राजिम की पंचकोसी यात्रा
March 12, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | भाद्रपद शुक्ल द्वितीया | शनिवार
नक्षत्र: हस्त | योग: शुभ | करण: बालव
पर्व विशेष : | तदनुसार 12 सितंबर 2026

भारतीय जीवन और संस्कृति में जो सर्वाधिक आभामय और विविध रंगी हैं, वह ‘लोक’ ही है | लोक केवल गाँव में ही नहीं बसता, बल्कि शहरों में भी बसता है | यह वह लोक है जिसे शहरी जीवन और सुविधाओं ने उसे उसकी जड़ से काटने की कोशिश की, पर अलग नहीं कर पाया | लोक का प्रभाव ही है जो उसे अपनी माटी, अपनी प्रकृति और संस्कृति से जोडे रखता है | जीवन - यापन के लिए लोग अपना गाँव, अपनी माटी छोड तो देते हैं, किन्तु वे अपनी संस्कृति से प्राणपन से जुड़े रहते हैं| यह संस्कृति उसे जीने के लिए उर्जा देती है | अपने गीतों के माध्यम से माटी और प्रकृति के प्यार और दुलार को तीज त्योहारों में गुनगुनाने के लिए प्रेरित करती है | लोक के तीज - त्यौहार रंग रंगीले होते हैं | यदि बात होली की हो तो यह और भी ज्यादा रंग - रंगीली तथा मस्ती भरी है |
बसंत आगमन - होली का स्मरण आते ही छत्तीसगढ़ की होली और यहाँ गाये जाने वाले फाग गीतों की मादकता मन – प्राण को मुदित कर देती है | जड़ काला ज्यों ही बीतने लगता है, हवा थोड़ी रंग बदलती है | बासंती आहट देती है | धूप गुनगुनी हो जाती है | कोयल कुकने लगती है | आम्रमंजरी से बिखरते गंध सांसो में समा ने लगती है | फूलों का रंग निखरने लगता है|खेतों में गेहूं, सरसों और चने के पौधे थिरकने लगते हैं | माघ महीने की बसंत पंचमी से फाग गीतों की स्वर लहरी गांवों में गूँजने लगती है|तब गाँव का दृश्य हमारी आँखों को संतृप्त करती है, कुछ इस तरह –
पिंवरी पहिर सरसों झूमे,
तितली – भौंरा गाल चूमें |
अरसी ह बांधे अंईठी मुरेरी पागा,
बटरा तिंवरा ढिले मया के तागा |
पुरवइहा ह बइहा बन घूमे,
पिंवरी पहिर सरसों झूमें |
ढोलक बजावथे ढेमना चना ह,
राहेर हलावथे धरे घुनघुना ल |
गहूं घलो हरमुनिया धुंके,
पिंवरी पहिर सरसों झूमें |
धरसा के परसा सुलगावत हे आगी,
लाली सेम्हरा ला फभे, हरियर पागी |
कोयली हा बांसुरिया फूंके,
पिंवरी पहिर सरसों झूमे |
जंगल - पहर माते – माते हे मऊहा,
नरवा तीर नशा म, झुमरत हे कऊहा |
मउरे आमा देवय हूमें,
पिंवरी पहिर सरसों झूमें ||
अंडी की डालियाँ – छत्तीसगढ़ का प्रत्येक तीज – त्यौहार चाहे वह अक्ती हो हरेली हो, भोजली हो, तीजा हो या पोरा, सुरहुत्ती, छेरछेरा हो या होली,| सभी प्रकृति और कृषि संस्कृति से सम्बंधित हैं| होली की बात ही निराली है| गांवों में इसकी शुरुआत बसंत पंचमी से हो जाती है | बसंत पंचमी के दिन होले डांड (होलिका जलाने का स्थान) में विधि – विधान से पूजन कर अंडी ( येरंड) की डाली या पेड़ गडा कर की जाती है | फिर बच्चे इसी दिन लकड़ी इकट्ठा करना शुरू कर देते हैं | इन बच्चों को होलहार कहा जाता है | इनमें युवा भी शामिल रहते हैं | इनमें उन्माद अधिक होता है | इसी दिन से फाग का गायन प्रारंभ होता है | नंगारा ,तासक और झांझ के साथ शुरू होती है फाग गीतों की स्वर | लहरी क्या बच्चे , क्या युवा और क्या बूढ़े ? सब मस्ती में झूमने लगते हैं –
फागुन महिना पहुना बन आज आये
पहुना बन आज आये हो फागुन महिना
पहुना बन आज आये
कहाँ धूम मचत हे ? कहाँ परे गोहार ?
