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शैलचित्रों की निरंतरता: अतीत से वर्तमान तक

शैलचित्रों की निरंतरता: अतीत से वर्तमान तक


'कला मानव के संवाद का भी माध्यम है, जो युगों के अंतराल को भी जोड़ देती है।' आनंद कुमारस्वामी का यह विचार राजस्थान के हाड़ौती अंचल, विशेषकर बूंदी के शैलचित्रों में जीवंत हो उठता है। प्रस्तुत लेख डॉ. नेहा प्रधान के गहन शोध पर आधारित है, जो प्रागैतिहासिक काल की शिलाओं पर उकेरी गई संवेदनाओं और आज की जीवन शैली के बीच एक अद्भुत सेतु का निर्माण करता है। यह केवल इतिहास का विवरण नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक निरंतरता की खोज है जो भील, मीणा और सहरिया जैसी कई समुदायों की लोककलाओं में आज भी प्रवाहित है। प्राचीन गुफाओं के गेरुआ रंग से लेकर आधुनिक घरों की दीवारों पर थापों तक, यह लेख हमारी जड़ों की पड़ताल करता है।


”कला मानव की मौन भाषा है, जो युगों के अंतराल को भी जोड़ देती है।“ आनंद कुमारस्वामी का यह कथन प्रागैतिहासिक शैलचित्रों से आरम्भ होकर वर्तमान तक की सांस्कृतिक यात्रा को अभिव्यक्त करता है। मानव सभ्यता के प्रारम्भिक चरण में जब आदिमानव स्थायी आवासों से अपरिचित था, तब वह पर्वतीय कंदराओं और शैलाश्रयों में अस्थायी रूप से निवास करता था।

प्रकृति के निकट रहकर उसने अपने जीवन के अनुभवों, संघर्षों, उत्सवों तथा भावनाओं को अभिव्यक्त करने के लिए शैलचित्रों का सहारा लिया। इन्हीं चित्रों में उसके जीवन की संवेदनाएँ, सामाजिक गतिविधियाँ, धार्मिक विश्वास तथा सांस्कृतिक चेतना प्रतिबिंबित होती हैं। आदिमानव ने अपने अंतर्मन की कलात्मक अनुभूतियों को शिलाओं पर उकेरकर उन्हें अमर बना दिया। वास्तव में अभिव्यक्ति की आकांक्षा ही कला की मूल प्रेरणा रही है।

डॉ. अविनाश बहादुर वर्मा के अनुसार, “आदिमानव ने सुरक्षा हेतु गुफाओं का आश्रय लिया और अपने जीवन की कोमल भावनाओं को शिकार की गतियों तथा पशु-पक्षियों की आकृतियों के माध्यम से शिलाओं पर चित्रित किया।” इस अभिव्यक्ति की चाह में आदिमानव ने शैलाश्रयों में चित्रांकन की परम्परा प्रारम्भ की, जो आगे चलकर मानव संस्कृति के विकास का आधार बनी।

राजस्थान के हाड़ौती क्षेत्र विशेषतः कोटा, बूंदी, बारां और झालावाड़ में अनेक महत्वपूर्ण शैलचित्र स्थल प्राप्त हुए हैं। इन चित्रों में आखेट दृश्य, नृत्य, पशु आकृतियाँ, सामूहिक जीवन, धार्मिक अनुष्ठान तथा प्रकृति के विविध रूप अंकित हैं।

ये चित्र केवल प्रागैतिहासिक मानव के जीवन संघर्ष को ही नहीं दर्शाते, बल्कि उसकी सौंदर्य चेतना और सांस्कृतिक परिपक्वता का भी प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। डॉ. जगदीश गुप्त के अनुसार, “शैलचित्र प्राचीन मानव की प्रकृति, जीवन-संघर्ष एवं बाह्य परिस्थितियों का ही ज्ञान नहीं कराते, बल्कि उसकी सौंदर्य चेतना का भी साक्ष्य प्रदान करते हैं।”

शैलचित्र- प्रागैतिहासिक मानव की जीवनशैली का प्रतिबिम्ब
शैलचित्र- प्रागैतिहासिक मानव की जीवनशैली का प्रतिबिम्ब

 मानव सभ्यता के विकासक्रम में शैलचित्र केवल कला की अभिव्यक्ति नहीं रहे, बल्कि वे आदिम मानव की सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना के जीवंत दस्तावेज भी हैं। आज भी राजस्थान की अनेक समुदायों जैसे भील, मीणा, गरासिया और सहरिया आदि अपने पारंपरिक जीवन, लोकनृत्य, प्रकृति-पूजा, सामुदायिक उत्सव तथा लोककलाओं में उन आदिम सांस्कृतिक परंपराओं की निरंतरता को संजोए हुए हैं।

