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छत्तीसगढ़ में सूर्य उपासना की 10,000 वर्ष पुरानी परंपरा

छत्तीसगढ़ में सूर्य उपासना की 10,000 वर्ष पुरानी परंपरा

भारतीय संस्कृति में सूर्य उपासना की परंपरा अत्यंत प्राचीन रही है। लोक परंपराओं से लेकर वेदों और पुराणों तक सूर्य उपासना के विविध रूप देखने को मिलते हैं। वैदिक साहित्य में सूर्य को ‘सर्वस्य जगत आत्मा’ कहा गया है, अर्थात वह समस्त चराचर जगत की जीवंतता का मूल स्रोत है। ऋग्वेद, यजुर्वेद और छांदोग्य उपनिषद में सूर्य को केवल देवता नहीं, बल्कि ब्रह्मस्वरूप के रूप में प्रतिष्ठा दी गई है।
लोक जीवन में भी सूर्य उपासना का गहरा प्रभाव दिखाई देता है। प्रातःकाल स्नान के बाद ताम्बे के पात्र में जल, लाल पुष्प, लाल चंदन और अक्षत अर्पित कर सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा आज भी जीवित है। यह दैनिक पूजा का अभिन्न अंग है।

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सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा

16 संस्कार में भी सूर्य का स्थान महत्वपूर्ण है, सोलह संस्कारों में ‘निष्क्रमण संस्कार’ (छठा संस्कार) में शिशु को पहली बार घर से बाहर लाकर सूर्य दर्शन कराए जाते हैं। ऐसी सैकड़ों लोक परंपराएँ हैं जो हजारों वर्षों से निरंतर चली आ रही हैं।

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निष्क्रमण संस्कार

बिहार और उत्तर प्रदेश की तरह छत्तीसगढ़ में भी सूर्य पूजा की गहरी ऐतिहासिक जड़ें हैं, किंतु कुछ लोग अज्ञानतावश इसे परायी संस्कृति कहते हुए छठ जैसे प्रमुख सूर्योपासना पर्व से दूरी बना लेते हैं। जबकि वस्तुतः छत्तीसगढ़ के सैकड़ों स्थलों पर सूर्य उपासना के प्रामाणिक साक्ष्य मौजूद हैं जो इसकी प्राचीनता और लोकआस्था दोनों का परिचायक हैं। 
छत्तीसगढ़ में सूर्य उपासना के साक्ष्य
छत्तीसगढ़ में शायद ही कोई क्षेत्र हो जहाँ सूर्य की उपासना न होती हो।  छत्तीसगढ़ के उत्तर में सरगुजा से लेकर दक्षिण में बस्तर संभाग तक शैल चित्रों, शिलालेखों, ताम्रपत्रों और पुरातात्त्विक साक्ष्यों में सूर्य उपासना के लगभग 10,000 वर्ष पुराने प्रमाण मिलते हैं, जो इस परंपरा की प्राचीनता को सिद्ध करते हैं।


खैरपुर-रायगढ़ रॉक शैल्टर 

छत्तीसगढ़ में रायगढ़ जिले के सिंघनपुर, कबरा पहाड़, उषाकोठी एवं अन्य स्थानों से प्राप्त प्रागैतिहासिक काल के शैलचित्रों में सूर्य का अंकन इस परंपरा का सबसे प्राचीन प्रमाण है। पुरातत्वविदों के अनुसार रायगढ़ के ये शैलचित्र लगभग 10 हजार वर्ष से भी अधिक पुराने हैं।  ग्रामीण आज भी पर्वों के अवसर पर इन शैल चित्रों की पूजा करने जाते हैं। इसके अतिरिक्त ऐतिहासिक काल के प्राचीन भारत में हजारों पुरातात्विक साक्ष्य उपलब्ध हैं, जो सूर्य उपासना परम्परा के पुरातात्विक प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। 


रायगढ़ जिले के शैल चित्र (दायें: सूर्य का अंकन)

