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नक्षत्र: शतभिषा | योग: शुक्ल | करण: कौलव

पर्व विशेष : | तदनुसार 14 अप्रैल 2026

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बुन्देली चित्रकला

बुन्देली चित्रकला

मानव ने जबसे होश संभाला है उसने अपने शरीर की पुष्टता के लिए जहाँ भोजन की व्यवस्था की है वहीं अपने मन मस्तिष्क की रिक्तता को भरने का भी एक संतोषजनक उपक्रम किया है। यही क्रियाशील उपक्रम कला बन गया। तूलिका जब इस उपक्रम में माध्यम बनी और रंगों ने अपना ताना-बाना बुना तभी चित्रकला की उत्पत्ति हुई। इस चित्रकला को जब लोक जीवन द्वारा अंगीकार किया गया तब यह लोक भावनाओं की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बनकर लोक चित्रकला के रूप में प्रतिष्ठित हुई। गुफाओं की भित्ति पर उकेरे गये तमाम पशु-पक्षियों के चित्र उनके शिकार के चित्रों से इस लोक चित्रकला की यात्रा प्रारम्भ हुई थी और आज की तमाम धाराओं को अपने में समाहित करते हुए तमाम क्षेत्रीय परिस्थितियों का प्रतिनिधित्व करते हुए स्थानीय चित्रकला के नाम से प्रसिद्धि पायी। बुन्देलखण्ड के जनमानस में रची बसी यही चित्रकला बुन्देली लोक चित्र कला बनी जिसमें बुन्देलखण्ड के सामाजिक, आध्यात्मिक राजनैतिक एवं धार्मिक आयामों की छटा दृष्टिगोचर होती है।

बुन्देली लोक चित्रकला में, चौक पूरना, अल्पना, भित्ति चित्र, चित्रपट, थापे, मेंहदी, महावर, लिपाई-पुताई आदि अनेकों उपविधाएँ समाहित

बुन्देली लोक चित्रकला में हमें लोक मानस के मन, हृदय की संवेदनाओं, शिक्षण एवं पारम्परिक आस्थाओं के विभिन्न पहलुओं के दर्शन होते हैं। बुन्देली लोक चित्रकला की सभी उपविधाओं में सामाजिक मनोविज्ञान का दर्शन सामाजिक समरसता हेतु हमारा मार्ग प्रशस्त करता है। इसमें छिपा दर्शन एवं मनोविज्ञान अनूठा है। आध्यात्म से ही दर्शन की पवित्र गंगा बहती है जिसमें गोते लगाकर जीवन के यथार्थ दर्शन से साक्षात्कार होता है और अद्वितीय परम आनन्द की प्राप्ति होती है। मानव की बुद्धि और भावों के प्रतिबिम्ब से द्वैत विशिष्टाद्वैत एवं अद्वैत को दृष्टि मिलती है।

द्वैतवाद के अर्न्तगत ब्रह्मा, तथा जीव को अलग अलग ही माना जाता है जबकि विशिष्टाद्वैत में ब्रह्मा, निराकार मानते हुए, उसी को सर्वोपरि स्वीकार किया जाता है तथा जगत को मिथ्या मानते हैं। इसी कारण अद्वैतवाद में निर्गुण को सगुण साकार मानते हुए उसी की पूजा अर्चना वन्दना से मोक्ष प्राप्ति हेतु प्रयास किया जाता है तथा जगत को मिथ्या मानते हैं। इसी कारण अद्वैतवाद में निर्गुण ब्रह्म एवं जीव में कोई भेद नहीं माना जाता है। जीव ही ब्रह्म एवं ब्रह्म ही जीव है, की कल्पना को साकार स्वरूप प्रदान करता है यह अद्वैतवाद। दर्शन की दृष्टि से ब्रह्म जगत, माया एवं जीव ये चार ऐसे आधार हैं जिन पर विशिष्ट द्वैतवादी मार्ग में सगुण ब्रहा की ही आराधना की जाती है तथा मुक्ति हेतु शरणागत, भगवत्कृपा तथा निश्छल भक्ति भावना ही आधारभूत है। बुन्देली लोक चित्रकला में दर्शन के प्रमुख चारों अवयवों (ब्रह्म, जगत, माया एवं जीव) का दिग्दर्शन हमें विविध माध्यमों से होता है।