इन जनजातीय समुदायों की जीवन शैली और शैलचित्रों में अंकित दृश्यों के मध्य आश्चर्यजनक समानता दिखाई देती है। यह समानता इस तथय को प्रमाणित करती है कि संस्कृति समय के साथ परिवर्तित अवश्य होती है, परंतु उसकी मूल चेतना और परंपराएँ सदैव जीवित रहती हैं।

अतः शैलचित्रों और वर्तमान जनजातीय जीवन शैली का तुलनात्मक अध्ययन भारतीय संस्कृति की निरंतरता, विकास और लोकजीवन की गहरी समझ प्रदान करता है। डॉ. ममता चतुर्वेदी के अनुसार, “पाषाण युग के असंगठित भित्तिचित्रों से लेकर अजंता के विश्वविख्यात भित्तिचित्रों तक एक विस्तृत श्रृंखला है, जिसमें शैलचित्रों की सहज अभिव्यक्ति से बौद्धकालीन परिपक्व शास्त्रीय शैली तक की यात्रा दिखाई देती है।”

इसी प्रकार डॉ. वी. एस. वाकणकर एवं डॉ. पाण्डेय ने शैलचित्रों की अनेक शैलियों का उल्लेख किया है, जिनमें प्रमुखतः पाँच शैलियाँ उल्लेखनीय हैं-

पूरक शैली  (Complementary Style)

अर्द्धपूरक शैली (Semi&complementary Style)

रेखा शैली (Line Style)

अलंकृत शैली (Ornate Style)

क्षेत्र विभाजन शैली (Zoning Style)

भारतीय शैलचित्रों में पूरक शैली का विशेष महत्व है। इस शैली में चित्रों को एक ही रंग द्वारा बनाया जाता था तथा उनमें आंतरिक सजावट या अधिक विवरण नहीं दिया जाता था। बूंदी जिले के गराड़ा एवं गोलपुर जैसे प्रमुख शैलाश्रयों में शैलचित्रों में गेरुआ, लाल मिट्टी तथा प्राकृतिक खनिजों से प्राप्त रंगों का प्रयोग किया गया था।

आज भी जनजातीय समुदाय जैसे भील, मीणा, गरासिया एवं सहरिया में अपनी भित्ति चित्रकला, लोक सज्जा एवं धार्मिक अनुष्ठानों में प्राकृतिक रंगों लाल मिट्टी, चूना, कोयला तथा वनस्पतियों से बने रंगों का उपयोग प्रचलित है। इससे यह सिद्ध होता है कि दोनों संस्कृतियों का प्रकृति से गहरा संबंध रहा है।

प्राकृतिक रंग हैं शैलचित्रों की विशेषता 
प्राकृतिक रंग हैं शैलचित्रों की विशेषता 

दूसरी समानता चित्रण की सरलता एवं प्रतीकात्मकता में दिखाई देती है। पूरक शैली में मानव, पशु, आखेट तथा नृत्य दृश्यों को सरल रेखाओं और आकृतियों द्वारा दर्शाया गया है। वर्तमान जनजातीय कला में भी यथार्थवादी चित्रण की अपेक्षा प्रतीकात्मक शैली अधिक महत्त्वपूर्ण है।

जनजातीय चित्रों में सरल रेखाएँ, ज्यामितीय आकृतियाँ और सामूहिक दृश्य प्रमुख होते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि दोनों ही समाजों में कला का उद्देश्य केवल सौंदर्य प्रदर्शन नहीं, बल्कि जीवन, परंपरा और सामूहिक भावनाओं की अभिव्यक्ति था। सामूहिक जीवन की अभिव्यक्ति भी दोनों में समान रूप से मिलती है।

बूंदी क्षेत्र के शैलचित्रों में समूह में आखेट, नृत्य एवं उत्सवों के दृश्य अंकित हैं। इसी प्रकार आज भी जनजातीय समुदाय सामाजिक अनुष्ठानों  में उसी भांति सामूहिक नृत्य करते हैं।

शैलचित्रों में घेरा बनाकर कंधे पर हाथ रखकर गोलाकर रूप में नृत्य के दृश्य उकेरे गए हैं उसी प्रकार अनेक समुदायों में भी नृत्य की मुद्राओं से समानता मिलती है।  उनकी लोककला और चित्रों में कृषि, पशुपालन, शिकार तथा सामुदायिक उत्सवों का चित्रण मिलता है।

