आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | वैशाख शुक्ल तृतीया | सोमवार

नक्षत्र: रोहिणी | योग: सौभाग्य | करण: गर

पर्व विशेष : | तदनुसार 20 अप्रैल 2026

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लोकगाथा भरथरी

लोकगाथा भरथरी

भारतीय समाज में योगियों के संबंध में कई किंवदंतियाँ प्रचलित हैं। लोकसाहित्य में ध्यान दें, तो आधा साहित्य जादू-टोने, मंत्र-तंत्र और अवैज्ञानिक मनोवृत्तियों को समर्थन देता है। इस देश में, अध्यात्म को इतना अधिक महत्व आरंभ ही से मिला हुआ है, जितना अन्य देशों में नहीं। अध्यात्म अर्थात् स्वयं के सूक्ष्म रूप के दर्शन के कितने सारे मार्ग भारतीय योगियों एवं दार्शनिकों ने अपनी चिंतन-दृष्टि में देखे हैं और उनके वे मार्ग प्रचारित होकर समाज में वर्गों के आधार पर चर्चित हुए और उन्हें अलग-अलग बहुसंख्य मतावलंबियों की मान्यता मिली।

उन्हीं योगियों में एक भर्तृहरि या, भरथरी की चर्चा भारतीय हिन्दी साहित्येतिहास के आदिकालीन संत-कवियों के रूप में मिलती है। संप्रदाय और पंथ संबंधी काव्यधारा एवं आध्यात्मिक रूझानों को रेखांकित करती भर्तृहरि की कविताओं का उत्स ठीक तुलसी और कालिदास के जीवनों की तरह गृहस्थ जीवन से विरक्ति के फलस्वरूप ईश्वर भक्ति के निमित्त लिखी गई भावप्रवण रचनाएँ हैं। प्रकार या भावसृष्टि की दृष्टि से यद्यपि इनमें समरसता नहीं है, तथापि इनका उद्देश्य एक ही है।

भरथरी की रचनाओं को योगमार्गी रचनाएँ और उनके पंथ को योग या तंत्र साधना संबंधी पंथ के अंतर्गत देखा जा सकता है। हिन्दी साहित्य में भरथरी की जितनी चर्चा है, उससे कदाचित् अधिक वे लोकसाहित्य के प्रियपात्र है। इसका कारण एक यह भी हो सकता है कि उनका काव्यकाल प्रायः हिन्दी से अधिक हिन्दीपूर्व लोकभाषा का काव्यकाल था, इसके अतिरिक्त भरथरी के अनुयायियों द्वारा उनकी जीवनकथा को एक लोकगाथा का रूप दे डालना भी इसका प्रधान कारण हो सकता है। इनके संबंध में, प्रायः दो किंवदंतियाँ है-

एक यह कि भरथरी राज्य की सेवा में इतने समर्पित थे कि गृहस्थ जीवन के प्रति एक तरह से उदासीन से हो गये थे। अत्यंत रूपवती महारानी पिंगला भरथरी जैसे रूपवान, शक्तिशाली एवं यशस्वी पति को पाकर धन्य थी। किंतु, भरथरी का पिंगला के लिए अधिक समय नहीं निकाल पाना और उसकी शारीरिक संतुष्टि को अनदेखा करना भरथरी के जीवन की नयी कथा गढ़ गये। प्राणों से भी अधिक पत्नी को चाहने वाले भरथरी उसकी इस इच्छा को समझ नहीं सके पिंगला को मजबूरन किसी सैनिक के प्रति आसक्त होना पड़ा।

एक बार, भरथरी को किसी साधु से उपहारस्वरूप अमृतफल की प्राप्ति हुई। अपनी पत्नी को अधिक चाहने की वजह से भरथरी ने वह अलौकिक अमृतफल पिंगला को भेंट कर दिया। पिंगला सैनिक पर प्राण न्यौछावर करती थी, इसलिए उसने यह फल उसे दे दिया। सैनिक पिंगला से तो प्रेम करता था किंतु उसके हृदय की मानिनी कोई वेश्या बनी हुई थी, उसने वह फल वेश्या को दे दिया। इधर, वेश्या भी सैनिक से अधिक एक नगरत्रेष्ठि पर आसक्त थी। वह फल नगरत्रेष्ठि को मिल गया।

