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कम्बोडिया में भारतीय संस्कृति की छाप

कम्बोडिया में भारतीय संस्कृति की छाप

हाल के वर्षों में दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों का महत्व बहुत अधिक बढ़ गया है। इस क्षेत्र के तीन प्रमुख देश लाओस, कंबोडिया और वियतनाम को 'इंडो-चाइना' या 'हिन्द-चीन' कहते हैं। इसका प्रमुख कारण यह है कि गत दो हजार वर्ष पहले इन देशों में भारत और चीन दोनों देशों के लोग जाकर बस गये थे। हिन्द-चीन के देशों में भारत और चीन का बहुत अधिक प्रभाव है। परन्तु संस्कृति और धर्म की दृष्टि से हिन्द-चीन के देशों में चीन से अधिक भारत का प्रभाव है।

सन् 1992 में मुझे लाओस में भारत का राजदूत नियुक्त किया गया था। लाओस में पग-पग पर भारतीय संस्कृति की छाप दिखाई देती है। बौद्ध धर्म प्रायः दो हजार वर्ष पहले भारत से वहाँ गया था। बौद्ध भिक्षु वर्मा और थाईलैंड होते हुए मेकांग नदी पार कर लाओस पहुँचे। मेकांग नदी के तट पर उन्हें यह देखकर घोर आश्चर्य हुआ कि वहाँ परदेश में भी गंगा के समान एक नदी है।

उस नदी के जल को स्पर्श करते हुए उनके मुँह से अनायास निकल पड़ा, 'माँ गंगा' कालान्तर में इस नदी को लोग मेकांग कहने लगे। दरअसल मेकांग नाम फ्रांसीसियों का दिया हुआ था जिन्होंने हिन्द-चीन के तीनों देशों को अपना उपनिवेश बना लिया था। भारत से जो बौद्ध प्रचारक लाओस गये वे अपने साथ पाली और संस्कृत भाषा भी ले गये। आज भी लाओस की राजभाषा पाली ही है, यह बात भारत में बहुत कम लोगों को पता है।

लगभग दो वर्ष तक लाओस में रहने के बाद 1994 में मुझे भारत सरकार का संदेश मिला कि राष्ट्रपति जी ने मुझे कंबोडिया में भारत का राजदूत मनोनीत कर दिया है और मुझे सीधे लाओस से कंबोडिया जाना है। यह जानकर मुझे हार्दिक प्रसन्नता हुई कि हिन्द-चीन के एक और देश को निकट से देखने का सुअवसर मिलेगा। 1994 में जब मैं हवाई जहाज से कंबोडिया की राजधानी 'नोन पेन्ह' पहुँचा तो यह देखकर दंग रह गया कि उस देश में भी लाओस की तरह ही कदम कदम पर भारतीय संस्कृति की छाप है।

हवाई जहाज से उतरते हुए स्कूल में पढ़ने वाली छोटी-छोटी बालिकाओं के एक समूह ने हाथ जोड़कर मेरा अभिवादन किया और फूलों की मालाएँ पहनाई। इस सिलसिले में एक दिलचस्प बात यह है कि पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया में खासकर बर्मा, थाईलैंड, लाओस, कंबोडिया और वियतनाम में लोग एक दूसरे का अभिवादन हाथ जोड़कर 'नमस्ते' की मुद्रा में करते हैं। पश्चिम के देशों की तरह हाथ मिलाकर 'हैंड शेक' नहीं करते हैं।

हवाई अड्‌डे से बाहर निकलकर जब हम गाड़ी में सवार हुए तो हमारे दूतावास के प्रथम सचिव ने कंबोडियन ड्राइवर को अंग्रेजी में आदेश दिया कि हमें 'दूत स्थान' चलना है। विशुद्ध हिन्दी के ये शब्द सुनकर मैं आश्चर्यचकित रह गया। कंबोडिया में 'दूत स्थान' राजदूतों के निवास को कहा जाता है। अचानक ही मेरे मन में यह विचार आया कि ये शब्द हिन्दी और संस्कृत के शब्दों के बहुत अधिक निकट हैं।

