ज्ञान भारतम् अभियान: प्राचीन पांडुलिपियों को सहेजने का संकल्प
April 26, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | भाद्रपद शुक्ल द्वितीया | शनिवार
नक्षत्र: हस्त | योग: शुभ | करण: बालव
पर्व विशेष : | तदनुसार 12 सितंबर 2026

जनजातीय समाज में शिव-उपासना की परंपरा अनादि काल से ही विद्यमान रही है। भारत में लगभग 705 से अधिक जनजातीय समुदाय निवास करते हैं। इनमें से अधिकांश समुदाय महादेव को उनके स्थानीय नामों और स्वरूपों के आधार पर उपासना पूरे वर्ष करते हैं, लेकिन कुछ विशेष अवसरों पर पूरा समुदाय उत्सव और पर्व के रूप में शिव-उपासना करता है। यह लेख जनजातीय समाज की महादेव पर आस्था और महाशिवरात्रि से जुड़ी परंपराओं पर केंद्रित है।
जनजातीय समाज में महादेव स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है, उनकी मान्यता है कि महादेव का स्वरूप निराकार और सर्वव्यापक है। “महा” का अर्थ विशाल या महान होता है, इसी भाव से वनवासी समाज उन्हें “बड़ा-देव” के रूप में पूजता है। अनेक जनजातीय क्षेत्रों में आदि-देव महादेव को “बूढ़ा-देव” भी कहा जाता है। यहाँ “आदि” का अर्थ सबसे प्राचीन या प्रथम है, और लोकभाषा में इसी प्राचीनता को सम्मानपूर्वक “बूढ़ा-देव” कहा जाता है।
गोंड समुदाय की परंपराओं में महादेव का एक प्रचलित नाम “शंभू शेख” भी मिलता है। व्याकरण की दृष्टि से “शंभू” शब्द “शम्+भू” के योग से बना है, जिसका अर्थ है सुख और कल्याण करने वाले प्रधान देवता। गोंड समुदाय साहित्य में यह वर्णित है कि शंभू शेख इस धरती के अधिपति हैं, जिन्हें शंभू, गोटा या महादेव के नाम से भी संबोधित किया जाता है। ऐसे अनेक उदाहरण स्पष्ट करते हैं कि लोक मान्यताओं में “बड़ादेव” और “महादेव” मूलतः एक ही शिव-तत्व के भिन्न लोकनाम हैं।

400 वर्ष पुराना बूढ़ादेव मंदिर रायपुर
जनजातीय समाज में महादेव का स्मरण तो पूरे वर्ष होता है, किंतु कुछ विशेष अवसरों को और अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। सावन मास के सोमवार को कई श्रद्धालु निकटवर्ती शिवालयों में जलाभिषेक करते हैं। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया को “तीजा जगार” के अवसर पर शिव-पार्वती की विशेष पूजा की जाती है, माताएं-बहनें उपवास रखती है।
इसी प्रकार महाशिवरात्रि का पर्व जनजातीय समाज के लिए अत्यंत विशेष है। इस दिन सुबह से ही शिवालयों में जल अर्पित करने के लिए जनजातीय समाज के लोगों की भीड़ लगनी शुरू हो जाती है। कई लोग काँवड़ में जल लेकर अपने आस पास के किसी प्रसिद्ध शिवालय तक पैदल चलते जाते हैं। पूरा दिन भजन-कीर्तन और पारंपरिक गीतों के माध्यम से शंभू शेख की आराधना की जाती है। रात्रि में जागरण की परंपरा है, पूरी रात महादेव के भक्ति गीतों और ढोल-मंजीरे से भक्तिमय वातावरण बना रहता है।
महाशिवरात्रि से संबंधित लोककथा:
गोंड समुदाय में महाशिवरात्रि को “नरका पंडुम” तथा “शंभू जागरण की रात्रि” भी कहा जाता है। कथा के अनुसार जब आदि गुरु शंभू शेख ने सृष्टि को बचाने के लिए विषपान किया तो वे मूर्छित हो गए। तब एक वैद्य को बुलाया गया। वैद्य ने कहा कि यदि शंभू शेख को सुबह होने तक जगा कर रखा जाए तो उनकी जान बच जाएगी। ऐसे में कोया वनवासी समुदाय के लोगों ने ढोल-मंजीरे बजाकर रात भर कीर्तन किया और उन्हें जागृत रखा। सुबह होने के पश्चात् वे स्वस्थ हुए और उन्हें नया जीवन मिला। इसलिए महाशिवरात्रि की रात्रि में जागरण और भजन-कीर्तन की परंपरा प्रचलित है।

