जनजातीय समाज में महाशिवरात्रि का पर्व
February 14, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | चैत्र कृष्ण चतुर्दशी | गुरुवार
नक्षत्र: उत्तराभाद्रपद | योग: इंद्र | करण: विष्टि
पर्व विशेष : | तदनुसार 16 अप्रैल 2026

भारत की पहचान विश्व-जगत में हमारी संस्कृति से है। संस्कृति का अर्थ लोग आजकल तीज-त्योहार, नृत्य, संगीत और वेशभूषा से लगा लेते हैं, जबकि ये हमारी सभ्यता के अंश हैं। संस्कृति वह नैतिक मूल और आदर्श है, जो समाज में आचरण के माध्यम से दिखाई देता है जैसे- सत्य बोलना, कर्तव्यपालन, सदाचरण, अतिथि सत्कार, लोककल्याण, परोपकार, दान, प्रकृति व पूर्वजों के प्रति श्रद्धा इत्यादि। यही मूल भाव भारतीयों में आध्यात्म और मानवता की उन्नति का मार्ग प्रशस्त करते हैं। हमारी संस्कृति भारत को पिछले पाँच हज़ार वर्षों से न केवल जीवंत रखे हुए है, बल्कि विश्व को भी मार्ग दिखाने की क्षमता रखती है।

भारतीयो में नैतिक मूल्य एवं आदर्श
श्रद्धा और कृतज्ञता का भाव भारतीय का मूल स्वभाव है जिसका स्त्रोत हमारी संस्कृति ही है। यही कारण है कि प्रकृति तथा पूर्वजों के प्रति श्रद्धा का भाव हर भारतीय के मन में रचा-बसा है। यह भाव किसी क्षणिक प्रेरणा या बाहरी आदेश का परिणाम नहीं, बल्कि अत्यंत प्राचीन और अनुभवजन्य ज्ञान की देन है।

बुजुर्गो के प्रति श्रद्धा का भाव
आदिम युग में जब मानव का जीवन पूर्णतः प्रकृति पर आश्रित था, तब उसकी सभी आवश्यकताएँ प्रकृति से ही पूरी होती थीं। कंद-मूल-फल का संग्रह, जल की प्राप्ति या शिकार द्वारा भोजन की व्यवस्था, ये सब सीधे प्रकृति से जुड़े थे। उस काल के मानव ने प्रत्यक्ष अनुभव किया कि अस्तित्व और जीवन की निरंतरता का आधार केवल उसका परिश्रम नहीं, बल्कि प्रकृति का उदार सहयोग भी है। इसी अनुभव ने उसके भीतर आभार और श्रद्धा का भाव उत्पन्न किया।
धीरे-धीरे जब मानव ने वनों से खाद्य-संग्रह से आगे बढ़कर सामूहिक कृषि और संगठित समाज की ओर कदम बढ़ाए, तो आपसी सहयोग और सामुदायिक एकता का महत्व और स्पष्ट हुआ। मनुष्य को बोध हुआ कि उसका जीवन केवल व्यक्तिगत प्रयास पर नहीं, बल्कि प्रकृति, पूर्वजों और समाज के योगदान पर भी निर्भर है,जो दृढ़ विश्वास बन गया।