हरछठ, कजरी नौमी आदि ऐसे भित्ति चित्र आलेखन है जिनको सर्वशक्ति सम्पन्न ब्रह्मा की शक्ति स्वरूपा महिला की आकृति के विशाल अमाशय में अन्य चित्रांकन कर ब्रह्मा की सगुण सत्ता को स्वीकार किया जाता है। कजरी की नौमी में नेवला पालना सर्प आदि माया के प्रतीक के रूप में जहाँ अंकित होते है वहीं पशुपक्षी, पेड़ पौधे आदि जगत का प्रतिनिधित्व करते हैं। घट में जल होना जीव का द्योतक है। अतः लोक चित्रकला में बुन्देली जन मानस विशिष्टाद्वैतवाद को न जानते हुए भी दर्शन के अवयवों को न जानते हुए भी, उनका अंकन कर अपनी आध्यात्मिक प्रवृत्ति का परिचय देता है।

चौक पूरना-
सभी माँगलिक कार्यों के अवसर पर त्यौहारों पर इस क्षेत्र में चौक पूरे जाते हैं। गेहूँ या चावल के आटे से वर्गाकार अथवा त्रिभुजाकार अथवा आयताकार आकृति बनाकर उसे विभिन्न रेखाओं से अलंकृत करके एक ऐसी सम्पूर्ण आकृति बनाई जाती है जिसके देखने मात्र से ही मन प्रफुल्लित हो उठता है। चौक के माध्यम से अतिथि अथवा देव आवाह्न कर उन्हें आसन देने की मनोभावना प्रगट होती है। देव गण जिस स्थान पर आसन ग्रहण करते है वह स्थान पवित्र हो जाता है और उस स्थान की रज से अनिष्ट का नाश होता है। इसीलिए पूजा अर्चना के पश्चात् सुहागवती स्त्रियाँ अपने पति के दीर्घायु एंव संतान के उज्जवल भविष्य हेतु अपने आँचल के छोर से चौक को अंचराती है जिस चौक अंचराना कहते हैं। चौक पूरना-पवित्रता, स्वच्छता का पूरक है और इसकी आकृति मन को प्रमुदित करती है। चौक पूरने में जगत की कल्पना साकार हो उठती है।

चौक पुरना

अल्पना-
गेहूँ चावल के आटे का पानी में घोल बनाकर उसके द्वारा वर्गाकार, अथवा त्रिभुजाकार आकृति बनाकर उसमें प्रकृति के पूरक पक्षियों, आस्था के सोपान देव जनों एवं विभिन्न मन हर्षाने वाली आकृतियों से उसे पूरित किया जाता है। अल्पना एक माध्यम है ईश्वर के श्रीचरणों में मन एकाग्र करने का मन को आनन्दमय करने का और समाज को प्रदूषण मुक्त करने का। अल्पना सिर्फ स्वच्छ पवित्र स्थान पर ही उकेरी जाती है। तथा यह 'माया' का स्वरूप दर्शाती है।