अब, नगरत्रेष्ठि के लिए उसका प्रिय पात्र राजा भरथरी थे। अतः उसने वह फल राजा को उपहारस्वरूप दे दिया। भरथरी के द्वारा पिंगला को दिया गया अमृतफल जब उसी के पास लौट आया और वह भी नगरश्रेष्ठि के द्वारा उसे स्वाभाविक चिंता हुई। उसने पता लगाया, तो पिंगला का विश्वासघात देखा। इस तरह, उसने राजकार्य से विरक्त होकर ईश्वर भक्ति के लिए गृहस्थ जीवन को तिलांजलि दे दी।

लेकिन, दूसरी कथावस्तु इससे बिलकुल अलग है। जहाँ पहली कथा पिगला को भरथरी की पत्नी बताती है, वहीं दूसरी कथा में पिंगला साली है। भरथरी की पत्नी का नाम इस कथा में सामदेई है। राजकार्य एवं गृहस्थ जीवन से विरक्त होने तथा उस विरक्ति की चरम स्थिति को जानने के लिए आइये लोकगाथा भरथरी के गीतों और कथातत्वों पर दृष्टिपात करें।

उज्जैन राज्य के प्रतापी राजा चंद्रसेन हुए, जिनके पुत्र इन्द्रसेन पिता की तरह ही यशवंत एवं लोकहितकारी सिद्ध हुए। इन्द्रसेन की पत्नी रूपदेई ने भरथरी को जन्म दिया। राजदरबार ही नहीं, प्रजा के घरों में भी उस दिन त्यौहार मनाया गया। बधाई के गीत गाये गये और बाजे गाजे के साथ लोगों ने युवराज के आने का स्वागत नाच-नाचकर किया। राजा ने भी उस दिन अन्न, वस्त्र और गाय दानस्वरूप प्रजा एवं ब्राह्मणों को दिये।

युवराज के जन्मलग्न-विचार के लिए काशी के पंडित बुलाये गये। पंडित ने अपनी पोथी-पत्रिका निकाली, तो प्रजा जिस शिशु को भावी युवराज समझने लगी थी, उसके भाग्य में योगी होना लिखा था। रानी रूपदेई ने सुना, तो विकल होकर रोने लगीं। उन्होंने पंडित से विनती की कि पचास घोड़े और हाथी उसे उपहारस्वरूप मिलेंगे, वह शिशु का भाग्य पलट दें। परंतु पंडित ने मना कर दिया। उसने कहा कि भाग्य तो गंगा की धार की तरह है, दाता ने जो लिख दिया, उसे मिटानेवाला कोई नहीं।

तब बोले पंडित काशी के रानी सुन मेरी बात
लिखनेवाला दाता लिख गया मेटनेवाला कोई नहीं
जैसे गंगा जी की धारा वैसे योग लिखा करतार
नाम फेरे योग ना घटे रानी सुन मेरी बात
इतना कहा पंडित काशी का रानी सुन मेरी बात

रानी मूर्चिछत होकर गिर पड़ी। होश में आयी, तो पुनः पंडित से अनुरोध किया कि किसी तरह भाग्य बदल दें, नहीं तो उनके प्राण नहीं बचेंगे पंडित ने फिर समझाया कि अंधा और लंगड़ा पुत्र पाकर भी लोग प्रसन्न होते हैं, यह शिशु तो साक्षात् सूर्य के समान तेजस्वी होगा। योगी होकर घूमते हुए सबको सत्कर्म और ईश्वर प्रेम की शिक्षा देगा, तो उज्जैन के लिए इससे अधिक गौरव की क्या बात होगी।

रानी ने विचार किया। पंडित को पुरस्कारस्वरूप हाथी, घोड़ा वस्त्र और मुहरों का दान दिया। पंडित ने आशीष दिया और काशी को लौट पड़े। भरथरी बढ़ने लगे और विद्याध्ययन के लिए गुरू के पास जाने लगे। इधर, सिहलद्वीप के राजा के घर में भी एक सुंदर लड़की ने जन्म लिया। नाम पड़ा सामदेई।