सहयोग और सामाजिक एकता का महत्त्व
भारतीय संस्कृति में पितरों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता का विशेष भाव विद्यमान है। पितरों का स्मरण केवल किसी विशेष अवसर या पर्व तक सीमित नहीं, बल्कि नित्यकर्म और दैनिक दिनचर्या का अविभाज्य अंग है। मान्यता रही है कि जो कुछ हमें प्राप्त है, वह केवल हमारे प्रयत्न का फल नहीं, बल्कि पूर्वजों के परिश्रम और त्याग का परिणाम भी है। इसलिए हमारी सांस्कृतिक व्यवस्था में पितरों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने के अनेक माध्यम बने, जिन्हें मनुष्य अपने नित्यकर्म में सहज निभाता आ रहा है।
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पूर्वजो के परिश्रम और त्याग को दर्शाता दृश्य
प्रातःकाल स्नान के उपरांत जल अर्पित करके पितरों का स्मरण किया जाता है, इसे “पितृतर्पण” कहा जाता है। संध्या-वंदन के समय भी पूर्वजों को याद किया जाता है। घरों में यह परंपरा रही है कि भोजन से पूर्व थोड़ी मात्रा में अन्न अग्नि को समर्पित किया जाता है या पृथ्वी पर रख दिया जाता है- इसे “वैश्वदेव” (अन्न का कुछ अंश अग्नि में आहुति देना) कहा जाता है। भोजन करने से पहले अन्न का एक अंश देवताओं, पितरों और जीव-जंतुओं के लिए निकाला जाता है। भोजन का पहला ग्रास गाय को विशेष रूप से दिया जाता है, साथ ही भोजन का ग्रास कुत्ते, पक्षियों, विशेषतः कौवे को देना प्रचलित है। भारतीय संस्कृति में कौवा पितरों का प्रतीक माना गया है; उसके द्वारा भोजन ग्रहण करना पितरों की तृप्ति का संकेत माना जाता है। यह दर्शाता है कि हमारा भोजन केवल हमारे लिए नहीं, बल्कि उसमें पितरों और प्रकृति का भी अंश है। नित्य पूजा-अर्चना में देवताओं के साथ-साथ पितरों का भी स्मरण होता है। मन ही मन स्वीकार किया जाता है कि जीवन, संस्कार और आचरण का आधार हमें पूर्वजों से मिला है।

प्रतिदिन स्नान के बाद पितरो का तर्पण
शास्त्रों में गृहस्थ के लिए पंचमहायज्ञ-देवयज्ञ, पितृयज्ञ, भूतयज्ञ, ब्रह्मयज्ञ, मनुष्ययज्ञ-की व्यवस्था बताई गई है। इनमें पितृयज्ञ का विशेष स्थान है। आशय यह कि प्रत्येक गृहस्थ अपने नित्य आचरण में पितरों के प्रति कृतज्ञता बनाए रखे। यह स्मरण केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि नैतिक शिक्षा भी है कि हमारी जड़ें पूर्वजों से जुड़ी हैं और हम उनके प्रति सदा ऋणी हैं। भारतीय दर्शन में मान्यता है कि मानव जीवन तीन ऋणों- देवऋण, ऋषिऋण और पितृऋण से बँधा हुआ है। उपनयन संस्कार के बाद धारण किया जाने वाला जनेऊ भी इन तीनों ऋणों को इंगित करता है। पितृ-ऋण का अर्थ है कि हमारे जीवन, संस्कार और अस्तित्व का आधार हमारे पूर्वज हैं; नित्यकर्म में उनका स्मरण इसी सत्य की स्वीकृति है। पितृ-पूजा की परंपरा वनांचल में और भी विशेष रूप से दिखाई देती है। आरंभ से ही वन क्षेत्रों में विकसित यह परंपरा आज भी महत्त्वपूर्ण है और प्रत्येक प्रमुख अवसर पर पितरों का स्मरण किया जाता है।
गोंड समुदाय में अक्ती (अक्षय तृतीया) के समय पितरों को “अक्ती-पानी” (तर्पण) दिया जाता है। मान्यता है कि अक्ती-पानी अर्पित करने से पूर्वज या पुरखा-शक्ति संतुष्ट होती है और उनका आशीर्वाद परिवार पर बना रहता है। “अक्ती-पानी” देकर परिवारजन अपने पूर्वजों का आह्वान करते हैं कि “हे पुरखा-शक्ति, हमारे परिवार में पुनः जन्म लेकर आएँ, परिवार को आशीष दें।” इसी दिन गत वर्ष दिवंगत सदस्य का “पितर मिलान” किया जाता है। अक्ती-पानी दिए बिना कोई धार्मिक, सामाजिक आयोजन या संस्कार नहीं किया जाता। उनकी मान्यता है कि जो भी उन्हें प्राप्त होता है, उसमें प्रकृति और पेन-पुरखों का आशीर्वाद होता है। बीजा पंडूम, हरेली, देवारी जैसे त्यौहारों में पितरों का स्मरण किया जाता है। खास कर नवाखाई पर अपने पुरखा-देवता के निमित्त सात्त्विक भोजन-चावल, उड़द की दाल-को साजा, मोहलान या परसा के पत्तों में पितरों को अर्पित किया जाता है।

