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सांस्कृतिक व शैक्षिक तत्वों से भरपूर है:छतीसगढ़ी लोक खेल

सांस्कृतिक व शैक्षिक तत्वों से भरपूर है:छतीसगढ़ी लोक खेल


भारत की समृद्ध लोक परंपराओं में 'लोक खेलों का बड़ा ही सुंदर समायोजन है। यह बच्चों के बचपन से लेकर बड़े-बूढ़ों की प्रौढ़ावस्था तक विशुद्ध मनोरंजन करने के साथ ही शारीरिक एवं मानसिक विकास के विभिन्न तत्वों को अपने आंचल में समेटे हुए हैं। जहां इनसे प्रदेश की लोक संस्कृति का प्रत्यक्ष प्रदर्शन होता है। वहीं बच्चों की भाषाई विकास का यह एक शैक्षिक एवं महत्वपूर्ण आधार भी होता है। इनमें अनेक विशेषताएं तो समाहित होती ही हैं। साथ में इसे अलग से न सीख कर बच्चे अपने संगी-साथियों,  बालिकाएं अपनी सखी-सहेलियों और युवा एवं प्रौढ जन अपने संगी-संगवारियों के साथ बैठकर परंपरा से अभ्यास करते रहते हैं। वहीं अपनी बातचीत की सीधी संवाद शैली से विभिन्न लोक खेलों की सैद्धांतिक जानकारी, नियमों, शर्तों, हार-जीत की स्थितियां आदि को भी आत्मसात करते हैं।

सबसे बड़ी बात यह है कि इन खेलों में जहां हार-जीत का भावना प्रधान नहीं होता और न ही किसी तरह की आपसी रंजिश, और तो और इससे वाद-विवाद स्थितियां निर्मित नहीं होती।  यह खेल की विशुद्ध भावनाओं को निरंतर पल्लवित करने पर आधारित होते हैं। यही कारण है कि यह लोग जीवन के दर्शन को भी स्पष्ट करती हैं। साथ ही इसमें किसी तरह के महंगे, जटिल व नुकसान देह सामग्रियों का समावेश आवश्यक सामग्रियों के रुप में नहीं होना भी अपने आप में एक खास विशेषता है। इसके प्रचलन की पृष्ठभूमि पर दृष्टिपात करने से स्पष्ट होता है कि यह प्रदेश के पुरखों की दूरगामी सोच का परिणाम रहा होगा?  जब ऐसे लोक खेलों, बाल-खेलो की शुरुआत केवल स्वस्थ मनोरंजन ही नहीं, बल्कि जीवन के विभिन्न पहलुओं में कुशल होने के लिए की गई होगी?

छत्तीसगढ़ की लोक खेल परंपरा
छत्तीसगढ़ की लोक खेल परंपरा

इन खेलों के माध्यम से यहां आज से 50 वर्ष पूर्व तक जब सूचना व संचार, दृश्य-श्रव्य सामग्रियों का आविष्कार और प्रचलन जन समुदाय के मध्यम नहीं हुआ था। तब तक बच्चे, युवा, बालिकाएं, प्रौढ़, महिलाएं चौक-चौपालों पर अपनी-अपनी रुचि के खेल आदि से ही मनोरंजन करते दिखाई पड़ते थे। भले ही अब ऐसी स्थितियां न रही हों, पर बच्चों, युवाओं व बालिकाओं में आज भी लोक खेल प्रचलित हैं।

प्रचलित लोक खेल:-
भले ही आज सूचना व संचार के आधुनिक संसाधन घरों-घर और हर परिवार के पास उपलब्ध है। यहां तक कि प्रत्येक युवक-युवतियों के पास एंड्राइड मोबाईल फोन उपलब्ध है, जिससे वे अपना संपूर्ण मनोरंजन कर लेते हैं। बावजूद इसके ग्रामीण क्षेत्र से लेकर शहरी क्षेत्रों में जहां चार बच्चे एकत्र हुए कि उनमें लोक खेलों की शुरुआत हो जाती है। कुछ खेलों के लिए किसी तरह के संसाधन या वस्तु की आवश्यकता नहीं होती ऐसे में भी तीन-चार बच्चे एकत्र होते ही अपना मनोरंजन का रास्ता निकाल लेते हैं। यही इन खेलों की विशेषता भी है। सरल और उपलब्ध वस्तुओं का उपयोग ही लोक खेलों को आज भी लोकप्रिय की श्रेणी में रखा हुआ है।

