ज्ञान और भक्ति का पावन संगम : तिरुवोट्टियूर का ऐतिहासिक त्यागराजस्वामी मन्दिर
June 14, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी | रविवार
नक्षत्र: रोहिणी | योग: धृति | करण: शकुनि
पर्व विशेष : | तदनुसार 14 जून 2026

श्रीरामचरितमानस का सुन्दरकाण्ड भारतीय महाकाव्यों में किसी भी महाकाव्य का एक ऐसा अद्वितीय अध्याय है जहाँ महाकाव्य के नायक को पृष्ठभूमि में रखकर उसके परम सेवक को सम्पूर्ण कथा का दायित्व सौंप दिया गया है। यह आलेख इस गूढ़ साहित्यिक तथ्य की अत्यन्त सूक्ष्म मीमांसा प्रस्तुत करता है कि किस प्रकार गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस कांड में हनुमान को सम्पूर्ण अधिकार सौंपकर उन्हें एक स्वतन्त्र और अजेय नायक के रूप में स्थापित किया। सुरसा के प्रसंग से लेकर अशोक वाटिका के विध्वंस और ब्रह्मास्त्र के प्रति सम्मान तक, डॉ. पी. आर. कोसरिया जी ने इस लेख में हनुमान के बुद्धि-कौशल, चातुर्य और अगाध स्वामीभक्ति का अत्यन्त मनोहारी और रचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया है।
महान ग्रन्थ श्रीरामचरितमानस का सुन्दरकाण्ड यद्यपि सम्पूर्ण रामकथा के मध्य एक प्रासंगिक कथावस्तु का ही अंग प्रतीत होता है, तथापि गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस कांड की सम्पूर्ण कथावस्तु को पूरी तरह से पवनपुत्र हनुमान को ही समर्पित करके इसे एक मुख्य कथा का भव्य स्वरूप प्रदान कर दिया है। इस पूरे कांड में कथा के वहन का सम्पूर्ण दायित्व हनुमान पर छोड़ दिया गया है।
मानस के मूल नायक भगवान श्रीराम इस कांड में लगभग अनुपस्थित ही रहते हैं और ऐसा प्रतीत होता है कि इस कांड के लिए तुलसीदास जी ने नायकत्व के समस्त अधिकारों का पूर्ण हस्तान्तरण हनुमान को कर दिया है। इसी अगाध विश्वास के कारण हनुमान कुछ समय के लिए ही सही, मुख्य नायक की भूमिका में आ जाते हैं।
सुन्दरकांड में हनुमान पूर्ण रूप से एक नायक की भूमिका में दृष्टिगत होते हैं। यही कारण है कि इस कांड में हनुमान अनेक स्थानों पर एक स्वतन्त्र नायक की भांति अपने निर्णय स्वयं लेते हैं। दुष्ट रावण की विशाल अशोक वाटिका का विध्वंस करना, अक्षय कुमार का वध करना और सम्पूर्ण लंका नगरी का दहन करना इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं, क्योंकि इन सभी कार्यों को करने का कोई सीधा आदेश हनुमान को नहीं दिया गया था।

