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पर्व विशेष : | तदनुसार 18 जुलाई 2026

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संकल्प एवं मानवीय चेतना के जागरण का अनुष्ठान - भीमसेनी एकादशी

संकल्प एवं मानवीय चेतना के जागरण का अनुष्ठान - भीमसेनी एकादशी


भारतीय परम्परा शरीर को साधन और आत्मा को लक्ष्य मानती है। भौतिक सुखों से दूर होकर परमार्थ की ओर बढ़ना ही व्रत है। सनातन संस्कृति में एक वर्ष में 24 एकादशी होती हैं। ये आत्मिक शान्ति के अवसर हैं। तेज गर्मी में अन्न और जल का त्याग करना कठिन होता है। सनातन धर्म भीमसेनी एकादशी को एक कठोर तपस्या मानता है।

भीमसेनी एकादशी के पीछे महर्षि वेदव्यास और पाण्डुपुत्र भीम की कथा है। यह कथा धर्म की सरलता और संकल्प शक्ति को बताती है। युधिष्ठिर सहित सभी पाण्डव और द्रौपदी हर पक्ष की एकादशी का पालन करते थे। भीम के लिए यह कठिन था। उनके पेट में वृक नामक अग्नि के कारण उन्हें बहुत तेज भूख लगती थी। भीम ने यह समस्या महर्षि व्यास को बताई। महर्षि ने उन्हें एक उपाय बताया। उन्होंने कहा कि वर्ष भर की 24 एकादशियों का फल प्राप्त करने के लिए ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी का बिना जल के व्रत करना चाहिए। भीमसेन ने इस कठोर तपस्या को पूरा किया। उनके इस दृढ़ संकल्प के कारण ही यह तिथि भीमसेनी एकादशी के रूप में प्रसिद्ध हुई।

यह केवल एक पौराणिक कथा नहीं है। यह मानवीय क्षमता का एक बड़ा उदाहरण है। भीम थोड़ी देर भी अन्न के बिना नहीं रह सकते थे। उन्होंने भीषण गर्मी में बिना जल के व्रत किया। भीमसेन से प्रेरणा लेकर आज तक बहुत से हिन्दू स्त्री और पुरुष भीमसेनी एकादशी का व्रत करते हैं। यह प्रमाणित करता है कि पवित्र लक्ष्य होने पर शारीरिक सीमाएँ आत्मा को नहीं रोक सकती हैं।

भीमसेनी एकादशी का बिना जल का उपवास शरीर को स्वस्थ रखने की एक वैज्ञानिक प्रक्रिया भी है। गर्मी के इस समय में वात और पित्त का असन्तुलन बहुत अधिक होता है। ऐसे में 24 घण्टे का यह उपवास पाचन तन्त्र को पूरा विश्राम देता है। जल न मिलने पर शरीर अपनी रक्षा के लिए ऑटोफैजी की प्रक्रिया आरम्भ कर देता है। शरीर अपनी मृत कोशिकाओं और हानिकारक तत्वों को नष्ट करके ऊर्जा में बदलने लगता है। इससे रक्त शुद्ध होता है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।

सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से यह पर्व समरसता और करुणा का सन्देश देता है। भारतीय ऋषि प्रकृति और मनुष्य के सम्बन्ध को अच्छी तरह समझते थे। इस दिन दान का विशेष महत्व है। व्रत करने वालों के लिए ठण्डे जल, शक्कर, रसदार फलों और छाते के दान का नियम है। यह दान साक्षात् मनुष्य और ईश्वर की सेवा का माध्यम है।

भीमसेनी एकादशी आत्म संयम, पवित्रता और अच्छे विचारों को जगाने का अवसर है। यह सांसारिक इच्छाओं से दूर जाने की यात्रा है। अन्न और जल का त्याग करके ईश्वर के स्मरण में लगा हुआ मनुष्य भगवान की शरण चाहता है। उसकी प्रार्थनाओं में "सर्वे भवन्तु सुखिन:" की कामना शामिल होती है। यही हमारी सनातन परम्परा की वह पहचान है जो लम्बे समय से लोक कल्याण का मार्ग दिखा रही है।

- नम्रता वर्मा

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