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पर्व विशेष : | तदनुसार 21 अप्रैल 2026

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सृष्टि केवल मनुष्य के लिए ही नहीं

सृष्टि केवल मनुष्य के लिए ही नहीं

'सृष्टि केवल हमारे ही लिए बनी है' जो ऐसा सोचते हैं वे भ्रम में हैं। 'माइट इज राइट' या 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' जैसी बातें ज्यों के त्यों स्वीकार करने में हम परहेज नहीं करते जबकि बाकी बातें चाहे वे खान-पान या जीवन के अविच्छिन्न अंग से सम्बद्ध हों हमने काफी बदलाव किया है अथवा बदलाव को व्यवहारिकता के स्तर पर स्वीकार करते हैं।

जीवों और अन्य प्राणियों के साहचर्य या दोस्ती से हमारे जीवन में बहुत सुखद परिवर्तन आ सकते हैं। यह आवश्यक है कि हम उनके साथ वैसे ही नाता जोड़ने की कोशिश करें जैसे इंसानों या मित्रों के साथ करते हैं। जानवर या जीव नासमझ और कमतर हैं यह बात कुछ ही समय में बेमानी साबित हो जाएगी। जीवों में कम ज्यादा सही पर हमारी भांति सहज, तुरन्त और प्रत्युत्पन्न मति होती है।


मानव और जीव के मध्य आत्मीय सम्बन्ध 

उसे जानने और समझने के लिए बहुत ज्यादा दिमाग नहीं लगाना पड़ता। थोड़ी सी बातें या अपेक्षित सुरक्षा का ध्यान रखकर हम असीम सुख, संतोष पा भी सकते हैं और दे भी सकते हैं। एक ही प्रक्रिया द्विमुखी हो तो सोने में सुगन्ध माना जा सकता है। प्रकृति ने अपने संतुलन के अनुसार सृष्टि की संरचना की है। उस आधार पर हम जीवों से दूर होकर या उनको दूर करके उस संतुलन को बिगाड़ते हैं या प्रकृति के कार्य में अनावश्यक हस्तक्षेप करते हैं।

अनावश्यक दखलन्दाजी या हस्तेक्षेप जैसे हमारी प्रकृति पर असर डालता है वैसे ही बाहा प्रकृति पर भी प्रभाव डालता है। उसका असर अथवा प्रतिक्रिया होने में देर सबेर हो सकती है। जीवों का साहचर्य हमें सृष्टि के मूल की ओर ले जाता है। नन्हें-नन्हें बच्चे यह जानना चाहते हैं कि जीव कब, कैसे, कहां से आते हैं। उनका यह चिंतन किसी दार्शनिक के चिंतन की भांति होता है।



माँ प्रकृति के प्रेम पर सबका अधिकार

कई लोगों ने विषय और ज्ञान की कठिनता तथा दुरूहता पर भी इससे विजय पायी है। यह वो ज्ञान होता है जिसे स्वयं सीखने वाला पाना चाहता है। ज्ञान में परस्पर अन्तर और भिन्नता का सिद्वान्त भी इससे समझा जा सकता है। व्यावहारिक ज्ञान स्थायी और विश्लेषणात्मक होता है।किताबी पठन-पाठन से दूर जीव जगत एक अलग ही लोक और क्षेत्र है जिससे कभी बोरियत नहीं होती, यह विचारों की प्रयोगशाला है। बच्चों को व्यावहारिक रूप से संवेदनशील, भावुक, होशियार और विश्लेषक बनाती है।

एक पिता ने बताया कि वे जब छोटे शहर से महानगर में आए तो उनके बच्चे का स्वभाव ही बदल गया। लडाकू, चिड्चिड़ा बदमिजाज.... वे कारण समझ ही नहीं पा रहे थे। उनकी माँ जब वहाँ आयीं तो उन्होंने बच्चे को सुबह पार्क में ले जाना शुरू किया। पन्द्रह बीस दिन में उसमें अद्भुत परिवर्तन था। सोचा गया कि उसका ध्यान बंट गया या उसे अकेलापन काटने का साधन मिल गया पर असल में प्रकृति से, जीवों से दादी माँ ने उसका साहचर्य जोड़ दिया था।

उन्होंने तब याद किया कि वहाँ उनके घर में बहुत पेड़ पौधे थे। बहुत से पंछी उन पर चहचहाया करते थे। रोज गाय गण्डक की रोटी निकाली जाती थी। यहाँ "फ्लैट" में आकर सब कुछ ही बदल गया था। इसी ने उन सबको बदल दिया, अब उसने अपने खोये सूत्र खोज लिए। उनके घर दो-तीन बिल्लियां आने लगी हैं, गर्मी में बाथरूम में सोती हैं, लैट्रीन में भी डेरा जमा लेती हैं। दरअसल थोड़ा समझाने सिखाने से जानवर समझते हैं।

हमें लगता है फालतू समय और स्थान का उपयोग हो गया। अब उन्होंने अपने बच्चे को चिड़ियाघर ले जाना शुरू किया, पढ़ने में उसकी दक्षता समय कम देने के बावजूद बढ़ी।जानवर की सहनशीलता और संतोषी वृत्ति हमारे जीवन हेतु रामबाण है। एक मैदान या छोटे क्षेत्र में जानवर न बांधे जाने पर भी रमकर रहता है, थोड़ा-बहुत कभी कहीं घूम आता है। जो मिलता है वही खा पीकर प्रसन्न रहता है। यह हमारे असंतोषी जीवन के हृदयघात को संतुलित बना सकने की पूरी क्षमता रखता है।

