पचराही का पुरातात्विक वैभव
November 02, 2025
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नक्षत्र: मूल | योग: वज्र | करण: बालव
पर्व विशेष : | तदनुसार 13 फ़रवरी 2026

छत्तीसगढ़ के मध्यकालीन इतिहास में भोरमदेव क्षेत्र का विशेष स्थान है। यहाँ से प्राप्त अभिलेख न केवल प्राचीन शासन व्यवस्था के स्वरूप को स्पष्ट करते हैं, बल्कि दक्षिण कोसल में सक्रिय विभिन्न राजवंशों के आपसी संबंधों और सत्ता-संघर्ष की भी महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं। भोरमदेव स्थित मड़वा महल से प्राप्त विक्रम संवत 1406 (1349 ई.) का अभिलेख फणिनागवंश के इतिहास को समझने का एक प्रमुख आधार है।
भोरमदेव के मड़वा महल अभिलेख, संवत 1406 (1349 ई.) में फणिनागवंशी राजाओं की एक सूची प्राप्त होती है। इनमें से अनेक शासकों के अन्य अभिलेखीय साक्ष्य भी उपलब्ध हैं, जबकि कुछ शासकों के संबंध में किसी अन्य स्रोत से जानकारी नहीं मिलती। इसके अतिरिक्त, दो ऐसे शासक भी ज्ञात होते हैं जिनके विषय में जानकारी अन्य स्रोतों से प्राप्त होती है, किंतु मड़वा महल अभिलेख में उनका उल्लेख नहीं है।

मड़वा महल
1. भोडिंग देव (भोणिंग देव)
हरि (या) ब्रह्मदेव का खलारी से प्राप्त विक्रम संवत 1470 (1415 ई.) का अभिलेख इस तथ्य की सूचना देता है कि अहिहय (हैहय) कुल की कलचुरी नामक शाखा में राजा सिंघण हुए। उनके पुत्र रामचंद्र ने (फणि) नागवंश के भोणिंग देव को युद्ध में घायल किया था। अभिलेख का श्लोक इस प्रकार है:
“अभवदनिपालस्तत्सुतो रामदेवः समरशिरसि धीरो येन भोणिंग देवः।
मणिरिव फणिवंशस्याऽहतः कोपदृष्ट्या तरुणतरुणितेजः पुंजराजत्प्रपातः॥५॥”
(अर्थात् उसका पुत्र राजा रामदेव हुआ, जो रणभूमि में धीर था। उसने क्रोध में उस भोणिंग देव को आहत किया, जो नागवंश का मणि के समान था और दोपहर के सूर्य के तेजपुंज के समान प्रतापी था।)
यह भोणिंग देव किस नागवंश से संबंधित था, यह स्पष्ट नहीं हो पाया है। तत्कालीन छत्तीसगढ़ क्षेत्र में दो प्रमुख नागवंशी शासक विद्यमान थे- एक बस्तर के छिंदक नागवंश और दूसरा भोरमदेव (कवर्धा) का फणि नागवंश।
बस्तर के छिंदक नागवंश का अंतिम अभिलेख राजा हरिश्चंद्र का टेमरा अभिलेख, संवत 1226 (1324 ई.) का माना जाता है। इसके बाद इस क्षेत्र पर काकतीय वंश का अधिकार हो गया। अतः उल्लेखित भोणिंग देव का काल बाद का होने के कारण उसका छिंदक नागवंश से संबंधित होना संभव प्रतीत नहीं होता।

16 स्तंभों वाला मंडप
श्री लक्ष्मीशंकर निगम के अनुसार चौदहवीं शताब्दी ईस्वी में उड़ीसा के कालाहांडी क्षेत्र में एक नागवंश की स्थापना हुई थी। संभव है कि भोणिंग देव इसी नागवंश से संबंधित हो। किंतु अभिलेख में स्पष्ट रूप से भोणिंग देव को फणि वंश का बताया गया है- “फणिवंशस्याऽहतः।”
इससे प्रतीत होता है कि ‘फणि’ को केवल सामान्य नागवंश न मानकर ‘फणिनागवंश’ के रूप में ग्रहण करना अधिक उपयुक्त है। इसी आधार पर मिराशी ने इसके फणिनागवंशी होने की संभावना व्यक्त की है।
यदि भोणिंग देव वास्तव में फणिवंशी था, तो एक तथ्य विचारणीय है। रामचंद्र का विवाह हैहय कुल की कन्या धन्यांबिका देवी से हुआ था, जिससे यह स्पष्ट होता है कि बाद के समय में दोनों वंशों के संबंध सामान्य नहीं रह गए थे। यह भी संभव है कि धन्यांबिका हैहयों की रतनपुर शाखा से संबंधित रही हों।
फणिनागवंशी रामचंद्र के मड़वा महल अभिलेख, विक्रम संवत 1406 (1349 ई.) में उनके पुत्र अर्जुन और हरिपाल का उल्लेख मिलता है। यदि भोणिंग देव फणिवंशी था, तो संभवतः वह इन्हीं के बाद की पीढ़ी का रहा होगा। किंतु इस संबंध में अब तक कोई ठोस साक्ष्य प्राप्त नहीं हुआ है।

