आज का पंचांग

संवत् 2082 विक्रमी | चैत्र कृष्ण अष्टमी | बुधवार

नक्षत्र: ज्येष्ठा | योग: वज्र | करण: बालव

पर्व विशेष : | तदनुसार 11 मार्च 2026

आज का पंचांग

संवत् 2082 विक्रमी | चैत्र कृष्ण अष्टमी | बुधवार

नक्षत्र: ज्येष्ठा | योग: वज्र | करण: बालव

पर्व विशेष : | तदनुसार 11 मार्च 2026

पुस्तक समीक्षा : सावरकरकृत ‘भारतीय इतिहास के छः स्वर्णिम पृष्ठ’

पुस्तक समीक्षा : सावरकरकृत ‘भारतीय इतिहास के छः स्वर्णिम पृष्ठ’

एक व्यक्ति की ही तरह एक राष्ट्र का जीवन भी सतत उतार-चढ़ावों का एक अनुक्रम होता है। इन उतार-चढ़ावों से भरी डगर में राष्ट्र भी निरन्तर अपने अस्तित्व, उत्थान और प्रगति के लिए संघर्षरत रहता है। हमारा भारतवर्ष पिछली सात सहस्त्राब्दियों से अपने जीवन मूल्यों व अपनी संस्कृति की रक्षा करता हुआ अविरत विश्व का सांस्कृतिक व आर्थिक नेतृत्व करता रहा है और आज भी सात हजार वर्षों के सुदीर्घ जीवन के अनुभवों से विश्व को प्रगति की वास्तविक राह दिखाने वाले पथ-प्रदर्शक की भूमिका के लिए सर्वथा सक्षम है। किन्तु जिस तरह हीन भावना से ग्रस्त हुए किसी व्यक्ति का स्वयं पर से विश्वास डिग जाता है और वह अपनी क्षमताओं को विस्मृत कर दूसरों से दया की अपेक्षा करता है, ठीक उसी तरह ब्रिटेन की 150 वर्षों की ही दासता ने भारतवर्ष में जिस हीन भावना का संचार किया यह उसी का परिणाम है कि आज अधिकांश भारतवासी अपने गौरवशाली इतिहास से अनभिज्ञ हैं और अपनी समस्याओं के समाधान हेतु सदैव पश्चिम से आस लगाए रहते हैं। दुर्दैव से भारतीय राष्ट्र की पराधीनता का वर्णन ही हमारे इतिहास का मुख्य विषय होकर रह गया है।

वास्तव में हमारे पूर्वजों के स्वेद और शोणित से सींचित हमारी मातृभूमि भारत ने एक लम्बे समय तक सामर्थ्य और पौरूष के बल पर अर्जित वैभव के स्वर्णिम युगों को देखा है। तथापि, ‘भारत सदा ही किसी-न-किसी का गुलाम रहा है’; ऐसे मिथ्यावादों ने हमारे इतिहास को हमारे ही समक्ष न केवल घृणित रूप में रखा अपितु हमारे स्वाभिमान को समाप्त कर हमारे भीतर एक हीन भावना को जन्म भी दिया है। स्वातन्त्र्य वीर के रूप में प्रसिद्ध स्व. विनायक दामोदर सावरकर ने सतत पराभव की गाथा को ही भारतवर्ष का इतिहास बताने वाले इन झूठे प्रचारों को समाप्त करने एवं भारतीय इतिहास के अनेकानेक गौरवशाली पृष्ठों पर छाए झूठ और दुराग्रह रूपी कोहरे को हटाने की दृष्टि से ही ‘भारतीय इतिहास के छः स्वर्णिम पृष्ठ’ नामक यह ग्रन्थ लिखा था। वस्तुतः कला, साहित्य, संगीत, विज्ञान, अध्यात्म आदि की गाथा कहने वाले अनेकों पृष्ठों के होते हुए भी पिछली 25 शताब्दियों से समय-समय पर परकीयों द्वारा पदाक्रान्त किये जाने पर स्वराष्ट्र को स्वाधीनता दिलाने वाले भारतीय वीरों की शौर्यगाथा को ही लोकहित प्रकाशन – लखनऊ द्वारा तीन भागों में प्रकाशित इस ग्रन्थ में स्वर्णिम पृष्ठों की संज्ञा प्रदान की गई है। इस ग्रन्थ में केवल इतिहास सिद्ध घटनाओं पर ही विचार किया गया है, अतः बुद्धकाल व इसके बाद का इतिहास ही इस ग्रन्थ का आधार है।

इतिहास के इस काल के प्रारम्भ में ही अर्थात् 372 ई.पू. में भारत पर ग्रीक योद्धा सिकन्दर (अलेक्ज़ेण्डर) का आक्रमण हुआ। सिकन्दर के प्रतिकार से लेकर आचार्य विष्णुगुप्त ‘चाणक्य’ व चन्द्रगुप्त के नेतृत्व में मगध केन्द्रित विशाल साम्राज्य की स्थापना, तदन्तर सेल्यूकस के पराभव के उपरान्त हिन्दूकुश पर्वत (प्राचीन भारत व ईरान की सीमा) तक चाणक्य व चन्द्रगुप्त द्वारा अखण्ड भारतीय साम्राज्य की स्थापना को ही इस ग्रन्थ में प्रथम स्वर्णिम पृष्ठ कहा गया है। इस ग्रन्थ में कलिंग नरेश खारवेल व उसके उपरान्त मगध सम्राट पुष्यमित्र शुंग द्वारा पुनः ग्रीकों के समूल पराभव को जहाँ द्वितीय स्वर्णिम पृष्ठ की संज्ञा दी गयी है, वहीं शकों पर आन्ध्र व मालव-योधेय गणराज्यों की विजय के साथ ही कुषाणान्तक सम्राट समुद्रगुप्त व उसके पुत्र शकारि चन्द्रगुप्त ‘विक्रमादित्य’ की कुषाणों पर विजय को तृतीय स्वर्णिम पृष्ठ कहा गया है। विशाल रोमन साम्राज्य सहित समूचे यूरोप, मध्य एवं मध्य-पूर्व एशिया को अपने पैरों तले रौंदने वाले बर्बरतम हूणों पर सम्राट यशोधर्मा की विजय का चौथे स्वर्णिम पृष्ठ के रूप में इसमें उल्लेख किया गया है।

