फाग का लोकरंग
February 27, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | चैत्र कृष्ण द्वादशी | मंगलवार
नक्षत्र: शतभिषा | योग: शुक्ल | करण: कौलव
पर्व विशेष : | तदनुसार 14 अप्रैल 2026

भारतीय संस्कृति की प्रवृति बड़ी उदात्त है। वह अपने संसर्ग में आने वाले तत्वों का बड़ी उदारता के साथ अपने आप में समाहित कर लेती है। संस्कृति का यही गुण भी है। जो सबको अपना समझता है, वह सबका हो जाता है। हमारी संस्कृति इसी गुण के कारण विश्व में अपनी अलग ही पहचान रखती है।
भारतीय संस्कृति का आंचलिक प्रभाव इन्ही कारणों से छत्तीसगढ़ की संस्कृति को भी सबसे अलग चिन्हित करता है। यही कारण है कि भारतीय परिदृश्य में विभिन्न आपदाओं व आक्रांताओं के पश्चात् भी यहां की प्राचीन संस्कृति आज भी मौजूद है। यहां की भाषा, शिल्प और कला निरंतर प्रगति के सोपान रचती रही है।
भारत का हर प्रदेश ही अंचल अपनी स्थानीय कला-संस्कृति का नायाब नमूना है। हर क्षेत्र की लोककला समृद्धि का नया इतिहास रच रही है। आज क्षेत्रियता की सीमा को लांघकर विश्व पटल पर प्रतिष्ठित हो रही है। ऐसी ही गरिमापूर्ण पहचान बनी है छत्तीसगढ़ के लोक शिल्प की।

शिल्प की दृष्टि से छत्तीसगढ़ का वनवासी क्षेत्र (जंगली भूभाग) मैदानी क्षेत्रों की अपेक्षा अधिक समृद्धशाली है। विशेषकर बस्तर और सरगुजा अंचल। वैसे भी बस्तर का प्राकृतिक सौन्दर्य जन मानस को जितना आकर्षित करता है, उससे कहीं ज्यादा वहां का शिल्प सौन्दर्य लोगों को सम्मोहित और आकर्षित करता है। तीज-त्यौहारों और लोक पर्वों पर स्थानीय शिल्प कला अपनी सम्पूर्ण लोक आभा के साथ प्रदर्शित होती है।
यही दृश्य लोक सौन्दर्य सरगुजा अंचल में भी दिखाई पड़ती है। मैदानी क्षेत्रों में भी इतना नही तो कुछ कम सही पर लोक शिल्प अपनी लोक परम्पराओं के साथ दृष्टि गोचर होती है। शिल्प गढ़ने के लिए स्थानीय लोग स्थानीय स्तर पर मिलने वाली वस्तुओं जैसे मिट्टी, पत्थर, लकड़ी , बाॅस, कांसा, लोहा, पीतल घास-पत्ते आदि का उपयोग करते हैं। इन निर्जिव वस्तुओं में लोककलाकार अपनी कला के माध्यम से इनमें प्राण फ़ूंक देते हैं। अनगढ़ वस्तुओं को मूर्तरूप देने के लिए कलाकार अपनी लगन और अपनी मेहनत का अनवरत प्रयोग कर कला की परिभाषा को सार्थक करते हैं। लोक शिल्प को लोक जीवन का प्राणतत्व् कहें, तो अत्युक्ति न होगी।
मनुष्य सृजनशील प्राणी है। सृजनात्मकता उसकी प्रवृत्ति है। यह प्रवृत्ति उसमें आदिकाल से देखी जा रही है। चाहे वह अपने दैनिक जीवन में उपयोग के लिए होश् या दूसरों को सुविधा देने के लिए या फिर अर्थ लाभ के लाभ के लिए वस्तुओं का निर्माण हो। उसे वह स्थानीय वस्तुओं के माध्यम से बनाता है। सौंदर्यबोध उसकी आदतों में शामिल है। इसलिए अनगढ़ पत्थर भी उसकी छेनी व हथौड़ी की मार सहकर सुघर और सजीव हो जाता है। सृजन की क्षमता नई कलाकृतियों को जन्म देती है। छत्तीसगढ़ के लोक शिल्प को निम्नांकित प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता हैः-
मिट्टी निर्जीव है, किन्तु वह सबको जीवन देती है। विभिन्न आकारों में सज-संवर कर, विभिन्न रूप प्राप्त कर स्वयं सजीव हो उठती है। मिट्टी से बनी मूर्तियां लोक कलाकार के हाथों का स्पर्श पाकर ऐसी लगती हैं कि अबतब वे बोल ही पड़ेंगी। पारम्परिक लोक शिल्प की प्रत्येक विधा का अपना अलग-अलग महत्व है और सभी विधाएं हमारी समृद्ध परम्परा का अभिन्न हिस्सा हैं। किन्तु इन सब में मृदा शिल्प की अपनी अलग ही विशेषताएं हैं। यह इसलिए कि यह सर्व सुलभ है। मिट्टी से बने खिलौने जो पोला त्यौहार पर बनाए जाते हैं उनमे नांदिया बैल, पोरा, चुकिया, चूल्हा, जाता, कमण्डल, कढ़ाही, झारा ये भले ही बच्चों के खिलौने हैं किन्तु ये मृदा शिल्प के उत्कृष्ट नमूने हैं। नांदिया बैल तो हमारी कृषि संस्कृति का पोषक और हमारी लोक आस्था का प्रतिक है। बस्तर के टेरा कोटा का लोक शिल्प में विशेष स्थान है। इस शिल्प में जीवन और प्रकृति से जुड़ी वस्तुओं के साथ ही धार्मिक प्रतीकों की आकृतियां बनती हैं। बैल, हाथी, घोड़े अब तो अभिजात्य वर्गो के घरों की शोभा बनते हैं। बड़े-बड़े होटलों में टेराकोरा की कलाकृतियां सजी होती है।