दोनों सयाने हुए, तो उनके विवाह की बात चलने लगी। दोनों का विवाह योग मिला और बात आगे बढ़ चली।बावन सूबों के सूबेदार और छप्पन गढ़ों की प्रजा को बारात में चलने का निमंत्रण मिला। उज्जैन में लगता था, जैसे मेला हो। बाजे-गाजे और धूम-धड़ाके के साथ बारात सिहलद्वीप पहुंची। राज-दरबार में भरथरी की पालकी उतरी, तो भरथरी के सौंदर्य पर किसी की आँख हटी नहीं। सब भरथरी के माता-पिता के भाग्य को सराहने लगे।

लोग सराहने लगे राजकुमारी सामदेई के भाग्य को, भरथरी के साथ जिसका विवाहयोग लिखा है। अब, भरथरी दूल्हा बने हैं, तो उनकी शारीरिक सजावट भी तो देखिये। बावन पाट के जामा और रत्नजड़ित टोप पहने है भरथरी। मोरपंख की माला पर मोतियों का गुच्छा तो शोभे-ही-शोभे।

बावन पाट कर तो जामा टोपी रतन जड़ाव
मोर की तो माला जी तिस पर मोतियन का गुच्छा

विवाह-मंडप पर ज्यों ही सामदेई आयी, भरथरी उसके रूप पर आसक्त हो गये। किन्तु सामदेई का मुखमंडल पीला पड़ने लगा। सामदेई को ज्ञात हो गया कि भरथरी उसके पूर्व जन्मा का बेटा है। अब वहाँ पति बनने के लिए विवाह मंडप पर बैठा है। परंतु सामदेई ने ईश्वर के निर्णय के समुख स्वयं को समर्पित कर दिया और इस तरह विवाह हो गया।

तिलक दहेज के सामानों में सैकड़ों दासियां भी थीं, सामदेई की सभी प्रिय वस्तुएँ थी। पालकी उज्जैन में उतरी। रानी रूपदेई ने अपने पुत्र की तरह अतुलनीय सौंदर्य वाली पुत्रवधू देखकर खुशी से ब्रह्मणों को दान दिया और आदर तथा स्नेह से सामदेई को लिवा लायी।कोहबर घर में सोने का पलंग बिछा और चौमुख दीये जला दिये गये। फूलों की सेज बिछी और पूरा कोहबर गमगम करने लगा।

छुईमुईं की तरह सामदेई पलंग पर बैठी थी कि उधर से भरथरी आ गये। सामदेई का मन फिर धिक्कार कर उठा। पूर्व जन्म का बेटा इस जन्म में उसका पति बनकर उसको भोगने के लिए उपस्थित हुआ है. इतना सोचकर ही वह काँप उठी। उसने ईश्वर का स्मरण किया। भरथरी ने जैसे ही पहला पाँव पलंग पर दिया, हाय रे ईश्वर। कैसा अपशकुन! पलंग चरमरा कर टूट गया। सोने का नया पलंग टूटा कैसे? आश्चर्य।

इधर, सामदेई ने उठाकर हँस दिया। भरथरी के क्रोध का ठिकाना न रहा, उन्होंने सामदेई से पूछा- ऐसा अपशकुन आखिर हुआ कैसे। सामदेई टालती गई, पर भरथरी नहीं माने। हारकर सामदेई ने कहा कि यह रहस्य उसकी बहन पिंगला ही बता सकती है, जो दिल्ली में ब्याही जा चुकी है। भरथरी उलटे पाँव रंगमहल से लौट पड़े और चिता में पड़ गये। कई वर्षों तक उनमें और सामदेई में नाम मात्र का ही पति पत्नी संबंध रहा। दोनों एक-दूसरे से अलग-अलग ही रहे।