काहेन के मऊर बांधे ? कोन ठाढ़े दुवार |
पहुना बन आज आए |
शहर – नगर धूम मचत हे , गाँव परे गोहर ,
आमा के मऊर बांधे, फागुन ठाढ़े दुवार
पहुना बन आज आये |
होलिका की कथा – बसंत पंचमी से प्रारंभ फाग प्रतिदिन रससिक्त होते जाता है | लोक जीवन के विविध रंग लोक कठों से मुखरित होते हैं|वाचिक परम्परा की लोकधारा लोक कठों से निकल कर लोकमानस को अभिसिंचित कर उर्जस्वित करती है|फाग गीत बड़े सहज , सरस और सरल होते हैं| लोक गीतों की अजस्र धारा बसंत से लेकर होलिका दहन पश्चात चैत्र माह के तेरस तक लोक को आनंदित करती है|
होलिका दहन की पौराणिक कथा से सभी परिचित हैं| अत्याचारी हिरण्यकश्यप ने अपने रामभक्त पुत्र प्रहलाद को नष्ट करना चाहा | तब होलिका प्रहलाद को गोद में लेकर आग में बैठ गई, क्योंकि होलिका को यह वरदान प्राप्त था कि वह आग में नहीं जलेगी | किन्तु हुआ उल्टा होलिका जल गई और प्रहलाद बच गया | यही होता है , जब हम अपनी प्राप्त शक्तियों का दुरपयोग करते हैं,और अपनी ताकत से ‘जन’ को दबाना चाहते हैं | तब जन की ताकत बड़ी होती है| वह अपनी शक्ति और संगठन से अहंकारी सत्ताधीशों को उखाड़ फेकती है |होली के इस त्यौहार का गुढार्थ तो मुझे यही मालूम होता है | सत्य की प्रतिस्थापना और असत्य का विनाश |
होली रंगों का त्यौहार है | फाग गीतों का त्यौहार है | ओ फाग गीत जिनमें लोक जीवन नाचता है , गाता है , और अपने विविध मनोभावों को प्रकट करता है | फाग गीतो में राम व कृष्ण से संबंधित विषयों की अधिकता होती है |
दे दे बुलौवा राधे को नगर में
दे दे बुलौवा राधे का
कुंजन बीच होरी होय , कुंजन में होरी होय
दे दे बुलौवा राधे को |
कुंवारी अग्नि – होलिका दहन के दिन मुहूर्त देखकर होली जलाई जाती है | छत्तीसगढ़ में होली जलाने की परम्परा बड़ी निराली है | गाँव में, नगर में कई स्थान पर होली जलाई जाती है | इनमें एक स्थान प्रमुख होता है जहाँ पर चकमक पत्थर व सेम्हरा फल के रेशे से अग्नि उत्पन्न की जाती है | जिसे “कुँवारी अग्नि” कहा जाता है | फिर उसके बाद कुँवारी अग्नि से जले होलिका डांड से आग ले अन्य स्थानों की होली जलती है | चकमक पत्थर, कनाछी लोहा और सेम्हरा फूल के रेशे से पैदा यह अग्नि मानव के आदिम अवस्था और इतिहास की ओर इंगित करती है | जब आदिमानव ने पत्थरों को लुढ़कते देखकर उससे पैदा अग्नि की चमक को समझकर तब आग जलाना सीखा | फाग गीतों में लोक परम्परानुसार पहले गणपति की वंदना की जाती है |
गणपति को मनाँव, गणपति को मनाँव
प्रथम सुमर गणपति को |
काखर भए गणपति, काखर हनुमान ?
काखर भैरव बाबा, काखर सिरीराम ?