भित्ति चित्र-
विभिन्न धार्मिक उत्सवों पर दीवार पर विभिन्न रंगों की सहायता से ये चित्र बुन्देली महिलाओं द्वारा अंकित किये जाते हैं। इन चित्रों में सम्बन्धित उत्सव के कथानक का दृश्यांकन होता है तथा कुछ सर्वभौम सत्य के प्रतीकों का भी अंकन होता है। इन भित्ति चित्रों के माध्यम से जहाँ शिक्षा दी जाती है वहीं कोमल मनों पर अपनी प्राचीन वैभवमयी संस्कृति के आयामों को भी अंकित किया जाता है। चित्रों के माध्यम से शिक्षण क्रिया विधि अत्यन्त सुगम हो जाती है। भित्ति चित्र भी शिक्षण का ही माध्यम है। भित्ति चित्रों में जो चिह्न अंकित किये जाते हैं वे उद्देश्यपरक होते हैं। बुन्देली लोक चित्रकला में प्रयुक्त चिह्न दर्शन के प्रमुख तत्वों की ओर इंगित करते हैं।

अ- सूर्य चन्द्रमा का अंकन-
हम सब जिस सौर मण्डल में रह रहे हैं उसमें सभी कुछ सूर्य के आस-पास ही है। वह हो हमारी शक्ति का आदि स्रोत है। उसके द्वारा ही हमें प्रकाश मिलता है। तम का नाश होता है। एक ऐसा सत्य जो कि शाश्वत है। चन्द्रमा भी सामाजिक कलाओं का परक है तम में प्रकाश की किरण से मार्ग प्रशस्त करता है और मन की उद्विग्नता को शीतलता प्रदान करता है। प्रकृति के ये दोनों शाश्वत चिह्न अंकित कर प्रकृति की शाश्वतता का भान कराया जाता है और इन्हीं को प्रेरणा स्रोत बनाकर इनकी ही भाँति शास्वत बनने के लिए समाज में कुछ कर गुजरने का शिक्षण दिया जाता है।

ब- ॐ का अंकन
एवं उसके माया भ्रम से निकलकर सत्य को समझने का एक विकल्प है। ॐ तो साक्षात् ब्रह्मा ही है। इसके अंकन से ब्रह्मा से साक्षात्कार

स- सलिया का अंकन-
भित्ति चित्रों में सतिया का अंकन विशेष दर्शन युक्त है। सतिया का चिह्न स्वयं में भारतीय सामाजिक जीवन के सम्पूर्ण दर्शन को अपने में समाहित किये हुए है। सतिया में चार भुजाएँ होती है जो कि मानव जीवन की चार अवस्थाओ, बहह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यास का जहाँ प्रतीक है, वहीं अर्थ, काम, धर्म और मोक्ष रूपी चारों स्थितियों का भी दिग्दर्शन कराती है। ये चारों भुजाएँ वर्गाकार रूप में सीधे चक्राकार स्थिति को बनाती हैं। परिणामस्वरूप यह चक्राकार स्थिति हमें भारतीय जीवन मूल्यों के अनुसार सदैव कार्यशील होने की प्रेरणा देती हैं। इन चारों भुजाओं के आपसी चक्राकार स्थिति से चार खुले हुए प्रकोष्ठ तैयार होते है। जिनमें बिन्दु स्थित रहता है। यह बिन्दु मानव का प्रतीक है। अस्तु मानव को चारों अवस्थाओं में अर्थ, काम, धर्म और मोक्ष हेतु सतत् प्रयासरत रहने का अनोखा प्रेरणा पूँज है यह सतिया। यह लोक के मन हृदय पर सार्थक प्रभाव डालने का एक सशक्त उपक्रम है।

द- पशु पक्षियों एवं पेड़-पौधों का अंकन-
इन भित्तिचित्रों में पशु पक्षियों एवं पेड़ पौधों का चित्रण भी खूब मिलता है। वस्तुतः पशु-पक्षी एवं पेड़ पौधे प्रकृति के प्रतीक है। इसके अंकन से यह शिक्षा देने का प्रयास किया जाता है कि दुनिया के माया जाल में रहते हुए प्रकृति के साथ तारतम्य सदैव बनाये रखना चाहिये जिससे प्रकृति चक्र संतुलित बना रहे और समाज में प्रदूषण बाधा कम से कम हो।

