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चित्रकूट: प्रकृति और संस्कृति का संगम

चित्रकूट: प्रकृति और संस्कृति का संगम


भारतीय संस्कृति का मूल आधार प्रकृति के प्रति अगाध श्रद्धा है, जहाँ पृथ्वी को माता, नदियों को जीवनदायिनी, पर्वतों को देवतुल्य और समस्त चराचर जगत में ईश्वर का निवास माना गया है। अथर्ववेद का यह उद्घोष "माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः" हमारी उस जीवन-दृष्टि को दर्शाता है, जिसमें पर्यावरण संरक्षण किसी बाहरी कानून या प्रतिबंध का परिणाम नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति के संस्कारों और आत्मीयता का सहज हिस्सा है।


कैलाश, गोवर्धन और चित्रकूट पर्वत

आज के वैश्विक पर्यावरणीय संकट के दौर में, भारतीय संस्कृति का यह दृष्टिकोण, जो प्रकृति के साथ दोहन नहीं बल्कि सामंजस्य की बात करता है, अत्यंत प्रासंगिक और अनुकरणीय हो गया है। भारतीय संस्कृति के केंद्र में पर्वतों का विशेष महत्व है, जिन्हें केवल भूगर्भीय संरचना न मानकर चैतन्य शक्ति और देवताओं का निवास माना जाता है। गोवर्धन पर्वत से लेकर कैलाश और चित्रकूट तक, ये पर्वत भारतीय अध्यात्म और जीवन-मूल्यों के संरक्षक रहे हैं।

गोवर्धन ने जहाँ श्रीकृष्ण के माध्यम से प्रकृति के सम्मान का संदेश दिया, वहीं चित्रकूट भगवान श्रीराम की तपस्या, त्याग और धर्मपालन की पावन साक्षी स्थली बनकर उभरा है। भारतीय परंपरा में इसी श्रद्धा-आधारित मॉडल ने वनों, नदियों और जीव-जंतुओं को सदैव संरक्षित रखा है। चित्रकूट का दिव्य वैभव श्रीराम के वनवास के उन ग्यारह वर्षों का जीवंत इतिहास है, जो केवल कष्ट नहीं, बल्कि धर्म और मानवता के उत्सव के रूप में व्यतीत हुए। मंदाकिनी के तट पर बसा यह पावन पर्वतीय क्षेत्र आज भी उस कालखंड की शांत पर्वतमालाओं और मधुर वातावरण को समेटे हुए है। 


भरत मिलाप

यहाँ हुआ 'भरत मिलाप' इतिहास का वह प्रसंग है, जिसने त्याग और भाईचारे का सर्वोच्च आदर्श प्रस्तुत किया। कामदगिरि पर्वत की परिक्रमा, रामघाट की सांध्यकालीन आरती, और जानकी कुंड व स्फटिक शिला जैसे स्थान आज भी श्रद्धालुओं को प्रभु राम की उपस्थिति का मानसिक अनुभव कराते हैं।


भरत मिलाप मंदिर चित्रकूट

गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी इसी चित्रकूट की महिमा गाते हुए अपने जीवन की सार्थकता राम-दर्शन के रूप में यहाँ प्राप्त की थी। 'श्रीरामचरितमानस' के अयोध्या कांड में, जब श्रीराम महर्षि वाल्मीकि के आश्रम पहुँचकर उनसे निवास के लिए उपयुक्त स्थान पूछते हैं, तब वाल्मीकि जी उन्हें चित्रकूट जाने का सुझाव देते हुए वहाँ की प्रकृति और महिमा का वर्णन करते हैं:

चित्रकूट गिरि करहु निवासू।
तहँ तुम्हार सब भाँति सुपासू॥

सैलु सुहावन कानन चारू।
करि केहरि मृग बिहग बिहारू॥

अर्थात आप चित्रकूट पर्वत पर निवास कीजिए, वहाँ आपके लिए सब प्रकार की सुविधा है। वह अत्यंत सुहावना पर्वत है और सुंदर वन है, जहाँ हाथी, सिंह, हिरण और पक्षी स्वच्छंद विहार करते हैं।


रामघाट

तुलसीदास जी ने चित्रकूट के पर्वत को 'कामदगिरि' (इच्छाएं पूर्ण करने वाला) कहा है। उनका मानना था कि इस पवित्र क्षेत्र के दर्शन मात्र से ही मनुष्य के जीवन के सभी संताप और दुख मिट जाते हैं:

कामदगिरि भे राम प्रसादा।
अवलोकत अपहरत बिषादा॥

अर्थात, भगवान श्रीराम की कृपा से यह पर्वत 'कामद' (मनोकामना पूर्ण करने वाला) हो गया है, जिसके दर्शन मात्र से ही सारे दुख और विषाद दूर हो जाते हैं।

आज चित्रकूट न केवल एक प्रमुख तीर्थ और पर्यटन केंद्र है, बल्कि गोसेवा, जैविक कृषि और ग्रामीण स्वावलंबन के माध्यम से भारतीय जीवन-मूल्यों के संरक्षण का भी एक आदर्श स्थल बना हुआ है। विकास का मार्ग प्रकृति के साथ साहचर्य और संवर्धन में निहित है। 

यदि हम वृक्षों को देवता, नदियों को माता और धरती को अपनी आधारशिला मानकर आचरण करें, तो पर्यावरण संरक्षण किसी सरकारी योजना का विषय न रहकर हमारे दैनिक जीवन का स्वाभाविक अंग बन जाएगा। यही चित्रकूट एक संदेश है, जिसे अपनाकर हम भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित और समृद्ध पृथ्वी का निर्माण कर सकते हैं।

लेख -
श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव
भोपाल, मध्यप्रदेश

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