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स्वतन्त्रता आन्दोलन और राष्ट्रनिर्माण में सन्त गहिरा गुरु का योगदान

स्वतन्त्रता आन्दोलन और राष्ट्रनिर्माण में सन्त गहिरा गुरु का योगदान


यह लेख स्वतन्त्रता आन्दोलन और समाज सुधार में छत्तीसगढ़ के सन्त गहिरा गुरु के योगदान पर प्रकाश डालता है। अजय कुमार चतुर्वेदी द्वारा लिखित इस आलेख में सन्त गहिरा गुरु के राष्ट्रप्रेम, महात्मा गान्धी के साथ उनके जुड़ाव और वन क्षेत्रों में किए गए उनके कार्यों का विवरण दिया गया है। लेख बताता है कि कैसे उन्होंने जल, जंगल और जमीन की रक्षा के साथ शिक्षा और नशामुक्ति के लिए काम किया।


15 अगस्त 2026 को देश जब अपना 80वाँ स्वतंत्रता दिवस पूरे उत्साह के साथ मना रहा है, तब छत्तीसगढ़ के वनांचलों में आजादी का अलख जगाने वाले महान संत, समाज सुधारक और प्रखर राष्ट्रभक्त संत गहिरा गुरु (रामेश्वर जी) के अविस्मरणीय योगदान को कृतज्ञता के साथ याद किया जा रहा है।


संत गहिरा गुरु

तत्कालीन धर्मजयगढ़ (वर्तमान रायगढ़) के लैलूंगा अंतर्गत ग्राम 'गहिरा' में सावन अमावस्या को जन्मे संत गहिरा गुरु का पूरा जीवन केवल आध्यात्मिक साधना और व्यसनमुक्ति तक सीमित नहीं था; उनके हृदय में भारत राष्ट्र के प्रति अगाध प्रेम और समर्पण था।

स्वतंत्रता संग्राम और महात्मा गांधी से जुड़ाव
संत गहिरा गुरु राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सत्य, अहिंसा और आत्म-अनुशासन के विचारों से गहराई से प्रभावित थे। गांधीवादी विचारधारा को गहराई से समझने के लिए उन्होंने साबरमती आश्रम जाकर गांधी जी से भेंट की थी।


महात्मा गांधी

भारत छोड़ो आंदोलन (1942)
अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों और स्थानीय शोषक जमींदारों के खिलाफ आवाज उठाते हुए, गुरुजी दुर्गम रास्तों से गहिरा गाँव से पैदल यात्रा कर महात्मा गांधी से मिलने रायगढ़ गए थे। किंतु महात्मा गांधी सहित सभी बड़े नेता जेल चले गए जिस कारण महात्मा गांधी से उनकी मुलाकात नहीं हुई और वह अपने गृह ग्राम गहिरा वापस हो गए। वे हमेशा आदिवासियों को आंदोलन के लिए संगठित करते थे।

नोआखली दंगे (1946) और शांति प्रयास
अक्टूबर 1946 में नोआखली (बंगाल) के भीषण सांप्रदायिक दंगों के दौरान जब महात्मा गांधी शांति स्थापना के दौरे पर थे, तब उस बेहद विषम परिस्थिति में भी संत गहिरा गुरु गांधी जी के साथ डटकर खड़े रहे और सामाजिक सद्भाव बनाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई।

1962 भारत-चीन युद्ध: 'वानर सेना' और नेहरू जी को पत्र
गुरुजी का राष्ट्रप्रेम केवल शब्दों तक सीमित नहीं था। 1962 के भारत-चीन युद्ध के समय तत्कालीन प्रतिष्ठित समाचार पत्रिका "राष्ट्र चक्र" (21 अक्टूबर 1962) के उल्लेख अनुसार, गुरुजी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू को एक ऐतिहासिक पत्र लिखा था:

"मैं वनवासी जनजाति के बीच रहने वाला साधारण मनुष्य हूँ... आज हमारी भारत माता पर संकट आया है, इसलिए मैं अपने हजारों पराक्रमी वनवासी भाइयों के साथ देश की रक्षा के लिए सीमा पर जाने और शत्रुओं का सफाया करने के लिए तत्पर हूँ।"


1962 भारत-चीन युद्ध

उन्होंने अपने 20 वर्षों के तप से जुड़े लगभग दो लाख समर्थकों को 'वानर सेना' के रूप में संगठित किया और तीर-कमान, फरसा व भालों जैसे पारंपरिक हथियारों के साथ सेना की सहायता करने का दृढ़ संकल्प व्यक्त किया था।

संत गहिरा गुरु: सच्चे देशभक्त, पर्यावरण संरक्षक और मानवता के पुजारी
संत गहिरा गुरुजी का दर्शन प्रकृति, धर्म और देववाणी संस्कृत के संरक्षण के ज़रिए राष्ट्र-निर्माण का संदेश देता है। उन्होंने वनांचल क्षेत्रों में जल, जंगल और जमीन की रक्षा को नैतिक कर्तव्य बनाया, 'सनातन संत समाज' के माध्यम से संस्कृति व धर्म की जड़ों को सींचा और दुर्गम क्षेत्रों में संस्कृत विद्यालयों की स्थापना कर इस ज्ञान को सर्वसुलभ बनाया। उनका जीवन राष्ट्र सेवा, पर्यावरण संवर्धन और कुरीति-मुक्त सात्विक जीवन शैली का एक अनुपम उदाहरण है।

सम्मान, विरासत और अमर संदेश
21 नवंबर 1996 को 92 वर्ष की आयु में ब्रह्मलीन होने वाले इस महान कर्मयोगी के योगदान को अक्षुण्ण रखने के लिए शासन द्वारा अनेक सम्मान प्रदान किए गए। वर्ष 1986-87 में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय पुरस्कार (राष्ट्रीय एकता, उत्कृष्ट समाज सेवा और सांप्रदायिक सौहार्द के लिए), 1996-97 बिरसा मुंडा आदिवासी सेवा पुरस्कार, मरणोपरांत मध्य प्रदेश सरकार द्वारा जनजातीय सेवा हेतु सर्वोच्च सम्मान और वर्ष 2003 में छत्तीसगढ़ शासन के वन विभाग द्वारा पर्यावरण संरक्षण हेतु 'संत गहिरा गुरु पर्यावरण पुरस्कार' की स्थापना की गई। इनके सम्मान में अंबिकापुर (सरगुजा) स्थित विश्वविद्यालय का नामकरण 'संत गहिरा गुरु विश्वविद्यालय' किया गया।


संत गहिरा गुरु विश्वविद्यालय

प्रासंगिकता: "सब मनखे एक समान"
संत गहिरा गुरु का कालजयी संदेश "सब मनखे एक समान" और उनके दिए गए 14 सूत्र आज 21वीं सदी में भी अत्यंत प्रासंगिक हैं। नशामुक्ति, पर्यावरण संरक्षण, शिक्षा का प्रसार और समतावादी समाज का उनका सपना आज के युवाओं के लिए राष्ट्र निर्माण का सबसे बड़ा मार्गदर्शक है। स्वतंत्रता दिवस का यह अवसर हमें उनके बताए सत्य, शुचिता और राष्ट्रप्रेम के मार्ग पर चलने का संकल्प दिलाता है।

- अजय कुमार चतुर्वेदी
(पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी स्मृति पुरस्कार प्राप्तकर्ता साहित्यकार)

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