दो वर्षों तक कंबोडिया प्रवास के दौरान पग-पग पर मुझे भारतीय संस्कृति की छाप दिखाई पड़ती रही। यह दुर्भाग्य की बात है कि कंबोडिया में आज तक शेष रह गई भारतीय संस्कृति के विषय में अपने देशवासियों को बहुत ही सीमित ज्ञान है। जब भी विदेशों में रह रहे भारतीय मूल के लोगों का जिक्र आता है तो मुख्यतः मॉरिशस, गुयाना, सूरीनाम, फीजी, त्रिनीडाड आदि का ही उल्लेख होता है।

इस  बात की कभी चर्चा नहीं होती है कि कंबोडिया, लाओस, वियतनाम, थाईलैंड, वर्मा, मलेशिया, इंडोनेशिया आदि देशों में भी भारत विद्यमान है।आज से प्रायः दो हजार वर्ष पहले भारतीयों का एक बहुत बड़ा जत्था कंबोडिया गया। उनमें से अधिकतर लोग वहीं बस गये। उसके बाद सैकड़ों वर्षों तक लोगों का आना-जाना लगा रहा। भारत से बहुत बड़ी संख्या में लोग कंबोडिया गये और कंबोडिया से बहुत बड़ी संख्या में भारत आये। यह स्वाभाविक ही है कि दो हजार वर्ष पहले की बात अब किसी को ठीक से मालूम नहीं हो। उस समय इतिहास लिखने की परम्परा नहीं थी।

कंबोडिया में एक किंवदंती है कि पहली सदी में 'कंबोडिया' नाम का एक भारतीय ब्राह्मण पुजारी जो संभवतः आन्ध्र या कर्नाटक का था, प्रायः सपने में देखा करता था कि भगवान उसे आदेश दे रहे हैं कि उसे सागर पार के एक अनजान, अपरिचित देश में जाना है। समुद्र यात्रा के दौरान एक जगह उसका जलयान बिगड़ जाएगा, तब वहाँ से कोसों पैदल चलने पर उसे स्वच्छ निर्मल जल की एक विशाल झील मिलेगी जहाँ असंख्य कमल खिले होंगे।

उसी झील के पास उस देश की राजकुमारी खड़ी मिलेगी। उस राजकुमारी से उसका घमासान युद्ध होगा। उसके पश्चात् उसी राजकुमारी से उसका विवाह हो जाएगा और फिर वह उस देश का राजा बन जाएगा।


अंकोरवाट (कम्बोडिया) में स्थित अप्सराओं की प्रतिमाएं 

कंबोडिया में अभी भी लोग कहते हैं कि 'कोन्हिन्या' के साथ घटनाक्रम ठीक इसी प्रकार घटा। एक दिन वह अनायास ही जलयान पर सवार होकर घर से निकल पड़ा एक अनजान देश की ओर। महीनों चलने के बाद उसका जलयान अचानक ही खराब होकर एक अनजान देश के तट पर लग गया। फिर तो वे सारी बातें अनायास ही सच होती चली गई जो उसे सपने में दिखती थी। कोसों चलने के बाद उसे एक विशाल झील दिखाई पड़ी जहाँ असंख्य कमल खिले थे और जिसकी छवि देखते ही बनती थी।

इसके पहले कि वह पानी में घुसकर किसी कमल को तोड़ता, उस देश की राजकुमारी 'सोमा' ने उसे युद्ध करने के लिये ललकारा। जवाब में कोन्डिन्या ने कहा कि वह निहत्था है। यदि राजकुमारी उसके साथ युद्ध करना चाहती हैं तो उसे भी तीर धनुष दिया जाए। राजकुमारी ने उसकी इच्छा पूरी की, युद्ध के पहले दौर में राजकुमारी सोमा ने कोन्डिन्या को युद्ध में बुरी तरह पराजित किया फिर उस राजकुमारी से विवाह कर वह उस देश का राजा बना गया।

