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छत्तीसगढ़ पर्यटन : अछूता प्राकृतिक सौंदर्य और नई संभावनाएँ

छत्तीसगढ़ पर्यटन : अछूता प्राकृतिक सौंदर्य और नई संभावनाएँ

भारत की भूमि स्वयं में विविधताओं की विराट गाथा है। उत्तर में हिमालय की श्वेत श्रृंखलाएँ जहाँ देवत्व का अनुभव कराती हैं, वहीं दक्षिण के सागर तट अपनी शीतल हवाओं और लहरों से मन को शांति प्रदान करते हैं। पश्चिम का मरुस्थल मानव की सहनशक्ति का परिचायक है तो पूरब के हरित प्रदेश जीवन की उर्वरता का प्रतीक !


देवभूमि- उत्तराखंड

इन्हीं भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधताओं के मध्य, भारत के हृदय में स्थित है- छत्तीसगढ़, जिसे धान का कटोरा कहा जाता है। यह राज्य अपनी सरलता, मधुर बोली, लोकसंस्कृति और आत्मीयता के लिए विख्यात है; परंतु यदि इसे एक पर्यटक की दृष्टि से देखा जाए, तो यह प्रकृति और संस्कृति दोनों का अनूठा संगम प्रतीत होता है।


प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण - छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ का 55,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र घने वनों से आच्छादित है, जिससे यह भारत का तीसरा सबसे अधिक वनों वाला राज्य बनता है। ये वन न केवल पर्यावरणीय संतुलन के संरक्षक हैं, बल्कि पर्यटन के लिए भी अपार संभावनाएँ प्रस्तुत करते हैं। झरनों, नदियों और पहाड़ियों से घिरे ये क्षेत्र प्रकृति प्रेमियों और साहसिक यात्रियों दोनों के लिए स्वर्ग समान हैं।

मैनपाट, जिसे ‘छत्तीसगढ़ का शिमला’ कहा जाता है, अपने शीतल वातावरण और हरियाली के लिए प्रसिद्ध है। इसी प्रकार चिरमिरी, चिल्फी घाटी, सरोधा दादर, कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान और मनेन्द्रगढ़ जैसे स्थल “स्टेकेशन” और “वेलनेस टूरिज्म” के लिए उपयुक्त हैं  जहाँ शांति, स्वच्छ वायु और प्राकृतिक ऊर्जा का समागम मिलता है।


कांगेर घाटी, मैनपाट, चिल्फी घाटी, तामड़ाघुमर जलप्रपात

यदि आपकी यात्रा का उद्देश्य आध्यात्मिक है, तो छत्तीसगढ़ में विविध तीर्थों की श्रृंखला आपको अपनी ओर आकर्षित करती है। डोंगरगढ़ की माँ बम्लेश्वरी, रतनपुर का महामाया शक्तिपीठ, दंतेवाड़ा की माँ दंतेश्वरी, और राजिम का त्रिवेणी संगम जहाँ कुलेश्वर महादेव विराजमान हैं - ये सभी स्थान आस्था के साथ-साथ स्थापत्य कला के अद्भुत उदाहरण भी हैं।

बौद्ध एवं पुरातात्त्विक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण सिरपुर आज भी अपने प्राचीन बौद्धविहारों, मंदिरों और मठों के कारण विद्वानों और बुद्धिजीवियों के लिए आकर्षण का  केंद्र है। इसी तरह 3000 फीट की ऊँचाई पर विराजमान ढोलकल गणपति (दंतेवाड़ा), चैतुरगढ़ दुर्ग (कोरबा) , राजीवलोचन मंदिर (राजिम, गरियाबंद जिला )और चंडी डोंगरी (महासमुंद ) जैसे स्थल इस भूमि की आध्यात्मिक विविधता को प्रकट करते हैं।


सिरपुर- प्रमुख बौद्धस्थल (बाएं), ढोलकल गणेश प्रतिमा (दाएं)

जब आधुनिकता के प्रभाव से लोक परंपराएँ विस्मृत हो रही हैं, तब भी छत्तीसगढ़ अपने मेलों और मड़ईयों के माध्यम से भारतीय संस्कृति की आत्मा को जीवित रखे हुए है। बस्तर दशहरा, जो 75 दिनों तक चलने वाला विश्व का सबसे लंबा उत्सव माना जाता है, यहाँ की सांस्कृतिक चेतना का सजीव प्रमाण है। यह प्रदेश न केवल पर्यटन का केंद्र है, बल्कि भारत की प्राचीन सनातन परंपराओं की जीवंत झलक भी प्रस्तुत करता है।


