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छत्तीसगढ़ परिचय: डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र जी की अद्वितीय कृति

छत्तीसगढ़ परिचय: डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र जी की अद्वितीय कृति


प्रस्तुत लेख छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने वाले मूर्धन्य विद्वान डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र के कृतित्व पर केन्द्रित है। वर्ष 1960 में प्रकाशित उनकी पुस्तक 'छत्तीसगढ़ परिचय' केवल लोककथाओं का संग्रह नहीं है, अपितु यह इस अंचल के इतिहास को जनश्रुतियों के माध्यम से व्याख्यायित करने का एक प्रयास है। इस लेख में हम छत्तीसगढ़ के नामकरण, प्राचीन शैलचित्रों की विश्वव्यापी समानता और यहाँ की रियासतों आदि के बारे में समझेंगे। वर्तमान पीढ़ी के लिए अपनी माटी की गौरवगाथा को प्रामाणिक सन्दर्भों के साथ समझना नितान्त आवश्यक है, ताकि वे अपनी जड़ों से जुड़ सकें।


छत्तीसगढ़ के इतिहास और संस्कृति को समझने पूर्व के अध्येताओं का योगदान महत्वपूर्ण सीढ़ियां हैं, जिनसे होकर हम वर्तमान जानकारियों तक पहुँचे हैं। प्रारम्भिक अध्ययनों में साक्ष्यों की सीमितता होने के उपरान्त भी अध्ययन सामग्री की शुद्धता अधिक होती है, जिससे घटनाओं की वास्तविकता को समझने की सम्भावना बढ़ जाती है।

लोककथाएं और जनश्रुतियाँ अपने प्रारम्भिक रूपों में अधिक सार्थक हुआ करती हैं क्योंकि समय के साथ उनमें मिलावट बढ़ती जाती है। डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र छत्तीसगढ़ के प्रतिष्ठित विद्वानों में गिने जाते हैं। साहित्य और संस्कृति पर उन्होंने महत्वपूर्ण लेखन किया है। विशेष रूप से तुलसी दर्शन पर उनका कार्य अत्यन्त चर्चित रहा है।

डॉ. मिश्र द्वारा लिखित 'छत्तीसगढ़ परिचय' जो 1960 ईस्वी में प्रकाशित हुई थी, मुख्य रूप से लोककथाओं और जनश्रुतियों का संग्रह है। इसमें उन्होंने छत्तीसगढ़ अंचल की चौबीस लोककथाओं को संकलित किया है। इसके साथ ही पुस्तक में छत्तीसगढ़ परिचय शीर्षक से एक आलेख भी सम्मिलित है, जिसमें इस क्षेत्र के इतिहास का संक्षिप्त विवेचन प्रस्तुत किया गया है।


छत्तीसगढ़ परिचय- बलदेव प्रसाद मिश्र जी की कृति

छत्तीसगढ़ क्षेत्र के लिए एक नाम 'महाकोसल' भी प्रचलित रहा है। प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता कनिंघम ने 'महा' विशेषण को विशालता के अर्थ में ग्रहण किया है। इस नाम के सम्बन्ध में मिश्र जी का तर्क है कि कीर्तवीर्य सहस्त्रार्जुन के वंशज चेदि हैहयों ने, जिनका इस ओर लगभग 1500 वर्षों तक राज्य रहा, इसकी महत्ता बढ़ाने के लिए इसे महाकोसल कहना प्रारम्भ कर दिया हो।

यह ठीक उसी तरह है जैसे नदी का नाम महानदी हो गया, छोटे इलाके का नाम महासमुन्द हो गया, आराध्य देवी का नाम महामाया और राजाओं का नाम महाशिवगुप्त पड़ गया।  लोकमानस में छत्तीस राग और छत्तीस जातियों का अर्थ भी इसी व्यापकता से लिया जाता है। जिस प्रकार नाई को अपनी चतुराई के लिए छत्तीसा कहा जाता है, सम्भव है कि इसी आधार पर उल्टे सीधे सभी तरह के गढ़ों के पुंज का नाम छत्तीसगढ़ पड़ गया हो।

ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो छत्तीसगढ़ के रायगढ़ क्षेत्र में प्राचीन शैलचित्र प्राप्त होते हैं। रोचक तथ्य यह है कि लम्बी भौगोलिक दूरी के बाद भी इन चित्रों में अद्भुत समानता दिखाई देती है। यह आदिमानवों के आपसी सम्बन्ध अथवा समान परिस्थितियों में समान रचनात्मक कल्पना को दर्शाता है।


रायगढ़ क्षेत्र के शैलचित्र  (साभार: Meenakshi D.Pathak)

मिश्र जी इस बात को रेखांकित करते हैं कि रायगढ़ की पहाड़ियों में शिकार और लैड मैन जैसे जो चित्र मिलते हैं, वैसे ही चित्र यूरोप के पश्चिमी कोने स्पेन में और अमेरिका के मध्यवर्ती भाग मेक्सिको में भी उपलब्ध हैं।


रायगढ़ क्षेत्र के शैलचित्र  (साभार: Meenakshi D.Pathak)

ये समस्त चित्र हमारी प्राचीन सभ्यता के परिचायक हैं। कला का यह वैश्विक मेल सिद्ध करता है कि उनमें परस्पर मेल जोल निरन्तर बना रहता था।

छत्तीसगढ़ के नामकरण के पीछे शिवनाथ नदी के उत्तर और दक्षिण में स्थित अठारह-अठारह गढ़ों की भूमिका को प्रमुख माना जाता है। इस सम्बन्ध में मिश्र जी का मत है कि लगभग 1600 वर्ष पूर्व जब भारतीय नेपोलियन समुद्रगुप्त ने महाकोसल के राजा महेन्द्र और महाकान्तार के राजा व्याघ्रदेव से युद्ध किया था, तब अष्टादश अटवी राज्य अर्थात अठारह वन्य प्रदेशों का उल्लेख मिलता है।


समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति में उल्लेख

इससे स्पष्ट होता है कि अठारह गढ़ की प्रथा प्राचीन है। कालान्तर में उड़ीसा में भी अठारह गढ़ दिखाई देने लगे। सम्भवतः गढ़ों की संख्या दुगनी होने की आकांक्षा से यह प्रान्त छत्तीसगढ़ कहलाने लगा। यह भी सम्भव है कि रतनपुर के हैहय घराने के अठारह गढ़ और रायपुर के हैहय घराने के अठारह गढ़ मिलकर समूचा प्रान्त छत्तीसगढ़ बन गया हो।

पुरातत्व के क्षेत्र में सिरपुर जिसे प्राचीन काल में श्रीपुर कहा जाता था, अपने अवशेषों के लिए विख्यात है। ब्रिटिश अध्येताओं बेगलर और कनिंघम ने इसका विस्तृत उल्लेख किया है। यह माना जाता रहा है कि राजिम क्षेत्र के मन्दिरों में विशेषकर राजिम के रामचन्द्र मन्दिर के स्तम्भों में सिरपुर के पुरावशेषों का उपयोग हुआ है।

सिरपुर के पुरावशेष है हमारी अमूल्य थाती
सिरपुर के पुरावशेष है हमारी अमूल्य धरोहर

मिश्र जी लिखते हैं कि श्रीपुर के आसपास बिखरी शिवमूर्तियों और खण्डहरों को देखकर यह सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि किसी समय वह मध्यप्रदेश की काशी नगरी कहलाने का सामर्थ्य रखती थी।

वहाँ के नक्काशीदार पत्थरों और कलापूर्ण मूर्तियों को राजिम, रायपुर और धमतरी जैसे स्थानों पर ले जाकर विभिन्न मठों और मन्दिरों में स्थापित कर दिया गया। इनमें से कुछ अवशेष रायपुर के घासीदास संग्रहालय में भी सुरक्षित हैं। इसके उपरान्त भी जो कुछ वहाँ शेष है, वह दर्शकों को चकित करने के लिए पर्याप्त है।

प्रशासनिक शब्दावली में भी छत्तीसगढ़ की अपनी विशिष्टता रही है। मैदानी क्षेत्रों के गाँवों में गौंटिया के बाद 'मण्डल' का पद महत्वपूर्ण होता था। मिश्र जी के अनुसार छत्तीसगढ़ का सम्मान सूचक मण्डल शब्द वास्तव में 'माण्डलिक' शब्द से बना है, जिसका अर्थ किसी सूबे का गवर्नर होता है।