कम्बोडिया में लोगों का विश्वास है कि उसी कोन्डिन्या के नाम पर कालान्तर में उस देश का नाम कम्बोडिया पड़ा। इसके सैकड़ों वर्ष बाद तक मुख्यतः दक्षिण भारत के लोग भारी संख्या में कंबोडिया जाकर बसते रहे और कम्बोडिया के लोगों का प्रवाह भारत की ही दिशा में जारी रहा। उन दिनों कम्बोडिया का साम्राज्य 'खमेर साम्राज्य' कहा जाता था। ईसा के जन्म के 600 वर्ष बाद निकटवर्ती जावा देश से जयवर्मन द्वितीय नाम का एक राजा कम्बोडिया आया।

उसने कम्बोडिया में लड़ रहे विभिन्न समूहों में एकता पैदा की और हिन्दू धर्म का जोरशोर से प्रचार-प्रररार किया। उसने अपने को कम्बोडिया का महाराजाधिराज भी घोषित कर दिया। उसके बाद उसके वंशजों ने 'खमेर साम्राज्य' को और भी सुदृढ़ किया। यह साम्राज्य पश्चिमी बर्मा से 'साऊथ चाइना सी' तक फैल गया और इसने लाओस पर भी कब्जा कर लिया।

कहते हैं कि इस साम्राज्य के सभी राजा मूलतः भारतीय ही थे। उन्होंने हिन्दू धर्म का जोरों से प्रचार-प्रसार किया और 15वीं शताब्दी तक कम्बोडिया में बेशुमार हिन्दू मंदिर बनाये गये।12वीं शताब्दी में 'अंकोरवाट' का विश्वविख्यात हिन्दू मंदिर बना जो दुनिया के सात आश्चयों में से एक है।


अंकोरवाट मंदिर, कम्बोडिया

कहते हैं कि इसके निर्माण में सैकड़ों वर्ष लग गये। इस बीच हजारों भारतीय कारीगर, जिन्हें मंदिर बनाने की दक्षता प्राप्त थी, भारत से समुद्र के रास्ते कम्बोडिया गये। वहाँ स्थानीय लोगों के साथ मिलकर अंकोरवाट और दूसरे सैकडों मन्दिर बनाये जो एक साथ ही प्रायः पचास किलोमीटर तक फैले हुए हैं। जिन लोगों ने दक्षिण भारत के मंदिरों को देखा है उन्हें यह देखकर सुखद आश्चर्य होगा कि ये सारे मंदिर हुबहु दक्षिण भारत के मंदिरों की शैली पर बने हैं।


दक्षिण भारत के सदृश अंकोरवाट मंदिर का एक भाग 

जैसा कि इतिहास में प्रायः होता है, बड़े-बड़े साम्राज्यों का उदय और विनाश होता है। एक समय कंबोडिया में खमेर साम्राज्य प्रभुता के शिखर पर था पर धीरे-धीरे उसका विनाश हो गया और सैकड़ों वर्षों तक कंबोडिया के लोग इस बात को भूल गये कि कभी खमेर साम्राज्य दक्षिण पूर्व एशिया का सबसे सम्पन्न साम्राज्य था। वे यह भी भूल गये कि उनके पास 'अंकोरवाट' नाम का विश्वविख्यात हिन्दू मंदिर हैं जो बाद के वर्षों में दुनिया के सात आश्चयों में से एक बना।

सन् 1861 में हेनरी माउहोट नामक फ्रांसीसी पर्यटक एवं वैज्ञानिक जो कंबोडिया के जंगलों में नये-नये पेड़ पौधों की खोज कर रहा था, अचानक अंकोरवाट के भव्य मंदिर से टकरा गया जिसे देखकर उसकी आँखें खुली की खुली रह गई। यह प्रसिद्ध वैज्ञानिक कुछ महीनों के बाद लाओस जाकर मलेरिया से पीड़ित होकर मर गया। परन्तु उसने सारे विश्व को वह सनसनीखेज समाचार दिया कि कंबोडिया के जंगलों में एक अदभुत मंदिर है जिसे ' अंकोरवाट' कहते हैं।

