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पूर्वोत्तर भारत के योद्धाओं का भारतीय स्वातन्त्रय समर में योगदान

पूर्वोत्तर भारत के योद्धाओं का भारतीय स्वातन्त्रय समर में योगदान


भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में पूर्वोत्तर भारत का योगदान स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। प्रायः मुख्यधारा के इतिहास में इस क्षेत्र के बलिदानियों की गाथाएं उपेक्षित रही हैं। अहोम शासकों के शौर्य से लेकर लचित बरफूकन जैसे रणनीतिकारों तक, पूर्वोत्तर की मिट्टी ने विदेशी आक्रांताओं के विरुद्ध अदम्य साहस का परिचय दिया। कनकलता बरुआ से लेकर यू. तिरोत सिंह और वीर टिकेन्द्रजीत जैसे नायकों ने अपनी मातृभूमि की रक्षा हेतु प्राण न्यौछावर किए। यह लेख उसी गौरवशाली विरासत का स्मरण कराता है, जो न केवल पूर्वोत्तर बल्कि संपूर्ण भारत की अस्मिता का प्रतीक है।


भारतीय स्वाधीनता संग्राम में मुगलों और अंग्रेजों के विरुद्ध पूरे भारत में तीव्र प्रतिक्रिया हुई थी, क्योंकि भारतीयों को दासता स्वीकार नहीं थी। स्वाधीनता प्राप्त करने के उद्देश्य से वे उन सभी गतिविधियों का सहारा ले रहे थे, जिनसे यह संभव प्रतीत होता था। इसी श्रृंखला में पूर्वोत्तर भारत के अहोम शासकों तथा अन्य स्थानीय योद्धाओं ने इन आक्रांताओं का प्रतिरोध सफलतापूर्वक किया। यही कारण रहा कि ये विदेशी पूर्वोत्तर भारत पर कभी पूर्णतः आधिपत्य कायम करने में सफल नहीं रहे। वीर लचित बरफूकन जैसे सेनापतियों के नेतृत्व में मुगलों और बाद में अंग्रेजों को करारी हार का सामना करना पड़ा। ऐसे अनेक स्वतंत्रता सेनानी पूर्वोत्तर की धरा पर हुए, जिनका वर्णन विस्तृत है, किन्तु यहाँ संक्षेप में उनका विश्लेषण किया गया है।


अहोम साम्राज्य का नक्शा

कनकलता बरुआ का जन्म 1924 में असम में हुआ और बाल्यावस्था से ही वे राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम में सम्मिलित हो गईं। मात्र 7 वर्ष की अल्पायु में उन्होंने 1931 में ब्रिटिश विरोधी रैलियों में भाग लिया। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में उन्होंने असम से क्रांतिकारियों का नेतृत्व किया। ब्रिटिश फौज के समक्ष हाथ में तिरंगा लेकर अपने सहयोगियों का मनोबल बढ़ाते हुए वे आगे बढ़ीं और ब्रिटिश गोलीबारी में उन्होंने अपने प्राण भारत माता के चरणों में न्यौछावर कर दिए। आज असम की दीवारों पर चित्रित दृश्य उनके बलिदान की गाथा गा रहे हैं। इनके अतिरिक्त, भोगेश्वरी फुकनानी (1872-1942), पुष्पलता दास (जन्म 27 मार्च, 1915), चन्द्रप्रभा सैकियानी (जन्म 24 दिसंबर, 1901) और मणिराम दीवान (24 दिसंबर, 1806) जैसे विशिष्ट स्वाधीनता सेनानियों ने असम की धरा पर जन्म लिया, जिन्हें हम आज भी स्मरण करते हैं।