नवाखाई पर्व में पितरो का स्मरण
हल्बा समुदाय में अक्ती के दिन पितरों/पूर्वजों को जल अर्पित किया जाता है। नवाखाई में परिवार के “बड़े घर” जहाँ “माता-पितर” विराजित हैं, वहाँ कुल-देवी और पूर्वजों को कुदाई पत्तों में नया चावल अर्पित कर सेवा-विनती की जाती है। कोल समुदाय में नवाखाई के दौरान घर के भीतर पूर्वजों की स्मृति में चौरा बनाकर स्थापना की जाती है। भाद्रपद मास के पहले दिन या तीज के दिन भुंजिया जनजाति नवाखाई में नई फसल से बनी खीर “डूमा-पितर” को अर्पित करती है।
जीवन में होने वाले महत्त्वपूर्ण संस्कारों में पूर्वजों को अवश्य स्मरण किया जाता है। गर्भ ठहरने पर माना जाता है कि घर का कोई पूर्वज आने वाला है। जन्म के बाद यह विचार किया जाता है कि शिशु के रूप में परिवार के किस पूर्वज ने पुनर्जन्म लिया है, यह जानने के लिए विविध लोक-विधियाँ अपनाई जाती हैं। घर पर प्रसव हो तो पेन-पुरखों का आशीर्वाद प्रसूता को मिलता है। छठी के दिन, नामकरण के समय भी पूर्वजों का स्मरण कर ही नाम रखा जाता है। विवाह-संस्कार में सभी कार्यों से पहले पूर्वजों को याद कर तेल–हल्दी की रस्म आरम्भ की जाती है।

जन्म - विवाह - मृतक संस्कार में पितरो का स्मरण
धुर्वा समुदाय में विवाह की प्रमुख रस्मों में डूमा उंदराना (पितर बैठाना) की परंपरा है। हल्बा समाज में मृत्यु-संस्कार भी देव-संस्कार के रूप में, पूर्वजों के विशेष स्मरण के साथ सम्पन्न होते हैं। कंवर समुदाय में मान्यता है कि मृत्यु के बाद व्यक्ति का जब पितर-मिलान किया जाता है,तो उसकी पहचान गोदना के आधार पर होती है और उसी आधार पर जीव अपने पूर्वजों/परिवारजनों से मिलता है। जन्मोत्सव में भी विभिन्न लोक-परंपराओं से देखा-समझा जाता है कि किस पूर्वज का पुनर्जन्म हुआ है। विवाह से पहले वर–वधू को पितरों का आशीर्वाद दिलाया जाता है; बारात के लौटने पर गृह-प्रवेश के बाद सबसे पहले प्रतीकात्मक रूप से बने अपने पूर्वजो के चित्रों के समक्ष नमन कर आशीर्वाद लिया जाता है। मृतक संस्कारों में विशेष अनुष्ठानों द्वारा मृतक की आत्मा को पितृगण में सम्मिलित किया जाता है, जिसे पितर मिलाना कहते है। बस्तर की कई जनजातियों में मृतकों की स्मृति में स्मृति-स्तंभ स्थापित किए जाते हैं और अक्ती, नवाखाई आदि तीज–त्योहारों पर पितरों के प्रति श्रद्धा अर्पित कर भेंट चढ़ाई जाती है।
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बस्तर में स्मृति स्तम्भ
इसके अतिरिक्त सबसे प्रमुख अवसर कृषि और फसल से जुड़े होते हैं। जब खेत में बीज-बोआई होती है, तो पितरों को याद किया जाता है; और जब नई फसल आती है, तो उसका पहला अंश पितरों तथा ग्राम-देवता को अर्पित किया जाता है।