प्रथम सुमर गनपति को |
गौरी के गणपति भए, अंजनी के हनुमान,
कालिका के भैरव बाबा, कौशिल्या के राम
प्रथम सुमर गणपति को |
पंच लकड़ियां – होली त्यौहार जिसे छत्तीसगढ़ में फागुन तिहार भी कहा जाता है | इसकी अनेक लोक रंगी आभा है, जो हमारे लोकाचार को भी प्रकट करती है | होले डांड में जहाँ होली जलाई जाती है, वहाँ सुबह गाँव के घरों से प्रत्येक लोग जाकर पाँच –पांच कंडे डालते हैं | साथ ही चाँवल के दाने छिड़क कर होले डांड की परिक्रमा करते हैं | ये पांच कंडे पांच लकड़िया के प्रतीक हैं | मृत्य व्यक्ति की चिता में दी जाने वाली लकड़ी की परम्परा का निर्वहन | होलिका दहन स्थल की राख को एक दूसरे के माथे पर टीका के रूप मे लगाते हैं और यथा योग्य अभिवादन करते हैं | होली की यह राख पवित्रता का प्रतीक है, जिसमें असत्य को जलाकर राख कर दिया गया है | यह सत्य और पवित्रता की राख है | इस राख की छोटी गठरी बनाकर लोग अपनी कोठी में भी रखते हैं | ऐसी लोक मान्यता है कि इससे धन – धान्य की वृद्धि होती है | फाग गीतों में राधा कृष्ण और राम सीता आदर्श जोड़ी के रूप में उपस्थित होते हैं |
अरे बाजे नंगारा दस जोड़ी
राधा किशन खेलय होरी |
पहिली नंगारा अवध में बाजे
राम – सीता के है जोड़ी
राधा – किशन खेलय होरी ||
सामाजिक चेतना – फाग गीतों मे जहाँ मनोरंजन है, मस्ती और उमंग है, वहीं सामाजिक चेतना की लौ भी दिखाई देती है | जब लोग सुबह होली में पाँच कंडे डालने के लिए जाते हैं, तब घरों मे होने वाले ढेकना ( खटमल ) किरनी ( पशुओं का खून चूसने वाला जीवाणु ) तथा खसु ( खुजली ) के छिलके को अलग – अलग गोबर की गोली में डालकर लाते हैं और होली मे डाल देते हैं | इसके पीछे ऐसी मान्यता है की इससे ढेकना, किरनी और खुजली समाप्त हो जाती है | ढेकना और किरनी को होली में जलाना सामाजिक चेतना का प्रतीक है | जो शोषक और अत्याचारी अन्यायी हैं, वे गरीबों के परिश्रम की कमाई और खून को ढेकना और किरनी की तरह चूसते हैं | अतः प्रतीकात्मक रूप में उन्हें जलाना आम व्यक्ति जो शोषित और पीड़ित हैं, उसके मन का भाव है | फाग इससे अछूता नही है –
अरे हाँ रे ढेकना…. कहाँ लुकाए खटिया म
अरे कहाँ लुकाए खटिया म रे ढेकना
कहाँ लुकाए खटिया में
होलिका संग करंव रे बिनास ढेकना
कइसे लुकाए खटिया में
ढेकना और होलिका में स्वभाव की साम्यता है | दोनों शोषण और अन्याय के पक्षधर हैं | इस लिए दोनों का विनाश जरुरी है | दोनों का विनाश लोक समाज होली में करता है |
नेऊज परंपरा – फाग गीतो मे लोक के खान - पान का वर्णन मिलता है | एक यह बात भी उल्लेखनीय है कि जिस दिन होली का त्यौहार मनाया जाता है , रंग – गुलाल खेला जाता है, उसी दिन गाँव में नेऊज चढाने की परम्परा है | जिसे नवा खाई भी कहा जाता है | नेऊज नवान्न है | इस दिन गेहूं की नई बाली के कुछ दाने आटा में मिलाकर व्यंजन बनाये जाते हैं | जिन्हें कुल देवता को अर्पित किया जाता है | इसके बाद की नए गेहूं के आंटे का उपयोग रोटी के लिए किया जाता है | छत्तीसगढ़ में नए धान के चाँवल का नेऊज नवरात्रि या दशहरा के दिन चढ़ाया जाता है | हमारे गीत हमारे खान – पान से अलग नहीं है | फाग गीत में खान – पान का लोकरंग देखें –
