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सूर्य मंदिर मोढेरा- प्राचीन शिलाओं में परिलक्षित होता भारतीय ज्ञान

सूर्य मंदिर मोढेरा- प्राचीन शिलाओं में परिलक्षित होता भारतीय ज्ञान

गुजरात के मेहसाणा जिले में स्थित मोढेरा का सूर्य मंदिर भारतीय स्थापत्य, खगोल विज्ञान और आध्यात्मिक ज्ञान परंपरा का अद्भुत उदाहरण है। सोलंकी शासक भीम प्रथम द्वारा 11वीं शताब्दी में निर्मित यह मंदिर मारू-गुर्जर शैली, सूर्य उपासना, ज्यामितीय संरचना और खगोलीय सटीकता का अनुपम संगम प्रस्तुत करता है। 

कच्छ का रन गुजरात में स्थित इस प्रसिद्ध स्थल के बारे में तो आप सब जानते ही होंगे हाल ही में विश्व पर्यटन में जिस गाँव को सर्वश्रेष्ट पर्यटन गाँव का पुरुस्कार मिला है वह धोर्दो गाँव भी गुजरात में हैं वैसे तो गुजरात पर्यटन की दृष्टि से बहुत समृद्ध प्रदेश है पर फिर भी यहाँ कि एक अनूठी स्थापत्य कला के बारे में अभी भी बहुत अधिक लोगों को जानकारी नहीं है ! हम बात कर रहें है मोढेरा के सूर्य मंदिर की।

सूर्योदय का सुन्दर दृश्य- मोढेरा सूर्य मंदिर
सूर्योदय का सुन्दर दृश्य- सूर्यमंदिर, मोढेरा

सूर्य की उपासना में निहित दर्शन और आध्यात्मिक भाव से सम्बंधित आलेखों की शृंखला में आज हमारा  विषय है गुजरात के मेहसाणा जिले के  पास स्थित मोढेरा का सूर्य मंदिर । लगभग 12 शताब्दी (1026-27 शताब्दी) के मध्य बना यह मंदिर मारू-गुर्जर स्थापत्य शैली का अद्भुत् उदाहरण है । जिसे सोलंकी वंश के शासक “भीम प्रथम” द्वारा बनवाया गया था ।

भारत में सूर्य मंदिरों की प्राचीन परंपरा रही है चाहें हम कोणार्क के सूर्य मंदिर की बात करें या मुल्तान के मंदिर की जो अब पाकिस्तान में है या फिर ललितादित्य मुक्तापीड द्वारा निर्मित कश्मीर का सूर्य मंदिर । आज हम विस्तार से बात करेंगे मोढेरा के सूर्य मंदिर की !

इस मंदिर की की अनोखी बात यह है कि इस मंदिर के एक स्थान विशेष पर यदि हम खड़े हो जायें तब प्रतीत होता है कि हम एक सीधी रेखा पर खड़े हैं यानि कर्क रेखा के अक्षांशीय विस्तार पर जो लगभग 23.50 उत्तरी गोलार्ध पर है यह वाकई भारतीय ज्ञान परंपरा का विस्मित कर देने वाला उदाहरण है।

जहाँ हम 21वीं सदी में  GPS टेक्नोलॉजी का आनंद ले रहें और मुक्तकंठ से विदेशियों के तकनीकी ज्ञान की प्रशंसा कर रहें है वहीं आज से लगभग हजारों साल पहले भारतीय समाज कितनी उन्नत तकनीकी ज्ञान से परिपूर्ण था और हम आज भी अपने देश के इतिहास से अनभिज्ञ यह काफी दुखद है ।

वैसे ज्ञान परंपरा की बात निकाली ही है तो मुझे यहाँ इस तथ्य का भी उल्लेख करना उचित लगता है कि परमार शासक राजा भोज ने 11वीं शताब्दी में एक  सुन्दर ग्रन्थ की, रचना की जिसका नाम था “समरांगण सूत्रधार” जिसमें नगर नियोजन, भवन निर्माण, मंदिर शैली और विशेषकर यंत्रों (स्वचालित मशीनों, विमानों) के विषय में 83 अध्यायों के माध्यम से वर्णन किया गया है।

परमार शासक राजा भोज द्वारा विरचित- समरांगण सूत्रधार
परमार शासक राजा भोज द्वारा विरचित- समरांगण सूत्रधार

खैर ऐसी विस्मित करने वाली ज्ञान-परम्पराओं से हम आपको अवगत करवाते रहेंगे अभी हम फिर से मोढेरा के सूर्य मंदिर की ओर चलते हैं । इस मंदिर का स्थापत्य कुछ इस तरह बनाया गया है कि 21 जून को, यानि उत्तरी गोलार्ध का सबसे बड़ा दिन।

सूर्य की पहली किरण इस मंदिर के गर्भगृह में स्थित सूर्यदेव की प्रतिमा में लगे मणि पर पड़ती है और सम्पूर्ण कक्ष में प्रकाश फैल जाता है । यह घटना न केवल एक अलौकिक दृश्य की साक्षी है बल्कि हमारे वास्तुकारों के खगोलीय और भवन निर्माण की कुशलता का भी प्रमाण है।

