संघर्ष, साधना और विजय: निराला की कालजयी कृति ‘राम की शक्ति पूजा’
October 17, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | अश्विना शुक्ल सप्तमी | शनिवार
नक्षत्र: पूर्वाषाढ़ा | योग: अतिगंड | करण: गर
पर्व विशेष : | तदनुसार 17 अक्टूबर 2026

लोगों के कंठ में लोकगीत समाहित रहते है, जो साहित्य की एक विधा है। हर एक भाषा के अपने लोकगीत है जो ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं द्वारा विशेष अवसर पर गाये जाते है। जिसका अपना एक विशेष महत्व होता है, श्रीराम ऐसे महान विभुति है जिनके व्यक्तितव से सारा संसार प्रभावित हैं। साहित्यकारों के साहित्य से जनमानस राममय हो गया है। जहां विभिन्न विद्या भाव एवं शैली में श्रीराम का चरित्र देश की उपभाषाओं के साहित्य में चित्रित है।
लोक भाषा के माध्यम से लोकगीत में आत्मा की अनुभूति होती है, और क्षेत्रीय भाषा के अनुसार उसमें ध्वनि एवं लय होती है। लोकगीत की प्रमुख भूमिका लोक जीवन को गति देने के लिए होती है। जो विशिष्ट अवसरों पर गाये जाते है। उत्तरप्रदेश के अवधी में श्रीराम के जन्मोत्सव को कवि ने इस प्रकार उभारा है -
‘‘एक दिन राम जन्म ली,
धरती अनंव भइली हो।
वहिनी काजै लागे अवध अधइया,
उठन लागे सोहन हो।‘‘ 1
एक लता के नीचे खडे होकर राजा दशरथ ने पुछा हे लता! सोने जैसा तुम्हारा पत्ता है, पर तुम फलती क्यो नही हो? लता ने कहा - हे राजा दशरथ तुम्हारे पास तो कौशिल्या है, तुम उनसे क्यो नही पुछते? रानी के पास जाकर राजा दशरथ पूछते है- रानी तुम उदास क्यो हो ? हृदय कमल विकसित क्यो नही है? तब माता कौशिल्या बताती है -
‘‘भल बहुराने राजा दशरथ
किन बउरावा हो।
राजा बिनु रे संतति कुलहीन
कंवल कैसे हुलसई हो‘‘ 2
जहां एक ओर पुत्र की प्राप्ति में अयोध्या के राजा दशरथ प्रसन्न थें। वही दुसरी ओर जनकपुर में राजा जनक के पुत्री जन्म लेती है। दोनो के पारस्परिक दाम्पत्य जीवन की कल्पना करके जिस सुख की अनुभूति की गई है, उसे लोकगीत के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है -
‘‘कहवां ही उपजेला अगर चंदनवा,
कहवां ही पान पुरान।
कहवां की जन्मेली सीता,
रनियवां कहवां जन्में भगवान ।।‘‘ 3
दहेज प्रथा जो आज है, वो उस समय भी थी। राजकुमार हंसराज दहेज में घोड़ा और गाय मागते है। इस पर सीता कहती है कि इससे बेटी कुवारी ही रह जायेगी। इसे लोकगीत के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है -
‘‘खोजत-खोजत हम गइली मोरी,
बेटी हो राजा दशरथ के द्वारा।
सांवर बर मांगे हंसराज घोडवा अवरू,
सब मांगे धेनु गाय।। ‘‘ 4
राजां जनक दहेज की चिंता नही करते है, और सभी चींज देते है। धनुष यज्ञ के पहले सीता ही अपनी सहेलियों के साथ बगीचे में फूल तोडने जाती है, जहां उनकी मुलाकात राम जी से होती है। इस भाव का चित्रण इस प्रकार है -
‘‘राजा जनक एक बगिया लगावले,
बगिया फूलेला कचनार।
फूलवा लोढे चलैली बेटी,
सीता देई हथवा उलरिया मुख पान।‘‘5
संवेदनशील सखियां किस प्रकार से सीता जी के विदाई के समय अपने भाव को अभिव्यक्त करती है, उस लोकगीत के माध्यम से चित्रित किया गया है -
‘‘बसवा की जरिया करील एक उपजय,
बाढि के लागेगा अकास।
माई की कोखिया सुंदरि,
एक जन्मी बाढि के भइली सयान।‘‘6
राजा दशरथ के राजवंश की विडम्बना कुंवर राम को सीता के साथ वन को जाना होता है। इस भाव को लोकगीत के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है -
‘‘राम केकई की बतिया से वन को गये,
छेडि के अपने बतन को भये न।
छोडि अयोध्या का राज शीश मुकुट दिये त्याग,
राम राम कहि हरि के शरण को गये।।‘‘7
वन मार्ग मे गंगा पार केंवट से मुलाकात होती है। इस संदर्भ में लोकगीत -
‘‘केंवट बोलय रामचंद्र से, हाथ जोरि अस बानी,
रे बाबू राउर मरम हम जानीं
पाथर से तु कइला,
हमरो घाट दयाकर अइला।।‘‘8
राम सीता को ढुढते हुए शबरी के आश्रम में जाते है। शबरी राम संवाद लोकगीत -
‘‘मगन भई हो सेबरी पाके खबरिया,
कुश के चटइया सबरी झारिकै विछवली।
जोंहली अपने राम के डगरिया,
मीठा मीठा फल, सेबरी जंगल में लावे।
रख ली अपनी कोठरिया,
करती रही सेबरी संतो की सेवा।।‘‘9
श्रीराम लंका पर चढाई करने के लिए लंका पहुॅच जाते है, जिसे सुनकर मन्दोदरी, रावण को समझाती है -
‘‘भति करा सिया के पिया से दुश्मनियां,
होइ है गरद जननियां न।
रामादल से बानर अइहै,
फूकि दिहै राजधनियां न।।‘‘10
इस प्रकार स्पष्ट है कि लोकगीतों में राम का अपना एक विशेष महत्व है, जो सामान्य लोगो के कंठ में समाहित रहती है। इसमें आंचलिक मिट्टी की खुशबू आती है, और निजस्व प्रस्फुटित होता है। साथ-साथ इसमें जन-मानस का अपनत्व जुडा रहता है।
आलेख
एमन्त माधुरी ठाकुर (शोध छात्रा)
शासकीय नागार्जुन स्नातक विज्ञान
महाविद्यालय रायपुर (छत्तीसगढ)
संदर्भ ग्रंथ सूची
गुप्ता, मदन लाल. छत्तीसगढ की संस्कृति एवं लोक आयाम के विभिन्न स्वरूप, बिलासपुरः भारतेन्दु साहित्य समिति, प्रथम संस्करण. 2003, पृ. सं. 51-56
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