प्राचीन भारत की सैन्य-शक्ति की तत्कालीन विश्व में सर्वश्रेष्ठता बताने के बाद ग्रन्थकार ने मध्ययुग के प्रारम्भ में मुस्लिम आक्रान्ताओं द्वारा सिन्ध पर विजय के उपरान्त से चित्तौड़ के महाराणा बप्पा रावल द्वारा 25 वर्षों में ही सिन्ध सहित हिन्दूकुश तक के सभी क्षेत्रों पर पुनर्विजय का वर्णन भी इसमें किया है, जिसके बाद 300 वर्षों तक मुस्लिमों के आक्रमण नहीं हुए। महमूद गजनवी द्वारा सोमनाथ ध्वस्त करना हो या गोरी के हाथों पृथ्वीराज की पराभव और उसके उपरान्त अलाउद्दीन खिलजी द्वारा पूरे भारत में इस्लामी साम्राज्य की स्थापना; केवल यही वास्तविक इतिहास नहीं है; ऐसा लिखते हुए लेखक ने इस ग्रन्थ में अलाउद्दीन के साम्राज्य के अवसान तथा हरिहर व बुक्कराय के नेतृत्व एवं विद्यारण्य स्वामी (माधवाचार्य) व सायणाचार्य के मार्गदर्शन में 14वीं सदी के महान विजयनगरम् साम्राज्य के उत्थान का भी वर्णन किया है।

पंजाब में गुरुपुत्रों के बलिदान व दशमेश के नेतृत्व में सिक्खों के बलिदान के साथ-साथ दक्षिण में छत्रपति शिवाजी के नेतृत्व में मराठा योद्धाओं द्वारा स्थापित हिन्दूपद पादशाही हमारे राष्ट्रीय गौरव के स्मारक है। इनके साथ लेखक ने इस ग्रन्थ में पेशवा बाजीराव के नेतृत्व में उत्तर भारत में हिन्दूपद पादशाही के विस्तार तथा मुगलों के पूर्ण पराभव का भी उल्लेख किया है कि किस तरह दिल्ली में ही मुगल बादशाह मराठों की शरणागति लेने को विवश हुए। मुगलों के बाद नादिरशाह हो या अहमदशाह अब्दाली दोनों को सिन्धु के पार खदेड़ कर मराठा सेनापति रघुनाथराव के नेतृत्व में अटक के उस पार से कटक तक व कश्मीर से तंजौर तक एक विशाल भारतीय साम्राज्य की स्थापना सावरकरकृत इस ग्रन्थ के अनुसार हमारे इतिहास का पाँचवाँ स्वर्णिम पृष्ठ है।

भारत में इस्लामी प्रभुसत्ता को सदा के लिए समाप्त कर दिया गया लेकिन इस बार अंग्रेजों ने भारत की सत्ता हथियाई। पराभव का दंश भारत को ज्यादा समय तक अचेत न कर सका और पुनः 1857 ई. में भारतीयों ने अंग्रेजों के विरुद्ध स्वातन्त्र्य के प्रथम समर का शंखनाद कर दिया। इस क्रान्ति के शमन के उपरान्त सन् 1900 से 1947 तक भारतीयों द्वारा हिंसात्मक एवं अहिंसात्मक तरीकों से अंग्रेजों के खिलाफ़ संघर्ष जारी रहा और अगस्त 1947 को स्वातन्त्र्य की प्राप्ति हुई। अंग्रेजों के विरुद्ध इस संघर्ष को ही लेखक ने भारतीय इतिहास का छठा स्वर्णिम पृष्ठ कहा है।

कुल मिलाकर, इस ग्रन्थ को पढ़ने के बाद पाठक यह जान सकेंगे कि किस तरह भारतीयों की सतत पराभव के रूप में हमें हमारा ही इतिहास विकृत रूप में पढ़ाया जा रहा है जबकि बात इससे ठीक उलट है। हमारा इतिहास तो विजय और वैभव के अगणित कथानकों से भरा पड़ा है। और तो और, सम्पूर्ण मध्य एशिया, उत्तरी अफ्रीका को नामशेष करने वाली इस्लामी सत्ता के विरुद्ध 10 शताब्दियों के लम्बे व कठिन संघर्ष के बाद भी अन्तिम विजय हमने ही प्राप्त की और 7 हजार वर्षों पुरानी अपनी संस्कृति को बचाने में सफल रहे। ब्रिटिश राजसत्ता भी 150 वर्ष ही हमें दबाकर रख सकी और अब एक विशाल लोकतंत्र के रूप में भारत ने पुनः प्रगतिपथ पर अपने पग बढ़ा दिए हैं। मेरे मत से भारतीय इतिहास की यह विवेचना पाठकों के मन में हमारे आत्म-गौरव के दीप को प्रज्जवलित करने वाली है, जिससे हमारा गतेतिहास पुनः आत्मविस्मृत भारतीयों के लिए प्रेरणा का स्रोत होगा।

Follow us on social media and share!