खान – पान
अरे हाँ गुलाबी चना, मजा उड़ा ले भजिया में |
इसी तरह का एक और एक दूड़िया फाग गीत,
अरे हाँ रे कांदा भाजी, मजा उड़ा ले बोईर में|
फाग गीत की लोक रंगी आभा का एक और मजेदार पक्ष जो चिंगरी मछरी को लेकर है –
अरे हाँ रे चिंगरी मछरी
चिंग-चिंग कूदे तरिया में
अदवरी बरी में मजा बताय रे चिंगरी
चिंग – चिंग कूदे तरिया में
राष्ट्र प्रेम व इतिहास – फाग गीतों में केवल मनोरंजन या मौज मस्ती ही नहीं हैं | इसमें राष्ट्रप्रेम और आजादी की बातें भी शामिल है | हम सभी जानते है कि आजादी की लड़ाई हमारे पुरखो ने गाँधी जी के नेतृत्व मे लड़ी | अपने प्राणों का उत्सर्ग किया तब यह आजादी हमें मिली | लोक आज भी फाग गीतो में गाता है –
अरे हाँ गाँधी तिरंगा फहरा दिए भारत में
भारत में,भारत में,भारत में
गाँधी तिरंगा फहरा दिए भारत में
फहरइया जवाहर लाल - फहरइया जवाहर लाल
गाँधी तिरंगा फहरा दिए भारत में
आजादी की लड़ाई लड़ते हमारे छत्तीसगढ़ के लोगों ने खादी और गाँधी का गुणगान फाग गीतों मे किया –
अरे कपड़ा पहिरो खादी के भईया
जय बोलो महात्मा गाँधी के |
पर्यावरण प्रेम – जैसे – जैसे हम लोक सरिता मे अवगाहन करते हैं, वैसे-वैसे ही लोकगीतों के मोती हमें मिलते जाते हैं | लोक राजा विक्रमादित्य को भी प्रकृति की रक्षा के लिए प्रेरित करता है | लोक राजा से पूछता है कि तुम्हारे बाग़ – बगीचे में कौन – कौन से पौधे लगे हैं ?
राजा विक्रमादित महाराजा
केंवरा लगे हे तोर बागों में |
के ओरी लगे राजा केंवती अउ केंवरा
के ओरी लगे अनार महाराजा
केंवरा लगे हे तोर बागो में
नव ओरी लगे राजा केकती अउ केंवरा
दस ओरी लगे अनार महाराजा
केंवरा लगे हे तोर बागो में |
संयोग श्रृंगार – फाग में संयोग और वियोग का भी रंग बिखरा है | लोक गीतों मे समूह की अभिव्यक्ति होती है | इसलिए यह ज्यादा प्रभावी और संप्रेषणीय होता है | शब्द भी सहज, सरल और लोक व्यवहार के रस में पदो सास होते है | किसी भी लोक विधा के गीत को फाग में ढाल देना लोक गायक की विशेषता होती है | लोक गायक केवल गायक ही नहीं होता, बल्कि वह आशुकवि की तरह गीत भी गढ़ लेता है | लोक का यह रंग लोक संपदा की समृद्धि का सूचक है |
फाग की एक बानगी –
जरगे मंझनिया के घाम ग
आमा तरी डोला ल डोला ल उतार दे, उतार दे
आमा तरी डोला ल उतार दे
आमा तरी डोला उतार दे
पहिली गवन बर ससुर जी मोर आइन
नइ जावँव ससुर जी के संग हो
आमा तरी डोला ल उतार दे |
वियोग श्रृंगार – इसी तरह से देवर भी गवन लेने के लिए आता है | नायिका देवर के साथ भी जाने से इंकार करती है | किन्तु जब सैंया जी गवन ले जाने के लिए आते हैं, तो वह सहज तैयार हो जाती है | संयोग की तरह ही वियोग का भी एक उदाहरण –
आये – आये फगुनवा के रात मोर लालनी
सईया अभागा नई आए
काखर बर भेजँव लिख – लिख पतिया
काखर बार भेजँव संदेश मोर ललनी
सईया अभागा नई आए ||
