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जनजातीय समाज में महाशिवरात्रि का पर्व

जनजातीय समाज में महाशिवरात्रि का पर्व

जनजातीय समाज में शिव-उपासना की परंपरा अनादि काल से ही विद्यमान रही है। भारत में लगभग 705 से अधिक जनजातीय समुदाय निवास करते हैं। इनमें से अधिकांश समुदाय महादेव को उनके स्थानीय नामों और स्वरूपों के आधार पर उपासना पूरे वर्ष करते हैं, लेकिन कुछ विशेष अवसरों पर पूरा समुदाय उत्सव और पर्व के रूप में शिव-उपासना करता है। यह लेख जनजातीय समाज की महादेव पर आस्था और महाशिवरात्रि से जुड़ी परंपराओं पर केंद्रित है।


जनजातीय समाज में महादेव स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है, उनकी मान्यता है कि महादेव का स्वरूप निराकार और सर्वव्यापक है। “महा” का अर्थ विशाल या महान होता है, इसी भाव से वनवासी समाज उन्हें “बड़ा-देव” के रूप में पूजता है। अनेक जनजातीय क्षेत्रों में आदि-देव महादेव को “बूढ़ा-देव” भी कहा जाता है। यहाँ “आदि” का अर्थ सबसे प्राचीन या प्रथम है, और लोकभाषा में इसी प्राचीनता को सम्मानपूर्वक “बूढ़ा-देव” कहा जाता है।

गोंड समुदाय की परंपराओं में महादेव का एक प्रचलित नाम “शंभू शेख” भी मिलता है। व्याकरण की दृष्टि से “शंभू” शब्द “शम्+भू” के योग से बना है, जिसका अर्थ है सुख और कल्याण करने वाले प्रधान देवता। गोंड समुदाय साहित्य में यह वर्णित है कि शंभू शेख इस धरती के अधिपति हैं, जिन्हें शंभू, गोटा या महादेव के नाम से भी संबोधित किया जाता है। ऐसे अनेक उदाहरण स्पष्ट करते हैं कि लोक मान्यताओं में  “बड़ादेव” और “महादेव” मूलतः एक ही शिव-तत्व के भिन्न लोकनाम हैं।


400 वर्ष पुराना बूढ़ादेव मंदिर रायपुर

जनजातीय समाज में महादेव का स्मरण तो पूरे वर्ष होता है, किंतु कुछ विशेष अवसरों को और अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। सावन मास के सोमवार को कई श्रद्धालु निकटवर्ती शिवालयों में जलाभिषेक करते हैं। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया को “तीजा जगार” के अवसर पर शिव-पार्वती की विशेष पूजा की जाती है, माताएं-बहनें  उपवास रखती है।

इसी प्रकार महाशिवरात्रि का पर्व जनजातीय समाज के लिए अत्यंत विशेष है। इस दिन सुबह से ही शिवालयों में जल अर्पित करने के लिए जनजातीय समाज के लोगों की भीड़ लगनी शुरू हो जाती है। कई लोग काँवड़ में जल लेकर अपने आस पास के किसी प्रसिद्ध शिवालय तक पैदल चलते जाते हैं। पूरा दिन भजन-कीर्तन और पारंपरिक गीतों के माध्यम से शंभू शेख की आराधना की जाती है। रात्रि में जागरण की परंपरा है, पूरी रात महादेव के भक्ति गीतों और ढोल-मंजीरे से भक्तिमय  वातावरण बना रहता है।


महाशिवरात्रि से संबंधित लोककथा:
गोंड समुदाय में महाशिवरात्रि को “नरका पंडुम” तथा “शंभू जागरण की रात्रि” भी कहा जाता है। कथा के अनुसार जब आदि गुरु शंभू शेख ने सृष्टि को बचाने के लिए विषपान किया तो वे मूर्छित हो गए। तब एक वैद्य को बुलाया गया। वैद्य ने कहा कि यदि शंभू शेख को सुबह होने तक जगा कर रखा जाए तो उनकी जान बच जाएगी। ऐसे में कोया वनवासी समुदाय के लोगों ने ढोल-मंजीरे बजाकर रात भर कीर्तन किया और उन्हें जागृत रखा। सुबह होने के पश्चात् वे स्वस्थ हुए और उन्हें नया जीवन मिला। इसलिए महाशिवरात्रि की रात्रि में जागरण और भजन-कीर्तन की परंपरा प्रचलित है। 

महादेव विष पीते हुए
महादेव विष पीते हुए

पौराणिक ग्रंथ शिव पुराण में भी वर्णन मिलता है कि समुद्र मंथन से निकले कालकूट विष को भगवान शिव ने धारण किया। इसके प्रभाव से उनके शरीर में उष्णता बढ़ी, जिसे शांत करने के लिए देवताओं ने उन पर जल की धारा प्रवाहित की। इसी से जलाभिषेक की परंपरा का संबंध जोड़ा जाता है। बेलपत्र, धतूरा और अन्य औषधियों का प्रयोग विष के प्रभाव को कम करने के लिए किया गया, इसलिए आज भी शिव-पूजन में यह सामग्री प्रयुक्त होती है।

