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दक्षिण कोसल: रामायणकालीन विरासत की जीवित धरोहर

दक्षिण कोसल: रामायणकालीन विरासत की जीवित धरोहर

सृष्टि के सृजन में बहुत से देशों और  प्रदेशों का सृजन  और विनाश होता रहा लेकिन कुछ क्षेत्र ऐसे भी है जो यथावत खड़े हुए हैं और अलग-अलग युग और काल में होने वाले परिवर्तनों का  इतिहास अपने में समाहित किये हुए हैं । इन क्षेत्रों के गर्भ में छिपे इतिहास समय के साथ हुए परिवर्तनों की व्याख्या करते हुए वर्त्तमान के साथ कदम ताल करते रहते है और विकास के नए आयाम गढ़ते रहते हैं।

ऐसा ही एक प्रदेश है “छत्तीसगढ़” जो  भारत के ह्रदय स्थल  में बसा है और हमारी गौरवशाली संस्कृति के अमूल्य ऐतिहासक पन्नो को स्वयं में सहेजे हुए है । अपने प्राकृतिक सौंदर्य के अलावा अन्य बहुत सी ऐसी उपलब्धियां छत्तीसगढ़ ने पायीं हैं जिसके कारण यह राज्य  भारत भूमि को वैश्विक पटल पर प्रसिद्धी दिलाने में अहम् भूमिका निभाता है लेकिन आज भी यह तथ्य अल्पज्ञ है कि प्राचीन समय में यह प्रदेश दक्षिण कोसल के नाम से विख्यात था । हालाँकि कालांतर में इसके नामों में और भी परिवर्तन हुए परन्तु फिर भी दक्षिण कोसल विशेष है क्योंकि यह हमारा सम्बन्ध सीधे प्रभु श्री राम से जोड़ता है।

प्राचीन समय में कोसल एक समृद्ध और विस्तृत क्षेत्र था जिसकी गरिमा आज पर्यंत  यथावत बनी हुई है। इसके भोगोलिक विस्तार का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है की यह उत्तर कोसल और दक्षिण कोसल के नाम से शासित था । जहाँ उत्तर कोसल में सूर्यवंशी रघुकुल का शासन था वही दक्षिण कोसल में भानुमंत नाम के राजा की सत्ता विधमान थी। इन्हीं भानुमंत की संतानों में से उनकी एक पुत्री थीं कौशल्या जिनका विवाह उत्तर कोसल के राजा रघुकुलवंशी दशरथ से हुआ और इस तरह दक्षिण कोसल भगवान राम का ननिहाल हुआ ।

फिर एक और कड़ी है जिसके कारण प्रभु के सम्बन्ध यहाँ से और अधिक प्रगाढ़ हुए वो था उनकी बड़ी बहन का विवाह। श्री राम की बड़ी बहन जिनका नाम शांता था उन्हें उनकी मौसी, जिनका विवाह अंग देश के शासक रोमपाद से हुआ था, ने गोद लिया था । शांता के पिता रोमपाद ने सिहावा क्षेत्र (वर्त्तमान धमतरी के निकट ) में रहने वाले श्रृंगी ऋषि से शांता का विवाह करवाया और इस वैवाहिक सम्बन्ध के जुड़ने से दक्षिण कोसल  प्रभु राम की  बहन का ससुराल हो गया । इस तरह प्रभु राम जन्म से ही अपने पारिवारिक संबंधो के कारण दक्षिण कोसल से जुड़े हुए थे परन्तु यह सम्बन्ध  तब और प्रगाढ़ हुआ जब युवराज राम ने मर्यादा पुरषोत्तम राम बनाने की यात्रा वनवास के रूप में आरम्भ की ।
 


श्रृंगी ऋषि आश्रम- सिहावा (धमतरी)