2. महाराजा सतीम
मड़वा महल, भोरमदेव (कवर्धा) में वर्ष 2003 में मंदिर के अनुरक्षण कार्य के दौरान एक लेखयुक्त खंडित प्रस्तर प्राप्त हुआ। यह प्रस्तर एक सतीलेख है और वर्तमान में मंदिर प्रांगण में ही सुरक्षित है। इसका पाठ सर्वप्रथम श्री राहुल कुमार सिंह द्वारा प्रकाशित कराया गया। यह लेख सात पंक्तियों में उत्कीर्ण है-
(1) सम्वत 1407 वर्षे घोरे
(2) 11 सोमे सौत(-)डग्रे
(3) फणिवंस(श) राजो सरदा-
(4) ते गार्य(-) राजेन महि(धर)
(5) पुत्रः श्री महाराज सतीम--
(6) --रनं राउत घाघम पुत्र(त्री)
(7) दुई कुल उधरे(उद्धारे) सहगमन
इस लेख का महत्व इस तथ्य में निहित है कि इसमें फणिवंश के राजा ‘सरदा’ तथा महाराज ‘सतीम’ का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। अंतिम दो पंक्तियों में राउत घाघम की पुत्री द्वारा पितृकुल और पति कुल के उद्धार हेतु सहगमन (सती होने) का वर्णन है। फणिवंश के कुछ अज्ञात राजाओं के नाम तथा राउत जाति की स्त्री के सती होने का विवरण इस लेख को विशेष महत्व प्रदान करता है।
इस अभिलेख में महाराजा सतीम का उल्लेख एक पुरानी ऐतिहासिक गुत्थी को सुलझाता प्रतीत होता है। वस्तुतः वर्ष 1882 में तत्कालीन रायपुर जिले के सोंदरा (Sondra) गांव से ‘महाराजा श्री सतीमदेव’ नामांकित एक स्वर्ण मुद्रा प्राप्त हुई थी। इस विषय में श्री एस. एल. निगम ने उल्लेख किया है कि यह स्वर्ण मुद्रा एक नवीन शासक की जानकारी प्रदान करती है। मुद्रा के अग्रभाग पर तलवार धारण किए चलते हुए राजा की आकृति अंकित है तथा पृष्ठभाग पर तीन पंक्तियों में “महाराजा श्री सतीमदेव” अंकित है।

मंदिर के दीवारों पर उकेरी गई मूर्तियाँ
पूर्व में इस नाम के किसी शासक की जानकारी न होने के कारण इस मुद्रा को रायपुर शाखा के कलचुरी शासकों से जोड़कर देखा जाता था। किंतु अब मड़वा महल से महाराजा सतीम का अभिलेख प्राप्त हो जाने के बाद यह संभावना प्रबल हो जाती है कि दोनों सतीम एक ही व्यक्ति थे और वे भोरमदेव के फणिनागवंश से संबंधित थे।
ऐसा प्रतीत होता है कि महाराजा सतीम संवत 1407 (1349–50 ई.) के आसपास वर्तमान थे। रामचंद्र देव का मड़वा महल अभिलेख भी संवत 1406 (1349 ई.) का है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि दोनों समकालीन थे। तथापि, उनके आपसी संबंधों के विषय में कोई स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है।

मड़वा महल का गर्भ गृह (सौ.cgjohar )
मड़वा महल अभिलेख से यह भी ज्ञात होता है कि उस समय चतुरापुरी के शासक रामचंद्र देव थे। इससे यह अनुमान किया जा सकता है कि महाराजा सतीम उस समय तक प्रधान शासक नहीं थे। किंतु बाद में उनके द्वारा अपने नाम से मुद्रा जारी किए जाने से यह प्रतीत होता है कि आगे चलकर वे शासक बने होंगे।
संभव है कि सतीम, रामचंद्र के पुत्र या भतीजे रहे हों। किंतु मड़वा महल अभिलेख में रामचंद्र के पुत्रों के रूप में कन्हड़ देव, चंदन, अर्जुन, लक्ष्मी ब्रह्मा, हर्षपाल आदि के नाम प्राप्त होते हैं। संभव है कि इनमें से किसी का अन्य नाम सतीम रहा हो, अथवा वह कोई अन्य व्यक्ति रहा हो। चूंकि अभिलेख रामचंद्र के बाद की पीढ़ी के विषय में मौन है, इसलिए महाराजा सतीम के संबंध में निश्चित निष्कर्ष निकालना कठिन है।
फणिवंशी शासक भोजदेव और मलुगिदेव के कोटेरा ताम्रपत्रों से ज्ञात होता है कि ये ताम्रपत्र बालोद से जारी किए गए थे। इससे स्पष्ट होता है कि फणिवंशियों का अधिकार उन क्षेत्रों तक विस्तृत था। अतः महाराजा सतीम की मुद्रा का रायपुर क्षेत्र में प्राप्त होना अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता, यद्यपि यह भी स्वीकार्य है कि मुद्राएँ अन्य कारणों से भी दूर-दूर तक प्रसारित हो सकती हैं।
उत्कीर्ण लेख – बालचंद्र जैन, परिवर्धित संस्करण 2005, पृ. 148–151
छत्तीसगढ़: दक्षिण कोसल के कलचुरी – डॉ. ऋषिराज पांडेय, प्रथम संस्करण 2008, पृ. 126
Coins of Chhattisgarh – प्रो. एल. एस. निगम, पुस्तिका, संस्कृति एवं पुरातत्व निदेशालय, रायपुर
Mandawa Mahal Inscription of Ramchandra V.S. 1406 – बालचंद्र जैन, सिंहावलोकन ब्लॉग, राहुल कुमार सिंह
Kotela Copper Plate Inscription of Bhojadeva, Saka Year 1126 – बालचंद्र जैन, Journal of Indian History, Vol. 40, Part–2, 1962
लेख:
अजय चंद्रवंशी
कवर्धा (छत्तीसगढ़)
मो. 9893728320
भोरमदेव के फणिनागवंशी शासक भोणिंग देव और महाराजा सतीम
January 17, 2026