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चातुर्मास : संयम, साधना और स्वास्थ्य की यात्रा।

चातुर्मास : संयम, साधना और स्वास्थ्य की यात्रा।


भारतीय संस्कृति में चातुर्मास (आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक) का विशेष महत्व है। वर्षा ऋतु के इन चार महीनों में साधु-संत यात्रा रोककर एक स्थान पर ध्यान और स्वाध्याय करते हैं। यह समय आत्म-शुद्धि, तप, व्रत और संयम का प्रतीक है। इस दौरान सात्विक आहार तथा आध्यात्मिक चिंतन से शारीरिक व मानसिक शुद्धि प्राप्त होती है। आइए इस लेख के माध्यम से विस्तार से चर्चा करते है। 


चातुर्मास का उल्लेख अनेक हिन्दू धर्मग्रंथों और पुराणों में मिलता है। यह अवधि भगवान विष्णु के शयन और पुनः जागरण से जुड़ी हुई मानी जाती है तथा इसे विशेष तप, व्रत, जप और दान के लिए श्रेष्ठ समय बताया गया है। पद्म पुराण के अनुसार आषाढ़ शुक्ल एकादशी के दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शैया पर योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं। इस दिन को देवशयनी एकादशी कहा जाता है।

पद्मपुराण में उल्लेखित देवशयनी एकादशी
पद्मपुराण में उल्लेखित देवशयनी एकादशी

भगवान विष्णु की योगनिद्रा सामान्य निद्रा नहीं, बल्कि सृष्टि के संरक्षण और संतुलन की दिव्य अवस्था का प्रतीक है। यह बाहरी क्रियाओं से विराम लेकर आत्मचिंतन, धैर्य और आंतरिक जागृति का संदेश देती है।  दार्शनिक दृष्टि से योगनिद्रा सृष्टि के चक्र, परिवर्तन और पुनर्निर्माण की प्रक्रिया का प्रतीक मानी जाती है।

कार्तिक शुक्ल एकादशी को भगवान के जागरण का वर्णन मिलता है, जिसे प्रबोधिनी या देवोत्थान एकादशी कहा जाता है। "शयने विष्णोः प्रवृत्ते तु सर्वे देवाः शयानकाः।" अर्थात् जब भगवान विष्णु शयन करते हैं, तब देवताओं के शुभ कार्य भी स्थगित माने जाते हैं। देवशयनी एकादशी भगवान विष्णु के योगनिद्रा में प्रवेश का प्रतीक है, जो मनुष्य को संयम, साधना और आत्मनिरीक्षण का संदेश देती है। वहीं देवोत्थान एकादशी भगवान के जागरण और नई ऊर्जा के साथ शुभ कार्यों के आरम्भ का प्रतीक है। दार्शनिक रूप से ये दोनों एकादशियाँ जीवन में विश्राम और कर्म, आत्मचिंतन और पुनर्जागरण, तथा अंतर्मुखता और बहिर्मुखता के संतुलन को दर्शाती हैं।

भगवान विष्णु की योगनिद्रा
भगवान विष्णु की योगनिद्रा

स्कन्द पुराण में चातुर्मास को व्रत, दान, तीर्थस्नान और भगवान विष्णु की उपासना के लिए अत्यंत पुण्यकारी बताया गया है। इसमें कहा गया है कि चातुर्मास में किया गया जप, तप और दान सामान्य दिनों की अपेक्षा अनेक गुना फल प्रदान करता है। स्कन्द पुराण में यह भी वर्णित है कि वर्षा ऋतु में जीव-जंतुओं की रक्षा तथा अहिंसा की भावना से साधु-संत एक स्थान पर निवास करते हैं और भ्रमण नहीं करते। भविष्य पुराण में चातुर्मास के दौरान संयम, सात्विक आहार और धार्मिक अनुष्ठानों का विशेष महत्व बताया गया है।

इसमें विभिन्न महीनों में कुछ विशेष खाद्य पदार्थों के त्याग का विधान भी मिलता है। इस नियम के तहत, श्रावण मास में हरी पत्तेदार सब्जियों का त्याग किया जाता है, जबकि भाद्रपद माह में दही का सेवन वर्जित होता है। इसी क्रम में, आश्विन मास में दूध का परित्याग करने को कहा जाता है और अंततः कार्तिक मास में उड़द या कुछ विशेष दालों को भोजन में शामिल नहीं किया जाता है।

चातुर्मास में मुख्यतः वर्जित खाद्य

चातुर्मास में कुछ खाद्य पदार्थों का त्याग ऋतु परिवर्तन के दौरान स्वास्थ्य की रक्षा के लिए किया जाता था। वर्षा ऋतु में पाचन शक्ति अपेक्षाकृत कमजोर होती है, इसलिए कुछ खाद्य पदार्थों से परहेज करने की सलाह दी गई, जिससे पाचन संबंधी समस्याओं और संक्रमणों से बचाव हो सके। वर्षा ऋतु में नमी और तापमान के कारण बैक्टीरिया, वायरस और अन्य सूक्ष्मजीव तेजी से बढ़ते हैं। आहार-संयम, स्वच्छता और उपवास जैसी परंपराएँ रोग प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखने में सहायक मानी जाती थीं।

मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति तथा अन्य धर्मशास्त्रीय ग्रंथों में वर्षा ऋतु के दौरान संन्यासियों और तपस्वियों के एक स्थान पर निवास करने की परंपरा का उल्लेख मिलता है। इसे वर्षावास कहा जाता है, जो चातुर्मास के नाम से भी जाना गया।


बौद्ध मत में 'वर्षावास'