इससे यह संकेत मिलता है कि प्रागैतिहासिक काल से ही सामूहिक जीवन भारतीय संस्कृति का एक महत्त्वपूर्ण आधार रहा है। धार्मिक एवं प्रकृति-पूजक प्रवृत्तियों में भी समानता स्पष्ट दिखाई देती है। प्रागैतिहासिक मानव द्वारा बनाए गए पशु एवं प्रकृति संबंधी चित्र संभवतः धार्मिक या जादुई विश्वासों से जुड़े थे।

वर्तमान जनजातीय समुदाय भी वृक्षों, पर्वतों, नदियों एवं पशुओं की पूजा करते हैं। उनके चित्र एवं प्रतीक धार्मिक आस्था, समृद्धि तथा सुरक्षा से संबंधित होते हैं। इस प्रकार शैलचित्रों की पूरक शैली केवल कला न होकर आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का माध्यम भी थी।

अंततः, सीमित संसाधनों में कला सृजन की प्रवृत्ति भी दोनों को जोड़ती है। प्रागैतिहासिक मानव ने केवल एक रंग और प्राकृतिक शैल सतह का उपयोग कर प्रभावशाली चित्र बनाए। आज भी जनजातीय समुदाय सीमित साधनों में अपनी लोककला को जीवित रखे हुए हैं।

यह उनकी प्रकृति-आधारित, सरल एवं आत्मनिर्भर जीवनशैली को दर्शाता है। अर्द्ध-पूरक शैली भारतीय शैलचित्र कला की एक महत्वपूर्ण शैली है, जिसमें चित्रों को पूर्ण रूप से नहीं भरा जाता, बल्कि उनका कोई आंतरिक या बाहरी भाग अधूरा छोड़ दिया जाता है।

बूंदी जिले के बांका, पलकां एवं कँवरपुरा आदि शैलाश्रयों में इस शैली के अनेक चित्र प्राप्त हुए हैं। विशेष रूप से पशु चित्रों में शरीर का ऊपरी भाग अधूरा छोड़कर केवल आधा भाग अंकित किया गया है। यह शैली वर्तमान जनजातीय समुदायों की कला एवं सांस्कृतिक परंपराओं से कई प्रकार की समानता रखती है।

शैलचित्र- पलकां
शैलचित्र- पलकां

सबसे पहली समानता चित्रण की सहजता और प्रतीकात्मकता में दिखाई देती है। प्रागैतिहासिक मानव ने अर्द्ध-पूरक शैली में चित्रों को पूर्ण यथार्थवादी रूप में प्रस्तुत करने के बजाय संकेतात्मक रूप में बनाया। उसी प्रकार आज भी भील, सहरिया, गरासिया एवं मीणा जनजातियों की लोकचित्रकला में कई आकृतियाँ पूर्ण रूप से नहीं बनाई जातीं, बल्कि प्रतीकों और संकेतों के माध्यम से भाव व्यक्त किए जाते हैं।

उदाहरण के लिए, भील जनजाति की भित्ति चित्रकला में पशुओं और मानव आकृतियों को केवल आवश्यक रेखाओं एवं बिंदुओं द्वारा दर्शाया जाता है, न कि पूर्ण शारीरिक विवरण के साथ। इससे यह स्पष्ट होता है कि दोनों ही परंपराओं में कला का उद्देश्य यथार्थ चित्रण से अधिक सांस्कृतिक अभिव्यक्ति था।

सहरिया जनजाति के घरों की दीवारों पर बने चित्रों में कई बार केवल आधी आकृतियाँ या बाहरी रेखाएँ बनाई जाती हैं, जो अर्द्ध-पूरक शैली की याद दिलाती हैं। विवाह, त्योहार, फसल कटाई एवं धार्मिक अवसरों पर महिलाएँ और पुरुष मिलकर चित्रांकन करते हैं। 

रेखा शैली भारतीय शैलचित्र कला की अत्यंत महत्वपूर्ण और प्राचीन शैली है। भारतीय चित्रकला में रेखा को अभिव्यक्ति का मूल आधार माना गया है। विशेष रूप से बांका शैलाश्रय में घोड़े और जंगली सूअर के चित्र, तथा अलनिया में विशाल जंगली बैल का चित्र रेखा शैली के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