बस्तर संभाग:
बस्तर क्षेत्र से सूर्य उपासना के कई प्रमाण प्राप्त हुए हैं। छठी शताब्दी ईस्वी में नलवंशीय शासक विलासतुंग के अभिलेख में सूर्य की स्तुति की गई है, जिससे ज्ञात होता है कि नलवंश सूर्य को देवता के रूप में पूजता था।
बस्तर के जगदलपुर संग्रहालय में कुरूशपाल से प्राप्त 12वीं–13वीं शताब्दी की सूर्य प्रतिमा सुरक्षित है। इसके अतिरिक्त बस्तर से अन्य सूर्य प्रतिमाएँ भी मिली हैं जो इस क्षेत्र की सूर्य उपासना की परंपरा को प्रमाणित करती हैं।


जगदलपुर संग्रहालय में सूर्य की प्रतिमा (११वीं शताब्दी)

सरगुजा संभाग: सरगुजा के महेशपुर (उदयपुर से लगभग 8 किमी उत्तर) से प्राप्त सिरदल में सूर्य का अंकन हुआ है। यहाँ से कई सूर्य प्रतिमाएँ भी मिली हैं। बलरामपुर जिले के डिपाडीह स्थित सामत सरना मंदिर परिसर में नवग्रह पट (9वीं शताब्दी ईस्वी) में सूर्य का अंकन स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। ये सभी साक्ष्य इस अंचल में सूर्योपासना की प्राचीन काल से चली आ रही परम्परा को दर्शाते हैं।


महेशपुर से प्राप्त सूर्य प्रतिमा

बिलासपुर संभाग: सूर्य उपासना के प्रमाण बिलासपुर संभाग से भी प्राप्त हुए हैं।  ताला ग्राम के 1500 वर्ष पुराने देवरानी मंदिर (5वीं–6ठी शताब्दी ईस्वी) के गर्भगृह में सूर्य का अंकन है। बिलासपुर से 28 किमी दूर गनियारी के शिव मंदिर में चतुर्भुजी सूर्य की अलंकृत प्रतिमा उत्कीर्ण है।
कलचुरी शासक पृथ्वीदेव प्रथम (9वीं शताब्दी) के अमोदा ताम्रपत्र में सूर्य को “आकाश में बढ़ती हुई ज्योति” और “आदिपुरुष” कहा गया है। पृथ्वीदेव द्वितीय, जाजल्यदेव द्वितीय और प्रतापमल्ल के ताम्रपत्र अभिलेखों (कलचुरी संवत् 919–969) में भी सूर्य का गौरवपूर्ण वर्णन मिलता है।
जांजगीर–चांपा:
कलचुरी शासक रत्नदेव द्वितीय और पृथ्वीदेव द्वितीय के सामंत वल्लभराज ने विकर्णपुर (वर्तमान कोटगढ़, अकलतरा) में सूर्यपुत्र रेवंत का मंदिर बनवाया था। किले/गढ़ के प्रवेशद्वार पर सूर्य की प्रतिमा अंकित है। 


कोटगढ़, अकलतरा

जांजगीर का प्रसिद्ध विष्णु मंदिर, यद्यपि विष्णु को समर्पित है, फिर भी इसकी पश्चिमी जंघा पर सूर्य की उत्कृष्ट प्रतिमा अंकित है। रत्नदेव तृतीय के खरौद अभिलेख में उल्लेख है कि महामंत्री गंगाधर ने पहपक नामक स्थान पर सूर्य मंदिर बनवाया था। पाली (कोरबा) के शिव मंदिर तथा मल्हार से प्राप्त सूर्य प्रतिमाएँ (10वीं शताब्दी) इस परंपरा की निरंतरता को दर्शाती हैं।

आज तक यह मंदिर सूना है और एक दीप के लिए तरस रहा है... - janjgir vishnu  mandir-mobile
जांजगीर का विष्णु मंदिर 

