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हमारे सांस्कृतिक प्रतीक-स्वस्तिक और मंगल कलश

हमारे सांस्कृतिक प्रतीक-स्वस्तिक और मंगल कलश

भावनाओं को प्रतीकों के माध्यम से अभिव्यक्त करने की परंपरा प्राचीन है। भारत में भी विभिन्न अवसरों पर प्रतीकों का प्रयोग होता है। चाहे विवाह का मंगलपर्व हो अथवा जन्म या यज्ञोपवीत का शुभ अवसर हो। चाहे दीपावली, दशहरा, होली जैसे सांस्कृतिक उत्सव हों अथवा घर में वैसे ही किसी शुभ कार्य का आयोजन।

जन्म या विवाह के अवसर पर घर के दरवाजे पर बंधी हुई बंदनवार, विभिन्न मांगलिक अवसरों पर घर के अंदर व बाहर बनी हुई विविध अल्पनाएं, पूजा के समय दीवाल या जमीन पर बने हुए विविध स्वस्तिक चिह्न, चौक के ऊपर रखा हुआ सुसज्जित कलश, कलश के ऊपर आम के पत्ते और ऊपर रखा हुआ नारियल या दीपक । यह सब हमारे सांस्कृतिक प्रतीक ही हैं।

अर्धनारीश्वर, कमल, जगलक्ष्मी, बटराज, सरस्वती, दीपशिखा सभी विभिन्न भावों को व्यक्त करने वाले प्रतीक चिह्न हैं। इन प्रतीकों का अपना विशिष्ट अर्थ है। इनका अपना इतिहास भी है।

दीपावली हमारा सांस्कृतिक पर्व है। इस अवसर पर भारतीय हिंदू परिवार विविध रूप में अपने घर को सजाता संवारता है और अनेक विधि विधान से गणेश-लक्ष्मी का पूजन करता है। सारा घर दीपों की पंक्तियों से जगमगा उठता है।

ऐसा कहा जाता है कि जिसका घर सबसे साफ-सुधरा होगा, सजा-सजाया होगा और जो प्रकाशित होगा, उसी घर में लक्ष्मी का पदार्पण होगा। लक्ष्मी सुख संपत्ति की अधिष्ठात्री मानी जाती है। इसी भावना से प्रेरित होकर लोग कई दिन पहले से ही घर की सफाई प्रारंभ कर दीपावली की तैयारी करते हैं।

दीपावली के अवसर पर घर की आनुष्ठानिक साज सजा में मंगलकलश तथा स्वस्तिक का विशेष महत्व है। ये हमारे सांस्कृतिक प्रतीक हैं और इनका प्रयोग भारत में शुभ कार्य के साथ शताब्दियों से होता आ रहा है। आइए आज दीपावली के अवसर पर इनके स्वरूप और अर्थ पर संक्षेप में विचार करें।

स्वस्तिक

 

 

भारतीय प्रतीक चिह्नों में स्वस्तिक का महत्व संभवतः सबसे अधिक है। यही कारण है कि हर मंगल पर्व पर स्वस्तिक चिह्न बनाया जाता है। कभी यह दीवाल पर बनाया जाता है तो कभी धरती पर, कभी अन्य वस्तुओं पर। स्वस्तिक मंगल चिह्न है और हर शुभ कार्य में इसका प्रयोग होता है। स्वस्तिक का मूल "सु-अस" है। सु का अर्थ है अच्छा, कल्याण अथवा मंगल। अस् का अर्थ है अस्तित्व अर्थात् सत्ता। इस प्रकार स्वस्तिक का अर्थ है कल्याणकारी। स्वस्तिक की भावनाएं हैं- कल्याण हो।

आपने अनेक मंगल अवसरों पर निम्न मंत्र पाठ सुना होगा :-

"स्वस्ति न इंद्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्वेदाः स्वस्ति नस्तार्थ्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु "

इसका अर्थ है: महायशस्वी इंद्र हमारा कल्याण करें, विश्व का ज्ञान रखने वाला पूषा हमारे लिए कल्याणप्रद हो,

 जिसके पक्ष कभी नष्ट नहीं होते, ऐसा गरूड़ हमारा मंगल करे और बृहस्पति हमारे कल्याण को परिपुष्ट करें।

इस मंत्र के प्रत्येक चरण में 'स्वस्ति' का प्रयोग हुआ है। स्वस्ति कल्याण वाची है। स्वस्ति अर्थात् कल्याण करने वाले को ही स्वस्तिक कहा जाता है।

स्वस्तिक कई रूपों में बनाया जाता है। स्वस्तिक का प्रतीक धन का चिह्न है जो एक खड़ी रेखा और उसके ऊपर एक आड़ी रेखा खींचकर बनाया जाता है। खड़ी रेखा ज्योतिर्लिंग का प्रतीक है। ज्योतिर्लिंग विश्वोत्पत्ति का मूल कारण है जो खड़ी रेखा से बनाया जाता है। आड़ी रेख सृष्टि का विस्तार बताती है। इस सृष्टि का निर्माण ईश्वर ने किया और सब देवताओं ने अपनी-अपनी शक्ति का योग देकर इसका विस्तार किया। यही स्वस्तिक का भाव है।

