सरगुजा अंचल में गंगा दशहरा का पर्व
June 24, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | भाद्रपद शुक्ल द्वितीया | शनिवार
नक्षत्र: हस्त | योग: शुभ | करण: बालव
पर्व विशेष : | तदनुसार 12 सितंबर 2026

सरगुजा अंचल में मां भगवती अनेक रूपों और नामों में विराजमान होकर लोक आस्था का केंद्र बनी हुई हैं। चैत्र नवरात्रि के दौरान यहां विशेष उत्साह के साथ पारंपरिक रीति से पूजा होती है, जहां चलगली में नगाड़े और खडग की अनोखी आराधना विशेष आकर्षण है। कुदरगढ़ी देवी की महिमा भी इतनी प्रसिद्ध है कि उनकी गौरव गाथा केन्द्रीय विश्वविद्यालय बिलासपुर की पुस्तक “शक्तिपीठ” में स्थान पा चुकी है।
चैत्र मास देवी उपासना का पवित्र महीना है। चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से लेकर नवमी तक देवी पूजा की धूम रहती है। इस अवसर पर देवी की विभिन्न रूपों में पूजा होती है। चैत्र नवरात्रि के समय सभी देवी मंदिरों में धूमधाम से देवी की पूजा अर्चना की जाती है। सरगुजा के जनजातीय समुदाय के लोग भी मां भगवती की पूजा पारंपरिक ढंग से विभिन्न नामों से करते हैं। आश्विन नवरात्रि मां दुर्गा पूजा और चैत्र नवरात्रि रामनवमी पूजा के लिए प्रसिद्व है।

चैत्र नवरात्रि रामनवमीं की पूजा के लिए है प्रसिद्ध
सरगुजा अंचल में विभिन्न तीज, त्यौहार पर्व, संस्कारों और सभी पावन अवसरों पर पारंपरिक लोकगीतों का गायन किया जाता है। चाहे वह पावन अवसर देवी पूजा ही क्यों ना हो। सरगुजा अंचल में चैत्र नवरात्रि में सभी जगह देवी पूजा की धूम रहती है। और चारों तरफ देवी सेवा गीत और जस गीत की धून सुनाई देती है। नवरात्रि में सरगुजिहा लोक गीतों के साथ देवी के नौ रूपों की पूजा बड़े ही मनोयोग से की जाती है। देवी जस गीत के बोल कुछ इस प्रकार हैं -

सरगुजा अंचल में लोकप्रिय जसगीत के बोल
देवी की सवारी भी नवरात्रि के अवसर पर विशेष आस्था और विश्वास का विषय होता है । चैत्र रामनवमी के अवसर पर जवारा बोने और नौ दिनों तक देवी सेवा गीतों के गायन की विशेष परंपरा का निर्वहन किया जाता है। ग्रामीण देवी का रूप धारण कर जवारा निकालते हैं। जिस व्यक्ति पर देवी सवार रहती हैं। वह अपने शरीर के विभिन्न अंगों में त्रिषूल का बाना धारण कर खप्पर पकड़ता है। किंदरा, डमफा, डोल जैसे विभिन्न पाारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ सेवा गीत गाते हुए घर-घर दर्शन दे कर, देवी रोग, कष्ट दूर करने का आशीर्वाद देती हैं।

देवी की सवारी- नवरात्रि पर आम है यह दृश्य
राज्यपाल पुरस्कृत पदुम लाल पुन्ना लाल बख्सी स्मृति पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकार अजय कुमार चतुर्वेदी ने सरगुजा अंचल के देवी स्थलों पर ग्रामीणों, पुजारी, बैगा, और स्थानीय लोगों से जानकारी लेकर शोध कार्य किया है। अजय चतुर्वेदी ने बताया कि सरगुजा अंचल में विभिन्न नामों से देवी की पूजा अर्चना की जाती है। अंबिकापुर मे सरगुजा राज परिवार की कुल देवी और सरगुजा अंचल की आराध्य देवी जगत जननी मां महामाया के नाम से, सूरजपुर जिले के देवीपुर में महामाया और ओडगी तहसील के कुदरगढ़ में कुदरगढ़ी देवी और महोली गांव में गढ़वतिया देवी के नाम से पूजा होती है।
प्रेमनगर विकासखंण्ड के पंपापुर में महामाया और मंदिरों की नगरी प्रतापपुर में मां समलेश्वरी, मां महामाया और मां काली की पूजा होती है। और रमकोला में ज्वालामुखी देवी नाम से देवी की पूजा-अर्चना होती है। शंकरगढ़ चलगली के महामाया मंदिर में “बड़की माई“ के नाम से पूजी जाती देवी हैं। मान्यता है कि यहां देवी मां का स्वरूप नगाड़े में विराजमान है। इसलिए मंदिर का पुजारी (बैगा) मां के खडग और नगाड़े की पूजा विधि विधान से राजपरिवार के तत्कालीन उत्तराधिकारी से करावाता है।

"बड़की माई" भी है माता का एक स्वरुप
*चलगली की मां महामाया मंदिर में खडग और नगाड़े की पूजा होती हैं-*
मां महामाया सरगुजा संभाग मुख्यालय अंबिकापुर से लगभग 60 किलोमीटर की दूरी पर चलगली महामाया मंदिर में राज परिवार की कुलदेवी और आदिवासी अंचल की आराघ्य देवी के रूप में पूजित हैं। यहां प्रत्येक वर्ष क्वार नवरात्रि के अवसर पर पंचमी तिथि को शंकरगढ़ राजपरिवार के वर्तमान उत्तराधिकारी के द्वारा विशेष पूजा की जाती है।
शंकरगढ़ राजपरिवार के वर्तमान उत्तराधिकारी श्री अनुराग सिंह देव ने बताया कि यहां की महामाया हमारी कुलदेवी के रूप में पूजित हैं। इसलिए प्रत्येक क्वांर नवरात्रि की पंचमी को हमारे परिवार के द्वारा विशेष पूजा और नौ कन्याओं को भोज कराया जाता है।