वनवास के कुल चौदह वर्षों में से बारह वर्ष इसी दक्षिण कोसल के आरण्यक क्षेत्र में बिताये जिसे दण्डकरण्य के नाम से जाना गया और जिसका उल्लेख गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरित मानस में भी मिलता है । बस्तर और उसके सीमावर्ती क्षेत्र ही “दण्डकारण्य” कहलाते थे । बस्तर के वनकांतार, पर्वत श्रृखंलाएँ, नदी अपवाहतंत्र, यहाँ शोधों से प्राप्त जनजातिगत साम्यताएँ प्रमाणित करती है, कि दण्डकारण्य वह क्षेत्र था जहाँ रहकर राम ने धरती से असुरता के समूल नाश का सूत्रपात किया था। रामवन प्रवास की सार्थकता का संबंध जिस वन से मुख्यतम रूप में रहा वह दण्डकारण्य ही है।


प्रभु राम की दक्षिण कोसल यात्रा

रामायण में वर्णित मधुमन्त क्षेत्र  दंडक राज्य की राजधानी कुम्भावती से साम्यता रखता है जहाँ  के राजा दंडक के अपने गुरु शुक्राचार्य के बेटी पर कुदृष्टि डालने के कारण श्रापग्रस्त हो गया और यहाँ का इतिहास अंधकारमय हो गया । दण्डकारण्य से सम्बंधित अनेक कथाएं रामायण में मिलती हैं । आज भी NH-30 मार्ग पर बस्तर ग्राम के समीप मधोता नाम से स्थित मधुमन्त प्राचीन काल के इतिहास को समेटे आवश्यक पुरातात्विक उत्खनन की प्रतीक्षा कर रहा है जिससे इसका प्राचीन वैभव पुनर्जीवित हो सके । इसी भूमि पर  माता शबरी जो भील समुदाय की बेटी थी के प्रेम से आल्हादित होकर प्रभु ने सबसे पहले नवधा भक्ति का रहस्य बताया, यहीं खर और दूषण जो महाबली राक्षस और रावण के सौतेले भाई थे उनका वध कर जनजातीय समुदाय को निशाचरों के आतंक से मुक्ति दिलाई, इसी सूची में मारीच और सुबाहु को भी यमलोक पंहुचा कर प्रभु ने इस क्षेत्र को भय और आतंक से मुक्ति दिलाई ।


शिवरीनारायण धाम

राम तत्त्व के मूल्य और गुण आज भी यहाँ विधमान हैं  मुख्य रूप से बस्तर क्षेत्र का कण-कण इस सत्य का प्रतिध्वनित करता है। बस्तर क्षेत्र में स्थित शबरी नदी, राममेंटा, रामाराम, रामगिरिपर्वत, नारायणपुर तहसील स्थित कोसलनार, लखनपुरी, सीतानगर, रावणग्राम आदि रामायणकालीन स्थल स्थित है। शिवरीनारायण, जहाँ  मतंग ऋषि ने शबरी को अपने आश्रम में शरण और राम की भक्ति प्रदान की, कंक ऋषि जिनके नाम पर कांकेर शहर का नाम पड़ा, सप्तऋषि आश्रम और तुरतुरिया (बलौदाबाजार) वाल्मीकि आश्रम ऐसे अनेक प्रमाण उपलब्ध हैं जो प्रमाणित करते हैं की यहाँ पर रघुकुल के शिरोधार्य के पदपंकज निश्चित रूप से पड़े थे ।

स्कंदपुराण में भी वर्णित है की यहाँ धर्मज्ञ राम ने बारह वर्ष निवास किया और सुखधाम श्री राम के चरणों के प्रताप से यहाँ 108 तीर्थ बन गए । सिहावा में एक रक्सा पहाड़ भी है जिसे राक्षसों की हड्डियों का पर्वत कहा जाता है । आपको यह रक्सा पहाड़ उसी कथा की याद  दिलायेगा  जो रामायण काल से जुड़ी है अब हम इसे आश्चर्य की बात कहें या प्रतिपुष्टि का विषय, कि इन पत्थरों पर आग लगाने से हड्डियों के  जलने की दुर्गन्ध आती है । यदि हम अपने आस-पास सजग दृष्टि डालें तो ऐसे कितने ही  रामायणकालीन प्रमाण हमें बिना परिश्रम के प्राप्त हो जायेंगे क्योंकि यह क्षेत्र निश्चित ही  रामायणकल से जुड़ा हुआ है ।