भरथरी ने दीवान से कहलवाकर अपने राजदक्षेत्र के बावन सूबों में चिट्ठियाँ भिजवायी। सूबों के सूबेदारों भोज, ताल्हन, विक्रम, पृथ्वीसिंह, झन्ना-पन्ना, टोडरसिंह, जाफर खाँ मुगल, बारह सय्यद, गोसाई भोला गिरि, नित्यानंदलाल आदि को सूचना मिली। सबने लाव-लश्कर को साथ लिया। ताल्हन ने नौ लाख घोड़ों को अस्तबल से खोलवा लिया। इधर झन्ना-पन्ना दोनों ठाकुर भी तैयार हुए।

भोज ने तिरपन लाख घोड़ों के साथ चलने की तैयारी की। जयपुरवाले भोलागिरि ने साठ हजार अशर्फियाँ ली और उज्जैन को चले। जाफर खाँ के साथ चले नौ लाख साँड़नी सवार। बारह सय्यदों ने एकदम झक्क सफेद नौ लाख घोड़ों के साथ प्रयाण किया। माखनसिह ने बावन लश्करों को साथ लिया। बावन सूबों से लोग आ गये, किंतु गढ़ मोहबा से आल्हा-ऊदल दोनों भाई नहीं आये। मंत्री ने सलाह दी भरथरी को कि उन्हें भी बुलाया जाये। क्रोध के मारे भरथरी जैसे जलकर राख हो गये।

इतना बचन सुनके भरथरी जल बल हो गया खाक
तब तो बोला राजा भरथरी मंत्री सुन मेरी बात
कौन देश कौन वह राजा है हम नेवता देत पठाय
कहीं जगह-जमीन का मालिक नहीं दे नेवता पठाय
बीच में देवी उनको वर दिया विधना क्या करतार
मार लूट-पाट खाता है नेवत्ता कैसे देत पठाय

भरथरी ने कहा कि आल्हा ऊदल कोई राजा नहीं कि उन्हें सादर निमंत्रण भेजा जाये। वे तो देवी के वरदान से लूट-पाटकर खाने में सफल हो जाते हैं। परंतु, मंत्री ने समझाया-बुझाया तब भरथरी ने अपने हाथ चि‌ट्ठी लिखी आल्हा ऊदल को।

घोड़ा बिदेला पर दोनों भाई आये।
भरथरी ने दोनों भाइयों को पूरी सेना की बागडोर थमा दी।

बारह हजार तुरही और चौदह हजार नाल चिक्कारते चले, सात लाख तंबुओं को बाँध फ़ौज चल पड़ी ।
बारह हजार तुरही बोलता है चौदह हजार कर नाल सात लाख तम्बू मैदान आ गये उड़ता धूल है आज
रास्ते में भरथरी प्रजा के दुखड़े सुनते चले, उनकी समस्याओं को दूर करने के आदेश मंत्री को दिये।

भरथरी सदल-बल जब पहुँचे तो दिल्ली के महाराज मानसिंह पिंगला के पास आकर भय से कांपने लगे। पिंगला ने उठाकर हँस दिया उसने मानसिंह को धैर्यं दिया और कहा कि ईश्वर सबके खाने-पीने का बंदोबस्त कर देंगे। पिंगला ने भोलेनाथ का स्मरण किया, तो उसके हाथ में पाँच अक्षत आ गये। उसने पहला अक्षत दाल-चावल में दिया, दूसरा मेवा-मिष्ठान्न में, तीसरा तेल-फुलेल में, चौथा घी में और पाँचवाँ तालाब में। ईश्वर की कृपा हुई कि संपूर्ण लाव-लश्कर ने छककर खाया-पीया, पर भंडार न घटा।

