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रैबारी के रीति रिवाज एवं परम्पराएँ

रैबारी के रीति रिवाज एवं परम्पराएँ

रीति-रिवाज और परम्पराएँ प्रत्येक समाज की संस्कृति व सभ्यता के संवाहक होते हैं। सामाजिक प्राणी होने के कारण मनुष्य को समाज द्वारा बनाए गए कुछ नियमों का पालन करना आवश्यक होता है, जिससे उसका जीवन सुव्यवस्थित तरीके से व्यतीत हो सके। समाज द्वारा व्यक्ति के हितार्थ बनाए गए नियम ही परम्पराओं का स्वरूप ग्रहण कर लोक जीवन का अभिन्न अंग बन जाते हैं और यही आगे चलकर लोक संस्कृति का प्रतीक बनकर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित होते हैं। लोक समय की माँग के अनुसार इनमें परिवर्तन अवश्य करता आया है। घुमन्तू जाति की परम्पराएँ कब और किस देश-काल में निर्मित हुई होंगी, यह प्रश्न समय के गर्त में छिपा है, किन्तु वर्तमान में रैबारी समाज की रीति-रिवाज और परम्पराएँ सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध हैं, जो इनकी सतरंगी जीवन शैली की अभिव्यक्ति हैं।

आधुनिक सभ्यता से दूर, शिक्षा से वंचित, घुमन्तू और अभावग्रस्त जीवन जीने वाली रैबारी जाति के रीति-रिवाज और परम्पराएँ इनकी सांस्कृतिक सम्पन्नता की प्रतीक हैं। इन परम्पराओं का कोई लिखित रूप नहीं है। यह अपनी मौखिक परम्परा में अनन्तकाल से चली आ रही हैं। रैबारी परम्पराएँ प्रेम, दया, करुणा, सामाजिक सौहार्द्र आदि का अक्षय कोश है। इनमें समन्वय का गुण निहित है। घुमन्तू जीवन होने के कारण अनेक स्थानों के नदी, नाले, वन, कन्दराएँ, ऊँचे-ऊँचे पहाड़, मरू और उपजाऊ भूमि रैबारी जाति की परम्पराओं को सदियों से पल्लवित एवं पुष्पित करती आई है।

जन्म, विवाह, मृत्यु और प्रत्येक मांगलिक अवसर पर रैबारी समाज कथा, गीत, नृत्य, वादन द्वारा अपनी परम्परा की अभिव्यक्ति करता आया है। महिला के गर्भधारण से लेकर नवशिशु के जन्म लेने तक अनेक प्रकार की परम्पराओं का निर्वहन रैबारी लोगों द्वारा किया जाता है। पहली संतान बलशाली और हृष्ट-पुष्ट हो, इसके लिए महिला का प्रथम प्रसव उसके मायके में किये जाने की परम्परा रैबारी समाज में प्रचलित है, जिसका पालन आज भी रैबारी लोगों द्वारा किया जा रहा है।

raibari samaj me vivah
रैबारी समाज में विवाह

गर्भधारण के साँतवें गा नौवें महीने में महिला की गोद भराई की जाती है। देवी-देवताओं से स्वस्थ शिशु की कामना कर परिवार के लोग गर्भवती महिला की गोद में फल, मेवे, मिष्ठान आदि रखते हैं। सम्पूर्ण विधि-विधान पूर्ण कर महिला को उसके मायके भेज दिया जाता है। महिला के मायके जाने और नवशिशु को जन्म देने के पश्चात् दो से तीन माह तक महिला अपने मायके में रहती है। इसके पश्चात् महिला के मायके वाले उत्सव का आयोजन करते हैं, जिसमें ससुराल पक्ष के लोगों को भी आमंत्रित किया जाता है। इस अवसर पर महिला के मायके वाले वर पक्ष से उपस्थित लोगों को यथाशक्ति उपहार भी देते हैं। खासकर ननद और बुआ को। कार्यक्रम में प्रसुति महिला व बच्चे को एक निश्चित स्थान पर बैठाया जाता है। सम्पूर्ण परिवार के सदस्य महिला व बच्चे को अपनी-अपनी ओर से पैसे, गहनें, कपड़े, खिलौनें आदि भेंट करते हैं। उपस्थित महिलाएँ गीत गाकर परिवार वालों को बधाइयाँ प्रेषित करती हैं। सम्पूर्ण वातावरण आनन्द व खुशियों से खिल उठता है। इस अवसर पर भोज्य पदार्थों का आयोजन वधू पक्ष के लोगों द्वारा किया जाता है।