विश्वप्रसिद्ध नारायणपुर मड़ई में पधारे आंगादेव 

राज्य के झरनों और घाटियों में रोमांचप्रेमियों और साहसिक पर्यटन की अपार संभावनाएँ  हैं। चित्रकोट और तीरथगढ़ जलप्रपात बस्तर की पहचान हैं। चित्रकोट जिसे भारत का नियाग्रा कहा जाता है, कुछ पर्यटकों की माने जिन्होंने स्वयं नियाग्रा फॉल देखा है, उनका कहना है की चित्रकोट की सुन्दरता विश्वप्रसिद्ध इस जलप्रपात से कहीं अधिक है, वहीं अमृतधारा (सरगुजा) और 450 ऊंचा मकरभंजा (जशपुर) के अलावा अनगिनत जलप्रपात अपने सौंदर्य से पर्यटकों को मोहित करते हैं।


तीरथगढ़ जलप्रपात (बाएं), चित्रकोट जलप्रपात (दाएं)

गंगरेल बाँध, जिसे “मिनी गोवा” कहा जाता है, जलक्रीड़ाओं और कैम्पिंग के लिए लोकप्रिय हो रहा है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा “सर्वश्रेष्ठ पर्यटन गाँव” घोषित धुड़मारास ग्राम यह दर्शाता है कि स्थानीय समुदाय की भागीदारी से पर्यटन को सतत विकास का माध्यम तो बनाया ही जा सकता है साथ ही अपनी क्षेत्रीय संस्कृति से लोगो को परिचित करवाने और उसे संजोये रखने में भी बहुत सहयोग मिलता है ।

वन्यजीव प्रेमियों के लिए अचानकमार, बरनवापारा, सीतानदी, और अन्य अभयारण्यों में 11 वन्यजीव अभ्यारण व 3 राष्ट्रीय उद्यान हैं — जो इको-टूरिज्म की अपार संभावनाओं को उद्घाटित करते हैं।

राज्य में पर्यटन के लिए प्राकृतिक और सांस्कृतिक संसाधन तो पर्याप्त हैं, परंतु कुछ संरचनात्मक चुनौतियाँ अभी भी विद्यमान हैं। आतिथ्य क्षेत्र में प्रशिक्षित मानव संसाधन का अभाव, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सीमित प्रचार और कभी-कभी नक्सल प्रभावित छवि का प्रभाव इन सभी पहलुओं पर ध्यान दिया जाए तो पर्यटन राज्य की आर्थिक उन्नति के लिए एक महत्वपुर्ण घटक की भूमिका निभा सकता है । रायपुर, बिलासपुर और जगदलपुर जैसे शहरों के हवाई संपर्क तथा उत्कृष्ट सड़क नेटवर्क से पहुँचमार्ग बहुत  सुगम हो चुका है जो पर्यटन के क्षेत्र में निहित क्षमताओं को और सुदृढ़ बनाते हैं । “वेलनेस टूरिज्म”, “फॉरेस्ट बाथिंग”, “कैम्पर टूर” और “एडवेंचर टूरिज्म” जैसी आधुनिक अवधारणाओं के लिए छत्तीसगढ़ का पर्यावरण अत्यंत उपयुक्त है।


राज्य में संभावित पर्यटन के प्रकार 

छत्तीसगढ़ का पर्यटन केवल दर्शनीय स्थलों का संग्रह नहीं, बल्कि यह संस्कृति, पर्यावरण और समुदाय के बीच संतुलन का जीवंत उदाहरण है। यदि राज्य सुनियोजित पर्यटन विकास की नीति अपनाकर स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करे, तो यह न केवल भारत बल्कि विश्व पर्यटन मानचित्र पर एक नई पहचान स्थापित कर सकता है।

तो अब अगली बार आप जब भी कहीं सैर पर जाने की योजना बनायें तब छत्तीसगढ़ को अपनी “विशलिस्ट” में ज़रूर रखियेगा !

लेख-
सोनल बाजपेयी
शोधार्थी- भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा

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