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जनजातीय वर्ग के विरुद्ध अंग्रेजों के षड्यंत्र

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अंग्रेजों ने अपनी राजसत्ता कायम रखने के लिए भारतीय समाज को तोड़ने के, आपस में मन-मुटाव पैदा करने के कई तरीके अपनाए। इस बात पर आज कोई दो-मत नहीं हैं। और फिर हमने अभी चर्चा की ही कि कैसे अंग्रेजों की राह में सबसे ज्यादा प्रतिरोध जनजातीय समाज ने उत्पन्न किए। तो यह स्वाभाविक ही था कि अंग्रेजों ने अपने षड्यंत्रों का शिकार भी सबसे ज्यादा जनजातीय समाज को ही बनाया।

फ़िल्मों और पुस्तकों के माध्यम से उन्हें असभ्य, क्रूर क्या-क्या नहीं सिद्ध किया गया। यहाँ तक कि क्रिमिनल ट्राइब एक्ट बनाकर पूरे जनजातीय समाज को ही अपराधी घोषित कर दिया। इस कानून के तहत इन घोषित आपराधिक जनजातियों में पैदा होने वाला शिशु भी जन्म से अपराधी माना जाने लगा। और आज भी इसका कैसा दुष्प्रभाव है इसके लिए एक प्रसंग से समझने का हम प्रयत्न करते हैं।

तो बात कुछ ऐसी है कि मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के मछलिया घाट थाने में थानेदार के पद पर एक युवा थानेदार की नियुक्ति हुई। लोगों की धारणा थी कि वहाँ लूट-पाट की घटनाएँ बहुत होती हैं। तो युवा थानेदार ने पूरे घाट वाले रास्ते के किनारों पर यह लिखवा दिया कि यह चोरों-लूटेरों का इलाकों है और इसलिए यात्री वाहन सम्हल कर चलाएँ। इस मछलिया घाट थाने के इर्द-गिर्द भीलों की अनेक बस्तियाँ हैं। थानेदार द्वारा ऐसा कराए जाने पर भीलों में रोष व्याप्त हो गया। कुछ भील नवयुवकों ने थानेदार के पास जाकर आपत्ति दर्ज कराई।

पर इसमें थानेदार की गलती क्या थी? कुछ नहीं। आप हैरान होंगे कि कोई ऐसा कैसे कह सकता है। पर ऐसा ही है। दरअसल भील समुदाय को अंग्रेजों ने क्रिमिनल ट्राइब एक्ट के तहत आपराधिक ट्राइब घोषित कर रखा था। इसलिए समय के साथ सामान्य जनमानस में भी यही बात स्थापित हो गई कि भीलों का क्षेत्र यानी अपराधियों का क्षेत्र और इसलिए वहाँ होने वाली प्रत्येक अप्रिय घटना के लिए भीलों को ही जिम्मेदार समझा जाता है।

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राणा पूंजा भील

पर हमने अभी देखा कि कैसे समय-समय पर भीलों ने समाज के हित में अपने प्राणों का भी बलिदान किया, तो क्या वे भील अपने ही लोगों को लूटने-मारने का काम करते? नहीं न! पर जैसा अंग्रेज कहते, वैसा ही हम मानते; इस प्रवृत्ति ने प्रत्येक भील को जन्म से ही अपराधी की संज्ञा दे रखी थी। हमें इसे बदलना तो होगा। 

इसी तरह अंग्रेजों ने भारत के राजनीतिक इतिहास से भी जनजातियों को सोचे-समझे षड्यंत्रों के तहत निकाल दिया, क्योंकि अपने साम्राज्य का सूर्यास्त न होने की डींगे हाँकने वालों के लिए अपनी पराजय के किस्से अपमानजनक थे। हमने अभी अपनी चर्चा में रानी कमलापति का एक उदाहरण देखा कि कैसे भोपालवासियों को ही नहीं पता कि 200 साल पहले तक भोपाल गोंड साम्राज्य का अंग था।

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भोपाल की अंतिम गोंड रानी कमलापति

ऐसे ही नागपुर के रहने वालों को भी नहीं पता है कि नागपुर की स्थापना ही गोंडों ने की थी। देवरी के गोंड राजाओं का इसका श्रेय जाता है। इस गोंड साम्राज्य की समृद्धि की कल्पना इस बात से की जानी चाहिए कि इतिहास में ऐसे कई अवसर आए, जब इन गोंडों ने मुगल सल्तनत को कर्ज दिए। पर हमनें तो यही पढ़ा है कि जनजातीय समाज के लोग सदा ही अशिक्षित और गरीब ही रहे हैं।


नागपुर शहर के संस्थापक गोंड राजा बख्तबुलंद शाह 

कुल मिलाकर अंग्रेजों ने अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए और सर्वश्रेष्ठता के अपने झूठे दम्भ को पालने-पोसने के लिए समाज के बीच ऐसे झूठ सच के रूप में स्थापित किए कि हम भारतीय अपने स्वत्व से अलग हो जाएँ। क्योंकि ‘स्व’ के विचार के बिना स्वतंत्रता भला कैसे सार्थक हो पाती। पर हमारा सौभाग्य है कि आज भी इतिहास के अनेक ऐसे पन्ने सुरक्षित हैं, जिनसे हम अंग्रेजों के फैलाए झूठ के बादलों को छाँट कर फिर से सत्य की प्रतिष्ठा कर सकें। यह समाज की नैतिक जिम्मेदारी भी है कि जनजातीय समाज के गौरवशाली अतीत को सामने लाये और हमारे महापुरुषों को समाज में स्थान दें। 


लेख:
वेद प्रकाश सिंह ठाकुर,
संपादक, दक्षिण कोसल टुडे

 

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