कई स्थानों पर दोहरी रेखाओं द्वारा आंतरिक सज्जा एवं अलंकरण भी किया गया है। यह शैली वर्तमान जनजातीय समुदायों की कला परंपराओं से गहरी समानता रखती है। भील और मीणा समुदाय अपने चित्रों में हिरण, मोर, बैल, घोड़े एवं अन्य पशुओं को रेखात्मक शैली में चित्रित करते हैं।

उदाहरण के लिए, भील चित्रकला में मोर और हिरण की आकृतियाँ केवल कुछ रेखाओं और बिंदुओं से बनाई जाती हैं, जो शैलचित्रों की शैली से अत्यधिक मेल खाती हैं। बूँदी जिले के शैलाश्रयों में प्रयुक्त अलंकरण शैली केवल सौंदर्य प्रदर्शन का माध्यम नहीं थी, बल्कि यह उस समय के मानव के सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक जीवन का प्रतीक भी थी।

बूँदी के रामेश्वर महादेव, नालदह, केवड़िया, पलका तथा आलनिया शैलाश्रयों में मानव और पशु आकृतियों को ज्यामितीय रेखाओं, बिंदुओं, वृत्तों तथा सजावटी आकृतियों से अलंकृत किया गया है। भील और सहरिया जनजाति अपने घरों की दीवारों, वस्त्रों तथा पारंपरिक चित्रों में बिंदु, त्रिकोण, वृत्त और रेखाओं का प्रयोग करती है।

शैलचित्रों में मानव शरीर पर रेखात्मक सजावट, आभूषण तथा विशेष वेशभूषा का अंकन मिलता है। वर्तमान जनजातीय समुदायों में भी शरीर अलंकरण, गोदना पारंपरिक आभूषण और रंगीन वेशभूषा सामाजिक पहचान का महत्वपूर्ण अंग हैं।

उदाहरणतः सहरिया और भील महिलाओं के गोदना डिज़ाइन तथा आभूषणों की रेखात्मक शैली शैलचित्रों की अलंकरण परंपरा की निरंतरता को दर्शाती है। बूँदी जिले के शैलाश्रयों में प्रयुक्त क्षेपांकन शैली (छाया कला) प्रागैतिहासिक मानव की अभिव्यक्ति का अत्यंत महत्वपूर्ण माध्यम थी।

इस शैली में किसी वस्तु या आकृति के बाहरी भाग को उभारकर उसकी छाप बनाई जाती थी, जिससे मूल आकृति को नवीनता और विशेष पहचान मिलती थी। विशेष रूप से हाथों की छाप इस शैली का प्रमुख उदाहरण मानी जाती है।

क्षेपांकन शैली
क्षेपांकन शैली

बूँदी जिले के पलका और गरड़दा शैलाश्रयों तथा आलनिया क्षेत्र में इस प्रकार के हस्तचिह्न प्राप्त हुए हैं। राजस्थान और मध्यप्रदेश के ग्रामीण एवं जनजातीय क्षेत्रों में महिलाएँ त्योहारों, विवाह और धार्मिक अवसरों पर घर की दीवारों पर हल्दी, गेरू या चूने से हाथों की छाप लगाती हैं।

यह परंपरा प्रागैतिहासिक शैलचित्रों की क्षेपांकन शैली से अत्यंत मिलती-जुलती है। यूरोप के प्रागैतिहासिक शैलचित्रों में भी हाथों की छाप मिलती है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह शैली विश्वव्यापी मानव अभिव्यक्ति का एक प्राचीन माध्यम थी।

समालोचनात्मक रूप से देखा जाए तो यह समानता दर्शाती है कि संस्कृति केवल भौतिक विकास पर आधारित नहीं होती, बल्कि उसके वास्तविक वाहक सामान्य जन और उनकी लोकपरम्पराएँ होती हैं, जो हजारों वर्षों बाद भी सांस्कृतिक निरन्तरता को बनाए रखती हैं।

संस्कृति निरन्तर प्रवाहमान परम्परा है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी अपने प्रतीकों और विश्वासों को सुरक्षित रखती है। एडगर डेगा का यह कथन बिल्कुल सार्थक सिद्ध होता है ‘‘कला वह नहीं है जो आप देखते हैं, बल्कि वह है जो आप दूसरों को दिखाने में सक्षम बनाते हैं।”

-डॉ. नेहा प्रधान (प्राकृतिक चिकित्सक)
 सह-आचार्य, कॅरियर पॉइंट यूनिवर्सिटी

कोटा राजस्थान 

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