बहुत दिनों तक लोग यह समझ नहीं पाए कि इन मंदिरों में कौन से देवी देवताओं की मूर्तियाँ है। जब उनके चित्र पश्चिम के समात्चार पत्र और पत्रिकाओं में छपने लगे तब भारत ने जोर देकर कहा कि ये सभी हिन्दू मंदिर हैं और इनमें सभी मूर्तियाँ हिन्दू देवी देवताओं की हैं। भारतवासी आज से सैकड़ों वर्ष पहले ऐसी विलक्षण प्रतिभा रखते थे, यह बात विदेशियों को और खासकर फ्रांसीसियों के गले नहीं उतर पाई।

उन्होंने कंबोडिया के लोगों को भड़काना शुरू किया कि अंकोरवाट का जग प्रसिद्ध मंदिर उनके पूर्वजों ने ही बनाया था। इसमें भारत के लोगों का कोई योगदान नहीं था। इस बारे में पश्चिम के समाचार पत्रों में भारत के खिलाफ काफी कुछ लिखा गया। यहाँ यह ध्यान देने योग्य बात है कि कंबोडिया के शासक और वहाँ की जनता अच्छी तरह समझती है कि भारत के सहयोग से ही जग प्रसिद्ध अंकोरवाट मंदिर बना था। वे लोग कंबोडिया और भारत के दो हजार वर्षों के मधुर संबंधों को पूर्णरूपेण स्वीकार करते हैं। केवल मु‌ट्ठी भर विदेशी उन्हें समय समय पर बरगलाते रहते हैं।


भारतीय स्थापत्यकला की झलक समेटे 'अंकोरवाट'

1994 में यूनेस्को के तत्वावधान में अंकोरवाट के मंदिरों के जीर्णोद्धार, सुरक्षा और देखरेख के बारे में कंबोडिया की राजधानी नोन पेन्ह में एक महत्वपूर्ण अन्तर्राष्ट्रीय गोष्ठी हुई जिसमें पश्चिम के देशों के विशेषज्ञ और कंबोडिया में रहने वाले दुनिया के प्रायः सभी देशों के राजदूत मौजूद थे। भारत सरकार का आग्रह था कि इस महत्वपूर्ण गोष्ठी में मैं भारत का प्रतिनिधित्व करूं।

इस गोष्ठी में एक ही बात पश्चिम के देशों के राजदूतों और विशेषज्ञों ने दोहराई कि इस जग प्रसिद्ध मंदिर 'अंकोरवाट' के निर्माण में भारतीयों का कोई योगदान नहीं था। उनका कहना था कि आज से हजारों वर्ष पहले कंबोडियावासियों ने अपने बलबूते पर इस मंदिर को बनाया था। मैं बड़ी देर तक उनके प्रलाप सुनता रहा। इस गोष्ठी में जाने के पहले विश्व इतिहास की प्रसिद्ध पुस्तकों में जितना कुछ अंकोरवाट के बारे में लिखा था उसे मैंने काफी सतर्कता से पढ़ लिया था और मैंने जरूरी नोट भी बना लिये थे।

सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक मुझे जवाहर लाल नेहरू की 'ग्लिम्सेज ऑफ वल्र्ड हिस्ट्री' अर्थात् 'विश्व इतिहास की झलक' लगी। इसमें नेहरू जी ने विस्तार से कंबोडिया में भारतीय संस्कृति के प्रभाव के बारे में लिखा है। उन्होंने खमेर साम्राज्य के उत्थान और पतन के बारे में जिक्र करते हुए लिखा है कि कभी-कभी कोई प्राकृतिक आपदा किसी देश के इतिहास के स्वरूप को ही बदल देती है।