खाने-पीने के बाद पाँच नौकरानियों ने जाकर पिंगला से मिलने के लिए भरथरी को निवास में बुला लिया। पिंगला के बच्चे को आशीर्वाद देने और इधर-उधर की बातचीत के बाद भरथरी ने पिगला से पूछा पलंग टूटने और सामदेई के हँसने का रहस्य। पिंगला ने इधर उधर की बातों में भरथरी के प्रश्न को टालना चाहा, पर वह मानें नहीं। तब पिंगला ने अचंभेवाली बात कहीं।
उसने कहा कि आज शाम वह जब सोयेगी, तो सर्पदंश से उसकी मृत्यु हो जायेगी और तब वह कोइरिन के घर जन्म लेगी। तब उसके प्रश्न का उत्तर दे सकेगी। सचमुच पिंगला मर गई। लाव-लश्कर के साथ भरथरी उज्जैन लौट आये। फिर अकेले योगी के वेश में पिगला के कहे अनुसार कोइरिन के घर जा पहुँचे। वहाँ हाल ही पिगला का जन्म हुआ था। कोइरिन को किसी बहाने घर से बाहर भेजकर भरथरी ने उससे वही सवाल किया। तब पिंगला ने कहा कि वह आज शाम फिर मर जायेगी और सूअर के रूप में उसका जन्म होगा, तभी उसके प्रश्न का उत्तर देगी।

पिंगला सूअर के रूप में जन्मी, कुतिया के रूप में जन्मी, फिर उसका जन्म सियार के रूप में भी हुआ, वह सर्प के रूप में भी जन्मी, पर हर बार भरथरी को अगले जन्म में उत्तर देने का वादा कर टालती रही। अगले अन्य कई जन्मों में भी पिंगला की मौत शिशु रूप ही में हो गई। इधर, पिगला जिस दिन दिल्ली की रानी के रूप में संसार को छोड़ चली, उसी दिन से उज्जैन छोड़कर अपने प्रश्न के उत्तर के लिए उसके पीछे भटक रहे है भरथरी।

उधर, पिगला और मानसिंह का बेटा वंशीधर बड़ा हो गया है. दूसरी तरफ पिंगला भी ब्याहने लायक हो गई है गढ़ गोदिया के राजा ओदम सिंह के घर उनकी पुत्री फुलवा बनकर। संयोग कि कुछ जन्म पूर्व पिंगला के गर्भ से बेटे के रूप में जन्में बंशीधर के साथ फुलवा यानी पिंगला ही का विवाह तय हो जाता है। विवाह के मंडप पर राजा भरथरी बीकू माली का रूप धरे बैठे हैं। ओड़म सिंह को किसी तरह पता चल जाता है कि उज्जैन से कुछ वर्षों पूर्व लापता हुए भरथरी ही बीकू माली के रूप में बैठे हैं।

जब भरथरी से उनका परिचय पूछा गया, तो उनसे झूठ कहा नहीं गया। वह रोने लगे और बता दिया कि वही भरथरी है। विवाह मंडप के सभी प्रतिष्ठित लोगों ने तब आदर के साथ भरथरी का चरण स्पर्श किया। डोली दिल्ली के लिए चल पड़ी।बीच रास्ते में भरथरी ने डोली रुकवा ली और कहा कि पहले तू साली थी, अब पुतोहू हुई। जो तुम्हारा पुत्र था कभी, वही आज तुम्हारा पति बना हुआ है। खैर, मेरे प्रश्न का उत्तर आज दे देना होगा।

फुलवा ने डोली से निकलकर बता दिया भरथरी को जीवन का समूचा दर्शन। उसने कहा कि जिस तरह किसी जनम का बेटा वंशीधर आज उसके फुलवा रुप में जन्मने पर उसी का पति बन गया है। उसी तरह, सामदेई इस जन्म में भरथरी की पत्नी बनी है। किंतु पिछले जन्मों में वह उनकी बेटी और माँ के रूप में भी पैदा हो चुकी है। फुलवा ने कहा कि इस तुच्छ जीवन की नियति यही है। मनमाने, तो इस जीवन के लिए जीया जाये, नहीं तो इससे मुक्ति के लिए योग का रास्ता लिया जाये।

बोली वचन रानी फुलवा ने राजा सुन मेरी बात
आगे जनम की है माँ तेरी राजा भरथरी एक जनम
कन्या तेरी कुँवर सुन मेरी बात
तेरे सामने बेटा जन्मा विधना क्या करतार
वह ऐसे ही मैया रानी थी कुँवर सुन मेरी बात
मन माने तो भोग कर ले मन माने योग साध