अक्ती पर्व में पितरो को तर्पण
उराँव समुदाय अपने पूर्वजों को कुल-देवी–देवता मानता है। मान्यता है कि परिवार/समुदाय की रक्षा करना इन्हीं कुल-देवताओं का दायित्व है, इसलिए उनकी प्रार्थनाओं में भाव-प्रश्न के साथ-साथ रोष/क्रोध का भी उल्लेख मिलता है। सरना पूजा में मृत पूर्वजों की आराधना की जाती है। प्रचलित प्रार्थना (मूल रूप) इस प्रकार है-
“हरदी नगर, रूईदास, पटना अरा ईयांता हूँ पचबल आलारों,
हुदि इन्ना परब गहि नामेनू निमागे असमा अरा झरा चिआ लगदम।
होरगर खटरके दरा ओनके–मोख़के दरा एमन दवले उईके,
परब दवले बितआ नेकआ।”
अर्थ : “हरदी नगर, रूईदास, पटना के मृत पूर्वजों और इस ग्राम के पितृगण-लीजिए, आज हम पर्व-त्योहार के निमित्त आपको रोटी और हँडिया/पानी अर्पित कर रहे हैं। आप सभी इसे आपस में मिल-बाँटकर स्वीकार करें, हम सबको सुख–शांति और समृद्धि दें, और यह पर्व शुभतापूर्वक सम्पन्न हो।”

सरहुल पूजा उराव समुदाय द्वारा
अर्पित चढ़ावे का प्रसाद पुजारी उपस्थित लोगों में बाँट देता है; शेष हँडिया/पानी वह स्वयं ग्रहण करता है। सरना में पितर/मृत पूर्वजों की पूजा पुजारी/बैगा द्वारा की जाती है। पूजा में चावल–आटा से बनी हाथ-ठोकी तली हुई रोटियाँ और हड़िया का तपावन पानी भोग रूप में अर्पित किया जाता है।
नए घर का निर्माण आरम्भ करने से पहले भी पितरों का आशीर्वाद लिया जाता है। प्रत्येक अमावस्या और विशेषतः पितृपक्ष के दिनों में गाँव के डीह-स्थल पर सामूहिक पूजा, बलि और तर्पण किया जाता है, जिससे पूरे समुदाय में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता की भावना प्रकट होती है। इसके अलावा सरहुल, करमा, मड़ई जैसे सामुदायिक त्योहारों में गीत–नृत्य और अर्पण के साथ पूर्वज-स्मृति का उत्सव मनाया जाता है। इस प्रकार जनजातीय समाज में पूर्वजों का स्मरण और उनका आशीर्वाद निरंतर प्राप्त किया जाता है।
भारतीय समाज दैनिक जीवन में तो पितरों का स्मरण करता ही है, साथ ही कई विशेष अवसर भी हैं जिनमें पूर्वजों के विशेष स्मरण की परंपरा है। श्राद्ध-पक्ष और अन्य पर्वों पर पितरों के स्मरण का विशेष महत्त्व होता है। ये अवसर नित्य-परंपरा का विस्तृत रूप हैं। इससे समझ आता है कि नित्य स्मरण को समय–समय पर सामूहिक और व्यापक रूप भी दिया जाता है। यह परंपरा हमें स्मरण दिलाती है कि हम अकेले नहीं हैं; हमारे जीवन का प्रत्येक क्षण हमारे पूर्वजों और समाज की देन है। इसी कारण पितरों के प्रति श्रद्धा भारतीय नित्य-जीवन का अनिवार्य अंग बनी हुई है।
लोक-समाज में पूर्वज-स्मरण की परंपराएँ बहुत पहले से प्रचलित रही हैं-खेत की पहली उपज का अंश पितरों को देना, गाँव के डीह/पितृ-स्थान पर चढ़ावा चढ़ाना, विवाह और गृह-प्रवेश पर सामूहिक भोज, कौवे और गाय को ग्रास, नदी/कुएँ पर जल-अर्पण-ये सरल और स्वाभाविक लोकाचार सर्वत्र पाए जाते हैं।
पूरे भारत में पितरों से संबंधित विविध लोक-परंपराएँ देखने को मिलती हैं। इन्हीं विविधताओं के बीच, हमारे पूर्वजों ने इन परंपराओं को स्थायी, सार्वलौकिक और लम्बे समय तक संरक्षित रखने हेतु एक ठोस पद्धति तैयार की, जिसे मानकीकृत करके लिपिबद्ध कर दिया गया ताकि ये परंपराएँ हज़ारों वर्षों तक बिना विकृति के निभाई जा सके। इस प्रकार इन लोक-परंपराओं का शास्त्री/मानकीकरण किया गया, जिसके चिन्ह हमें गृह्यसूत्रों और धर्म शास्त्र इत्यादि में दिखाई देते है। गृहस्थ के नित्य कर्म में पितृ यज्ञ का स्थान स्पष्ट किया गया और तिल (तिलौदक), कुश, आसन–दिशा, पात्र तथा आचरण–शुचिता जैसी सूक्ष्म विधियाँ निर्धारित की गईं। परिणामस्वरूप बिखरी लोक-प्रथाएँ एक पद्धति में आईं। बाद में स्मृतियों-मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य-स्मृति-ने पंचमहायज्ञ के ढाँचे में पितृयज्ञ को स्थान दिया; स्वाहा देवताओं के लिए और स्वधा पितरों के लिए, यह स्पष्ट किया; वैदिक शब्दावली ने लोक-कर्मों को वैध अर्थ दिया और उनके पालन की दिशा तय की।