जानवरों की बुद्वि और वृत्ति चकित कर देती है। भूकम्प और मौसम के विषय में इनकी महारत मौसम विज्ञानियों पर भी भारी पड़ती है। इस रूप में लगता है ये पशु-पक्षी विज्ञानी हैं जो हमारे जीवन की सहूलियत में कितना योगदान करते हैं। हजारों मील से उड़कर आए पक्षियों को जब हम पक्षी विहार में देखते हैं तो आह्‌लादित और चमत्कृत हो जाते हैं।अपने बच्चों को चाट चाट कर साफ करती शेरनी, गाय, बकरी, बिल्ली, पिलिया, नन्हें बच्चों को दाना चुगाते पंछी, उड़ना सिखाते पंछी कितनी कर्त्तव्य-निष्टा का पाठ पढ़ाते हैं।

मैंने कई बार देखा है कुत्ते कितना ही स्वादिष्ट भोजन क्यों न कर रहे हों पर कोई भौंके या आवश्यकता पड़ते ही तुरन्त खाना छोड़कर भाग लेते हैं। यकीनन मनोवैज्ञानिक तौर पर यह सच है कि जीव जानवरों के निश्छल प्यार को जानने के बाद उस श्रेणी का प्यार इंसानों से या किसी से पाना मुश्किल ही नहीं दुर्लभ भी है। इनका हमारा 'गिव एंड टेक' का नाता नहीं। एक बार जानवर ने आपको अपना मान लिया तो मान लिया। दगा फरेब कभी नहीं। पूरी दुनिया समय न होने का रोना रोती है पर इनके पास आपके लिए समय ही समय है।

इनके जीवन में हबड़ा-तबड़ी नहीं। हम रात 12 बजे भी आए तो हमारे परिचित सड़‌कालू कुत्ते हमारी प्रतीक्षा करते हैं। आप चाल बदलें या घूंघट काढ़ लें पर वे दूर से पहचान कर जब आप पर लपकते हैं तो लगता है आपके प्यार की ताजपोशी कर रहे हैं। आपके बिना उदास हो जाते हैं..... खाना नहीं खाते.. घर के सदस्यों से भी ज्यादा आपको याद करते हैं, खोजते हैं, लगता है हम इनके दिल के राजा हैं।

बच्चे और घर के तमाम लोग लड़ने बहस करने में लगे रहें पर जानवर आपकी बात मानते हैं। भरोसा करना कोई इनसे सीखे भले ही उनसे इन्हें घाटा ही होता हो। जितना त्याग, समर्पण, प्यार इनसे मिलता है वह आज के समय में दुर्लभ है। गौर से देखेंगे तो आपको इनके मुंह पर मासूमियत, निश्छलता दिखेगी चाहे वह शेर ही क्यों न हो। ये हर समय आक्रोश तनाव में नहीं रहते। नियमित रूप से जानवरों से साहचर्य, सम्पर्क में रहने वाले लोगों को यह कभी नहीं लगता कि जानवर बोलते नहीं हैं।

उनकी संप्रेषणीयता हमारी संप्रेषणीयता से ज्यादा मुखर होती है। जीव-जानवर प्रेमी खुलकर कहते हैं कि जानवर का कोई उद्देश्य या एक्शन निरुद्देश्य नहीं होता। जानवरों की हिंसा का शिकार हुए पचासों लोगों ने स्वीकार किया है कि इसका कारण उनकी अपनी गलती थी। पागलपन, छेडछाड़ के बिना वे शिकायत योग्य व्यवहार नहीं करते। उनके दुर्व्यवहार में भी हम देखेंगे कि उनका उद्देश्य अधिकांश में आत्म-रक्षा या आत्मरक्षण के प्रति डर है, हमारा नुकसान पहुंचाना नहीं।

एक वकील और संस्था के महासचिव ने बताया एक गाड़ी के नीचे सद्य मां बनी कुत्तिया बैठी थी। उन्होंने ध्यान न दिया उसे लगा कि वे उसके बच्चे ले जा रहे हैं जब काट खाया तो लोग उसे और बच्चों को मारने लगे, उन्होंने मना किया। ये कितनी मुस्तैदी से अपने बच्चों की रक्षा में लगी है इसके पास रक्षा करने को और क्या है। नीचे धरती ऊपर आकाश.... अब लोग इन्हें भी पागल समझने लगे।

थोड़ी रक्षा-सुरक्षा और एहतियात बरतकर हम अपने और इनके जीवन को धन्य बना सकते हैं। कालिदास, रवीन्द्र नाथ टैगोर आदि विश्व विख्यात लेखकों ने जानवरों के चित्रण और रचनाएं पढ़कर लगता है हमारे जीवन के विकास ही नहीं अपितु उन्नयन में इनका कितना योगदान है। इनके बिना जीवन की कल्पना ही कितनी दूभर है। कालजयी रचनाएं रचनाकारों की इसी कालजयी करुणामय जीवन की कलात्मक कृति तो होती है।


गुरुदेव- रविंद्रनाथ टैगोर(बाएं), महाकवि-कालिदास (दायें)
 

लेख-
डॉ० रेखा व्यास
797, तिमारपुर, दिल्ली-110054
संस्कृति संयुक्तांक-8/9

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