भारत विभाजन की विभीषिका
August 13, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | भाद्रपद कृष्ण द्वादशी | बुद्धवार
नक्षत्र: मघा | योग: शुभ | करण: तैतिल
पर्व विशेष : | तदनुसार 07 अक्टूबर 2026

मानवीय सभ्यता के इतिहास में मनुष्य कई बार बलात और अनचाहे विस्थापनों का शिकार हुआ है, कभी प्राकृतिक कारणों से तो कभी मानवीय कारणों से। इन विस्थापनों ने जहाँ एक ओर भयावह त्रासदी, अकल्पनीय मानवीय विनाश, दु:ख, आँसू और पीड़ा की हाहाकारी कहानियों को जन्म दिया वहीं दूसरी ओर मनुष्य की दुर्दमनीय जिजीविषा को बार-बार रेखांकित किया।
आजादी के नाम पर हमारे अविभाजित देश को भारत और पाकिस्तान में बांटा गया। 20 फरवरी 1947 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली के द्वारा की गई घोषणा के आधार पर 3 जून 1947 को माउंटबेटन द्वारा प्रस्तुत योजना के मुताबिक, ब्रिटिश भारत को भारत और पाकिस्तान में विभाजित कर आजाद किया जाना था। इसके तहत बंगाल और पंजाब का विभाजन होना था एवं असम के सिलहट जिले का जनमत संग्रह के आधार पर विभाजन होना था।

ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली
आजादी के लिए 15 अगस्त की जो तिथि चुनी गई, वह थी द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान के आत्मसमर्पण की दूसरी वर्षगांठ की तारीख। मतलब, 3 जून 1947 से 15 अगस्त 1947 के बीच केवल ढाई माह के अत्यल्प समय में इतने बड़े देश का विभाजन हुआ। आपाधापी में तैयार किए गए धर्म आधारित देश विभाजन के प्लान को तुरत-फुरत लागू किए जाने की हड़बड़ी में, दुर्भाग्य से, मानवीय विस्थापन की कोई सुनियोजित प्लानिंग नहीं की गई।
कैसी विडम्बना कि विभाजन का कार्यान्वयन कैसे होगा, इसमें कितना समय लगेगा, लोगों का सुरक्षित तथा गरिमापूर्ण विस्थापन कैसे होगा, विस्थापित हुए लोगों का पुनर्वास कैसे होगा, विभाजन तथा पुनर्वास का बजट कितना होगा आदि किसी भी मुद्दे पर कोई भी काम नहीं किया गया।

3 जून 1947 की माउंटबेटन योजना
भारतीय उपमहाद्वीप में अगस्त का मध्य मतलब है, भारी बारिश का समय। भरी बरसात में हिंदुस्तान और पाकिस्तान दोनों ओर के लाखों-लाख लोगों का विस्थापन कितना अव्यवहारिक, कितना अमानवीय, कितना कष्टप्रद, कितना हाहाकारी होगा; इनपर भी किसी भी पक्ष ने- न अंग्रेजों ने, न कांग्रेस ने और न ही मुस्लिम लीग ने - गौर करने तक की जरूरत समझी।
15 अगस्त 1947 को जहाँ देश के अन्य सभी हिस्सों के खाते में आजादी का जश्न आया, पंजाब-सिंध और बंगाल की झोली में बँटवारे से उपजे मातम और खून खराबे और अनचाहे विस्थापन के निर्मम काँटे आए। दरअसल, आजादी की मनहूस घोषणा के महीनों पहले से ही पूरे देश में हिन्दू और मुसलमान दोनों समुदायों के बीच का वैमनस्य बढ़ने लगा था। समय बड़ी तेजी से करवट बदल रहा था। इतनी तेजी से कि भयाक्रांत आमजन मुँह बाए उसकी चाल को समझने का असफल प्रयास करते रह गए। मुसलमानों का अपना होमलैंड होगा, यह कल्पना मुस्लिम समुदाय में उत्तेजना और उन्माद बढ़ाने को पर्याप्त थी।
इसके चलते गैर मुस्लिम लोगों को अपना सब कुछ छोड़-छाड़ कर पाकिस्तान के दोनों हिस्सों, पश्चिम और पूर्वी से हिन्दू बहुल दूसरी ओर भागना पड़ा। वे भागे अपनी जान बचाने। वे भागे, अपना धर्म और बहू-बेटियों की इज्जत बचाने के लिए। कमोबेश यही स्थिति हिंदुस्तान से पंजाब जाने वाले मुसलमानों की थी। किन्तु पूर्वी बंगाल के मुसलमान इस मामले में खुशकिस्मत थे। वहाँ विभाजन की मार केवल हिन्दुओं पर पड़ रही थी।