सुन्दरकाण्ड के नायक हैं हनुमान
श्रीराम और दल के नायक जामवंत के स्पष्ट निर्देश केवल माता सीता का पता लगाकर वापस लौटने के ही थे। किष्किंधा कांड में श्रीराम का हनुमान के लिए यह स्पष्ट निर्देश था:
बहु प्रकार सीतहि समुझाएहु।
कहि बल बिरह बेगि तुम्ह आएहु।।
इसी प्रकार दल के नायक जामवंत का भी यही निर्देश था:
एतना करहु तात तुम्ह जाई।
सीतहि देखि कहहु सुधि आई।।
इन स्पष्ट निर्देशों के उपरान्त भी सीता जी का पता लगाने और उन्हें मुद्रिका सौंपने के पश्चात् कथा वहाँ समाप्त नहीं होती है। यदि हनुमान तुरन्त वापस लौट आते तो उनका प्रखर नायकत्व कभी उभर कर सामने नहीं आ पाता। इसीलिए तुलसीदास जी ने कथा का विस्तार करते हुए हनुमान से यह कहलवाया:
सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा।
लागि देखि सुन्दर फल रूखा।।
महर्षि वाल्मीकि जी ने भी अपनी रचना वाल्मीकीय रामायण में कथा का इसी प्रकार विस्तार किया है, परन्तु दोनों के मन्तव्य में बड़ा अन्तर है। वाल्मीकि जी ने हनुमान के स्वगत कथन के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि वे शत्रु पक्ष के बल और पराक्रम का भलीभांति परीक्षण करना चाहते थे। वाल्मीकीय रामायण के सुन्दरकांड के 41वें सर्ग के तीसरे श्लोक में हनुमान विचार करते हैं: पराक्रमस्त्वेष ममेह रोचते।। अर्थात् यहाँ मुझे पराक्रम दिखाना ही सर्वथा उचित जान पड़ता है। इसी सर्ग के 7वें श्लोक में वे पुनः विचार करते हैं:
इहैव तावत्कृतनिश्चयो ह्यहं, व्रजेयमद्य पल्वगेश्वरालयम्।
परात्मसम्मर्दविशेषतत्ववित् ,ततः कृतं स्यान्मम भतृशासनम्।।
इसका अर्थ है कि यदि इसी यात्रा में मैं इस बात को ठीक-ठीक समझ लूँ कि अपने और शत्रु पक्ष में युद्ध होने पर कौन प्रबल होगा और कौन निर्बल, तत्पश्चात् भविष्य के कार्य का निश्चय करके सुग्रीव के पास चलूँ, तो मेरे द्वारा स्वामी की आज्ञा का पूर्णरूप से पालन हुआ समझा जाएगा। वाल्मीकि जी का यह वर्णन मनोवैज्ञानिक दृष्टि से अत्यन्त उपयुक्त है। इसके विपरीत तुलसीदास जी ने ऐसा कोई स्पष्टीकरण न देकर हनुमान के भीतर छिपे अजेय नायकत्व को पूर्ण रूप से प्रस्फुटित होने का सीधा अवसर प्रदान किया है।
महर्षि वाल्मीकि जी अपनी रचना में श्रीराम को मुख्य रूप से एक प्रभावशील और आदर्श महापुरुष के रूप में ही चित्रित करते हैं। वाल्मीकीय रामायण में श्रीराम के लिए 'नरश्रेष्ठ' और 'पुरुषर्षभ' जैसे विशिष्ट शब्दों का प्रयोग हुआ है। बालकांड के 75वें सर्ग के 12वें श्लोक में परशुराम जी कहते हैं:
अनुसृष्टं सुरैरेकं त्र्यम्बकाय युयुत्सवे।
त्रिपुरघ्नं नरश्रेष्ठ भग्नं काकुत्स्थ यत्त्वया।।
इसी प्रकार शरभंग ऋषि भी श्रीराम को 'महात्मनः' कहकर सम्बोधित करते हैं:
त्वयाहं पुरषव्याघ्र धार्मिकेण महात्मनः।
समागम्य गमिष्यामि त्रिदिवं चामरं परम्।।
अरण्यकांड में माता शबरी भी श्रीराम के लिए 'पुरुषर्षभ' शब्द का ही प्रयोग करती हैं:
मया तु विविधं वन्यं संचितं पुरुषर्षभ।
तवार्थे पुरुषव्याघ्र पम्पायास्तीरसम्भवम्।।
किन्तु गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपनी महान रचना में श्रीराम के भीतर साक्षात् परब्रह्म के ईश्वरत्व को पूरी तरह से समाहित किया है। जब हनुमान समुद्र लांघते हैं, तो वे साक्षात् भगवान का स्मरण करते हैं:
बार बार रघुबीर सँभारी।
तरिकेउ पवन तनय बल भारी।।

प्रभु राम को समर्पित है हनुमानजी का हर कार्य
तुलसीदास जी ने हनुमान के चरित्र में वे सभी श्रेष्ठ लक्षण समाहित किए हैं जो एक आदर्श नायक में होने चाहिए। हनुमान पवनपुत्र हैं। जब समुद्र पार करने की बारी आई और सुग्रीव की वानर सेना के वीर अपनी असमर्थता प्रकट करने लगे, तब जामवंत ने हनुमान को उनकी उस असीम शक्ति का स्मरण कराया:
कहइ रीछपति सुनु हनुमाना।
का चुप साधि रहेहु बलवाना।
पवन तनय बल पवन समाना।
बुधि बिबेक बिग्यान निधाना।
कवन सो काज कठिन जग माहीं।
जो नहिं होत तात तुम्ह पाहीं।।
शक्ति का स्मरण होते ही हनुमान लंका की ओर उड़ान भरते हैं। मार्ग में देवतागण उनकी प्रत्युत्पन्नमति का परीक्षण करने के लिए सुरसा को भेजते हैं। हनुमान अत्यन्त छोटा रूप धारण करके उसके मुख में प्रवेश करते हैं और कुशलतापूर्वक बाहर आ जाते हैं। सुरसा अत्यन्त प्रसन्न होकर कहती है:
मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा।
बुधि बल मरमु तोर मैं पावा।।
वानर सेना में हनुमान के सर्वाधिक महत्त्व का पूर्व संकेत तुलसीदास जी ने तभी दे दिया था जब श्रीराम ने अपनी मुद्रिका केवल हनुमान को ही सौंपी थी। जब त्रिजटा के जाने के पश्चात् माता सीता अत्यन्त दुखी होकर अग्नि की याचना कर रही थीं, उसी उचित अवसर पर हनुमान ने ऊपर से मुद्रिका नीचे गिरा दी:
कपि करि हृदयँ बिचार, दीन्हि मुद्रिका डारि तब।
जनु अषोक अंगार, दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ।।