यहां बहुत-से खेल मौसम, ऋतु, स्थान, कृषि संस्कृति, तीज- त्यौहार आदि पर आधारित होते हैं। वहीं घरों में उपलब्ध सामग्रियों पर भी आधारित हैं। इन खेलों की श्रृंखला में अंधियारी-अंजोरी, अटकन-भटकन, अटकन भटकन, अत्ती-पत्ती, चुटिया- मुटिया, खटिया-पाटी, खोखो मोखो डलिया, डंडा पौहा, गाडा़-गाड़ी,  गेंड़ी दौड़, घर-गुंदिया, घानी-मनी, चूरमुंदरी, लंगडी, डंडा पिचरंगा, चिंगारी बरबटी,उलानबाटी, टोपा बंधान, घोड़ा हे बदाम खाई,नौ गोटिया, डंडा पौहा, नूनसूर, नदी-पहाड़, डंडा-लुकउल,  परी- पत्थर,  पोशम्पा, फल्ली,  फुगड़ी, घोड़ा कुदाल, बिल्र्लास, चोर- पुलिस,  भोटकुल, सोना-चांदी, गोंटा, जलेबी दउड़, , गोली चम्मस, छू-छुवौल, भोटकुल, हाथ खींचनी, सूर आदि आज जनसमुदाय के किसी के स्वरुप में आज प्रचलित‌ लोकप्रिय हैं।

गेंड़ी खेल की लोक परंपरा
गेंड़ी खेल की लोक परंपरा

खेलों की श्रेणियां:-
बच्चों सहित बड़ों में प्रचलित लोक खेलों को अलग-अलग श्रेणियों में रखा जा सकता है। क्योंकि बच्चों की पसंद बढ़ती उम्र से लेकर युवा और प्रौढ़ होते-होते बुढ़ापे तक अभिरुचियां बदलती रहती हैं। ऐसे में मानसिक एवं बौद्धिक स्तर में काफी भिन्नता आती है। इसके परिणाम स्वरुप वह अलग-अलग खेलों से अपने मनोरंजन करने का प्रयास करते हैं। यही बात इन्हें अलग-अलग श्रेणियों में रखती है।

01 बाल खेल:- इस तरह के खेलों को नन्हें शिशु से लेकर आठ-दस वर्ष के बच्चे आपस में खेलते हैं, जो प्रायः घरों के भीतर, आंगन या घर के आसपास गलियों में संपन्न होता है। इसमें अंधियारी-अंजोरी, चूड़ी लुकउल, घर- घुंदिया, पिट्टुल, पूक आदि शामिल है।
02 किशोर-किशोरियों के खेल:- इन खेलों में 11-12 से 16-17 साल तक के किशोर- किशोरियों अपनी रुचि के अनुसार घर या  बाहर मैदान आदि स्थलों का चयन कर अपने संगी-साथियों के साथ खेल कर मनोरंजन करते हैं।इसमें गिल्ली डंडा, गाड़ी दौड़, उलानबांटी, भौंरा, भीतरी पतंग, झोरपा पतंग, बिल्लस, डंडा-पिचरंगा आदि शामिल है।
03 प्रौढ़ और बुजुर्गों के खेल:- इन खेलों में मानसिक व बौद्धिक प्रयास करने की जरूरत पड़ती है। ऐसे खेलों में बड़े-बूढ़े  ज्यादा रुचि लेते हैं। जैसे:-तिरीपासा, चौसर, रस्सा खींच,  नारियल फेंक, बैल दौड़, गाड़ी दौड़ आदि।

बुज़ुर्ग  चौसर खेलते हुए 
बुज़ुर्ग  चौसर खेलते हुए 

खेलों के शैक्षिक लाभ:-
छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति में प्रचलित खेलों की बड़ी महत्ता है। इनके माध्यम से शिक्षा के महत्वपूर्ण उद्देश्य पूर्ण होते हैं। सबसे पहली बात तो इससे बच्चों का अपने सहपाठियों, हम उम्र तथा अपने से बड़ों के साथ रहने से भाषाई कौशलों का विकास होता है। वहीं निरंतर संवाद करते हुए स्थानीय परिवेश, आपसी संवाद, भाषा शैली और अपने जीवन कौशल को निरंतर सीखने चले जाते हैं। साथ ही खेलों के नियमों, हार-जीत की भावना, आपसी सामंजस्य जैसे उच्च मानवीय गुणों का विकास होता है। साथ ही नेतृत्व करते हुए किसी काम को संपादित करने, कठिनाइयों का सामना करने, कुछ न कुछ बनाने जैसी प्रक्रिया से गुजरते हैं, जो उनके भावी जीवन की दिशा भी तय करती है। इस तरह प्रचलित लोक खेलों की महत्ता केवल मनोरंजन तक सीमित न होकर इसके शैक्षिक उद्देश्य भी निश्चित हैं; जो कहीं-न-कहीं बच्चों के बहुआयामी व्यक्तित्व को विकसित और समृद्ध करते हैं।