विभिन्न धार्मिक ग्रंथो में पितरो की अवधारणा
महाभारत के अनुशासन पर्व ने समय निर्धारण का मानक प्रस्तुत किया। अश्विन कृष्ण प्रथम से अश्विन अमावस्या तक श्राद्ध के लिए उत्तम काल बताया और अमावस्या को सर्वपितृ-श्राद्ध का दिन निर्धारित किया गया। इससे क्षेत्रानुसार चल रही तिथियाँ एक पंचांग पर टिकीं और परिवारों को स्पष्ट मार्गदर्शन मिला। गरुड़ पुराण, मत्स्य पुराण, पद्म पुराणों ने इस ढाँचे को लोकप्रिय आख्यान और फलश्रुति से समृद्ध किया। यमलोक से पितरों के अवतरण की मान्यता, पिंडदान, ब्राह्मण-भोजन, गौ-ग्रास, कौवों को अन्न, तुलसी–जल अर्पण जैसी लोक-प्रथाएँ शास्त्रीय भाषा में प्रतिष्ठित हुईं। मध्यकालीन अनुष्ठान-ग्रंथ और पंचांग क्षेत्रानुसार विकल्प देकर विविधता की रक्षा करते रहे; गया, प्रयाग, पुष्कर जैसे तीर्थ पिंडदान के संस्थागत केंद्र बने। पुरोहित-परंपराएँ और वंशावलियाँ इस स्मरण को अंतरपीढ़ी ज्ञान में रूपांतरित करती रहीं।
पितरों के स्मरण और कृतज्ञता का सहज भाव अक्षुण्ण रहा, पर उसके पालन को समयबद्धता, स्पष्ट विधि, सामाजिक वैधता और पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरण का सहारा मिला; यही कारण है कि पितृपक्ष और पितृ-स्मरण भारतीय जीवन के सांस्कृतिक, दार्शनिक और सामुदायिक ताने-बाने में स्थायी रूप से गुंथे रहे हैं।
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हमारे पितर वह अदृश्य सूत्र हैं जो पूरे भारतवर्ष को एक डोर में पिरोते हैं। घर में नित्य पितरों को जल देना, भोजन से पहले वैश्वदेव (भोजन का अंश अग्नि में आहुति देना), मासिक अमावस्या और वार्षिक पितृपक्ष, ये सब एक ही भावना का विस्तार हैं: पितरों के प्रति कृतज्ञता और सम्मान। शास्त्र ने इसे स्वरूप दिया, पंचमहायज्ञ में पितृयज्ञ का स्थान, स्वधा का उच्चारण, महाभारत–पुराणों द्वारा काल-निर्धारण, विधि और फल; और लोक ने इसे जीवन बनाया, वनांचलों के डीह-स्थल, अक्ती-पानी, नवाखाई, सरना-पूजा, स्मृति-स्तंभों पर भेंट, तथा जन्म–विवाह–मरण के प्रत्येक संस्कार में पूर्वज-आशीष। यही लोक और शास्त्र की संयुक्त धारा भारत को अखंड बनाए रखती है। हमारे पितर, वह नैतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक सूत्र हैं, जो पूरे भारत को एक कृतज्ञ चेतना में बाँधकर राष्ट्र की सातत्य, समाज की समरसता और एकता सुनिश्चित करते हैं।

संपादक:
वेद प्रकाश सिंह ठाकुर
दक्षिण कोसल टुडे
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