नेहरू जी ने लिखा है कि खमेर साम्राज्य का गढ़ 'सिमरिप' नाम का प्रसिद्ध नगर था। यहीं पर जग प्रसिद्ध अंकोरवाट' हिन्दू मंदिर की स्थापना हुई थी। यह शहर मेकांग नदी के किनारे बसा हुआ था। मेकांग, गंगा की तरह ही दुनिया की बहुत बड़ी नदियों में से एक है। यह सर्वविदित है कि दुनिया की सभी बड़ी नदियाँ दस बीस वर्षों में आपनी धारा मोड़ देती हैं। मेकांग भी सिमरिप से रूठ कर प्रायः 50 मील दूर चली गई जिस जगह को उसने छोड़ा, वह दलदल में परिवर्तित हो गया।

वहाँ घने जंगल उग आये। धीरे-धीरे इन जंगलों ने अपने अंदर अंकोरवाट मंदिर को जकड़ लिया जहां कभी दिन रात शंख और घड़ियाल बजते थे और हिन्दू पंडितों और पुजारियों का बोलबाला था। वहाँ शेर, चीते, भालू और दूसरे हिंसक जानवर रहने लगे इनके डर से लोगों ने उस मंदिर में जाना भी छोड़ दिया। धीरे-धीरे कबोडियावासी यह भूल गये कि उनके यहाँ 'अंकोरवाट' नाम का कभी कोई मंदिर था। वह तो महज एक संयोग था कि सन् 1861 में फ्रांसीसी पर्यटक हेनरी माउहोट ने इसे खोज निकाला।

मैंने उपर्युक्त अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में सभी विशेषज्ञों से एक-एक कर पूछा कि उनमें से कितने लोगों ने दक्षिण भारत के मंदिरों को देखा है। सभी निरुत्तर ही गये। मैंने उन्हें चुनौती दी कि जो लोग इस बात का ढिंढोरा पीटते हैं कि अंकोरवाट के मंदिरों के निर्माण में तथा कम्बोडिया के दूसरे बौद्ध और हिन्दू मंदिर के निर्माण में भारतीयों का कोई योगदान नहीं है, वे भारत जाकर दक्षिण भारत और उड़ीसा के मंदिरों को देखें फिर स्वयं इस बात का निर्णय करें कि अंकोरवाट के मंदिर तथा कंबोडिया के अन्य प्राचीन मंदिर भारत के मंदिरों से 90 प्रतिशत मेल खाते है अथवा नहीं?

और यदि यह सच है तो यह भी सच होगा कि इन मंदिरों को भारतीयों के सहयोग से सैकड़ों वर्ष पहले बनाया गया होगा। मैंने सभी विदेशी विशेषज्ञों को भारत सरकार की ओर से भारत भ्रमण कर अपना मत प्रकट करने का निमंत्रण दिया। मेरे तर्क का उनके पास कोई जवाब नहीं था।

अंकोरवाट के जग प्रसिद्ध मंदिर के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है। इस मंदिर की जितनी प्रशंसा की जाए, कम है। चाहे समुद्र मंथन का पत्थर से तराशा गया प्रायः एक किलोमीटर तक फैला हुआ दृश्य हो या पत्थर पर रामायण और महाभारत की घटनाजों का विस्तृत चित्रण, सबकुछ अदभुत है। अंग्रेजी में एक कहावत है कि जब तक आप किसी चीज को देखें नहीं तब तक आप विश्वास नहीं कर सकते हैं कि यह इतना अद्भुत होगा।

अंकोरवाट जैसा मंदिर रोज-रोज और सब जगह नहीं बनता है। यह भारत और कंबोडिया के अटूट, गहरे सास्कृतिक संबंधों का प्रतीक है। कंबोडिया के महाराजाधिराज नरोत्तम सिंहानुक से अनेक बार मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उनका दृढ़ विश्वास है कि उनके पूर्वज भारत से ही आए थे और इसी कारण पिछले सैकड़ों वर्षों  से राज परिवार के लोगों का नाम प्रायः भारतीय नाम ही रहा है।