कनकलता बरुआ|
कनकलता बरुआ

मेघालय के 'यू. तिरोत सिंह' खासी समुदाय से थे और 'खडसीफ्रा सियामेशिप' के राजा थे। प्रारंभ में अंग्रेजों ने उस क्षेत्र में विकास कार्यों का आश्वासन दिया, तो तिरोत सिंह ने सहमति व्यक्त की, किंतु धीरे-धीरे वे अंग्रेजों की कर-प्रणाली लागू करने की मंशा समझ गए। वर्ष 1829 से 1833 तक दोनों पक्षों के मध्य घनघोर युद्ध हुआ। अंततः तिरोत सिंह ने समर्पण तो किया, लेकिन उन्होंने अपना मस्तक नहीं झुकाया और 1835 में उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके शौर्य की झलक ब्रिटिश इतिहासकार सर एडवर्ड गेट की पुस्तक 'द हिस्ट्री ऑफ असम' में मिलती है। प्रतिवर्ष 12 दिसंबर को मेघालय के गारो क्षेत्र में स्वाधीनता सेनानी पा. थोगन संगमा की स्मृति में 'स्वतंत्रता सेनानी दिवस' मनाया जाता है। जब अंग्रेजों ने 1872-73 में गारो हिल्स पर कब्जा करने का प्रयास किया, तो संगमा ने स्थानीय युवाओं को एकत्रित कर सशस्त्र सेना का निर्माण किया और अंग्रेजों से लोहा लिया। उन्होंने गांव-गांव जाकर सभाएं आयोजित कीं और संघर्ष में अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।

तिरोत सिंह

मणिपुर में प्रत्येक वर्ष 13 अगस्त को 'देशभक्त दिवस' वीर टिकेन्द्रजीत सिंह की याद दिलाता है, जिन्हें 'मणिपुर का शेर' कहा जाता था। 1891 के 'आंग्ल-मणिपुर युद्ध' में शहीद टिकेन्द्रजीत सिंह की भूमिका महत्वपूर्ण थी। उन्होंने अंग्रेजी सरकार की चूलें हिला दी थीं। वे मणिपुर सेना के कमांडर नियुक्त हुए थे और ब्रिटिश साम्राज्यवाद के धुर विरोधी थे। उनके बलिदान से आज भी पूर्वोत्तर के युवा प्रेरित होते हैं। विद्रोह के कारण उन्हें सार्वजनिक रूप से फांसी दी गई थी। मिजोरम के शूरवीर पसल्या खुआंगचेरा ने भी अपना जीवन ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरोध में समर्पित किया और 1890 में शहीद हुए।

अरुणाचल प्रदेश में जन्मे मतमुर जामोह ने स्थानीय क्षेत्र में अंग्रेजों का खुलकर प्रतिरोध किया। अपने साथियों के साथ उन्होंने 1911 में कैप्टन नोएल विलियम्सन और उसके सहयोगियों का अंत किया। जामोह जनजातीय भूमि की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध थे, जिस पर ब्रिटिश साम्राज्यवादी गिद्ध दृष्टि जमाए बैठे थे। स्थानीय संस्कृति और मूल्यों की रक्षा के उद्देश्य से जामोह ने विद्रोह किया, किंतु कालान्तर में उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया और वे राष्ट्र को अर्पित हो गए। सिक्किम में त्रिलोचन पोखरेल जैसे क्रांतिकारी हुए, जो महात्मा गांधी के अनुयायी थे। वे सत्याग्रह, असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलन में सक्रिय रहे। इसी प्रकार त्रिपुरा में उमेश लाल सिंह जैसे क्रांतिकारियों ने जन्म लिया, जो सूर्या सेन के नेतृत्व में 'चटगांव विद्रोह' में शामिल थे। उन्होंने भारत की स्वाधीनता और त्रिपुरा की संप्रभुता की रक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया।

पूर्वोत्तर के ऐसे अगणित और विस्मृत क्रांतिकारी हुए, जिन्होंने भारतीय स्वाधीनता हेतु अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया। आज आजादी के अमृत महोत्सव में हम सभी भारतीयों का यह कर्तव्य है कि इन हुतात्माओं का स्मरण करें और उनके त्याग से प्रेरणा लें।

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