मिट्टी से बने सजावटी सामानों से लोक कलाकारों को यहां आर्थिक लाभ होने लगा है। वही मृदा शिल्प में नए-नए प्रयोग हुए हैं। इससे शिल्प कला को नई दिशा और नए आयाम मिले हैं। मिट्टी ने नए आकार लिए। इसके तहत बाघ, चीतल मुख, बैलबूटे, देवी-देवता, मानव मुखौटे, लैंपशेड, बेल बूटेदार मंगल कलश, गमले, घड़े, कलापूर्ण सुराहियां झोपड़ी आदि बनाए जाते हैं। बस्तर टेराकोटा के लिए आदि बनाए जाते हैं। बस्तर टेराकोटा के लिए प्रसिद्ध है लेकिन कोंडागांव की प्रसिद्धि अधिक है।
छत्तीसगढ़ की पारम्परिक शिल्प कला में लौह शिल्प का प्रमुख स्थान है। पहले लौह अयस्क को भठ्ठी में गलाकर लोहा प्राप्त किया जाता था। अब बाजार में लोहा आसानी से मिल जाता है। लौह शिल्प बाजार में मिलने वाले लोहे से तैयार किया जाता है। घर में उपयाकग आने वाली वस्तुएं चूल्हा, छुरी, चिमटा, चाकू, कुल्हाड़ी, कजरौटी से लेकर दीप स्तंभ, घोड़ा, हिरण, सारस, फूलदान व अन्य सजावटी वस्तुएं बनाई जाती है।

बस्तर के लौह शिल्प में देवी-देवता की पूजा-अराधना और मनौती चढ़ावे के लिए पारम्परिक रूप से कलाकृतियों का निर्माण किया जाता है। लौह शिल्प से कलात्मक दरवाजे खिड़कियां, झूले आदि भी बनाए जाते हैं। बड़े-बड़े होटलों, शासकीय कार्यालयों में भी लौह शिल्प की सजावटी सामग्री देखने को मिलती हैं।
काष्ठ अर्थात लकड़ी मनुष्य का सच्चा साथी है। जन्म से लेकर मृत्यु तक लकड़ी आदमी का साथी है, उसका सहारा है। लोक जीवन में लकड़ी के बीना जीवन अधूरा है। लकड़ी की बनी वस्तुएं हही गांव में प्रयोग की जाती हैं जैसे पीढ़ा, खटिया, माची, लाठी, हल, कोपर, बैलगाड़ी, मचान, मकान सब कुछ लकड़ी से ही बनते हैं। लेकिन अब लकड़ी का घरेलू वस्तुओं के रूप में प्रयोग के साथ-साथ् कलात्मक सजावटी सामान भी बनाए जाते है। जो बड़े ही चित्ताकर्षक होते है। इन कलाकृतियों के निर्माण के लिए चिकनी और मुलायम लकड़ी उपयोग में लाई जाती है जैसे सागोन, खम्हार, बीजा, साल आदि। लकड़ी से सुन्दर से सुन्दर प्रदशनकारी वस्तुएं बनाई जाती है। जैसे काष्ठ शिल्पों में घोटुल के दृश्यः, सल्फी पेड़ आदि उकेरे जाते हैं। आदिवासी नर-नारी और सींग मुकुटधारी गंवर नर्तक की कलात्मक मूर्तियां अद्वितीय रहती हैं। इसके अलावा अन्य देवी-देवताओं की काष्ठ मूर्तियां बनाई जाती है, जिनमें गणेश, शंकर, पार्वती, लक्ष्मी, कृष्ण आदि प्रमुख हैं।