इस मंदिर की संरचना तीन भागों में विभाजित है पहला सूर्यकुण्ड, सूर्यकुण्ड के ही ठीक पीछे बना हुआ है नृत्य मंडप और उसके पश्चात गर्भगृह । सूर्यकुण्ड को रामकुण्ड भी कहा जाता है और इसकी विशेष बात यह है कि यह सदानीरा है अर्थ इसका पानी कभी सूखता नहीं।

भारतीय आध्यात्म परंपरा में 108 (12 राशियाँ × 9 नक्षत्र) का महत्त्व हम सभी जानते हैं इसे बहुत शुभ माना जाता है और रामकुण्ड को ध्यान से देखने पर पता चलता है की इस कुण्ड की ज्यामितीय संरचना में 108 मंदिर बने हुए हैं।

सीढ़ियों के निर्माण में भी ज्यमितीक अनुपात का विशेष ध्यान रखा गया है। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार जब इस कुण्ड को बनाया गया था सातों नदियों और समुद्र का जल इस कुण्ड में डाला गया था ।

अब हम इसके दुसरे भाग की ओर चलते हैं जिसे नृत्यमंडप के नाम से जाना जाता है । जब हम विश्लेष्णात्मक दृष्टि से देखें तो यह भी भारतीय कैलेन्डर का प्रतिनिधित्व करता नज़र आता है ठीक वैसे ही जैसा हमने कोणार्क के सूर्य मंदिर के पहियों में देखा था।

इससे यह तो स्पष्ट हो जाता है कि उत्तर हो या दक्षिण पूर्व हो या पश्चिम भारतीय ज्ञान परंपरा चहुँ ओर अपने ज्ञान से देश के गौरव और मान को प्रकाशित कर रही थी । नृत्य मंडप में स्तंभों की संख्या ठीक 52 (वर्ष के सप्ताह) है।

सनातन परंपरा में वर्णित दसों दिशायें
सनातन परंपरा में वर्णित दसों दिशायें

स्तंभों पर उकेरी गयी कलाकृतियों में 364 हाथी और एक शेर ( 365 दिनों की संख्या) की आकृति बनायीं गयी है। मंदिर के 52 स्तम्भ ऊपर से वृत्ताकार और नीचे से देखने पर अष्टभुजाकार दिखाई देते है जो संभतः निरंतर गतिमान समय और आठ प्रहरों में विभाजित एक दिन को प्रदर्शित करते हैं।

इन स्तंभों में रामायण और महाभारत की कथाओं का भी चित्रण है जैसे रावण द्वार माता सीता का हरण, रामजी का मूर्छित लक्षमण का सर अपनी गोद में रखा होना, भीम द्वारा अश्वाथथामा नाम के हाथी का वध और भीष्म पितामह का बाणों की शैय्या पर लेटा हुआ होना, प्रत्येक स्तम्भ में लगभग ऐसी ही कई कहानियां निरुपित की गयीं हैं।

ऐसे चित्र सामान्य रूप से भारत के सभी मदिरों में दिखाई देते है और शायद यह भी हमारा एक प्राचीन तरीका ही है, श्रुति परंपरा के माध्यम से ज्ञान और नैतिक मूल्यों के सहज प्रसार का, है न !

वर्तमान में मंदिर का गर्भगृह वाला भाग जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है  फिर भी इसके स्तंभों में भी बहुत से रूपांकन देखें जा सकते है यहाँ की एक दीवार पर प्रसव का दृश्य उकेरा गया है जिसमें पानी के अन्दर संतान को जन्म देती हुए माता और आस-पास उसकी सहायता हेतु खड़े लोगों का दृश्य उकेरा गया है।

इससे जीवविज्ञान सम्बन्धी समझ और जानकारी का भी पता चलता है इसके अलवा यहाँ पर सनातन धर्म में मान्यता प्राप्त दसों दिशाओं के दिक्पालों को भी उकेरा गया है और साथ ही यहाँ सूर्य देवता की कुल बारह प्रतिमाएं है जो बारह महीनो का प्रतीक है।

पुष्पावती नदी के तट पर स्थित सूर्य देव को समर्पित यह मंदिर सृष्टि के जीवन चक्र को चलायमान रखने में अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले सूर्य देव के प्रति कृतज्ञता और आस्था का प्रतीक है। एक ऐसा मंदिर जो वैज्ञानिकता और परंपरागत ज्ञान का अद्वितीय संगम है हमारी अमूल्य धरोहर है उसे एक अनपढ़,अज्ञानी, क्रूर और धर्मान्ध मुस्लिम शासक अल्लौद्दीन खिलजी द्वारा ध्वस्त कर दिया।

चूँकि सनातनी परंपरा में खंडित स्थल या प्रतिमा को नहीं पूजा जाता  इसलिए आज स्थापत्य कला की यह अनुपम कृति अपनी पहचान खोती जा रही है। समय आ गया है कि हम सभी भारत में यत्र-तत्र बिखरी इन धरोहरों के प्रति सजग हो और उनकी सुरक्षा हेतु व्यक्तिगत स्तर पर एक जिम्मेदार नागरिक होने का कर्तव्य निभाते हुए जो भी बन सके ऐसा प्रयास करने से पीछे न हटें ।

वंदे सूर्याय! (सूर्य को प्रणाम)

लेख-
सोनल बाजपेयी
शोधार्थी- भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा 

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