महादेव विष पीते हुए
पौराणिक ग्रंथ शिव पुराण में भी वर्णन मिलता है कि समुद्र मंथन से निकले कालकूट विष को भगवान शिव ने धारण किया। इसके प्रभाव से उनके शरीर में उष्णता बढ़ी, जिसे शांत करने के लिए देवताओं ने उन पर जल की धारा प्रवाहित की। इसी से जलाभिषेक की परंपरा का संबंध जोड़ा जाता है। बेलपत्र, धतूरा और अन्य औषधियों का प्रयोग विष के प्रभाव को कम करने के लिए किया गया, इसलिए आज भी शिव-पूजन में यह सामग्री प्रयुक्त होती है।
भील जनजातीय समुदाय में भी महाशिवरात्रि से संबंधित एक कथा मिलती है। प्रचलित कथा में एक शिकारी भील का उल्लेख है, जो अनजाने में शिवलिंग पर बिल्वपत्र चढ़ाकर महाशिवरात्रि के दिन शिव की कृपा प्राप्त करता है और निर्दोष जीवों की हत्या न करने का संकल्प लेता है।

शिकारी भील
कुछ लोग महाशिवरात्रि को शिव-पार्वती विवाह के दिन से भी जोड़ते हैं, लेकिन शिव पुराण में मार्गशीर्ष (अगहन) मास में शिव-पार्वती विवाह का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। गोंड लोककथाओं और शास्त्रीय प्रमाणों दोनों से इसकी पुष्टि नहीं होती है, लेकिन लोक मान्यता के रूप में यह विद्यमान है।
जनजातीय क्षेत्रों में शिव उपासना
सतपुड़ा क्षेत्र में “तिलक सिंदूर” नामक स्थान महादेव के धाम के रूप में प्रसिद्ध है। परंपरा के अनुसार यहाँ प्रथम पूजा का अधिकार गोंड समुदाय के मुखिया को प्राप्त है। महाशिवरात्रि के अवसर पर यहाँ विशेष अभिषेक और लोकाचार आधारित अनुष्ठान संपन्न होते हैं।

तिलक सिंदूर, सतपुड़ा
झारखंड के गुमला कस्बे से लगभग 60 किलोमीटर दूर एक छोटी पहाड़ी की चोटी पर स्थित तंगीनाथ अपने शिवलिंग के लिए प्रसिद्ध है। इस शिवलिंग की पूजा स्थानीय उरांव समुदाय के लोग करते हैं। इस पवित्र स्थल के मुख्य पुजारी भी उरांव समुदाय से होते हैं, जो अपनी विशिष्ट परंपरा और शैली के अनुसार पूजा-अर्चना करते हैं।

तंगीनाथ शिवलिंग, गुमला
झारखंड के छोटानागपुर क्षेत्र में जनजातीय समुदायों के बीच भगवान शिव से जुड़ी अनेक कथाएँ और मान्यताएँ प्रचलित हैं। झारखंड का प्रमुख जनजातीय समुदाय संथाल अपने सर्वोच्च ईश्वर को “मरांग बुरु” कहता है, जिसे कई स्थानों पर “महादेव” के रूप में भी संबोधित किया जाता है।