उदाहरण के लिये स्वयं महाराज नरोत्तम सिंहानुक का नाम भारतीय है। उनके पुत्र जो इन दिनों संसद के अध्यक्ष हैं, उनका नाम रणरिद्ध सिंहानुक है व भाई का नाम श्रीयुत् सिंहानुक है। उनकी बेटी का नाम बोपादेवी है। यहाँ इस बात को बताना आवश्यक है कि कंबोडिया के राज परिवार की महिलाएं ही अपने नाम के साथ देवी लिख सकती हैं अन्य कोई नहीं।कंबोडिया में अब हिन्दू धर्म प्रायः लुप्त-सा हो गया है परन्तु प्राचीन हिन्दू मंदिरों को देखकर तथा नोन पेन्ह के विश्वविख्यात म्यूजियम को देखकर कोई भी व्यक्ति आश्चर्यचकित हुए बिना नहीं रह सकता है।

म्यूजियम में पहली शताब्दी की पत्थर की मूर्तियाँ हैं जो यह दिखाती है कि उन दिनों कंबोडिया में हिन्दू ऋषि मुनि ठीक उसी प्रकार के होते थे जैसे भारत में हुआ करते थे। उनकी लम्बी चोटी और लम्बी दाढ़ी थी। सैकड़ों वर्षों में प्राचीन मंदिरों में पाये गये तथा खुदाई से प्राप्त हुए हजारों शिवलिंग है। दुर्गा की बेशुमार प्रतिमाए है और विष्णु की प्रतिमाओं का तो कहना ही क्या। असंख्य प्रतिमाएं है उनकी। इन सबसे इक बात तो स्पष्ट दिखाई पड़‌ती हैं कि पिछले दो हजार वर्षों में कंबोडिया में भारतीय संस्कृति का गहरा प्रभाव रहा है।

हिन्दू धर्म के समाप्त होने के बाद कंबोडिया में जब बौद्ध धर्म का प्रचार हुआ तो वह भी भारत से ही आया। आज भी हजारों की संख्या में गेरूआ वस्त्र पहने हुए बौद्ध भिक्षु कंबोडिया की राजधानी नोन पेन्ह या शहरों व देहातों के बौद्ध मठों में देखे जाते हैं। भारत के बौद्ध भिक्षुओं की तरह ही वे भी यही मंत्रोचार करते रहते हैं- 'बुद्ध शरण गच्छामि, संघ शरणं गच्छामि, धम्मं शरणं गच्छामि।'

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लुम्बिनी बौद्ध मंदिर, कम्बोडिया

अर्थात् हम भगवान बुद्ध की शरण में जा रहे हैं, संघ की शरण में जा रहे हैं और धर्म की शरण में जा रहे हैं। पता नहीं वे बौद्ध भिक्षु इन संरकृत श्लोकों का अर्थ समझते भी है अथवा नहीं। परन्तु वे जब इन मंत्रों का और दूसरे बौद्ध मंत्रों का पॉली और संस्कृत में उच्चारण करते हैं तो रोमांच हो आता है और कंबोडिया में बैठे हुए हर भारतीय को बरबस भारत की याद आ जाती है।

कंबोडिया में मैंने देखा कि समाज में सबसे अधिक प्रतिष्ठा बौद्ध भिक्षु की है। आम जनता महाराज सिंहानुक को देवता की तरह पूजती है और स्वयं महाराज बौद्ध भिक्षुओं को भगवान की तरह पूजते हैं। बौद्ध धर्म कंबोडिया का राजकीय धर्म है। हर सार्वजनिक समारोह में सबसे ऊँचा स्थान बौद्ध भिक्षुओं को दिया जाता है। वे प्रायः दस पन्द्रह मिनट तक मंत्रोचार करते हैं। उसके बाद महाराज या प्रधानमंत्री उनके चरणों में अपने शीश झुकाते हैं। उन्हें ढेर सारा कपड़ा, फल और धन दक्षिणा में देते हैं।