देवी स्वरूपा के रूप में पूजी जाती हैं कन्याएं
प्रायः देखा जाता है कि देवी मंदिरों में किसी मूर्ति या प्रतिमा की पूजा होती है। किंतु चलगली के महामाया मंदिर में केवल मां के खडग और नगाड़े की पूजा होती है। इस संबंध में ऐसी मान्यता प्रचलित है कि देवी मां का स्वरूप नगाड़े में विराजमान है, इसलिए नगाड़े और मां की खडग की विशेष पूजा होती है।

खड़ग और नगाड़े के स्वरुप में भी पूजी जाती हैं माता
*कुदरगढ़ी देवी की गौरव गाथा केन्द्रीय वि0वि0 बिलासपुर की पुस्तक शक्तिपीठ में शामिल-*
सरगुजा अंचल की प्रसिद्ध देवी कुदरगढ़ी माता हैं। सूरजपुर जिला अन्तर्गत ओड़गी ब्लाक मुख्यालय से लगभग छः किलो मीटर की दूरी पर उत्तर पश्चिम मे कुदरगढ़ पर्वत के सघन वनों के बीच शक्तिपीठ मां बागेश्वरी बाल रूप में कुदरगढ़ी देवी के नाम से विराजमान हैं। दोनों नवरात्रि में यहां नौ दिनों तक श्रद्वालू भक्तों का तांता लगा रहता है।
शक्तिपीठ मां बागेश्वरी कुदरगढ़ी देवी के संबंध में एक जनश्रुति प्रचलित है कि वनवास काल में भगवान श्री राम, लक्ष्मण और माता सीता ने भी इस पर्वत पर मां वन देवी की पूजा अर्चना की थी। पदुम लाल पुन्ना लाल बख्सी स्मृति पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकार अजय कुमार चतुर्वेदी ने शक्तिपीठ मां कुदरगढ़ी देवी की गौरव गाथा लिखी है,जो शक्तिपीठ पुस्तक में प्रकाशित है। इस पुस्तक के संपादक प्रो0 आलोक कुमार चक्रवाल, कुलपति केन्द्रीय वि0वि0 बिलासपुर हैं।
सरगुजा अंचल की आराध्य देवी *अंबिकापुर की जगत जननी मां महामाया-*
सरगुजा अंचल की आराध्य देवी अंबिकापुर की जगत जननी मां महामाया हैं। मां महामाया संभाग मुख्यालय अंबिकापुर में शक्तिपीठ के रूप में विराजमान हैं। यहां कुछ दूरी पर मां समलेष्वरी विराजमान हैं। ऐसी मान्यता है कि यहां से कोई भी श्रद्धालु भक्त खाली हाथ नहीं लौटता है। कालांतर में मां महामाया अंबिका देवी के नाम से श्रीगढ़ की पहाड़ी पर पुजित थी। यहां चैत्र नवरात्र में श्रद्वालू भक्तों का अपार जन सैलाब उमड़ता है।
ब्रिटीश शासन काल में 16 अक्टूबर सन् 1905 ई. के बंगाल विभाजन के पहले तक सरगुजा बंगाल के छोटा नागपुर कमिश्नरी में शामिल था। यह छत्तीसगढ़ कमिश्नरी के 14 रियासतों में दूसरे नंबर का रियासत था। रियासत काल में सरगुजा की राजधानी प्रतापपुर को भी बनाई गई थी, जो महाराजा रघुनाथशरण सिंहदेव बहादुर के समय सरगुजा की राजधानी प्रतापपुर से वर्तमान अंबिकापुर लाई गई।
उस समय अंबिकापुर को बिश्रामपुर कहा जाता था। 16 अक्टूबर 1905 ई. को सरगुजा के मध्य प्रांत के प्रशासन के अधीन होने तक विश्रामपुर कहा जाता था। छत्तीसगढ़ नए सूबा में सरगुजा के शामिल होने के साथ ही विश्रामपुर का नाम अंबिकापुर अंबिका देवी के नाम पर रखा गया। मान्यता है कि मां के दरबार से कोई भक्त खाली हांथ नहीं लौटता।
प्रतापपुर विकास खंड के रमकोला में ज्वालामुखी देवी के नाम से, लखनपुर के जजगा गांव में रमपुरहिन दाई के नाम से और जसपुर जिले में खुड़िया रानी के नाम से देवी पूजा होती है ।
सरगुजा अंचल में देवी भक्त शारदीय और चैत्र दोनों ही नवरात्रि में मां भगवती की उपासना विभिन्न नामों से करते हैं। सरगुजा अंचल में कहीं ज्वालामुखी देवी, कहीं मां महामाया, कहीं कुदरगढ़ी देवी, कहीं खुड़िया रानी, कहीं रमपुरहिन दाई, कहीं गढ़वतिया देवी , तो कहीं बड़की माई के नाम से पूजी जाती हैं मां भगवती। श्रद्धालू भक्त नौ दिनों तक माता के नौ रूपों की पूजा और सेवा पारंपरिक सरगुजिहा लोक गीतों के साथ सच्चे मन से करते हैं, और मन चाहा वरदान पातें हैं।
लेखक-
श्री अजय कुमार चतुर्वेदी
व्याख्याता, अंबिकापुर
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