य- कलश अथवा घर अंकन-
कलश अथवा घट पूर्णता का प्रतीक है। इसके अंकन से ये शिक्षा देने का प्रयास किया जाता है कि सम्पूर्णता मन के संतोष से आती है। मन यदि संतोषी होगा तो माया के मोह जाल को पार करता हुआ इस ब्रह्माण्ड की परम सम्पूर्ण सत्यता का आभास शीघ्रता से कर लेगा। घट एक पात्र होता है जिसमें जल भरा रहता है। जल की कोई आकृति नहीं होती है। इसे जैसे पात्र में रखा जाये यह उसी की आकृति ग्रहण कर लेता है। इस घट का आध्यात्मिक पक्ष भी यही है कि जल आत्मा का सूचक है तथा घट-शरीर का। यह आत्मारूपी जल जिस घट रूपी शरीर में रहेगा, यह उसी की आकृति ले लेगा और जब घट टूट जावेगा तो यह जल रूपी आत्मा पुनः मुख्य जल के साथ मिलकर एकरस हो जावेगी। अर्थात घट का अंकन जहाँ पूर्णता का संदेश देता है। वहीं वह यह भी निर्दिष्ट करता है कि शरीर पर मोह मत करो तथा उसमें व्याप्त जल रूपी आत्मा के तत्व को पहिचानो। लोक जीवन में आध्यात्मिक गुढ़ता के इस रहस्य को समझाने का एक सुलभ माध्यम है घट कलश का अकेन।

र- देव अंकन-
इन भित्ति चित्रों पर विभिन्न देवी देवताओं का भी अंकन किया जाता है। ये देवी देवता गण भी अपने शरीर की आकृति से हमें सामाजिक शिक्षा देते है। जो कि साकार ब्रहा के द्योतक है।

त्रिदेव अंकन-
कहीं कहीं पर तीन पुत्तरियाँ बनाकर उनके नीचे ब्रह्मा, विष्णु, महेश लिख दिया जाता है। ये तीनों देव भारतीय दर्शन में आदि गुरू में प्रतिष्ठित है। ब्रह्मा मन में ज्ञान का उदय करते हैं, विष्णु उस ज्ञान को पालते हैं तथा महेश अज्ञान का विनाश करते हैं। त्रिदेव अंकन यह इंगित करता है कि हमें अज्ञान के तम से निकलकर ज्ञान की ज्योति को जलाकर उसको अपनाकर ही अपना जीवन निर्वाह करना चाहिये।

श्री गणेश अंकन-
बुन्देलखण्ड में उत्सवों पर जो भित्ति चित्र आलेखन होता है उसमें गणेश के चित्र का अंकन बहुधा होता है। साथ ही साथ विवाह आदि शुभ अवसरों पर भी दीवाल पर गणेश का अंकन किया जाता है। गणेश का स्वरूप अत्यन्त भाव प्रधान एवं सामाजिकता से ओत प्रोत है। श्रीगणेश का ठिगना स्वरूप हमें यह शिक्षा देता है कि समाज में व्यक्ति को छोटा बनकर ही रहना चाहिये जिससे समाज के प्रत्येक व्यक्ति व वर्ग का स्नेह प्राप्त हो सके। गणेश का सिर गज का है जो बुद्धि धैर्य व गम्भीर का द्योतक है। गणेश का उदर बड़ा है जो कि यह प्रेरणा देता है कि समाज में रहते हुए व्यक्ति को सबकी सुनकर उसे चुपचाप उदरस्थ कर लेना चाहिये। गणेश मोदक प्रिय है। अलग-अलग बूंदी को एक साथ मिलाकर मोदक बनाकर, उसे ग्रहण करने से जिस प्रकार से शारीरिक पुष्टता प्राप्त होती है उसी भाँति समाज के सभी बिखरे पड़े लोगों को एकत्रित कर सामाजिक कार्यों में लगाने से समाज में प्रगति रूपी पुष्टता दिखलाई पड़ती है। गणेश की सवारी चूहा है जिसकी प्रवृत्ति होती है कि वह वस्तुओं को कुतर कर नष्ट कर देता है कि समाज को तोड़ने वाली शक्तियों पर धीरज तथा गम्भीरता का अंकुश लगाकर उन्हें नियंत्रित किया जा सकता है तथा उनका सकारात्मक योगदान लिया जा सकता है। अतः गणेश के चित्राकंन का यह दर्शन है समाज में विनम्र रहकर सबको साथ लेकर चलना।\