मरांग बुरु पहाड़ी
झारखंड के घाघरा, बस्ती क्षेत्र में “देवकी” नामक स्थल स्थानीय समुदायों के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि "देवकी" शब्द दो शब्दों के योग से बना है: “देव” और “अकी”। उरांव भाषा में “अकी” का अर्थ घर और “देव” का अर्थ देवता होता है। इस प्रकार “देवकी” का अर्थ “देवताओं का घर” या “देवताओं का निवास” समझा जाता है। स्थानीय श्रद्धालु इस स्थल को देवघर के समान ही पवित्र मानते हैं।
हिमाचल प्रदेश में रहने वाला जनजातीय समुदाय “गद्दी” यह मानता है कि भगवान शिव हिमालय में निवास करते हैं और अपने चुने हुए भक्तों, विशेषकर गद्दी समुदाय पर निरंतर कृपा-दृष्टि बनाए रखते हैं।

कैलाश पर्वत
कर्नाटक का कोरगा जनजातीय समुदाय भी शिव के अनेक रूपों में पूजा करता है। वे भगवान को परिवार के सदस्य की तरह मानते हैं और उनके साथ अपने सुख-दुख को जोड़कर देखते हैं।
कई जनजातीय समुदायों में साजा वृक्ष का संबंध बड़ादेव से जोड़ा जाता है। गोंड परंपरा में यह विश्वास प्रचलित है कि समस्त सृष्टि महादेव और पार्वती के युगल-तत्व से उत्पन्न हुई है। बड़ादेव को “सल्ला-गांगरा” अर्थात नर और नारी शक्ति के रूप में भी समझा जाता है, जो सृजन के मूल सिद्धांत का प्रतीक है। यह अवधारणा महादेव के अर्धनारीश्वर स्वरूप से साम्य रखती है।

साजा वृक्ष
गोंड समाज में बड़ादेव की पूजा-विधि में लोक-परंपराओं का विशेष स्थान है। पूजा स्थल को गोबर से लीपकर शुद्ध किया जाता है, फिर हल्दी या आटे से चौक बनाकर उस पर पाटा रखा जाता है और सफेद वस्त्र बिछाया जाता है। इसके बाद हल्दी की पाँच गाँठें, चावल, नारियल, बेलपत्र और पुष्प अर्पित किए जाते हैं, तथा धूप-दीप से आराधना की जाती है।
फड़ापेन की कथा के दोहे में शिव-स्मरण इस प्रकार मिलता है:
“शिव गौरा को सुमरि, गुरु देवगन को सिर नाय।”
बूढ़ादेव की आरती में भी महादेव का उल्लेख मिलता है:
“दिव्यशक्ति बुध देव, जगत नियंता देव।
कोयामुरी दीपम में शंभू भय महादेव।।"
जनजातीय क्षेत्रों में ऐतिहासिक शिवालय और शिवरात्रि पर मेले
मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के वनांचल, जो कभी गोंड राजाओं के गढ़ रहे, आज भी अनेक प्राचीन शिव मंदिरों के साक्षी हैं। पचमढ़ी का चौरागढ़ महादेव मंदिर इस परंपरा का प्रमुख केंद्र है, जहाँ शिवरात्रि पर श्रद्धालु त्रिशूल समर्पित करते हैं।

पचमढ़ी का चौरागढ़ महादेव
बस्तर क्षेत्र में गोंड, मुरिया, माड़िया (अबूझमाड़िया), भतरा, हल्बा, धुरवा और दोरला जैसे जनजातीय समाज निवास करता है। इस क्षेत्र में अनेक प्राचीन शिव मंदिर आज भी विद्यमान हैं। केशकाल क्षेत्र के टीलों की खुदाई में कई शिव मंदिरों के प्रमाण मिले हैं, जिनमें से कई लगभग 1500 वर्ष पुराने हैं।
गोबरहीन का शिव मंदिर (गढ़ धनोरा) विशेष रूप से प्रसिद्ध है, जहाँ एक ही टीले पर अनेक प्राचीन शिवलिंग स्थापित हैं। महाशिवरात्रि के अवसर पर यहाँ एक विशाल मेला भरता है, जहाँ जनजातीय समाज की महादेव पर गहरी आस्था देखने को मिलती है।