रायगढ़ के पुजारीपाली अभिलेख में गोपालदेव की तुलना अश्वारूढ़ रेवंत से की गई है। जिला संग्रहालय रायगढ़ में पुजारीपाली से प्राप्त 10वीं शताब्दी की नवग्रह पट्ट सुरक्षित है, जिसमें सूर्य प्रमुख रूप से अंकित हैं।
रायपुर संभाग: आरंग, रायपुर से प्राप्त शरभपुरीय शासक जयराज के आरंग ताम्रपत्र में गायों को सूर्य की पुत्री कहा गया है। पाण्डुवंशी शासक भवदेवरणकेशरी के भान्दक अभिलेख में सूर्य के एक चक्रयुक्त रथ का उल्लेख मिलता है। बलौदाबाजार जिले के नारायणपुर तथा डमरू पुरातात्त्विक स्थलों से भी सूर्य प्रतिमाएँ मिली हैं।
सिरपुर के गंधेश्वर मंदिर (8वीं शताब्दी ईस्वी) परिसर में सूर्य सहित नवग्रहों का अंकन विद्यमान है; उत्खनन से प्राप्त सूर्य प्रतिमा अत्यंत सुशोभित है और सफेद बलुआ पत्थर पर निर्मित है।
दुर्ग संभाग: कबीरधाम जिले के प्रसिद्ध भोरमदेव मंदिर के चबूतरे पर द्विभुजी सूर्य की प्रतिमा प्रदर्शित है। यह प्रतिमा (11वीं शताब्दी) अलंकरण और मुद्रा दोनों दृष्टियों से अत्यंत प्रभावशाली है। खैरागढ़ के निकट खपरी पुरास्थल से भी सूर्यपुत्र रेवंत की प्रतिमा प्राप्त हुई है।

भोरमदेव - विकिपीडिया
भोरमदेव मंदिर, जिला कबीरधाम

इन सभी पुरातात्त्विक, अभिलेखीय और लोकसांस्कृतिक प्रमाणों से यह स्पष्ट होता है कि छत्तीसगढ़ में सूर्य उपासना की परंपरा न केवल प्राचीन है, बल्कि आम जनमानस में रची-बसी रही है। बस्तर, सरगुजा, बिलासपुर, जांजगीर, रायगढ़, रायपुर, बलौदाबाजार, महासमुंद, दुर्ग, कबीरधाम सहित पूरे क्षेत्र में सूर्य उपासना की परम्परा अब भी जीवित है। 
ऐसे में छठ पूजा, केवल बिहार या पूर्वी भारत का पर्व नहीं बल्कि वह उत्सव है, जिसमें सूर्य उपासना के प्रति हर हिन्दू समाज की श्रद्धा और प्रकृति से जुड़ाव के रूप में देखा जा सकता है। छत्तीसगढ़ में मौजूद साक्ष्य यह स्पष्ट करते हैं कि सूर्य की पूजा, यहाँ के जनजातीय समाज से लेकर राजवंशों और शास्त्रीय परंपराओं तक, हर स्तर पर स्थापित रही है। 

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महादेव घाट, रायपुर में छठ पूजा

छठ पूजा जैसे पर्वों को सामाजिक सद्भाव, सांस्कृतिक समावेश और आस्था के साथ मनाना चाहिए। प्रवासी भारतीयों ने  संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, मॉरीशस, श्रीलंका, सिंगापुर, संयुक्त अरब अमीरात और जापान में छठ पूजा मना कर विश्व भर में इस पर्व को भारतीयता की पहचान के रूप में स्थापित कर चुके हैं। अतः प्रकृति-पूजक हिन्दू समाज को छठ पर्व की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक गहराई समझनी चाहिए, और इसे पूरे उल्लास के साथ  हमारे सांस्कृतिक वैभव को आगे बढ़ाना चाहिए।


लेख 
वेद प्रकाश सिंह ठाकुर 
सम्पादक, दक्षिण कोसल टुडे

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