।)

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