गढ़धनोरा शिव मंदिर
बस्तर के वनांचलों में बारसूर का बत्तीसा मंदिर, समलूर का शिव मंदिर, सिंगईगुड़ी और भैरमगढ़ के प्राचीन मंदिर, जो 10वीं–11वीं शताब्दी के नागवंशी काल के हैं, जनजातीय आस्था के महत्वपूर्ण केंद्र हैं। इस अवसर पर हजारों जनजातीय समाज के लोग महाशिवरात्रि के दिन पूजन कर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

बत्तीसा मंदिर बारसूर
महाशिवरात्रि के अवसर पर बस्तर में चपका (कोंडागांव), चेमल (खंडी घाट), समलूर (तुलार गुफा व गुमरगुंडा), आदि में मेला लगता है। सरगुजा में कापू मेला, धमतरी के रुद्रेश्वर महादेव मंदिर में रुद्री मेला, सिरपुर के गंधेश्वर महादेव, भोरमदेव मंदिर, सक्ती का तुर्रीधाम मेला, रायपुर के हटकेश्वर महादेव और राजिम के कुलेश्वर महादेव मंदिरों में भी भव्य आयोजन होते हैं। इन अवसरों पर बड़ी संख्या में जनजातीय समाज के लोग दर्शन और उत्सव में भाग लेते हैं।
समग्र रूप से देखा जाए तो जनजातीय समाज की शिव-आस्था कोई अलग या नई परंपरा नहीं, बल्कि उसी व्यापक सनातन शिव-तत्व की धारा है जो भारत के शास्त्रीय और लोक जीवन में साथ-साथ बहती रही है। बड़ादेव/बूढ़ादेव/शंभू शेख/मरांग बुरु जैसे कई नाम हों, पर इनके पीछे छिपा भाव एक ही है: शिव को सर्वोच्च, सर्वव्यापक और कल्याणकारी शक्ति मानने का भाव। महाशिवरात्रि के जागरण, अभिषेक, भजन-कीर्तन, लोककथाओं और मेलों के माध्यम से जनजातीय समाज अपने जीवन को प्रकृति, धर्म (नैतिकता), शिव के साथ जोड़कर देखता है। समावेशी और एकत्व से परिपूर्ण यह पर्व हमें बताता है कि जनजातीय समाज की आध्यात्मिक चेतना भारतीय संस्कृति के साथ सहज रूप से जुड़ी हुई है, और उसकी पूजा-पद्धतियों की लोक परंपरा में उसी शिव-भक्ति की अभिव्यक्ति हैं जो अनादि काल से चली आ रही है।