इतना कहकर फुलवा डोली में चढ़ी और दिल्ली शहर के लिए डोली चल पड़ी। राजा संसार की नियति से दुःखी हो गये। उन्होंने मन-ही-मन इस निकृष्ट जीवन के लिए ईश्वर को धिक्कारा। उज्जैन लौटे, पर मन बेहद अवसन्न, खिन्न था। रानी सामदेई ने प्यार से हँस-हँसकर बातें की। किंतु उनकी ओर से भरथरी ने अरुचि से मुँह फेर लिया। क्रोध से अवश होकर वह शिकार करने जंगल की ओर चले।

सामदेई ने मना किया, लेकिन नहीं माने। तब रानी ने पूछा कि जंगल में कुछ अनिष्ट हो गया, तो उसके इसका पता कैसे चलेगा? भरथरी ने कहा कि आँगन की तुलसी जिस दिन सूख जायेगी, समझना भरथरी इस संसार में नहीं। भरथरी ने बावन लाख की कलंगी सिर पर रखी है, नौ लाख के कुंडल पहने कानों में और लाखों का हार गर्दन में डाल लिया। सज-धज कर सल्ला कमान लिया और फाँदकर घोड़े पर चढ़ लिए। भरथरी का सौंदर्य देख दिर-दिगंत तृप्त हो रहे हैं।

बावन लाख को कलंगी कुँवर लिया सिर पर डारी
कानो कुंडल नौ लाख का गले लाखों का हार बाँहों पर
लाख कुँवर बौध लिया विधना क्या करतार सल्ला कमान
उनके बगलों में काबुल का बछेड़ा फौद के सवारी
घोड़ा कर लिया गंगा जमुना चाबुक शोभित है
उनके हाथ घोड़िया से हो पाँच पोर की किल्ली है
उसके नाम क्या रे चौद तेरी चाँदनी जैसे जनमवा का चाँद
हाय रे सकल राजा भरथरी को विधना क्या करतार

सिंहलद्वीप के जंगल में सत्तर सौ मृगाओं को एक काले मृग के पीछे बावरी होकर चलते देखा। भरथरी जब काले रंग के मृग पर बाण साधने लगे, तब बेहद विनीत और आहत स्वर में कई मृगाओं ने मना करते हुए कहा कि यदि उन्हें शिकार खेलने का शौक है, तो मृगाओं में से कुछ को मार लें। एक काले मृग के मर जाने से सत्तर सौ मृगाओं को वैधव्य का दुःख झेलना पड़ेगा। परंतु, भरथरी नहीं माने, काले मृग पर लगातार कई बाण चला दिये। मरते-मरते काले मृग ने सींग अवधूत को और माँस गिद्धों को दान दे देने की प्रार्थना की और खाल का आसन बनाने की इच्छा व्यक्त की।

सत्तर सौ मृगाओं ने दुःखी होकर भरथरी को शाप दे दिया- जिस तरह मृग की सत्तर सौ स्त्रियाँ विधवा हुई है, उसी तरह भरथरी की स्त्री भी पतिविहीन हो जाये और उनका महल सूना हो जाये। मृगाओं के दुःख से भरथरी द्रवित होकर मूग को जिलाने का उपाय खोजने लगे। उन्होंने फिर ईश्वर को धिक्कारा कि प्राण लेने का कौशल उसने मनुष्य को दिया, लौटाने वर क्यों नहीं।

भरथरी योगीश्वर गोरखनाथ के पास पहुँचे, उनके पीछे-पीछे सत्तर सौ मृगाएँ पहुँची। गोरखनाथ ने कुछ क्षण बाद मृगको प्राणदान दे दिया, तब सावन के मोर की तरह सत्तर सौ मृगाएँ नाचने लगीं। भरथरी को लगा कि संसार से मुक्ति का मार्ग गुरू गोरखनाथ के सिवा और नहीं। उन्होंने गोरखनाथ से आग्रह किया कि भरथरी को शिष्य रूप में ग्रहण करें। गोरखनाथ ने कहा कि अभी उनकी रानी ने पत्नी होने का कोई सुख नहीं भोगा, अतः भरथरी कुछ दिन पत्नी के साथ रह लें, उसके बाद उनकी शरण में आ जायें।