भील जनजातीय समुदाय में भी महाशिवरात्रि से संबंधित एक कथा मिलती है। प्रचलित कथा में एक शिकारी भील का उल्लेख है, जो अनजाने में शिवलिंग पर बिल्वपत्र चढ़ाकर महाशिवरात्रि के दिन शिव की कृपा प्राप्त करता है और निर्दोष जीवों की हत्या न करने का संकल्प लेता है। 

शिकारी भील 
शिकारी भील 

कुछ लोग महाशिवरात्रि को शिव-पार्वती विवाह के दिन से भी जोड़ते हैं, लेकिन शिव पुराण में मार्गशीर्ष (अगहन) मास में शिव-पार्वती विवाह का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। गोंड लोककथाओं और शास्त्रीय प्रमाणों दोनों से इसकी पुष्टि नहीं होती है, लेकिन लोक मान्यता के रूप में यह विद्यमान है।

जनजातीय क्षेत्रों में शिव उपासना

सतपुड़ा क्षेत्र में “तिलक सिंदूर” नामक स्थान महादेव के धाम के रूप में प्रसिद्ध है। परंपरा के अनुसार यहाँ प्रथम पूजा का अधिकार गोंड समुदाय के मुखिया को प्राप्त है। महाशिवरात्रि के अवसर पर यहाँ विशेष अभिषेक और लोकाचार आधारित अनुष्ठान संपन्न होते हैं।

तिलक सिंदूर, सतपुड़ा
तिलक सिंदूर, सतपुड़ा

झारखंड के गुमला कस्बे से लगभग 60 किलोमीटर दूर एक छोटी पहाड़ी की चोटी पर स्थित तंगीनाथ अपने शिवलिंग के लिए प्रसिद्ध है। इस शिवलिंग की पूजा स्थानीय उरांव समुदाय के लोग करते हैं। इस पवित्र स्थल के मुख्य पुजारी भी उरांव समुदाय से होते हैं, जो अपनी विशिष्ट परंपरा और शैली के अनुसार पूजा-अर्चना करते हैं।

तंगीनाथ, गुमला
तंगीनाथ शिवलिंग, गुमला

झारखंड के छोटानागपुर क्षेत्र में जनजातीय समुदायों के बीच भगवान शिव से जुड़ी अनेक कथाएँ और मान्यताएँ प्रचलित हैं। झारखंड का प्रमुख जनजातीय समुदाय संथाल अपने सर्वोच्च ईश्वर को “मरांग बुरु” कहता है, जिसे कई स्थानों पर “महादेव” के रूप में भी संबोधित किया जाता है।


मरांग बुरु पहाड़ी

झारखंड के घाघरा, बस्ती क्षेत्र में “देवकी” नामक स्थल स्थानीय समुदायों के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि "देवकी" शब्द दो शब्दों के योग से बना है: “देव” और “अकी”। उरांव भाषा में “अकी” का अर्थ घर और “देव” का अर्थ देवता होता है। इस प्रकार “देवकी” का अर्थ “देवताओं का घर” या “देवताओं का निवास” समझा जाता है। स्थानीय श्रद्धालु इस स्थल को देवघर के समान ही पवित्र मानते हैं।
हिमाचल प्रदेश में रहने वाला जनजातीय समुदाय “गद्दी” यह मानता है कि भगवान शिव हिमालय में निवास करते हैं और अपने चुने हुए भक्तों, विशेषकर गद्दी समुदाय पर निरंतर कृपा-दृष्टि बनाए रखते हैं। 

कैलाश पर्वत
कैलाश पर्वत

कर्नाटक का कोरगा जनजातीय समुदाय भी शिव के अनेक रूपों में पूजा करता है। वे भगवान को परिवार के सदस्य की तरह मानते हैं और उनके साथ अपने सुख-दुख को जोड़कर देखते हैं।
कई जनजातीय समुदायों में साजा वृक्ष का संबंध बड़ादेव से जोड़ा जाता है। गोंड परंपरा में यह विश्वास प्रचलित है कि समस्त सृष्टि महादेव और पार्वती के युगल-तत्व से उत्पन्न हुई है। बड़ादेव को “सल्ला-गांगरा” अर्थात नर और नारी शक्ति के रूप में भी समझा जाता है, जो सृजन के मूल सिद्धांत का प्रतीक है। यह अवधारणा महादेव के अर्धनारीश्वर स्वरूप से साम्य रखती है। 

सजा वृक्ष
साजा वृक्ष

गोंड समाज में बड़ादेव की पूजा-विधि में लोक-परंपराओं का विशेष स्थान है। पूजा स्थल को गोबर से लीपकर शुद्ध किया जाता है, फिर हल्दी या आटे से चौक बनाकर उस पर पाटा रखा जाता है और सफेद वस्त्र बिछाया जाता है। इसके बाद हल्दी की पाँच गाँठें, चावल, नारियल, बेलपत्र और पुष्प अर्पित किए जाते हैं, तथा धूप-दीप से आराधना की जाती है।