इतिहास लोकगाथा – फाग गीतो में लोक जीवन के वे सारे रंग मिलते हैं, जो लोक की अनुभूतियो से उपजे हैं | चाहे लोक का सांस्कृतिक पक्ष हो या सामाजिक पक्ष, राजनैतिक पक्ष हो या ऐतिहासिक पक्ष | लोक तब भी था, अब भी है और आगे भी रहेगा | लोक ही तो आधार है शास्त्र का, वेद का | फाग गीत में इतिहास का भी रंग समाहित है | आल्हा उदल लोक के प्रमुख पात्र हैं | आल्हा खंड और आल्हा गायन में ये लोक का प्रतिनिधित्व करते हैं | अपनी वीरता और चतुराई के कारण इन्हें पाँडवों का अवतार माना जाता है | उदल की वीरता का बखान इस फाग गीत में दृष्टव्य है –
उदल बांधे तलवार, उदल बंधे तलवार
एक रानी सोनवा के कारण |
काखर डेरा बाहिर में
काखर कदली कछार
एक रानी सोनवा के कारन |
आल्हा के डेरा बाहिर में ,
उदल कदली कछार
एक रानी सोनवा के कारन |
अध्यात्म दर्शन – फाग अध्यात्म और दर्शन में भी रंगा हुआ है | छत्तीसगढ़ी लोक गीतों में कबीरदास तुलसी दास, सूरदास और घासी दास की प्रेम भक्ति का प्रभाव साफ़ साफ़ दिखाई पड़ता है | फाग इससे कतई अलग नहीं है |
बही जात एक नंदिया धारा
बही जात एक नंदिया बहत हे
लख चौरासी धारा |
धरमी – धरमी पार उतरगे
पापी बहे मझधारा |
बही जात एक नंदिया ||
पुरइन पत्ता रहे जल भीतर,
जल ही में करे पसारा |
वाके डार पान नहीं दिखे ,
छलक जात जल सारा ||
बही जात एक नंदिया……||
एक और उदाहरण अध्यात्म का –
जिवरा पराये के बस म हो
कुछु करो मोर राम – कुछु करो मोरे राम
जिवरा पराये के बस म…..|
बिना पाँख के सुवना उड़ी चले रे अगास,
जिहाँ पवन न पानी, सुवा मरत हे पियास ||
जिवरा पराये के बस म
निचट अंधियारी कोठरिया
कभू दिया न जलाय |
बाँहा पकड़ के ले जाही
का करंव में उपाय ||
जिवरा पराये के बस म |
कच्चा माटी के पतोही
पानी देई – देई के सार |
धरत – छुवत फुटि जाही
मै हा करंव का उपाय ||
जिवरा पराये के बस मे |
मीत – मितानी – छत्तीसगढ़ लोक जीवन में फागुन तिहार का रंग बड़ा अलबेला है | इस दिन दोपहर में ही छत्तीसगढ़ी पकवान बनते हैं | परिवार जनों के साथ ही मीत के परिवार को भी भोजन के लिए आमंत्रित किया जाता है | भोजनोपरांत उन्हें रंग – गुलाल से नहलाया जाता है | फिर उन्हें नए वस्त्र धोती या साड़ी भेंट की जाती है | यह मित्रता के भाव को सुदृढ करने का भाव है | गाँव की गलियाँ रंगों से नहाती हैं, तो आँगन और चौपाल रंग – गुलाल से सराबोर होते है | प्रेम, भाई – चारा, समता और सदभाव के रंगों से रंगा फागुन सबको चाहे वह अमीर हो या गरीब , छोटा हो या बडा सबको अपने रंग में रंग लेता है | लोग परस्पर गुलाल का टीका लगाते हैं और आपसी बैर भाव को भुला कर रिश्तों को मजबूत बनाते हैं | घर - कामो से निवृत होकर महिलाओं की टोली भी मस्त रहती है, रंग – गुलाल खेलने में | होली प्रेम का त्यौहार है | शाम के समय सज जाती है फगुवारों की टोली | मस्ती में झूम-झूम कर लोग गाते हैं, स्वांग करके नाचते हैं | नंगारा और तासक की धमक मन को उत्साह से भर देती है –
बन – बन बाजे बांसरी, के बन – बने नाचे मोर |
बन – बन ढूंढे राधिका, कोई देखे नंदकिशोर ?