श्री दुर्गा अंकन-
कुछ उत्सवों पर भित्तिचित्रों में माँ दुर्गा का भी अंकन किया जाता है। माँ दुर्गा का भव्य स्वरूप जहाँ माता के दिव्य प्रेम की अनुभूति कराता है वहीं उनका क्रोधी स्वरूप दुष्टता के दमन का भी प्रतीक है। "नारी" समाज का एक ऐसा अंग है जिसके अभाव में समाज की कल्पना ही नहीं की जा सकती। वह बुन्देलखण्ड में तो प्रेरणा स्रोत है। श्री दुर्गा का अंकन समाज में नारी के स्थान एवं उसके अलौकिक स्वरूप से कर्तव्य की प्रेरणा ग्रहण करने को बाध्य करता है।

शंख दीप आदि का अंकन-
कुछ कुछ भित्ति आलेखनों में शंख का अंकन किया जाता है। शंख की ध्वनि से बैक्टीरिया का नाश होता है तथ भूत बाधा भी दूर होती है। अतः शंख ध्वनि करने की प्रेरणा इस अंकन से मिलती है। दीप तम में प्रकाश का वाहक है जिसके अंकन का यह सार है कि अज्ञान को समाप्त कर ज्ञान के ज्योतर्मय प्रकाश में जीवन यापन करना चाहिए। भित्ति चित्र आलेखनों की एक विशेषता यह है कि ये अधिकांश भित्ति चित्र जव बनाये जाते हैं तो एक महिला के उदर भाग में व्रतोत्सव से सम्बन्धित अन्य अंकन किये जाते हैं यह महिला की आकृति प्रकृति के सर्वशक्तिमान नियंता ब्रह्म की शक्ति होती है तथा इसे ही सर्वशक्ति सम्पन्न माँ भवानी का स्वरूप माना जाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि इन भित्तिचित्रों के अंकन के समय तथा बाद में भी मन के अन्दर यह अटूट विश्वास होता है कि इस विश्व में जो कुछ भी होता है वह सब प्रकृति देव के अनुसार ही सम्पन्न होता है और हम सभी मात्र कठपुतली बनकर अपने अपने चरित्रों को अभिनीत करते हैं। यह भित्तिचित्र के अंकन का वेदान्तिक दर्शन निश्चित रूप से लोक जीवन को माया मोह से विलग करके 'कर्मण्येवाधिकारस्ते माँ फलेसु कदाचित्' के मार्ग पर चलने हेतु प्रेरित करता है।

गीता के कर्मयोग को लोक जीवन का एक अभिन्न अंग बनाने का यह चित्राकंन एक अभिनव प्रयोग है जो लोक जीवन की शाश्वत्ता को मूर्त रूप देता है। लोक द्वारा अपनायी यह लोक चित्रकला जहाँ सामाजिक नीति निर्धारण का दिशा बोध कराती है वहीं आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग भी प्रशस्त करती है। दीपावली, भैय्या दूज, कजरी की नौमी, गुरूपूर्णिमा, होली, आसमाई पूजन, हरि ज्योति पर्व, कुनघुसी पूनी, आदि उत्सवों पर बुन्देलखण्ड में महिलाएँ विभिन्न रंगों के माध्यम से आलेखन करके अपनी इस लोक चित्रकला को अमरत्व प्रदान करती है।