फड़ापेन की कथा के दोहे में शिव-स्मरण इस प्रकार मिलता है:
“शिव गौरा को सुमरि, गुरु देवगन को सिर नाय।”

बूढ़ादेव की आरती में भी महादेव का उल्लेख मिलता है:
“दिव्यशक्ति बुध देव, जगत नियंता देव।
कोयामुरी दीपम में शंभू भय महादेव।।"

जनजातीय क्षेत्रों में ऐतिहासिक शिवालय और शिवरात्रि पर मेले

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के वनांचल, जो कभी गोंड राजाओं के गढ़ रहे, आज भी अनेक प्राचीन शिव मंदिरों के साक्षी हैं। पचमढ़ी का चौरागढ़ महादेव मंदिर इस परंपरा का प्रमुख केंद्र है, जहाँ शिवरात्रि पर श्रद्धालु त्रिशूल समर्पित करते हैं। 

 पचमढ़ी का चौरागढ़ महादेव
पचमढ़ी का चौरागढ़ महादेव

बस्तर क्षेत्र में गोंड, मुरिया, माड़िया (अबूझमाड़िया), भतरा, हल्बा, धुरवा और दोरला जैसे जनजातीय समाज निवास करता है। इस क्षेत्र में अनेक प्राचीन शिव मंदिर आज भी विद्यमान हैं। केशकाल क्षेत्र के टीलों की खुदाई में कई शिव मंदिरों के प्रमाण मिले हैं, जिनमें से कई लगभग 1500 वर्ष पुराने हैं।

गोबरहीन का शिव मंदिर (गढ़ धनोरा) विशेष रूप से प्रसिद्ध है, जहाँ एक ही टीले पर अनेक प्राचीन शिवलिंग स्थापित हैं। महाशिवरात्रि के अवसर पर यहाँ एक विशाल मेला भरता है, जहाँ जनजातीय समाज की महादेव पर गहरी आस्था देखने को मिलती है।

गढ़धनोरा शिव मंदिर
गढ़धनोरा शिव मंदिर

बस्तर के वनांचलों में बारसूर का बत्तीसा मंदिर, समलूर का शिव मंदिर, सिंगईगुड़ी और भैरमगढ़ के प्राचीन मंदिर, जो 10वीं–11वीं शताब्दी के नागवंशी काल के हैं, जनजातीय आस्था के महत्वपूर्ण केंद्र हैं। इस अवसर पर हजारों जनजातीय समाज के लोग महाशिवरात्रि के दिन पूजन कर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

बत्तीसा मंदिर बारसूर
बत्तीसा मंदिर बारसूर

महाशिवरात्रि के अवसर पर बस्तर में चपका (कोंडागांव), चेमल (खंडी घाट), समलूर (तुलार गुफा व गुमरगुंडा),  आदि में मेला लगता है।  सरगुजा में कापू मेला, धमतरी के रुद्रेश्वर महादेव मंदिर में रुद्री मेला, सिरपुर के गंधेश्वर महादेव, भोरमदेव मंदिर, सक्ती का तुर्रीधाम मेला, रायपुर के हटकेश्वर महादेव और राजिम के कुलेश्वर महादेव मंदिरों में भी भव्य आयोजन होते हैं। इन अवसरों पर बड़ी संख्या में जनजातीय समाज के लोग दर्शन और उत्सव में भाग लेते हैं।
समग्र रूप से देखा जाए तो जनजातीय समाज की शिव-आस्था कोई अलग या नई परंपरा नहीं, बल्कि उसी व्यापक सनातन शिव-तत्व की धारा है जो भारत के शास्त्रीय और लोक जीवन में साथ-साथ बहती रही है। बड़ादेव/बूढ़ादेव/शंभू शेख/मरांग बुरु जैसे कई नाम हों, पर इनके पीछे छिपा भाव एक ही है: शिव को सर्वोच्च, सर्वव्यापक और कल्याणकारी शक्ति मानने का भाव। महाशिवरात्रि के जागरण, अभिषेक, भजन-कीर्तन, लोककथाओं और मेलों के माध्यम से जनजातीय समाज अपने जीवन को प्रकृति, धर्म (नैतिकता), शिव के साथ जोड़कर देखता है। समावेशी और एकत्व से परिपूर्ण यह पर्व हमें बताता है कि जनजातीय समाज की आध्यात्मिक चेतना भारतीय संस्कृति के साथ सहज रूप से जुड़ी हुई है, और उसकी पूजा-पद्धतियों की लोक परंपरा में उसी शिव-भक्ति की अभिव्यक्ति हैं जो अनादि काल से चली आ रही है। 

 


लेख:
वेद प्रकाश सिंह ठाकुर,
संपादक,
दक्षिण कोसल टुडे. 

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