श्री राम से हमारे इस अनूठे बंधन का एक और स्वरुप विद्यमान है जिसे रामनामी सम्प्रदाय के नाम से जाना जाता है । इनका संकेन्द्रण मुख्यतः जांजगीर चाम्पा जिले में है । राम जी के आदर्शो और जीवन मूल्यों  का यह समुदाय पूर्णतः  पालन करता नज़र आता है । इस समुदाय में  वर्ण और जाति जैसी व्यवस्थाओं का अभाव दिखलाई पड़ता है जिसमें कोई गुरु-शिष्य नहीं, कोई छोटा–बड़ा नहीं है। कोई मूर्ती, मंदिर, देवी-देवता, कर्म कांड नहीं है। न स्वर्ग है न नर्क है न मोक्ष है केवल नाम का स्मरण है बस उसी में रमना है।

जब हमने इस  बात के पर्याप्त प्रमाण प्राप्त कर लिए कि रामलला का हमारे क्षेत्र से गहरा नाता है  तब दक्षिण कोसल अर्थात वर्त्तमान छत्तीसगढ़ के पचहत्तर स्थलों को रामवन गमन पथ  के रूप में मान्यता प्रदान की गई जिसमे प्रदेश के लगभग सभी संभागों  सरगुजा, बिलासपुर, रायपुर और बस्तर संभाग के अंतर्गत आने वाले स्थल सम्मिलित हैं जो कोरिया के हरचौका से प्रारंभ होकर सुकमा जिले के रामाराम तक जाता है । इस प्रकार रामवन गमन पथ की लम्बाई 2226 किमी०है जो हमारे सौभाग्य का सूचक है कि प्रभु श्री राम के चरण कमलों ने हमारे क्षेत्र में इतनी लम्बी पदयात्रा की।


रामवनगमन पथ में छत्तीसगढ़ (दक्षिण कोसल ) के चयनित स्थल 

दक्षिण कोसल और रामायण का यह अविच्छिन्न संबंध न केवल भौगोलिक साक्ष्यों पुरातात्विक स्थलों और लोक-स्मृतियों में विद्यमान है, बल्कि यह हमारी सामाजिक चेतना, आस्था और सांस्कृतिक पहचान में भी गहराई से परिलक्षित होता है। प्रभु श्री राम की चरण-धूलि से पावन हुई यह धरती आज भी उसी आदर्श, मर्यादा और करुणा का संचार करती है जो रामत्व का मूल है। दण्डकारण्य के विराट वनप्रदेश से लेकर शबरी की सरल भक्ति, श्रृंगी ऋषि का तप, वाल्मीकि आश्रम की दिव्यता और रामनामी समुदाय की निरंतर साधना तक, दक्षिण कोसल का प्रत्येक अंचल इस दिव्य परंपरा का जीवित प्रमाण है।

जब हम रामवनगमन पथ के इन पवित्र स्थलचिह्नों का स्मरण करते हैं, तब स्पष्ट होता है कि हमारा छत्तीसगढ़ केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के उस शाश्वत आयाम का वाहक है जिसने रामायण को जीवित रखा है। यही कारण है कि यह भूमि आज भी उतनी ही तेजस्विनी, उतनी ही पावन और उतनी ही सांस्कृतिक रूप से समृद्ध है, जितनी वह त्रेतायुग में रही होगी।

लेख-
श्रीमती सोनल बाजपेयी

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