खेलों से संस्कृति का संवर्धन:-
प्रदेश में प्रचलित खेलों से स्थानीय संस्कृति का संवर्धन भी सुनिश्चित हो पाता है। जब शिशु से लेकर युवक- युवतियां, प्रौढ़ और बड़े-बूढ़े अपने मनोरंजन के साधनों के रुप में इन खेलों को अपनाते हैं। तब वे अपनी संस्कृति के साथ सीधे जुड़ते हुए इसे आने वाली पीढ़ियों में हस्तांतरित करते हैं। इसके प्रदर्शन के दरमियान बहुत सारे कौशल, संवाद कौशल सहित गीतों का हस्तांतरण परंपरा से होती रहती है। यह प्रदेश की वाचिक परंपरा को समृद्ध करने में सहायक होते हैं। प्रदेश में प्रचलित बाल व खेल गीतों की अपनी समृद्धि परंपरा है। यह लोक साहित्य की कोठियों को निरंतर समृद्ध करते हैं।

"अटकन मटकन दही चटाकन,
लउहा लाटा बन मं कांटा। 
सावन में बुंदेला पाके,
चल चल बिटिया गंगा जाबो।
गंगा ले गोदावरी,
पक्का पक्का बेल‌ खाबो।।
बेल‌के डारा टूट गे,
भरे कटोरा फूट गे।।"

खेल-गीतों की लोक परंपरा
खेल-गीतों की लोक परंपरा

जैसे बाल खेलगीत हमारी संस्कृति और शब्दावलियों का मौलिक रुप से मुखरित होने से लोगों को शरीर के नश्वरता तक भी ले जाती है। इसी तरह पहली बारिश होने पर बच्चे गांव के मैदान में अपने सहपाठियों, संगी-साथियों के हाथ पकड़ कर चारों ओर घूमते हैं और गीत गाते हैं:-

"घानी मुनि घोर दे, पानी दमोर दे।
 हमर खेत लाल भैया, दूध दही ले बोर दे।।"

इस तरह से वर्षा के देवता इंद्र को अपनी अर्जी खेलों के माध्यम से नन्हें शिशु पहुंचाते हैं और अपने माता-पिता सहित संपूर्ण ग्राम वासियों, प्रदेश वासियों और देशवासियों की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। इसी तरह से:-

"केऊं मेऊं मेकरा के जाला,
जा रे री बिलइया बुद्धु के पारा।"

जैसे गीत भी प्रचलित हैं, जो आमने-सामने बैठकर एक दूसरे से कान पड़कर केऊं मेऊं नामक खेल खेलते हैं और ऐसे सुंदर ध्वन्नियात्मक शब्दों के उच्चारण से बच्चों में कठिन और प्रचलित शब्दों को शुद्धता के साथ उच्चारण करने की शैक्षिक कुशलता भी प्राप्त होती है। इन खेलों के माध्यम से कहीं-कहीं प्रकृति और पर्यावरण का ज्ञान बच्चों को सहजता के साथ प्राप्त होता है। जब डंडा पिचरंगा खेलते हैं, तब बच्चे रेशेदार व लचकदार शाखों वाले पेड़ों को ढूंढते हैं। ऐसे में वे प्रायः बरगद का चुनाव ज्यादा करते हैं। क्योंकि बरगद प्रायः सभी ग्रामों में होता है। यह हमारा राष्ट्रीय वृक्ष है। जब बच्चे उसके पास जाते हैं, तो उसकी बहुत सारी खूबियां से परिचित भी होते हैं और अपना मनोरंजन भी करते हैं। इसी तरह से इस गीत:-

"अत्ती पत्ती मार गदत्ती, जा के लान पीपर के पत्ती।"

खेल से प्रकृति का परिचय
खेल से प्रकृति का परिचय

इस तरह से अलग-अलग पेड़-पौधों की पत्तियां, फुल, शाखाएं, फल आदि लाने के लिए कहने‌ पर बच्चे स्थानीय पेड़-पौधों और वनस्पतियों से भी परिचित होते हैं। इसी तरह से खेलों के साथ संस्कृति और आवश्यक जानकारियां बच्चों को होती रहती है। इस तरह से प्रचलित लोक खेल प्रदेश की लोक संस्कृति को समृद्ध करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

- श्री राम कुमार वर्मा
सेवानिवृत्त प्रधान पाठक एवं लोक संस्कृति कर्मी

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