घर और भूमि पीछे छोड़कर सुरक्षित स्थानों की ओर बढ़ता शरणार्थियों का काफिला।
रिलीजन आधारित विभाजन की शर्त पर मिली हमारी आजादी का दामन त्रासद विस्थापन के रक्त छीटों से बुरी तरह सना हुआ है। इस विभाजन के चलते हुए भीषण दंगों में अनुमानित बीस लाख लोग मारे गए और लगभग दो करोड़ लोग विस्थापित हो शरणार्थी बनने को मजबूर हुए। इस महा विस्थापन की विभीषिका की कल्पना इस बात से की जा सकती है कि पाकिस्तान बनाने के नाम पर हुए भीषण सांप्रदायिक मारकाट की वजह से लाखों लोगों को या तो बर्बरता के साथ मार डाला गया या फिर मुसलमान बनने को बाध्य किया गया।
पाकिस्तान से हिंदुस्तान और वैसे ही हिंदुस्तान से पाकिस्तान को आने वाली ट्रेनें निरीह, बेकसूर, असहाय लोगों की लाशों से भरी आने लगी। इसी तरह, पूर्वी पाकिस्तान में स्टीमरों और नावों के जरिये भारत आने वालों को बीच नदी में ही काट डाला गया। लाखों अभागी, बेबस स्त्रियों के शील, गरिमा एवं सम्मान का क्रूर दलन किया गया।
उन्हें नग्न कर उनकी सरेआम नुमाईश की गई, उनके साथ भीड़ के द्वारा सामूहिक बलात्कार किया गया, उन्हें जिंदा जलाया गया या जानवरों की तरह बोली लगाकर बेचा गया। इतना ही नहीं उन्मादियों द्वारा नवयुवतियों के पुष्ट स्तनों को काट कर मांस के उन लोथड़ों से फुटबाल की तरह खेला गया। उनके साथ के मर्दों का बेदर्दी से कत्ल किया गया। अफसोस, धर्म आधारित विभाजन की विभीषिका की मारी उन लाखों अभागी महिलाओं की बेचारगी, दु:ख, अपमान और यंत्रणा को कभी किसी इतिहास में अंकित नहीं किया जाएगा।

लगभग 1.5 करोड़ लोगों विस्थापन
इस देश विभाजन का सबसे अधिक दर्द सिंध और पंजाब के सिखों एवं हिंदुओं के साथ बंगाल के हिन्दुओं ने सहा। इसमें भी बंगाल निर्विवाद रुपेण देश विभाजन के दर्द का सर्वाधिक भुक्तभोगी रहा। विभाजन के दौरान हुई क्रूर हिंसा का प्रतिरोध पंजाब के लोग बंगालियों के मुक़ाबले अधिक सशक्त रूप से कर सके, क्योंकि एक तो वे सामाजिक रूप से बंगालियों से अधिक संगठित थे।
दूसरे, उन्हें बंगाल में हुए 1943 के भयावह अकाल जैसी किसी महा त्रासदी ने थकाया-तोड़ा नहीं था। तीसरे, उन्हें हिन्दू बंगालियों की तरह विभाजन के ठीक पहले अगस्त 1946 के ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ और उसके कारण फैले बंगाल व्यापी भयावह दंगों का शिकार नहीं होना पड़ा था और चौथे, उन्हें विभाजन के उस दर्द को किश्तों में दशक दर दशक नहीं झेलना पड़ा था।
धर्म आधारित देश के विभाजन के समय पूर्वी बंगाल के सभी हिन्दुओं के लिए अपनी माटी को एकबारगी छोड़ना संभव न हुआ। इसके पीछे सामाजिक, आर्थिक, शारीरिक और रागात्मक- भावनात्मक कारण थे। परंतु परवर्ती समय में धार्मिक उन्माद के उफानों ने उन्हें सामूहिक रूप से विस्थापित होने बार- बार बाध्य किया। 1946-47 में, देश बँटवारे के बाद सन 1950 में, फिर 1964-65 में जब-जब इस्लामिक सांप्रदायिक उन्माद उफान पर आया, हिन्दुओं को पूर्वी पाकिस्तान से सामूहिक रूप से विस्थापित होना पड़ा।