उसके बाद ये भिक्षु महाराज या प्रधानमंत्री के सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देते हैं और समारोह शुरू करने की आज्ञा प्रदान करते हैं। यह देखकर मुझे ऐसा लगा कि प्राचीन काल में भारत में जब बौद्ध धर्म का वर्चस्व रहा होगा तो शायद उस समय के राजा महाराजा भी इसी प्रकार करते होंगे। कहावत है कि प्राचीन काल में राजा महाराजा अकाल पड़ने पर सोने का हल चलाया करते थे जिससे प्रसन्न होकर इन्द्र देवता वर्षा करते थे।

इसी प्रकार एक बार हल चलाने पर राजा जनक को खेतों में पड़ी हुई सीता नवजात शिशु के रूप में मिली थी। भारत में बहुत कम लोगों को यह पता है कि कंबोडिया में अभी भी लोग इस प्रथा का अनुसरण करते हैं। राजा बरसात शुरू होने के पहले सोने का हल चलाते हैं। राजमहल के पास तीन टोकरे रखे रहते हैं। एक में लबालब जल से भरा हुआ मटका रहता है। दूसरे में शराब की बोतल रहती है और तीसरे में बन्दूक तथा दूसरे अस्त्र शस्त्र रहते हैं।

जब राजा हल जोतने के बाद अपना आसन ग्रहण करते हैं तब राजदरबारी उस हल के बैल को इन टोकरियों के पास ले जाते हैं। यदि बैल ने जल वाला टोकरा छू दिया तो तालियाँ बजने लगती हैं। और लोग समझते हैं कि इस बार देश में वर्षा अच्छी होगी और फसलें अच्छी पैदा होंगी। यदि बैल शराब की टोकरी को मुँह लगाता है तो लोग डर जाते हैं और समझते हैं कि आने वाले समय में चोर उचक्कों का जोर बढ़ जाएगा।

यदि बैल अस्त्र-शस्त्र वाली टोकरी को मुँह लगाता है तो लोग चीख उठते हैं और उन्हें डर होता है कि शायद देश में गृह युद्ध हो जाए। मार्च के महीने में जिस तरह भारत में होली मनाई जाती है लगभग उसी तरह की होली कंबोडिया में भी मनाई जाती है और होली के साथ ही कंबोडिया वासियों का नया वर्ष शुरु होता है। होली की तरह ही लोग एक दूसरे पर पिचकारियों से पानी डालते हैं। पिछले कुछ वर्षों से लोगों ने भारत की तरह ही नये वर्ष के मौके पर एक दूसरे को रंग और गुलाल लगाना शुरु कर दिया है।

कंबोडिया के राजमहल में रहने वाले राजपुरोहित जो कि ज्योतिषी भी हैं, उनका बहुत अधिक महत्व है। कंबोडियावासियों का मानना है कि राजपुरोहित के पूर्वज सैकड़ों वर्ष पहले भारत के केरल प्रान्त से आये थे।वे वहाँ के नम्बूदरी ब्राह्मण थे। कालान्तर में वे कंबोडिया में ही रह गये। देखने में वे अभी भी केरल वासियों की तरह ही लगते हैं। वैसे भी 50 प्रतिशत से अधिक कंबोडियावासी हूबहू भारतीय, विशेषकर दक्षिण भारतीय की तरह लगते हैं।

अन्य दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों की तरह कंबोडिया में भी रामायण का बहुत महत्व है और कंबोडियावासी बड़े मनोयोग से साल में कई बार रामलीला मनाते हैं। संक्षेप में, कंबोडिया में अपनी तरह का एक भारत सुरक्षित हैं। क्योंकि उस देश में असंख्य लोग हैं जिनकी नसों में भारतीय खून बह रहा है। हमने बहुत दिनों तक कंबोडिया की अवहेलना की। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने इन संबंधियों को जो सैकड़ों वर्ष पूर्व बिछड़ गये थे फिर से गले लगा लें।

लेख -
डॉ॰ गौरी शंकर राजहंस
संस्कृति संयुक्तांक- 8/9

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