स्वस्तिक का प्रयोग विश्वव्यापी है और विभिन्न रूपों में इसका प्रयोग विश्व की विभिन्न संस्कृतियों में होता रहा है। कहीं यह धन का चिहन है तो कहीं गुणन का। स्वस्तिक की चार भुजाएं हैं जो चार दिशाओं की द्योतक हैं। चारों रेखाओं के अंत पर बनी हुई चार लघु रेखाएं जीवन की गतिशीलता की प्रमाण हैं। स्वस्तिक की चार भुजाओं को कहीं विष्णु की चार भुजाएं कहा गया है तो कहीं भारतीय हिंदू धर्मशास्त्र में गणपति का प्रतीक माना गया है।

हिंदुओं के समान बौद्धों और जैनों ने भी स्वस्तिक चिह्न को पूज्य माना है और इनकी विभिन्न प्रकार से व्याख्या की गई है। मिस्र, सीरिया, योरप आदि संस्कृतियों में इसे प्रजनन शक्ति का और भारत चीन में इसे सृजन का, शाश्वत जीवन के प्रतीक के साथ ही शाश्वत मंगल का द्योतक भी माना गया है। भारत में स्वस्तिक का पूजन अनेक मंगल पवों पर होता है और अनेक रूपों में यह बनाया जाता है।

आपके संदर्भ के लिए स्वस्तिक चिह्न के विभिन्न रूप साथ में दिए जा रहे हैं जिनका विभिन्न धार्मिक अथवा सांस्कृतिक अवसरों पर आनुष्ठानिक मांगलिक सज्जा के लिए प्रयोग होता है।

 

 

 मंगलकलश

 

 

भारत में विभिन्न मांगलिक अवसरों पर कलश का विशेष महत्व है। यही कारण है कि कलश को मंगलकलश भी कहा जाता है। चाहे जन्म हो या यज्ञोपवीत का अवसर हो, चाहे विवाह का शुभ मुहूर्त, चाहे दिपावली  पूजन हो, सभी अवसरों पर कलश का प्रयोग देखा जा सकता है। कहीं कलश का पूजन होता है तो कहीं  कलश घर की सजावट का प्रमुख अंग होता है।

द्वार पूजा के अवसर पर मुख्य द्वार पर सजावट दो बड़े कलश से की जाती है। मंदिर के सर्वोच्च शिखर पर कलश की ही प्रतिष्ठापना होती है। कलश की स्तुति करते हुए कलश को विष्णु, रुद्र, ब्रह्मा का स्थान कहा गया है। भारतीय संस्कृति के आचार्यों ने मंगलकलश में समस्त देवता, सप्तसागर, सत्पसरिता, सप्तद्वीप, पृथ्वी, चारों वेद, गायत्री और सावित्री सभी का निवास माना है।

कलश सब पापों का शमन करने वाला और शांति का विस्तार करने वाला है। कलश का पूजन भारतीय शुभ कर्म में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। चूंकि कलश का पूजन महत्वपूर्ण है, इसलिए पूजन में कलश का प्रयोग करते समय विशेष प्रकार से मांगलिक कलश सज्जा की जाती है। उस पर विभिन्न प्रतीकात्मक चिह्न बनाये जाते हैं। अनेक ग्रंथों में इस कलश सज्जा का विधान भी बताया गया है। कलात्मक चित्रकारी से कलश आकर्षक भी लगता है।

किसी भी पूजा में जब कलश रखते हैं, तो यह ध्यान रखने की बात है कि कलश कभी खाली नहीं रखा जाता है उसमें शुद्ध जल रखा होता है। जहां कलश रखते हैं, वह जगह भी साफ करके, अल्पना बनाकर आटे की चांक पूरते हैं फिर उस पर कलश रखते हैं। कलश एक भी रखा जा सकता है या कुछ लोग सुंदरता के हिसाब से दो, तीन या पांच भी बड़े से छोटे कलश क्रमशः एक के ऊपर एक रखते हैं।

ऊपर के कलश पर आम की पत्तियां रखकर एक बड़ा प्याला रखा जाता है जिसमें धान अथवा गेहूं, अनाज रखते हैं उसके ऊपर एक दीपक जला कर रखते हैं या चाहे तो नारियल रखते हैं। कलश के ऊपर घर की स्त्रियां नीले पीले रंग से जो हल्दी आदि के सम्मिश्रण से विशेष रूप में तैयार किया जाता है चित्रकारी भी करती हैं। कलश सज्या के कुछ नमूने दिए जा रहे हैं। आप भी दीपावली के अवसर पर अपना घर नए ढंग से सजाएं।

श्रीमती धारा वर्मा
हमारे सांस्कृतिक प्रतीक-स्वस्तिक और मंगल कलश
"संस्कृति: अंक 02"

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