बस्तर अंचल में चाकू, हंसिया, खेती के औजारों की मुठिया, लकड़ी के पीढ़े, तम्बाकू रखने की डिबिया, केधियां, बांसुरी आदि सभी चीजों में की गई नक्काशी अत्यंत कलात्मक होती है। घरों के नक्काशी दार स्तम्भ व दरवाजे, देवस्थल के खम्भे, देवझूला इनके काष्ठ शिल्प का अद्भूत नमूने होते हैं साथ ही नाच आदि में उपयोग किए जाने वाले लकड़ी के मुखौटे भी रोचक होते हैं।
पाषाण अर्थात पत्थर। छत्तीसगढ़ की पाषाण शिल्प कला भी प्रसिद्ध हैं। पत्थर से अधिकतर देवी-देवताओं की मूर्तियां बनाई जाती हैं। पत्थर शिल्प की प्रेरणा कारीगरों को प्राचीन मंदिरों के पाषाण शिल्पों से मिली है। क्योंकि यहां के प्राचीन मंदिर मूर्ति शिल्प कला के बेजोड़ नमूने हैं। छत्तीसगढ़ के कई स्थानों पर पत्थर की मूर्तियां बनाई जाती हैं। पत्थर के मूल स्तंभ, देवी देवता व कलात्मक दीप स्तंभ बनाए जाते हैं। बस्तर के शिल्प में प्रकृति से जुड़ी लोक संस्कृति के दृश्यों को उकेरा जाता है। पत्थर की मूर्तियां जीवंत लगती है और हमारी आस्था के साथ-साथ लोक संस्कृति को अभिव्यक्त करती हैं।
ढोकरा शिल्प, शिल्प कला का अप्रतिम उदाहरण है। इस शिल्प में शिल्पी द्वारा कलाकृतियों को मोम पर तैयार कर उसमें मिट्टी का लेप लगाकर भठ्ठी पर पकाकर उसमें पिघली हुई पीतल धातु डाला जाता है। पीतल मोम का स्थान ले लेता है और जमने पर आकृति तैयार हो जाती है। देवी-देवता, हाथी-घोड़ा, बैल तथा सजावटी सामग्री तैयार की जाती है।

ढोकरा शिल्प रायगढ़, कोंडागांव, बस्तर आदि क्षेत्रों में बहुयात रूप से तैयार किया जाता है। इसमें गौर का सिंग, मुकुट, दरवाजे के हैंडिल आदि भी बनाये जाते हैं। इन कलाकृतियों में आदिवासी संस्कृति की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। इनसे घरों, होटलों व कार्यालयों की आंतरिक सज्जा की जाती है। छत्तीसगढ़ के ढोकरा शिल्प ने भारत ही नहीं अपितु विश्व स्तर पर विदेशों में भी अपनी पहचान बनाई है।
बांस ग्रामीण जीवन में बड़ा उपयोगी है। बांस सं बंसोड द्वारा घरेलू उपयोग की वस्तुएं जैसे टुकना, टोकरी, सूपा, पर्री, झऊहा आदि के साथ विवाह में उपयोग आने वाली झांपी, पर्रा, बिजना आदि वस्तुए बनाई जाती है। विवाह मंडप में बांस को मड़वा के रूप में गड़ाने की परम्परा है।

ये दैनिक उपयोग की वस्तुए कलात्मक होती है। इसके अतिरिक्त सुन्दर कलाकृतियां भी बांस से बनाई जाती है। बांस से लैंपसेड, ट्रे, बैग, चित्रित परदा, पेन होल्डर, गुलदस्ता, कुर्सियां आदि भी बनाई जाती हैं। ये सुन्दर और कलात्मक होती है।
किसी भी वस्तु को कलाकार अपनी कला की दृष्टि से देखता है और बेकार पड़ी हुई वस्तु को वह कलात्मक स्वरूप दे देता है। ऐसा ही तुम्बा शिल्प है। तुम्बा अर्थात लौकी। सुखी हुई पकी लौकी ग्रामीण जीवन में कई काम आती है। इससे नकडेवन या बीन नाम लोक वाद्य बनाया जाता है। यह गर्मी के दिनों में पानी रखने के काम आता है। इसमें पानी ठंडा रहता है। इस तुम्बा पर कलात्मक आकृतियां उकेर कर गर्म किया जाता है, जिससे आकृतियां स्थायी हो जाती हैं। पालिश करने पर यह और भी सुन्दर दिखाई पड़ता है।

इस प्रकार छत्तीसगढ़ की शिल्प कला अत्यंत ही समुन्नत है और इसकी प्रसिद्धि केवल प्रदेश या देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी हैं। छत्तीसगढ़ का लोक शिल्प ग्रामीण जीवन और उसकी संस्कृति का प्रतीक है।
आलेख
डाॅ. पीसी लाल यादव
‘‘साहित्य कुटीर‘‘ गंडई पंड़रिया जिला राजनांदगांव (छ.ग.) मो. नं. 9424113122
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