परंतु, भरथरी नहीं माने। उन्होंने सारे राजसी आभूषण उतारकर गोरखनाथ के हवन कुंड में रख दिये और अंगों में भभूत लगाकर योगी बन गये। ऐसा देख, कैलाश पर तपलीन भोलेनाथ का हृदय द्रवित हो गया, इन्द्र का आसन डोल गया। ब्रह्मा मुँह और आँखें बंदकर शोकाकुल हो गये।

शिवजी कलपे कैलाशों में इन्द्रासन डोलने लगा
मुख ब्रह्मा जी जो बंद किया जुलुम भइल हो राम

उधर, उज्जैन में तुलसी सूख गई और भरथरी की मृत्यु का आदेश कर रानी सामदेई विलाप करने लगीं। रानी का विलाप देख संपूर्ण उज्जैन शोकाकुल हो गया। हाथी-घोड़े सब घबराने लगे। महल का स्वर्णबुर्ज ढह गया। विधवा की तरह, सारे आभूषण और वस्त्र त्याग कर सामदेई कई दिनों बेहोश होकर आँगन में पड़ी रहीं। एक दिन सेविकाओं ने आकर सूचना दी कि कोई योगी रानी के हाथों भिक्षा लेने की इच्छा से द्वार पर धूनी रमाकर बैठ गया है।

सामदेई ने अपनी सखी-सी नौकरानी चंपा से कहा- जब उम्र भर की एकादशी और चौबीस लाख ब्राह्मणों को दिया गया दान काम नहीं आया, भोलेनाथ पर चढ़ाया गया बारह लाख काँवर जल का पुण्य जब मेरे दुःख को टाल नहीं सका, तो एक योगी को दान देने से क्या लाभहोगा। चंपा! जाकर कह योगी से कि रानी के करम में आग लग गई है, वह दूसरी ड्योढ़ी भिक्षाटन को निकल जाये।

चंपा ने जाकर वैसे ही कह दिया योगी से। पर योगी माना नहीं। तब, विवश होकर पर्दे की ओट से सामदेई ने सारा हाल कह सुनाया। तब, योगी ने कहा कि कुँवर मरा नहीं है, उसने अपना रूप बदल लिया है। उसने अपने सारे आभूषण दान कर दिये हैं। सिंहलद्वीप के पास समुद्रतट पर उसकी भेंट हुई थी कुँवर से। उसने उसे सोने का कंगन उतार कर दिया है। कुँवर जीवित है।

योगी ने कंगन उतारकर दिखाया, तो वह जैसे मरे से जी गई। उसने आदेश दिया कि ऐस शुभ संदेश देने वाला योगी अवश्य कोई सिद्ध पुरूष है, इसके रहने और खाने-पीने वा विशेष प्रबंध कर दिया जाये तथा दानस्वरूप पाँच सौ अशर्फियों दे दी जायें। कई दिनों तक योगी धुनी रमाये बैठा रहा। एक दिन उसने रानी से आग्रह किया कि वह अपने हाथों दान देकर उसे विदा करे।

परंतु सामदेई ने दासी चंपा के हाथों भिक्षा भेज दी। उस दिन कहलवा भेजा कि जिस दिन कुँवर लौट आयेंगे, उसी दिन अपने हाथों से उसे ढेर सारे उपहार देगी। रानी सामदेई का संदेश सुन योगी उठाकर हँस पड़ा। मोतियों से दाँतों की चमक देख चंपा ने पहचान लिया अरे! यह तो साक्षात् कुँवर महाराज हैं। चंपा के पाँवों में पंख लग गये, वह सामदेई के सम्मुख जाकर कहने लगी कि वह योगी और कोई नहीं कुँवर महाराज भरथरी हैं।

सुनकर सामदेई रोने लगी, उसने क्रोध के मारे चंपा के लिए फाँसी का आदेश दे दिया, उसने कहा कि यह ईश्वर का ही कोप है कि आज समय बिगड़ा है तो अपनी सखी-सी दासी योगी लगाकर उसे गाली दे रही है।कार्तिक मास की एकादशी। चंपा ने आग्रह किया कि गंगा-स्नान और शिवपूजन के बाद उसे फाँसी दी जाये। गंगा स्नान करने के बाद चंपा ने आँचल फैलाकर दीनानाथ महादेव का स्मरण किया।