चातुर्मास के दौरान वर्षा ऋतु में यात्रा को सीमित करने की परंपरा का उद्देश्य नवजीवन प्राप्त करने वाले छोटे जीव-जंतुओं, कीट-पतंगों और वनस्पतियों की रक्षा करना था। इससे अनावश्यक हिंसा कम होती थी और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में सहायता मिलती थी।

महाभारत तथा बाद की वैष्णव परंपराओं में चातुर्मास को भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की विशेष आराधना का समय माना गया है। इस दौरान विष्णु सहस्रनाम, भागवत पुराण का पाठ और गीता का अध्ययन विशेष रूप से किया जाता है। चातुर्मास केवल व्रत, तप और साधना का काल ही नहीं, बल्कि भारतीय उत्सव परंपरा का भी महत्वपूर्ण समय है। इस अवधि में मनाए जाने वाले अनेक प्रमुख पर्व धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जीवन को समृद्ध बनाते हैं।


चातुर्मास के दौरान भजन कीर्तन

चातुर्मास भारतीय संस्कृति में आध्यात्मिक साधना और उत्सवों का ऐसा अद्भुत संगम है, जिसमें प्रत्येक पर्व जीवन के किसी न किसी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक मूल्य को अभिव्यक्त करता है। इसकी शुरुआत गुरु पूर्णिमा से होती है, जो गुरु के प्रति श्रद्धा, ज्ञान और आत्मिक मार्गदर्शन के महत्व को स्थापित करती है। इसके पश्चात जन्माष्टमी के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण के अवतरण और धर्म की स्थापना का संदेश प्राप्त होता है, जबकि गणेश चतुर्थी बुद्धि, विवेक और प्रत्येक शुभ कार्य के सफल आरम्भ का प्रतीक बनकर आती है।

आगे चलकर शारदीय नवरात्रि आत्मशक्ति, साधना और देवी शक्ति की आराधना के माध्यम से आंतरिक ऊर्जा के जागरण का अवसर प्रदान करती है। चातुर्मास के अंतिम चरण में दीपावली अज्ञान और अधर्म पर ज्ञान तथा धर्म की विजय का संदेश देती है। अंततः देवोत्थान एकादशी के दिन भगवान विष्णु के योगनिद्रा से जागरण के साथ चातुर्मास का समापन होता है और विवाह तथा अन्य मांगलिक कार्यों का पुनः शुभारम्भ होता है। इस प्रकार चातुर्मास के अंतर्गत आने वाले ये सभी पर्व ज्ञान से भक्ति, शक्ति से प्रकाश और आत्मचिंतन से नवआरम्भ तक की आध्यात्मिक यात्रा को दर्शाते हैं।

देवउठनी एकादशी के बाद विवाह एवं अन्य मांगलिक कार्य'
देवउठनी एकादशी के बाद विवाह एवं अन्य मांगलिक कार्य

वैष्णव, शैव, जैन, बौद्ध मतों में चातुर्मास की परंपरा अत्यंत महत्वपूर्ण है। चातुर्मास भारतीय धार्मिक परम्पराओं में तप, संयम और आध्यात्मिक साधना का महत्वपूर्ण काल माना जाता है। यद्यपि वैष्णव, शैव और जैन परम्पराओं में इसकी मान्यताएँ और अनुष्ठान भिन्न हैं, फिर भी आत्मसंयम, अहिंसा और आध्यात्मिक उन्नति का उद्देश्य सभी में समान है।

चातुर्मास भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में आत्मसंयम, साधना, अहिंसा और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता का अद्वितीय काल है। वैष्णव, शैव और जैन परम्पराओं में इसकी विधियाँ भिन्न होने पर भी इसका मूल उद्देश्य मनुष्य को संयमित, अनुशासित और आध्यात्मिक जीवन की ओर प्रेरित करना है। यह काल हमें केवल धार्मिक आचरण ही नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, जीव-दया और संतुलित जीवनशैली का भी संदेश देता है।

वैष्णव, शैव, जैन, बौद्ध मतों में चातुर्मास की परंपरा

भगवद्गीता (6.17) का यह श्लोक चातुर्मास की संयम और संतुलन की भावना को अभिव्यक्त करता है,

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥

अर्थ: जो व्यक्ति आहार-विहार, कर्म, निद्रा और जागरण में संयम रखता है, उसके लिए योग सभी दुःखों का नाश करने वाला बन जाता है। यह श्लोक चातुर्मास के मूल संदेश संयम, संतुलन और आध्यात्मिक उन्नति को सार्थक रूप से प्रस्तुत करता है।

चातुर्मास केवल आस्था से संबंधित नहीं है, बल्कि शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति की सुनियोजित यात्रा है। यह बाह्य जगत से दूर अंतर्मुखी होने व आत्म-मंथन का अवसर देता है। इस दौरान आहार-संयम व उपवास स्वास्थ्य को सुदृढ़ करते हैं, वहीं एक स्थान पर रहने, अहिंसा और पर्यावरण संरक्षण का पाठ पढ़ाती है। इस काल में आने वाले पर्व नव-चेतना का संचार करते हैं। अंततः, चातुर्मास गीता के अनुरूप हमें संयम, संतुलन और प्रकृति से जुड़ने का मार्ग दिखाता है।

लेख
डॅा. नेहा प्रधान (प्राकृतिक चिकित्सक)
(लेखिका प्राकृतिक चिकित्सक व कोटा के करियर पॉइण्ट महाविद्यालय में सहायक व्याख्याता हैं। वे स्वास्थ्य के प्रति जागृति लाने और प्राकृतिक जीवनशैली को बढ़ावा देने में निरन्तर योगदान करती हैं।)

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