इसी प्रकार स्थानों के नामकरण के पीछे भी ऐतिहासिक कथाएँ छिपी हैं। रतनपुर के कन्हारजुनी तालाब के विषय में मोरध्वज कथा के प्रेमी इसे कृष्णार्जुनी कहते हैं, जबकि इतिहास प्रेमी हैहय नरेश यश: कर्णदेव के नाम पर इसे कर्णार्जुनी मानते हैं।

कवर्धा के फणि नागवंशियों के विषय में डॉ. मिश्र एक तर्कसंगत दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं। यद्यपि भावुक लोग नागवंशियों को साँपों की सन्तान मानते हैं, किन्तु विचारकों का मत है कि नाग का अर्थ पहाड़ी लोग होता है जो नग अर्थात पर्वत पर निवास करते थे।

छत्तीसगढ़ के महान साहित्यकार बलदेव प्रसाद मिश्रजी
छत्तीसगढ़ के महान साहित्यकार बलदेव प्रसाद मिश्र जी

अतः यहाँ के जनजातीय परिवार के पहाड़ी लोग ही नाग कहलाते रहे होंगे। मिश्र जी स्पष्ट करते हैं कि नाग शब्द बहुअर्थी है, इसलिए प्रत्येक स्थान पर इसका अर्थ सर्प लगाना उचित नहीं है।

कवर्धा का नाम कबीरधाम का अपभ्रंश माना जाता है, जो 1806 ईस्वी के आसपास कबीरपंथ के आठवें गुरु हक्कनाम साहेब द्वारा गद्दी स्थापित करने के बाद प्रचलित हुआ। इससे पूर्व दस्तावेजों में इस क्षेत्र के लिए कमरदा या कँवरधा जैसे नाम मिलते हैं ।

गोंड शासकों के उदय के सम्बन्ध में मिश्र जी का मानना है कि 13वीं-14वीं शताब्दी के मध्य गोंड लोग दक्षिण की ओर से आकर छत्तीसगढ़ में विस्तृत रूप से फैल गए। यह जाति स्वावलम्बी और वीर थी, जिसमें परस्पर उत्तम संगठन था।

जब उत्तर भारत विदेशी आक्रमणकारियों से संघर्ष कर रहा था, तब इस जाति को दक्षिण कोसल की ओर विस्तार करने का अवसर मिला और उन्होंने इस प्रान्त को गोंडवाना बना दिया। 

मिश्र जी की यह पुस्तक मुख्यतः चौबीस लोककथाओं पर केन्द्रित है जो इस अंचल के विभिन्न स्थानों से जुड़ी हैं। इन स्थानों की सूची में सिंहनपुर, सिहावा, रतनपुर, रामगिरि, डोंगरगढ़, शिवरीनारायण, राजिम, दुर्ग, बनबरद, देव बलौदा, पाटन, दन्तेवाड़ा, खलारी, माली घोड़ी, गुण्डरदेही, विन्द्रा नवागढ़, उपरौड़ा, सोरर, सक्ती, शिवनाथ नदी, अम्बागढ़ चौकी, ओड़ार बाँध और भण्डार सम्मिलित हैं। प्रत्येक स्थान की अपनी एक पौराणिक या ऐतिहासिक गाथा है। 

डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र ने इस पुस्तक के माध्यम से इस अञ्चल में अतीत के प्रति गौरव का भाव जगाने और उन्हें राष्ट्रीयता के व्यापक दृष्टिकोण से जोड़ने का सफल प्रयास किया है।

उनकी कहानियाँ सरकारी गजेटियरों और लोक में प्रचलित किम्बदन्तियों पर आधारित हैं, जो मनोरञ्जन के साथ ज्ञानवर्धन भी करती हैं। वर्ष 1960 में प्रथम बार प्रकाशित इस कृति को 2024 में पुनर्प्रकाशित कर वैभव प्रकाशन ने एक सराहनीय कार्य किया है। छत्तीसगढ़ की माटी को समझने के इच्छुक प्रत्येक पाठक के लिए यह पुस्तक एक अनिवार्य सन्दर्भ ग्रन्थ के समान है।

-पुस्तक समीक्षा 
श्री अजय चंद्रवंशी
(कवर्धा- छत्तीसगढ़)

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