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पर्व विशेष : | तदनुसार 06 सितंबर 2026

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छेरछेरा: पौष पूर्णिमा पर लोकआस्था का पर्व

छेरछेरा: पौष पूर्णिमा पर लोकआस्था का पर्व

छेर छेरा कोठी के धान हेर हेरा
छत्तीसगढ़ में छेरछेरा पर्व पौष महीने के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। किसान अपनी फसल की कटाई-मड़ाई कर अनाज को कोठी-खलिहान में सुरक्षित रख लेते हैं। इन्द्रदेव की कृपा से जब अच्छी वर्षा होती है और भरपूर फसल होती है, तब किसानों का हृदय आनंद से भर उठता है।

छत्तीसगढ़ में इस दिन सभी बच्चे और बड़े छेरछेरा माँगने निकलते हैं और गीत गाते हैं—
“छेरिक छेरा, छेर मरकनिन छेर छेरा,
माई कोठी के धान ल हेरहेरा।”

छेरछेरा पर्व में दान हेतु अन्न रखते हुए

दफड़ा, गुदुम और मोहारी की धुन पर सब लोग मग्न होकर नाचते हैं। जब विदाई में देर होती है, तब दूसरा गीत गाया जाता है—
“तारा रे तारा, अंगरेजी तारा,
जल्दी-जल्दी विदा कर दो, हम दूसरे पारा जाएंगे।”
“अरन-बरन कोदो दरन,
जभे देबे तभे टरन”

हमारे छत्तीसगढ़ में एक और प्रथा भी है। किसान अपने कोठार या खलिहान में धान की मड़ाई के अंतिम दिन वहाँ उपस्थित सभी लोगों पर धान निछावर करते हैं।
जब किसान की धान की मड़ाई पूरी हो जाती है, तभी यह सामूहिक समापन “छेरछेरा पूर्णिमा” के पर्व के रूप में मनाया जाता है।

छेरछेरा पर्व में अन्न दान करते हुए

छेरछेरा पर्व से जुड़ी एक लोककथा भी है। बहुत समय पहले बड़े-बड़े जमींदार अपने धान और कोदो को मड़ाई-कुटाई कर कोठियों में भर लेते थे, जबकि गरीब मजदूर अन्न के एक-एक दाने को तरसते थे। भूख से उनके पेट जलते रहते थे। धरती माता अपने मेहनतकश बेटों को भूख से मरते हुए नहीं देख सकीं। उन्होंने भयानक अकाल ला दिया। धरती बंजर हो गई। एक भी हरी पत्ती नहीं उगी। अन्न और पानी के लिए हाहाकार मच गया। इस विपत्ति से बचने के लिए जमींदारों ने धरती माता की पूजा-अर्चना शुरू की।

सात दिनों तक पूजा की गई। पूजा समाप्त होने के बाद धरती माता प्रकट हुईं। सभी ने जय-जयकार किया। तब धरती माता ने जमींदारों से कहा—
“सभी लोग अपनी-अपनी उपज को …“ठोमा-खोंची का हिस्सा बनिहार को दान करो। किसी को छोटा और किसी को बड़ा मत समझो। कोई गरीब हो या अमीर, धान-कोदो का दान लो और दो, तभी तुम्हारी प्रशंसा होगी।”
देवी की बात को सभी लोगों ने हँसी-खुशी स्वीकार कर लिया। तब धरती माता ने अन्न, पानी, साग-भाजी, कंद-मूल, फल-फूल और जड़ी-बूटियों की वर्षा कर दी। लोगों के मन में खुशहाली छा गई। आदिशक्ति माता शाकंभरी देवी के रूप में प्रकट हुईं। इस दिन को शाकंभरी जयंती के रूप में भी मनाया जाता है।

छेरछेरा पर्व में बच्चे दान लेते हुए

छेरछेरा के दिन सभी लोग जाति-धर्म, ऊँच-नीच तथा छोटे-बड़े के भेदभाव को भूलकर अन्न दान माँगने निकलते हैं। धान-कोदो का दान किसी बर्तन में नहीं लिया जाता, बल्कि टुकना, चरिहा अथवा सुपा-टोपली में दिया जाता है।
छत्तीसगढ़ में छेरछेरा के दिन हँसी-खुशी की धारा बहती है। न कोई बड़ा होता है, न कोई छोटा—सभी बराबर होते हैं। इस दिन से सभी लोग धान-कोदो का दान लेते और देते हैं।
छेरछेरा पर्व हम सभी को मिल-जुलकर रहना सिखाता है और आपस में बाँटकर खाने की सीख देता है। यह छत्तीसगढ़ के सभी बच्चों और बुजुर्गों के लिए समानता का त्योहार है। छेरछेरा के दिन धान या रुपए-पैसे का दान किया जाता है

गोपी कृष्ण सोनी (शिक्षक)
नेउर, तहसील पंडरिया
जिला कबीरधाम

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