फाँसी घर के लिए चाण्डालों ने चंपा की डोली उठा ली। चंपा ने ड्योढ़ी के समीप आकर चांडालों से आग्रह किया कि एक बार योगी के दर्शन करा दें। चांडालों ने चंपा की अंतिम इच्छा पूरी की। योगी वेश में आये भरथरी ने जब चंपा से उसकी फाँसी की बात सुनी, तब अपना असली रूप प्रकट किया और चांडालों से मुक्त कराकर चंपा को सामदेई के पास ले गये। उन्होंने सामदेई को बतला दिया कि चंपा का कहा झूठ नहीं है।

सामदेई और भरथरी की आँखे मिलीं, लगा जैसे पानी के बिना तड़पती मछली को एक बूँद का आधार मिल गया। सामदेई चंपा के पैरों में गिर पड़ी ब्रह्मा ने तुझे बचा लिया।

चारि चश्म मिल गया जो रानी सामदेई आज
मीन तलफे जल बिन योगी योगवा बिना
गृहस्थ तलफे जल बिन योगी योगवा बिना
लौंडी के चरणों पर गिर गई रानी सामदेई
विधना क्या करतार ब्रह्मा ने तुझे लिया बचाय

फिर, सामदेई भरथरी के पैरों से लिपटकर रोने लगी। उसने कहा यदि योगी ही बनना था, तो उस दिन क्यों नहीं बने, जिस दिन माँ-बाबा की गोदी में थे। आप योगी हो गये, तो मेरा क्या होगा? भरथरी मौन रहे, उनके चेहरे पर महाशून्य का भाव था। वह चलने को हुए, तब रानी सामदेई भी साथ चलने को तैयार हुई। कितु, भरथरी ने उसे रोक दिया, उन्होंने कहा- 'सारे रिश्ते तो केवल नाम के हैं। असली रिश्ता तो मनुष्य का ईश्वर से है। उन्हें ही प्राप्त करने को निकला हूँ मैं।' भरथरी ने सामदेई को पुकारा - माँ, भिक्षा दो।

ड्योढ़ी पर जुटे सारे लोग भौंचक्के रह गये। रानी मूच्छित होकर गिर पड़ी-भरथरी ने माँ कैसे कह दिया पत्नी को ?!

सामदेई ने चंपा को भरथरी के बहिनोई और गढ़ झुनवा के राजा त्रिलोकचंद के पास भेजा तथा भरथरी को मनाने के लिए भरथरी की बहन मैनावंती और भांजे गोपीचंद को बुलवाया। भरथरी के योगी होने की सूचना पाकर मैनावंती मूच्छित हो गिर पड़ी। गोपीचंद ने तो प्राण ही त्याग दिये। अब, उलटे पुनः उज्जैन सूचना गई। भरथरी ने आकर दोनों को योगबल से प्राणदान दिया।

उज्जैन और गढ़ झुनवा की प्रजा में हाहाकार मच गया। भरथरी ने सभी औरतों को माँ कहकर भिक्षा ली। सामदेई और बहन मैनावंती भी आँखों में आँसू भरकर योगी भरथरी के लिए भिक्षा ले आयीं। जैसे सबके प्राण लेकर राम अनुज और पत्नी के साथ वन को गये थे, भरथरी भी चले। अंग भभूत, गेरूआ वस्त्र, हाथ में खप्पड़; अमित ध्वनि-"अलख निरंजन !"

सारे वन उपवन मौल्हाने लगे, एक-एक कर सारी स्त्रियाँ मूच्छित होकर गिर पड़ीं, पुरूषों का पौरूष उनके शरीरों का साथ छोड़ चला और सामदेई? सामदेई के प्राण तो कब के उड़ चले, शायद भरथरी के पद चिह्नों का अनुगमन करते।

लेख-
अश्विनी कुमार आलोक
चौमासा अंक-56

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