raibari samaj me vivah
कन्या दान, रैबारी समाज

नवप्रसूता महिला जब बच्चे को लेकर अपने ससुराल जाती है, तब ससुराल वाले भी कुलदेवी की पूजा-पाठ करवाते हैं व आने वाली पहली होली पर सभी रिश्तेदारों को आमंत्रित करते हैं। इस अवसर पर मामा की ओर से कपड़े भेंट किये जाने की परम्परा रैबारी जाति में प्रचलित है। ऐसा माना जाता है कि मामा अगर भान्जे को कुछ भेंट करे तो उसे बड़ा पुण्य मिलता है। लोक मान्यता तो यह भी है कि एक भान्जे को भोजन कराना सौ ब्राह्मणों को भोजन कराने के समान है।

रैबारी लोगों का अपने देवी-देवताओं में अटूट विश्वास है, जिसके चलते रैबारी चामुण्डा, जगदम्बा, मुण्डारा आदि देवियों के साथ भोलेनाथ, रामदेवजी की पूजा विशेष श्रद्धा, भक्ति व आस्था के साथ करते हैं। विवाह के बाद अधिक समय तक संतान न होने पर रैबारी लोग अपनी कुलदेवी से संतान प्राप्ति हेतु मन्नत भी लेते हैं। मन्नत कैसी और किस चीज की ली जाए इसका निर्धारण मन्त्रतधारी व्यक्ति स्वयं करता है। संतान प्राप्ति होने पर उस मनत को पूर्ण करना आवश्यक होता है। रैबारी लोगों की मान्यता है कि अगर मन्नत पूर्ण न की जाए तो कुल देवी नाराज होंगी और उसका अनिष्ट करेंगी।

chamunda mata mandir, rajasthan
चामुंडा माता मंदिर, राजस्थान

इस हतु भी मन्नत पूर्ण करना आवश्यक होता है। निम्न आर्थिक स्थिति होने के कारण रैबारी लोग अपनी परम्पराओं को पूर्ण करने हेतु अपने द्वारा पालित पशुओं (गाडर, ऊँट, बकरी) का विक्रय करते हैं, ताकि उनकी परम्पराएँ एवं रीति-रिवाज पूरे विधि-विधान से व निर्विघ्न सम्पन्न हो सके।

रैबारी जाति की वैवाहिक परम्पराएँ बड़ी रोचक व भावपूर्ण हैं, जो उनके परस्पर स्नेह और एकता को दर्शाती हैं। वर्तमान में जहाँ लोग अपने परिवारजनों से सम्बंध तोड़ एकांगी जीवन जीना पसंद करते हैं, वहीं रैबारी जाति के लोग आज भी अपनी पुरातन परम्पराओं द्वारा सामूहिक जीवन जीने व अपने संबंधियों से घनिष्ठ संबंध बनाए हुए हैं। यहाँ विवाह एकांगी न होकर संयुक्त रूप में होते हैं। सम्पूर्ण परिवार (काका-काकी, चाचा-चाची, मामा-मामी) में विवाह योग्य बच्चों का सामूहिक विवाह करने की परम्परा है। रैबारी समाज में अनेक दूल्हा-दुल्हन एक साथ ब्याह दिये जाते हैं, सभी की सहमति से विवाह हेतु एक निश्चित स्थान निर्धारित किया जाता है। जहाँ सम्पूर्ण परिवार एकत्रित होता है, रैबारी समाज में विवाह एक दिन का न होकर पाँच से सात दिन तक चलता है।