सियालदह स्टेशन पर पूर्वी पाकिस्तान से आए शरणार्थी
देश विभाजन के फलस्वरूप लाखों लोग अपने पुरखों की माटी, भाषा-संस्कृति, इतिहास, घर-द्वार और देखे गए सपनों को छोड़ कर एक अनिश्चित, अनदेखे और अनचीन्हे भविष्य के प्रवास को बाध्य हुए। रुपया-पैसा, घर-द्वार, नौकर-चाकर, सुख-संपत्ति, आशा-स्वप्न - सबकुछ छीन लिया इस ने विभाजन।
करेले पर नीम चढ़ा यह कि जो लाखों लोग शरणार्थी के रूप में भाग कर भारत की मुख्य भूमि में आए, उनको पुनर्वास देने के लिए भारत सरकार की कोई तैयारी नहीं थी, कोई दीर्घकालीन नीति या कोई पूंजीगत बजट प्रावधान नहीं था। फलत: कल तक के स्वावलंबी किसान, बुनकर, श्रमिक, खाते-पीते अच्छे-भले घरों के लाखों लोग शरणार्थी बन भूख के मारे दर-दर की ठोकर खाने मजबूर हो गए। ऐसी हालत में बुनियादी शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं से महरूम उनके नौनिहालों पर सालों तक क्या बीती, इसका अनुमान कठिन नहीं। उनकी पूरी एक पीढ़ी का भविष्य अंधकारमय हो गया। इनकी असंख्य करुण-दिल मसोसने वाली कथाएँ अब स्मृतिशेष हो चली हैं।

शरणार्थी शिविर और पुनर्वास
कहने में कोई संकोच नहीं कि सिंध, पंजाब और बंगाल के संत्रस्त लोगों के हाहाकार, आह और आंसुओं की कीमत पर देश के दूसरे भागों में लोगों ने मुक्ति का स्वाद चखा, स्वच्छंदता का सुख अनुभव किया। अपने ही लोगों को अंधेरे में धकेल कर शेष पूरा देश आलोकमय हो उठा।
समूची मनुष्यता को कलंकित करने वाले उस करुण विस्थापन की महागाथा में कई मार्मिक और झकझोरने वाली ज्ञात-अज्ञात कथाएँ समाहित हैं। इस विस्थापन ने ऐसी कटु स्मृतियाँ, छवियाँ, घृणाएँ, अविश्वास और कट्टर पहचानें रच दी हैं कि वे मिटाए नहीं मिटेंगी।
लेख-

श्री प्रतिभू बनर्जी
(लेखक एक सेवानिवृत्त मुख्य बैंक प्रबंधक, 'राजभाषा गौरव' से सम्मानित प्रतिष्ठित हिंदी साहित्यकार और एक समर्पित समाजसेवी हैं, जिनके पारिवारिक और व्यक्तिगत अनुभवों में विभाजन की विभीषिका व पीड़ा आज भी जीवित है।)
श्राद्ध और तर्पण: पितृ स्मरण की परम्परा
September 26, 2026