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November 12, 2025
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भारतीय इतिहास में मंदिर और मस्जिदों के विवाद में न्यायालयीय आदेशों पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने कई बार सर्वेक्षण और उत्खनन करके ऐसे विवादों के तथ्य-संग्रह में भूमिका निभाई है। धार स्थित भोजशाला का विवाद भी इसी श्रेणी में आता है। आइए विस्तार से जानते है, इस मंदिर के बारे में...
भारतीय इतिहास में परमार वंशीय राजाओं का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। वे केवल राजनीतिक उपलब्धियों के लिए ही नहीं, बल्कि कला और स्थापत्य के क्षेत्र में किए गए उल्लेखनीय कार्यों के लिए भी प्रसिद्ध हैं। 10वीं से 13वीं शताब्दी के बीच मध्य भारत के बड़े भूभाग पर शासन करने वाले इन शासकों की राजधानी वर्तमान मध्यप्रदेश की धार नगरी थी।

भोजशाला के स्तंभ (pc: saumynagayach21)
इस वंश के सर्वाधिक प्रतापी राजा, जिन्हें राजा भोज के नाम से जाना जाता है, कला-प्रेमी और विद्या-समर्थक बताए जाते हैं। उन्होंने 11वीं शताब्दी के प्रारम्भ से मध्यकाल में शासन करते हुए अपनी राजधानी में ज्ञान की देवी माँ सरस्वती (वाग्देवी) के लिए एक मंदिर का निर्माण करवाया। यह मंदिर उस समय शिक्षा-ग्रहण और विद्या-चर्चा का भी एक महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।

भोजशाला का दृश्य
कहा जाता है कि उस काल में दूर-दूर से लोग वाग्देवी के दर्शन और विद्या-साधना के लिए यहां आते थे। परंतु मध्यकालीन मुस्लिम आक्रमणों के दौरान अन्य मंदिरों की तरह भोजशाला का वैभव भी प्रभावित हुआ। इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि ने आगे चलकर विवाद के प्रश्न को जन्म दिया।
आधुनिक काल में धरोहरों के पुनर्मूल्यांकन और ऐतिहासिक तथ्यों की पुनर्स्थापना की प्रवृत्ति भी तेज हुई है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का ध्येय-वाक्य “प्रत्नकीर्तिमपावृणु” इसी दृष्टि को रेखांकित करता है। हालिया वर्षों में काशी विश्वनाथ परिसर से जुड़े निष्कर्षों की चर्चा इसी संदर्भ में होती रही है।
भोजशाला के पुरातात्विक सत्य को जानने के लिए माननीय उच्च न्यायालय ने एएसआई को सर्वेक्षण का आदेश दिया था। यहां यह उल्लेखनीय है कि एएसआई की वार्षिक पत्रिका इंडियन आर्कियोलॉजिकल रिव्यू 1984-1985 (IAR 1984-1985) के पृष्ठ 183 पर धार स्थित भोजशाला को मूलतः माँ सरस्वती के लिए निर्मित मंदिर बताया गया है। उसी संदर्भ में भोजशाला के पश्चिम और उत्तर में मंदिर के अधिष्ठान के चिह्नों का उल्लेख भी मिलता है।

अलंकृत छत
एएसआई द्वारा मुद्रित कॉर्पस इंसक्रिप्शन्स इंडिकारम, खण्ड 7 में भी एक महत्वपूर्ण उल्लेख मिलता है। उसके अनुसार एक ब्रिटिश अधिकारी को भोजशाला के अवशेषों के पास से सरस्वती (वाग्देवी) की मूर्ति प्राप्त हुई थी, जिसे वर्तमान में ब्रिटिश म्यूज़ियम में प्रदर्शित बताया गया है। पुस्तक में दिए विवरण के अनुसार यह प्रतिमा वाग्देवी की है और इसका निर्माण 11वीं शताब्दी में राजा भोज द्वारा करवाया गया था।
इस विवरण का आधार प्रतिमा पर अंकित अभिलेख को बताया गया है। उसी पुस्तक में यह भी संकेत मिलता है कि भोज द्वारा निर्मित भोजशाला में यह प्रतिमा स्थापित रही होगी। 1987 में एएसआई द्वारा किए गए उत्खनन में भोजशाला से हिन्दू धर्म से संबंधित 32 मूर्तियां प्राप्त होने का उल्लेख भी किया जाता है।
इन शोध-सूचनाओं के आधार पर लेखक का निष्कर्ष है कि भोजशाला का मूल स्वरूप हिन्दू मंदिर का रहा है। इसी संदर्भ में भोजशाला को मस्जिद कहना लेखक के अनुसार तथ्यहीन माना जाना चाहिए। परिसर में दिखाई देने वाले स्तम्भ और उनके अलंकरणों को परमार कालीन (11वीं शताब्दी) शैली का बताया जाता है।
यह भी कहा गया है कि भोजशाला के आसपास बनी कुछ कब्रों के निर्माण में परमारकालीन मंदिर-अवशेषों का उपयोग किया गया। इन अवशेषों पर हरा रंग पोतकर पहचान बदलने का प्रयास किए जाने का भी उल्लेख मिलता है। ऐसे संकेत विवाद के पुरातात्विक पक्ष को और जटिल बनाते हैं।
पुरातत्व विभाग के दल ने सर्वेक्षण के दौरान भोजशाला और निकट स्थित, कालांतर में बनी दरगाह में प्रस्तर पर अंकित शिलालेखों के छापे (स्टांपेज) लिए थे। पूर्व में भी भोजशाला से कई अभिलेख मिलने का उल्लेख मिलता है। पुरातत्वविद के. के. लेले के अनुसार भोजशाला के दो स्तम्भों पर अंकित अभिलेख इस ओर संकेत करते हैं कि इन्हें व्याकरण के किसी आचार्य द्वारा लिखवाया गया था।

उनके अनुसार इन अभिलेखों का उपयोग छात्रों के ज्ञानार्जन में होता होगा। यह संकेत भोजशाला की शैक्षिक भूमिका के पक्ष को भी मजबूत करता है। हालांकि, इन निष्कर्षों का अंतिम मूल्यांकन विस्तृत रिपोर्ट और न्यायालयीय परीक्षण के बाद ही स्पष्ट होगा।
एएसआई ने उत्खनन, स्टांपेज, फोटोग्राफी और प्रलेखन सहित भोजशाला में किए गए कार्य की विस्तृत रिपोर्ट न्यायालय के समक्ष 2024 में प्रस्तुत कर दी है। अपेक्षा है कि यह रिपोर्ट भोजशाला के निर्माण, उसके ऐतिहासिक परिवर्तन और उसके विध्वंस से जुड़े पक्षों पर अधिक प्रकाश डालेगी। वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय में लंबित इस विवाद के निर्णय की प्रतीक्षा बनी हुई है।
डॉ. शुभम केवलिया
सहायक आचार्य (इतिहास)
शहीद भगत सिंह महाविद्यालय (दिल्ली विश्वविद्यालय)
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