मुद्रिका गिरते ही हनुमान जी ने किया रामजी का गुणगान
मुद्रिका गिराने के पश्चात् सीता जी के मन में उत्पन्न आशंकाओं को दूर करने के लिए हनुमान ने श्रीराम के पावन गुणों का गान आरम्भ कर दिया:
रामचन्द्र गुन बरनैं लागा।
सुनतहिं सीता कर दुख भागा।।
परन्तु सीता के कहने पर जब हनुमान उनके समक्ष आते हैं, तो वे सहसा विश्वास ही नहीं कर पाती हैं कि रामकथा सुनाने वाला कोई वानर भी हो सकता है। उनके मन में यह सन्देह भी उत्पन्न होता है कि यदि यह वास्तव में वानर ही है, तो यह उनके किस काम आ सकता है। तब हनुमान जी एक बार पुनः अपने चातुर्य का प्रयोग करते हैं और पूर्ण श्रद्धा के साथ कहते हैं:
राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की।।
यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हीं राम तुम्ह कहँ सहिदानी।।
जब हनुमान जी सम्पूर्ण वृत्तान्त विस्तारपूर्वक सुनाते हैं कि किस प्रकार नर वानर की मित्रता हुई, तब जाकर माता सीता को उन पर पूर्ण विश्वास हो पाता है।
कपि के बचन सप्रेम सुनि, उपजा मन बिस्वास।
जाना मन क्रम बचन यह, कृपासिन्धु कर दास।।
हनुमान का लंका में उत्पात मचाने का विचार केवल रावण को अपनी शक्ति का अनुभव कराने के लिए था। हनुमान ने पहले ही मैनाक पर्वत से यह उद्घोष कर दिया था: राम काज कीन्हें बिनु, मोंहिं कहाँ बिश्राम। अतः राम काज पूर्ण होने के पश्चात् ही उन्होंने रावण को खुली चुनौती देने का निश्चय किया। सीता जी ने भी हनुमान के बुद्धि-बल को परखने के उपरान्त ही उन्हें फल खाने की अनुमति प्रदान की थी:
देखि बुद्वि बल निपुन कपि, कहेउ जानकी जाहु।
रघुपति चरन हृदय धरि, तात मधुर फल खाहु।।

राम काज कीन्हें बिनु, मोंहिं कहाँ बिश्राम
इस सम्पूर्ण प्रसंग में हनुमान एक विजेता नायक की भांति आचरण करते हैं। जब मेघनाद उन पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करता है, तो वे ब्रह्मा जी के अस्त्र का पूर्ण सम्मान रखने के लिए अपनी ही इच्छा से उसमें बंध जाते हैं: जो न ब्रम्ह सर मानउँ, महिमा मिटै अपार।
तो हमारी इस पूरी बात के साररूप में कहें तो श्रीरामचरितमानस की सहायक कथावस्तुओं का प्रदर्शन अत्यन्त सशक्त और दमदार रहा है जिसके कारण इसकी मुख्य कथावस्तु बेहद ही रोमांचक हो गई है। यदि हम मानस की नाट्य शैली में सुन्दरकांड की कथावस्तु पर विचार करें तो यह निस्संदेह कहा जा सकता है कि इस कांड की कथावस्तु मानस के अन्य सभी कांडों से एकदम पृथक है।
मानस में सुन्दरकांड ही एकमात्र ऐसा कांड है जो मूलतः एक सहायक कथावस्तु होते हुए भी पूर्ण रूप से पवनपुत्र हनुमान को समर्पित है और इसी कारण यह मुख्य कथावस्तु की समस्त विशेषताओं से सुसज्जित हो गया है। इस अद्भुत कांड का सर्वमान्य नायक हनुमान को ही ठहराया जा सकता है। यही नहीं यदि हम सुन्दरकांड की कथावस्तु को एक स्वतन्त्र कांड के लिए मुख्य कथावस्तु के स्थान पर रखकर देखें तो मैनाक, सुरसा, लंकिनी, त्रिजटा और हनुमान विभीषण संवाद आदि के प्रसंग स्वयं ही इस महान नायक की सहायक कथावस्तु की श्रेणी में आ जाते हैं।
-डॉ० पी० आर० कोसरिया
(लेखक वरिष्ठ शिक्षाविद्, भाषाविद व पूर्व प्राचार्य हैं, जो अपनी लेखनी से भाषाई शोध, लोक-संस्कृति और आध्यात्मिक विषयों पर निरंतर वैचारिक योगदान करते हैं।)
प्रासंगिक कथावस्तुओं में सुन्दरकाण्ड
May 14, 2026