लेख:
वेद प्रकाश सिंह ठाकुर,
संपादक,
दक्षिण कोसल टुडे.
ज्ञान भारतम् अभियान: प्राचीन पांडुलिपियों को सहेजने का संकल्प
April 26, 2026
सामाजिक समरसता के आलोक में गोटुल
February 22, 2026
जनजातीय समाज में महाशिवरात्रि का पर्व
February 14, 2026
भारतीय मापन पद्धति में रत्ती का महत्व
January 01, 2026
वाचिक परंपरा और उसका महत्व
December 25, 2025
नव वर्ष की भारतीय परंपरा
December 21, 2025
वनवासी विरासत पर आधारित आज का विश्व
December 11, 2025
लोक कथाओं में छिपा समाज का इतिहास
December 09, 2025
प्रथम महिला स्वतंत्रता सेनानी: रानी अब्बक्का देवी
November 19, 2025
जनजातीय गौरव दिवस: हमारे महापुरुषों और राष्ट्रीय-गौरव के स्मरण का दिन
November 14, 2025
जनजातीय वर्ग के विरुद्ध अंग्रेजों के षड्यंत्र
November 12, 2025
जनजातीय वर्ग का सामाजिक और आध्यात्मिक दर्शन
November 12, 2025
जनजातीय समाज की ज्ञान परम्परा
November 12, 2025
वैश्विक समस्याओं के निदान में जनजातीय समाज की भूमिका
November 12, 2025
जनजातीय समाज के प्रति मिथ्या धारणाएँ एवं उनका कारण
October 31, 2025
हम सबके मूल में जनजातीय समाज की मान्यताएं
October 31, 2025
जनजातीय समाज द्वारा इस्लामी आक्रमण का प्रतिकार
October 31, 2025
जब जंगलों से उठी आज़ादी की पहली आवाज़
October 31, 2025
तुलसी पूजा: भारतीय समाज में प्राकृतिक तत्त्वों के उपासना की परम्परा
October 31, 2025
आंवला नवमी: भारतीय समाज में प्रकृति पूजन का पर्व
October 29, 2025
छत्तीसगढ़ में सूर्य उपासना की 10,000 वर्ष पुरानी परंपरा
October 28, 2025
"छत्तीसगढ़ का पारंपरिक गौरा-गौरी उत्सव: शिव-पार्वती विवाह का लोक पर्व
October 21, 2025
दीपावली/ नवसस्येष्टि: प्रकाश, पुनर्जागरण और भारतीय जीवन-दर्शन का उत्सव
October 20, 2025
जानिए नरक चौदस का महत्व
October 19, 2025
धनतेरस पर्व में निहित आयुर्वेद और स्वास्थ्य समृद्धि का उत्सव
October 18, 2025
मुरिया दरबार
October 03, 2025
बस्तर दशहरा: शक्ति की उपासना और महिषासुर पर विजय की यात्रा (भाग 03)
September 24, 2025
बस्तर दशहरा: शक्ति की उपासना और महिषासुर पर विजय की यात्रा (भाग-02)
September 23, 2025
बस्तर दशहरा: शक्ति उपासना और महिषासुर पर विजय की यात्रा (भाग 01)
September 22, 2025
भारतीय समाज को एक सूत्र में बांधते: हमारे पितर
September 21, 2025
बस्तर का गोंचा/रथ महापर्व: भारतीय संस्कृति की देव यात्रा (जातरा) का प्रतीक
June 27, 2025
पारधी जनजाति की शिल्पकला आधारित जीवन शैली
April 30, 2025
महानदी अपवाह तंत्र की व्यापारिक पथ प्रणाली : शोध पत्र
April 30, 2025
मिशनरियों के विरुद्ध उलगुलान के नायक बिरसा मुंडा
June 09, 2022
नगपुरा का श्री उवसग्गहरं पार्श्व तीर्थ
January 21, 2022
कबीरपंथियों के आस्था का केन्द्र दामाखेड़ा
December 14, 2021
जानिए ऑपरेशन पोलो क्या है?
September 17, 2021
जहां प्रकृति स्वयं करती है शिव का जलाभिषेक
August 18, 2021
पोला तिहार और कुशोत्पाटिनी अमावस्या
September 10, 2026
पोरा तिहार: बैलों के प्रति कृतज्ञता और अन्न के गर्भ-पूजन का पर्व
September 09, 2026
गोवत्स द्वादशी: भारतीय जीवन-मूल्यों में गौ-वंश का स्थान