काली दाह जाय, काली दाह जाय
छोटे से श्याम कन्हैया |
छोटे से श्याम कन्हैया हो
छोटे से श्याम कन्हैया
काली दाह जाय, काली दाह जाय
छोटे से श्याम कन्हैया
छोटे – मोटे रूखवा कदम के
भुईंया लाहसे डार, भुईंया लाहसे डार
ऊपर में बइठे कन्हैयां, मुख मुरली बजाय |
छोटे से श्याम कन्हैया…..|
सांकुर खोर गोकुल के
राधा पनिया जाय, राधा पनिया जाय
पीछु ले आवे कन्हैया, गर लिए लपटाय
छोटे से श्याम कन्हैया |
फाग गीत सामयिक सन्दर्भ - कालीदाह के इस फाग गीत पर गंभीरता से विचार करें तो यह हमारे वर्तमान परिवेश की विसंगतियों को चित्रित करती है | हम सभी परिचित हैं की काली दाह यमुना नदी का एक दाहरा है, जहाँ पर कालिया नाग रहता था | उसने अपनी ताकत के बल पर वहाँ आतंक मचा रखा था | अपने जहर से यमुना के अमृत समान जल को जहरीला कर देता था | जल सेवन से मनुष्य और पशु – पक्षी मर जाते थे | तब अत्याचारी कालिया नाग का दमन कर श्री कृष्ण ने लोगों के जीवन की रक्षा की |आज भी हमारी नदियो में कालिया नाग का बसेरा है |
अब के गए कब अइहो ? – फागगीत का लोक रंग हर व्यक्ति आबाल – वृद्ध, नर नारी सबको अपने रंग में रंग लेता है | जो प्रेम के रंगों में रंगा नहीं उसका जीवन व्यर्थ हो जाता है | क्योंकि होली रोज नहीं होती, इसके बीतने के बाद अवसर के लिए साल भर की प्रतीक्षा करनी पड़ती है | फागुन की बिदाई का ये गीत हमें प्रेम और भाई चारे के रंग में रंगने के लिए बाध्य करता है –
हम पंछी कमल दल, जल सदा रहे भरपूर
अब के मिलना दुरलभ, क्या न्यारे क्या दूर ?
फागुन महराज, फागुन महराज
अब के गए ले कब अइहो ?
कऊने महीना हरेली ?
कब तीजा रे तिहार ?
कऊने महीना दसेरा ?
कब उडै रे गुलाल ?
अब के गए ले कब अइहो ?
सावन महीना हरेली,
भादो तीजा रे तिहार |
कुंवार महिना दसेरा,
फागुन उड़े रे गुलाल |
अब के गए ले कब अइहो ?
इसलिए बेहतर है हम फाग के लोक रंग में रंगें| अपने मन को प्रेम और भाईचारा के पाग में पगें| लोकरंग की ये लाली, सबको दे खुशहाली | यही कामना है |
ये फागुन बीत न जाये , मन – गागर रीत न जाये
आओ खिलें पलाश बन, मन में हम प्रीत सजायें |
आलेख
डॉ. पीसी लाल यादव
‘साहित्य कुटीर’ गंडई पंड़रिया जिला राजनांदगांव(छ.ग.) मो. नं. 9424113122
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सांस्कृतिक व शैक्षिक तत्वों से भरपूर है:छतीसगढ़ी लोक खेल
August 30, 2026
संस्कृत ध्वनियों का उच्चारण एक सहज योग
August 29, 2026
लोकपर्व भोजली
August 29, 2026
पोला तिहार और कुशोत्पाटिनी अमावस्या
September 10, 2026
पोरा तिहार: बैलों के प्रति कृतज्ञता और अन्न के गर्भ-पूजन का पर्व
September 09, 2026
गोवत्स द्वादशी: भारतीय जीवन-मूल्यों में गौ-वंश का स्थान
September 08, 2026
राजा चक्रधर सिंह पोर्ते: कला, संगीत और जनकल्याण के अप्रतिम नायक
September 08, 2026
रायगढ़ रियासत के दीवान और सुप्रसिद्ध साहित्यकार: डॉ.बल्देवप्रसाद मिश्र
September 07, 2026
राजस्थान में प्रकृति से जुड़ा लोकोत्सव है- गाँव बारो
September 06, 2026
शिक्षक दिवस विशेष: संविधान सभा में डॉ. राधाकृष्णन के विचार
September 05, 2026
रायपुर : विशेष लेख : नक्सलमुक्त क्षेत्रों में शिक्षा की नई भोर
September 05, 2026
डॉ.राधाकृष्णन और भारतीय ज्ञान परम्परा
September 04, 2026
छत्तीसगढ़ में श्रीकृष्ण का लोक स्वरूप और रासलीला
September 04, 2026
“कोटा (नंदगाँव) की कृष्ण जन्माष्टमी की अनूठी परम्परा”
September 04, 2026
देवकी के त्याग से तारणहार का प्राकट्य
September 04, 2026
श्री कृष्ण का वैदिक स्वरूप
September 03, 2026
संतान सुख और रक्षा, मातृत्व का पर्व: हलषष्ठी (खमरछठ)
September 02, 2026
बघेरा(केकड़ी) के मूर्ति शिल्प में विष्णु अवतार बलराम
September 02, 2026
लोक-अनुभव का भंडार: हमारी वाचिक परंपरा
September 01, 2026
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छत्तीसगढ़ का पारम्परिक लोकनाट्य: रहस
July 22, 2026