rajasthan ki samuhik vivah
सामूहिक विवाह, राजस्थान

महंगाई के इस बढ़ते दौर में भी वन-कन्दराओं और पर्वतों के बीच जीवन व्यतीत करने वाले रैबारी लोग बिना किसी व्यय की चिंता के अपनी परम्पराओं को निभा रहे हैं। विवाह में प्रत्येक दिन-रात में बाना निकाला जाता है। जिसमें नाच-गाना होता है, दूल्हा-दुल्हन व परिवार के लोगों के नाम ले-लेकर कई प्रकार के गीत गाये जाते हैं, नृत्य किया जाता है। हास-परिहास से निर्मित सुमधुर वातावरण सभी को आनंदित करता है। इन परम्पराओं में रैबारी संस्कृति प्रदर्शित होती है। विवाह में दूल्हा-दुल्हन व परिवार के लोग परम्परागत गहनें और आभूषण धारण करते हैं, जिनमें महिलाएँ चूड़ी, (लकारा) होनार, झुमका, कड़े आदि पहनती है तो पुरुष सिर पर पगड़ी, हाथ में कड़ा, कान में बाली, अँगूठी आदि पहनता है। विवाह अवसर पर वधू को आभूषण, बर्तन आदि दिये जाने की परम्परा है।

गौ-दान सबसे बड़ा दान माना जाता है। रैबरी लोग आज भी इसे महत्त्व देते हैं। विवाह में मामा द्वारा गाय का दान दिया जाता है। कुछ रैबारी विवाह में गाडरों का भी दान करते हैं। विवाह के अवसर पर कुल देवी/देवता की पूजा करने का विशेष ध्यान रखा जाता है, ताकि देवी-देवताओं की कृपा दूल्हा-दुल्हन पर बनी रहे और उनके जीवन में सुख-शांति व समृद्धि का भण्डार रहे।

गौ दान
गौ दान

अन्य समाज की तरह रैबारी समाज में भी मृत्यु होने पर कई प्रकार के अनुष्ठान किये जाने की परम्परा है, जिससे कि मृतक व्यक्ति की आत्मा को शांति प्राप्त हो सके। मृत्यु संस्कार में मृतक व्यक्ति के शरीर को जलाएँ जाने की परम्परा है, किन्तु अगर किसी बच्चे की मृत्यु हो जाए तो उसके शरीर को दफनाया जाता है। घुमन्तू जीवन होने के कारण अगर किसी व्यक्ति की रास्ते में आकस्मिक मृत्यु हो जाए तो उस व्यक्ति के शरीर को अपने निवास स्थान पर न ले जाकर भ्रमण स्थान के आसपास के लोगों की अनुमति से दफना दिया जाता है। बाद में नियत स्थान पर पहुँचकर दशवाँ और बारहवाँ किया जाता है, जिसमें परिवार के लोग एकत्रित होकर मृतक परिवार के दुःख में शामिल होकर उनको साहस और धैर्य का सम्बल प्रदान करते हैं, जिससे दुःखी परिवार को दुःख सहने की शक्ति प्राप्त होती है।

इस तरह रैबारी परम्पराएँ सम्पूर्ण समाज को एकता के सूत्र में बाँधने का सेतु हैं। कई अंचल की संस्कृक्तियों का समागम इनकी परम्पराओं में देखने को मिलता है। गोदने की परम्परा भी अन्य समाजों की तरह रैबारी समाज में प्रचलित है, जिसमें रैबारी लोग अपने शरीर पर भाई-बहन, माँ, देवी-देवताओं आदि के नाम गुदवाते हैं। देखा जाए तो रैबारी परम्पराएँ अनेकता से भरे देश में एकता के भावों को जाग्रत करने का महत्वपूर्ण दायित्व निभा रही है।

रैबारी जाति के रीति-रिवाज एवं परम्पराएँ अनोखी एवं समृद्ध है। घुमन्तू रैबारी जाति पशुओं एवं भेड़ों की वृद्धि में सहायक होकर संस्कृक्ति को भी समृद्ध किया है। रैबारी जाति की संस्कृति, रीति-रिवाज एवं परम्पराओं को संरक्षित करने की आवश्यकता है, क्योंकि इनके रीति-रिवाज एवं परम्पराएँ परोपकार की भावनाओं से ओत-प्रोत है।

लेख -
प्रो. ज्योति बर्फा

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