चित्रपट-
कागज अथवा कपड़े पर चूना, हल्दी, आलता आदि की सहायता से पूजा में काम लाये जाने वाले चित्रों का अकेन किया जाता है। कृष्ण जन्म के समय अष्टमी के दिन श्रीकृष्ण की विभिन्न लीलाओं को कागज पर अंकित कर उनका पूजन किया जाता है। यह चित्र 'कन्हैयाजू का पट' के नाम से जाना जाता है। चित्रपट के माध्यम से थोड़े से स्थान पर बहुत कुछ अंकित करके, शिक्षा देने का माध्यम है ये चित्रपट। उदाहरणार्थ श्री कृष्ण द्वारा कंस वध, कालिय नाग मर्दन आदि लीलाओं के अंकन से अत्याचार, अनाचार, व्यभिचार के खिलाफ बच्चों में लड़ने की प्रवृत्ति पैदा करना ही इस चित्रपट का वास्तविक मनोविज्ञान होना चाहिए। थापे-

विवाह आदि माँगलिक अवसरों पर अपने प्रियजनों के साथ ठिठोली का एक दौर चलता है जिसमें चावल के आटे को हल्दी तथा चूने के साथ रंग कर हाथों की हथेलियों में लगाकर अपने प्रियजनों की पीठ पर हथेली की छाप को अंकित किया जाता है। इसे ही थापे लगाना कहते हैं। मेरे विचार से थापे पंचपरमेश्वर का प्रतीक है। इन्हें लगाकर पंच परमेश्वर की उपस्थिति मानकर उन्हीं के साक्ष्य में शुभ कर्म सम्पादित किया जाता है। अतः थापे मात्र हाथ की छाप और ठिठोली ही नहीं है वरन् इससे सर्वसत्ता सम्पन्न ईश्वर की उपस्थिति महसूस करने का विकल्प खुलता है।

मेहंदी, महाबर-
शुभ अवसरों पर स्त्रियों अपने हाथों पैरों में मेंहदी रचाती है। यह मेहदी विशेषकर वर्षा ऋतु में रचायी जाती है। मेहदी की पत्तियों का यह आयुर्वेदिक गुण है कि उनकी तासीर सम होती है जो कि बदलते मौसम में रक्त प्रवाह को नियंत्रित करता है। मेहदी रचाने में स्वियों हाथों तथा पैरों में विभिन्न प्रकार के बेल बूटों पुष्पों आदि का अंकन करती हैं। पैरों पर महावर लगाकर पैर के पंजो का श्रृंगार किया जाता है। महावर लगाने से पैर में फटने वाली बिवाई से आराम मिलता है। कवि की महावर सम्बन्धी ये पंक्तियाँ बहुत सुन्दर है-

पांय महावर दैन की नाईन बैठी आय। फिर फिर जानि महावरी, एड़ी मीड़ित जाय॥

लिपाई पुताई-
बुन्देलखण्ड के ग्रामीण अंचल में घरों को स्वच्छ रखने हेतु दीवारों पर पुताई एवं फर्श पर गोबर से लिपाई की जाती है। यह लिपाई पुताई बड़ी ही कलात्मक होती है। कलई, गेरू के रंगों का प्रयोग करके चौक कमल पुष्प, सितारा आदि अंकन अत्यन्त चित्ताकर्षक होता है। मांगलिक अवसरों पर विशेष रूप से लिपाई पुताई होती है। तभी तो गाया जाता है-

गईया को गोबर मंगाओ बारी सजनी दिग दै आँगन लिपाओ महाराज मुतियन चौक पुराओ बारी सजनी आँगन कलस धराओ महाराज।

बुन्देलखण्ड के लोकमानस में रची बसी लोक चित्रकला सामाजिक एवं आध्यात्मिक दर्शन से ओत प्रोत है।

लेख -
डॉ. हरीमोहन पुरवार

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