वह धरती, जहाँ आज भी हैं श्री राम के पदचिह्न
April 17, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | आषाढ़ शुक्ल पंचमी | शनिवार
नक्षत्र: पूर्वा फाल्गुनी | योग: वरीयान | करण: बव
पर्व विशेष : | तदनुसार 18 जुलाई 2026

हमारा देश जब अंग्रेजों की गुलामी में जकड़ा हुआ था और चारों ओर त्राहि त्राहि मची हुई थी तब छत्तीसगढ़ भी इससे अछूता नहीं था। यहां भी गांधी, नेहरू और सुभाषचंद्र जैसे सपूत हुए जिन्होंने यहां जन जागृति फैलायी। इनमें स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और साहित्यकार थे जिन्होंने अपनी काव्यधारा प्रवाहित करके लोगों में आजादी के प्रति जन चेतना पैदा की और लोग स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े।
उनकी साहित्य साधना तो एक बहाना था। वे इसी बहाने इस महासमर में सभी को साथ लेकर कार्य करने में महती भूमिका निभाते थे। छत्तीसगढ़ में राजनीतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक चेतना जगाने वाले अनेक महापुरूष हुए किंतु छत्तीसगढ़ी बोली को भाषा और साहित्य में स्थान दिलाने का महत्वपूर्ण कार्य काव्योपाध्याय हीरालाल एक मात्र थे।
जिन्होंने छत्तीसगढ़ी व्याकरण लिखा। कदाचित् इसी कारण उनकी गिनती छत्तीसगढ़ के सप्त ऋषियों में होती है। ऐसे महापुरूष का जन्म सन 1856 में राखी (भाठागांव) तहसील कुरूद और जिला धमतरी में एक सम्पन्न कुर्मी परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम बालाराम और माता का नाम राधा बाई था।
हीरालाल जी की प्राथमिक शिक्षा रायपुर में हुई। मेट्रिक प्रधाना की परीक्षा उन्होंने 1874 में जबलपुर से पास की। वे बचपन से ही मेघावी और प्रतिभाशाली थे। उन्होंने अपने छात्र जीवन में अनेक पुरस्कार प्राप्त किया। मेट्रिक की परीक्षा पास करके मात्र 19 वर्ष की उम्र में सन 1875 में जिला स्कूल में सहायक शिक्षक नियुक्त हो गये। उस समय शिक्षकीय कार्य को बड़ा पुण्य का कार्य माना जाता था।
शीघ्र ही अपनी प्रतिभा सम्पन्नता के कारण वे पदोन्नत होकर वे प्रधानाध्यापक होकर धमतरी के एंग्लो वर्नाकुलत टाउन स्कूल में पदस्थ हो गये। कालांतर में धमतरी ही उनकी कार्यस्थली भी बनी। उन्हें उर्दू, उड़िया, बंगला, मराठी और गुजराती भाषा का अच्छा ज्ञान था।
सन् 1881 में उन्होंने ‘‘शाला गीत चंद्रिका‘‘ लिखा जिसे लखनऊ के नवल किशोर प्रेस ने प्रकाशित किया। इस रचना के लिए बंगाल के राजा सोरेन्द्र मोहन टैगोर ने उन्हें सम्मानित किया था। हीरालाल जी ने ‘‘दुर्गायन‘‘ लिखा जिसमें दुर्गा काली की स्तुति है।
उनकी इस रचना के लिए उन्हें बंगाल राजा ने स्वर्ण पदक देकर सम्मानित किया और बंगाल संगीत अकादमी ने उनकी इस रचना के लिए उन्हें 11 सितंबर 1884 को ‘‘काव्योपाध्याय‘‘ की उपाधि प्रदान किया।
तब से वे काव्योपाध्याय हीरालाल के नाम से प्रख्यात् हुए। 1885 में उन्होंने ‘‘छत्तीसगढ़ी व्याकरण‘‘ लिखा। उस समय यहां खड़ी बोली का प्रचलन था और उसका भी कोई प्रमाणिक व्याकरण्र नहीं लिखा गया था।
छत्तीसगढ़ी व्याकरण की चारों ओर व्यापक चर्चा हुई। सुप्रसिद्ध साहित्यकार पंडित लोचनप्रसाद पांडेय ने उसमें आवश्यक संशोधन किया और अंग्रेजी भाषाविद् जार्ज ग्रियर्सन से छत्तीसगढ़ी व्याकरण का अंग्रेजी अनुवाद करके जर्नल ऑफ एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल में इसे प्रकाशित कराया। उन्होंने इसकी प्रशंसा करते हुए लिखा कि ‘‘यह ग्रन्थ भारतीय भाषाओं पर प्रकाश डालने का प्रयास करने वालों के लिए प्रेरणास्प्रद है।‘‘
यह ग्रंथ केवल छत्तीसगढ़ी व्याकरण ही नहीं है अपितु इस ग्रंथ में छत्तीसगढ़ी मुहावरें, कहावतें, लोक कथाएं और लोकगीत भी सम्मिलित हैं। इसमें छत्तीसगढ़ी बोली के स्वरूप को स्पष्ट करने में मदद मिलती है। सुप्रसिद्ध साहित्यकार पंडित लोचनप्रसाद पांडेय ने इस ग्रंथ में संशोधन करते हुए लिखा कि ‘‘छत्तीसगढ़ी व्याकरण ने हीरालाल जी को अमर कर दियाा।‘‘
काव्योपाध्याय हीरालाल जी ने ‘‘शालापयोगी गीत चंद्रिका‘‘ लिखा जो बच्चों के लिए भारतीय शास्त्रीय संगीत पर आधारित था। इस पुस्तक पर बंगाल संगीत अकादमी ने रजत पदक और अभिनंदन पत्र प्रदान कर उन्हें सम्मानित किया था।
उनकी कुछ रचनाओं को इटली के सिग्नोर कैनिनी द्वारा संकलित काव्य ग्रंथ में प्रकाशित किया गया था। उल्लेखनीय है कि इस ग्रंथ में विश्व के अनेक भाषाओं की कविताओं का इटेलियन भाषा में अनुवाद प्रकाशित किया गया था। उनकी अन्य रचना में रायल रीडर भाग एक और दो (अंग्रेजीमें) और गीत रसिक प्रकाशित है।
काव्योपाध्याय हीरालाल स्वतंत्रता संग्राम के सिपाही, छत्तीसगढ़ी व्याकरणाचार्य ही नहीं थे बल्कि एक समाज सेवी भी थें। आगे चलकर वे धमतरी के नगरपालिका के अध्यक्ष चुने गये और लोगों की सेवाएं की। अक्टूबर 1890 में मात्र 34 वर्ष की आयु में उनका देहावसान हो गया। उन्होंने अपनी इस छोटी सी उम्र में हिन्दी और छत्तीसगढ़ी भाषा के लिए उल्लेखनीय कार्य कर अमर हो गए।
डॉ. पी. एल. मिश्रा और डॉ. रमन्द्र मिश्रा ने उनकी छत्तीसगढ़ी व्याकरण को परिमार्जित किया जिसे छत्तीसगढ़ राज्य हिन्दी ग्रंथ अकादमी रायपुर ने प्रकाशित किया है। काव्योपाध्याय हीरालाल के नाम पर रायपुर और अभनपुर के शासकीय महाविद्यालय का नामकरण किया गया है।
श्रोत : छत्तीसगढ़ के साहित्य साधक, ब्रजभूषण सिंह आदर्श और हरि ठाकुर के लेखों, वेब पोर्टल में रमेश नैयर के लेखों से साभार।
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