September 08, 2026
राजा चक्रधर सिंह पोर्ते: कला, संगीत और जनकल्याण के अप्रतिम नायक
September 08, 2026
रायगढ़ रियासत के दीवान और सुप्रसिद्ध साहित्यकार: डॉ.बल्देवप्रसाद मिश्र
September 07, 2026
राजस्थान में प्रकृति से जुड़ा लोकोत्सव है- गाँव बारो
September 06, 2026
शिक्षक दिवस विशेष: संविधान सभा में डॉ. राधाकृष्णन के विचार
September 05, 2026
रायपुर : विशेष लेख : नक्सलमुक्त क्षेत्रों में शिक्षा की नई भोर
September 05, 2026
डॉ.राधाकृष्णन और भारतीय ज्ञान परम्परा
September 04, 2026
छत्तीसगढ़ में श्रीकृष्ण का लोक स्वरूप और रासलीला
September 04, 2026
“कोटा (नंदगाँव) की कृष्ण जन्माष्टमी की अनूठी परम्परा”
September 04, 2026
देवकी के त्याग से तारणहार का प्राकट्य
September 04, 2026
श्री कृष्ण का वैदिक स्वरूप
September 03, 2026
संतान सुख और रक्षा, मातृत्व का पर्व: हलषष्ठी (खमरछठ)
September 02, 2026
बघेरा(केकड़ी) के मूर्ति शिल्प में विष्णु अवतार बलराम
September 02, 2026
लोक-अनुभव का भंडार: हमारी वाचिक परंपरा
September 01, 2026
प्रकृति और नारी के उल्लास का पर्व- कजली तीज
August 31, 2026
सांस्कृतिक व शैक्षिक तत्वों से भरपूर है:छतीसगढ़ी लोक खेल
August 30, 2026
संस्कृत ध्वनियों का उच्चारण एक सहज योग
August 29, 2026
लोकपर्व भोजली
August 29, 2026
पोला तिहार और कुशोत्पाटिनी अमावस्या
September 10, 2026
पोरा तिहार: बैलों के प्रति कृतज्ञता और अन्न के गर्भ-पूजन का पर्व
September 09, 2026
गोवत्स द्वादशी: भारतीय जीवन-मूल्यों में गौ-वंश का स्थान
September 08, 2026
राजा चक्रधर सिंह पोर्ते: कला, संगीत और जनकल्याण के अप्रतिम नायक
September 08, 2026
रायगढ़ रियासत के दीवान और सुप्रसिद्ध साहित्यकार: डॉ.बल्देवप्रसाद मिश्र
September 07, 2026
राजस्थान में प्रकृति से जुड़ा लोकोत्सव है- गाँव बारो
September 06, 2026
शिक्षक दिवस विशेष: संविधान सभा में डॉ. राधाकृष्णन के विचार
September 05, 2026
रायपुर : विशेष लेख : नक्सलमुक्त क्षेत्रों में शिक्षा की नई भोर
September 05, 2026
डॉ.राधाकृष्णन और भारतीय ज्ञान परम्परा
September 04, 2026
छत्तीसगढ़ में श्रीकृष्ण का लोक स्वरूप और रासलीला
September 04, 2026
“कोटा (नंदगाँव) की कृष्ण जन्माष्टमी की अनूठी परम्परा”
September 04, 2026
देवकी के त्याग से तारणहार का प्राकट्य
September 04, 2026
श्री कृष्ण का वैदिक स्वरूप
September 03, 2026
संतान सुख और रक्षा, मातृत्व का पर्व: हलषष्ठी (खमरछठ)
September 02, 2026
बघेरा(केकड़ी) के मूर्ति शिल्प में विष्णु अवतार बलराम
September 02, 2026
लोक-अनुभव का भंडार: हमारी वाचिक परंपरा
September 01, 2026
प्रकृति और नारी के उल्लास का पर्व- कजली तीज
August 31, 2026
सांस्कृतिक व शैक्षिक तत्वों से भरपूर है:छतीसगढ़ी लोक खेल
August 30, 2026
संस्कृत ध्वनियों का उच्चारण एक सहज योग
August 29, 2026
लोकपर्व भोजली
August 29, 2026
This is the commets tab content.
This is the Tags tab content.
Note * Your email address will not be published. Required fields are marked
भारतीय संस्कृति और भाषाई विविधता
July 08, 2026